18/08/2026
दिनांक 17-08-2026 को महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय, गोरखपुर के गुरु गोरक्षनाथ इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, आयुर्वेद महाविद्यालय के संहिता सिद्धान्त एवं संस्कृत विभाग, भारतीय ज्ञान परम्परा केन्द्र एवं राष्ट्रीय सेवा योजना के संयुक्त तत्वावधान में पंचकर्म सभागार में चरक जयंती एवं संस्कृत सप्ताह के समापन समारोह का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम विभागाध्यक्ष डॉ. शान्ति भूषण हंडूर, डॉ. प्रज्ञा सिंह एवं आचार्य साध्वी नन्दन पाण्डेय के मार्गदर्शन में सम्पन्न हुआ । कार्यक्रम का शुभारम्भ मुख्य अतिथि वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. एस. एन. सिंह, विशिष्ट अतिथि डॉ. प्रकाश चन्द्र त्रिपाठी, प्राचार्य डॉ. गिरिधर वेदांतम, डॉ कमलेश पांडे, डॉ विनम्र शर्मा एवं डॉ. प्रज्ञा सिंह द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया। दीप प्रज्वलन के पश्चात् विद्यार्थियों एवं उपस्थित अतिथियों ने भारतीय ज्ञान परम्परा और आयुर्वेद की समृद्ध विरासत के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की । मुख्य अतिथि डॉ. एस. एन. सिंह ने अपने मुख्य व्याख्यान में आचार्य चरक के आयुर्वेद में अमूल्य योगदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि चरक संहिता केवल चिकित्सा का ग्रन्थ नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन और मानव कल्याण की समग्र दृष्टि प्रस्तुत करने वाला महान ग्रन्थ है। उन्होंने वर्तमान समय में आयुर्वेद के वैज्ञानिक अध्ययन, विकास एवं व्यापक प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने विद्यार्थियों से शास्त्रीय ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जोड़कर आगे बढ़ाने का आह्वान किया । इस अवसर पर माधवकर एवं नागार्जुन बैच के विद्यार्थियों द्वारा संहिता विभाग के मार्गदर्शन में तैयार की गई रचनात्मक कृति ‘श्लोकावली’ का विमोचन किया गया। विद्यार्थियों द्वारा तैयार इस कृति में संस्कृत एवं शास्त्रीय ज्ञान के प्रति उनकी रुचि एवं रचनात्मकता का परिचय मिला ।
चरक जयंती के अवसर पर विद्यार्थियों ने संस्कृत नाटिका प्रस्तुत कर आचार्य चरक के जीवन, आयुर्वेदिक चिकित्सा-दृष्टि तथा लोककल्याण की भावना को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। नाटिका ने उपस्थित दर्शकों को भारतीय चिकित्सा परम्परा की गौरवशाली विरासत से परिचित कराया।
डॉ. पी. सी. त्रिपाठी, सेवा प्रमुख, विश्व आयुर्वेद परिषद, उ.प्र. ने अपने संबोधन में आयुर्वेद की महत्ता एवं वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आयुर्वेद की जीवनशैली आधारित दृष्टि आज की अनेक स्वास्थ्य चुनौतियों के संदर्भ में अत्यन्त उपयोगी है। उन्होंने विद्यार्थियों से आयुर्वेद के मूल सिद्धान्तों को समझकर उन्हें समाज तक पहुँचाने का आह्वान किया । डॉ. ज्वाला प्रसाद मिश्रा, उपाध्यक्ष, विश्व आयुर्वेद परिषद, उ.प्र. ने आयुर्वेद के व्यापक उपयोग एवं उसकी लोककल्याणकारी भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आयुर्वेद की शक्ति उसके समग्र स्वास्थ्य-दृष्टिकोण में निहित है। उन्होंने आयुर्वेद के शास्त्रीय ज्ञान के संरक्षण तथा उसके वैज्ञानिक विकास की आवश्यकता पर बल दिया । कार्यक्रम में नागार्जुन बैच के छात्र राजेश द्वारा प्रस्तुत मनमोहक गीत ने वातावरण को सांस्कृतिक रंग से भर दिया। इसके साथ ही संस्कृत सप्ताह के अन्तर्गत आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को पुरस्कार एवं प्रमाण-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया । समारोह के समापन अवसर पर प्राचार्य डॉ. गिरिधर वेदांतम ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परम्परा, संस्कृत एवं आयुर्वेद के संरक्षण, संवर्धन एवं विकास के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को आधुनिक शिक्षा के साथ अपनी शास्त्रीय एवं सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ना चाहिए। उन्होंने संस्कृत और आयुर्वेद को भारतीय ज्ञान परम्परा की महत्वपूर्ण धरोहर बताते हुए इसके व्यापक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया । कार्यक्रम के अन्त में डॉ. प्रज्ञा सिंह ने आभार ज्ञापित करते हुए मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथियों, प्राचार्य, विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण, विद्यार्थियों एवं आयोजन से जुड़े सभी सहयोगियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन विद्यार्थियों में ज्ञान के साथ-साथ संस्कार, सृजनशीलता और अपनी परम्परा के प्रति गौरव की भावना विकसित करते हैं । इस अवसर पर प्राचार्य डॉ. गिरिधर वेदान्तम, उप प्राचार्य डॉ. कमलेश कुमार पांडेय, डॉ. देवी नायर, डॉ. प्रज्ञा सिंह, डॉ. विनम्र शर्मा सहित महाविद्यालय के अनेक शिक्षकगण एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे। पूरे कार्यक्रम का सफल संचालन एवं प्रबंधन शिवांश सिंह, विपुल कुमार शर्मा, ध्रुव अग्रवाल एवं अरुष पाठक द्वारा किया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने में माधवकर एवं नागार्जुन बैच के विद्यार्थियों का विशेष सहयोग रहा । सम्पूर्ण समारोह ज्ञानवर्धक, सांस्कृतिक एवं प्रेरणादायी रहा। कार्यक्रम ने विद्यार्थियों में आयुर्वेद, संस्कृत एवं भारतीय ज्ञान परम्परा के प्रति जागरूकता, गौरव एवं उत्साह का संचार किया तथा अपनी समृद्ध ज्ञान-विरासत को आगे बढ़ाने का संदेश दिया ।