25/05/2026
, 3 नवंबर 1618 ई. में, गुजरात के दाहोद में शाहजहां और मुमताज महल के तीसरे बेटे और छठे बच्चे के रूप में औरंगजेब की पैदाईश हुयी थी। उस वक्त हिन्दुस्तान पर उन के दादा जहांगीर की हुकूमत कायम थी। कुछ ही हफ्तों बाद उनके वालिद शाहबुद्दीन मुहम्मद खुर्रम ने उनकी पैदाइश का जश्न मनाया। जिसमें उन्होंने अवाम को अपने नवजात बेटे का दीदार कराया, खैरात में जवाहरात से भरी तश्तरियां बांटी, दर्जनों हाथी बांटे।
औरंगज़ेब शाहजहां के तीसरे बेटे थे, दारा शिकोह और शाह शुजा से छोटे, लेकिन उनकी पैदाइश के एक बरस बाद उन का छोटा भाई मुराद भी आ गया। ये चारों सगे भाई थे। इन सभी की पैदाइश शाहजहां की सबसे पसंदीदा बीवी मुमताज महल से हुयी थी।
शाहजहां के चारों बेटे बड़ी कमसिन उमर से ही मुग़लिया तख्त के मुक़ाबले में जकड़ गए थे। मुग़ल सेंट्रल एशिया के इस रिवाज को मानते के थे कि सियासी ताक़त हासिल करने के लिए खानदान का हर शख्स बराबर का हक़दार होगा। लेकिन अकबर ने हुकूमत पर क़ानूनन दावेदारी के इस बड़े-से घेरे को काटकर बेटों तक ही सिकोड़ दिया था माने भतीजों और चचेरे भाइयों का पत्ता साफ़ कर दिया था।
महज सोलह साल की कमसिन उम्र से ही शहजादे औरंगज़ेब को शाहजहां ने हुकूमत संभालने में मदद करने के लिए दरबार से दूर भेज दिया था।
22 बरस का लंबा फ़ासला यानी 1635 से 1657 तक का वक़्त उन्होंने मुग़ल-सल्तनत की सरहदें नापते हुए बिताया, बल्ख, बुंदेलखंड और कांधार में जंग के मैदानों में जूझते हुए और गुजरात, मुल्तान और दक्कन की हुकूमत संभालते हुए। इस दौरान उन्होंने अपने आप को अपने सभी भाइयों से बेहतर साबित कर के दिखाया। और जब सितंबर 1657 में शाहजहां की बीमारी के बाद तख़्त के लिए जंग छिड़ी तब वह हिंदुस्तान का तख़्त हासिल करने में कामयाब रहे।
उन्होंने ने पूरे उनचास बरस पंद्रह करोड़ लोगों पर हुकूमत की। मुग़ल-सल्तनत की सरहदों को ख़ूब फैलाया। इंसानी तवारीख़ में पहली बार ऐसा हुआ था कि किसी ने हिंदुस्तानी उपमहाद्वीप के ज्यादातर हिस्से को एक हुकूमत के साये तले समेट कर रख दिया था।
क़ानूनी संहिताओं (ज़ाब्ता) की तशरीह (व्याख्या) और उन्हें अमल में लाने के लिए औरंगजेब ने यादगार काम किए। इंसाफ़परस्ती के लिए हर तबके और हर मज़हब के लोगों ने औरंगज़ेब आलमगीर की दाद दी।
उनके दौरे हुकूमत में मुग़ल सल्तनत अपने उरूज पर थी। औरंगज़ेब अपने समय के सबसे दौलतमंद और ताक़तवर शख़्स थे। उनके समय में मुग़ल सल्तनत की सीमा काबुल से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैली हुयी थी, जबकि दक्षिण में दक्कन के अंतिम छोर तक फैली हुयी थी।
उन्होंने अपनी सल्तनत में शरीयत को लागू किया था। इनके ही दौर में उलेमा-ए-कराम ने पूरे आठ सालों की मेहनत लगा कर 'फतवा-ए-आलमगीरी' को तैयार किया था।
उन्होंने दक्षिण में 4 मिलियन वर्ग किलोमीटर तक सल्तनत को फैलाया और 1690 में 450 मिलियन डॉलर के वार्षिक राजस्व के साथ 15 करोड़ से अधिक की आबादी पर हुकूमत की। उनके दौर में हिंदुस्तान चीन के किंग राजवंश को पीछे छोड़ दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया था। जिसकी कीमत 90 बिलियन डॉलर से अधिक थी, जो सन 1700 में दुनिया की जीडीपी का लगभग एक चौथाई (25%) था। लेकिन फिर भी वो अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कुरान की किताबत करते थे (माने नकल तैयार करते थे) और टोपियाँ बुनते थे। ये दोनों ही उनके ख़ासे पाक क़िस्म के शौक थे। इसके अलावा उन्होंने 1660 तक मुकम्मल क़ुरान को हिफ्ज कर लिया था। (माने वो 1660 तक हाफिजे कुरान हो चुके थे)
औरंगजेब ने अपने दौर-ए-हुकूमत में 30 से ज़्यदा जंगे लड़ीं, जिनमें से 11 जंग की कमान उन्होंने खुद ही संभाली।