Aligarian Boy

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छतर मंजिल महल और मछली के आकार में अवध के नवाब की नाव, लखनऊ 1858
25/05/2026

छतर मंजिल महल और मछली के आकार में अवध के नवाब की नाव, लखनऊ 1858

क्या आपको मालूम है की कुतुबमीनार का नाम सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक के नाम पर नहीं बल्कि कुतुबमीनार से तकरीबन 1 km दूर आराम ...
25/05/2026

क्या आपको मालूम है की कुतुबमीनार का नाम सुल्तान कुतुबुद्दीन ऐबक के नाम पर नहीं बल्कि कुतुबमीनार से तकरीबन 1 km दूर आराम फरमा रहे एक सूफी बुजुर्ग ख्वाजा कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी (र. ह.) के नाम पर रखा गया था, उस दौर में वहां के मकामी लोग इसे कुतुब साहेब की लाठ भी कहा करते थे.

पटना में दाख़िल होने और निकलने के लिए दो दरवाज़े हुआ करते थे। एक पश्चिम दरवाज़ा और दूसरा पूरब दरवाज़ा। पश्चिम दरवाज़ा तो...
25/05/2026

पटना में दाख़िल होने और निकलने के लिए दो दरवाज़े हुआ करते थे। एक पश्चिम दरवाज़ा और दूसरा पूरब दरवाज़ा।

पश्चिम दरवाज़ा तो आज भी अपने नाम की वजह कर मौजूद है। पर जब अंग्रेज़ों ने पटना पर क़ब्ज़ा कर लिया तब उन्होंने पूरब दरवाज़ा तोड़ दिया।

हम 1825 की एक पुरानी पेंटिंग शेयर कर रहे हैं, जिसे देख कर आप पूरब दरवाज़ा का अंदाज़ा लगा सकते हैं।

किसी भी वॉल्ड सिटी के लिये दरवाज़ा उसकी जान होती है। कभी पटना भी वैसा था।

19वीं सदी के लाल किले और उस दौर के लाल किले का खूबसूरत मंजरशानदार लाल किले का पुराना और आज का नज़ारा
25/05/2026

19वीं सदी के लाल किले और उस दौर के लाल किले का खूबसूरत मंजर

शानदार लाल किले का पुराना और आज का नज़ारा

सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की तलवार (1296 - 1316)तलवार पे एक तरफ बिस्मिल्लाह लिखा हुआ है तो वहीं दूसरी तरफ क़ुरआन की एक आयत ...
25/05/2026

सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी की तलवार (1296 - 1316)

तलवार पे एक तरफ बिस्मिल्लाह लिखा हुआ है तो वहीं दूसरी तरफ क़ुरआन की एक आयत लिखी हुई है ....… نصر من الله وفتح قريب

तलवार पर लिखी गयी क़ुरानी आयत का मतलब है शुरू अल्लाह के नाम से जो सबसे ज्यादा मेहरबान और निहायत ही रहम करने वाला है। अल्लाह की तरफ से मदद और करीब की फ़तेह।

फ़िलहाल ये तलवार मुंबई के CSMVS म्यूजियम में सर रतन टाटा आर्ट कलेक्शन का एक हिस्सा है।

हिंदुस्तान और तुर्की के रिश्ते आज भले ही खराब हो लेकिन कभी ये रिश्ते बहुत गहरे थे कभी ख़िलाफत ए उस्मानिया की शहज़ादीयां ...
25/05/2026

हिंदुस्तान और तुर्की के रिश्ते आज भले ही खराब हो लेकिन कभी ये रिश्ते बहुत गहरे थे कभी ख़िलाफत ए उस्मानिया की शहज़ादीयां निज़ाम हैदराबाद बहू थीं।

पहली जंगे अज़ीम (1914-1919) में उस्मानी सल्तनत यानी आज का तुर्की जर्मनी के साथ मिलकर मित्र राष्ट्रों के खिलाफ लड़ा था। इस जंग में तुर्की हार गया और तब आधुनिक तुर्की का उदय हुआ जो असल मे पतन की शुरूआत थी। जंग के बाद तुर्कों ने मुस्तफा कमाल अतातुर्क को अपना सेनापति चुना। अतातुर्क ने पहले तो खलीफा अब्दुल मजीद सानी को ख़िलाफ़त से दस्तबरदार किया और फिर ख़िलाफ़त ए उस्मानिया के खातमे का ऐलान कर दिया। खलीफा को जिलावतन कर फ्रांस भेज दिया गया। अतातुर्क कमाल पाशा के इस ज़ालिमाना कदम का सबसे बड़ा विरोध तत्कालीन अविभाजित भारत से हुआ था।

1919 में उस्मानी ख़लीफा की हिफ़ाज़त और ख़िलाफ़त की बक़ा के लिए हिंदोस्तान भर में आंदोलन शुरू हो गया था जिसे हम ख़िलाफ़त मूवमेंट या ख़िलाफ़त आंदोलन के नाम से जानते हैं। हैदराबाद के निज़ाम ने जिलावतनी में फ्रांस में रह रहे ख़लीफा को पैसे भेजना शुरू किये। दुनिया भर में विरोध को देखते हुए ब्रिटिश और कमाल अतातुर्क ने 3 मार्च 1924 को ख़िलफ़त के खात्मे का ऐलान कर दिया। इसके साथ ही भारत में खिलाफत आंदोलन भी खत्म हो गया।

लेकिन रिश्तों को बनाए रखने के लिए हैदराबाद के निज़ाम ने अपने बेटे प्रिंस आज़म जाह के लिए ख़लीफा की बेटी शहज़ादी दुर्रे शेवर ( Dürrüşehvar Sultan ) को निकाह का पैग़ाम भेजा। और ये पैग़ाम लेकर गए थे 'अल्लामा इकबाल'। शहज़ादी दुर्रे शेवर और शहज़ादा आज़म जा का निकाह 1932 में फ्रांस में हुआ और साथ ही दूसरी शहज़ादी नीलोफ़र का निकाह शहज़ादा मोअज़्ज़म जा से हुआ, इस तरह तुर्की की शहज़ादीयां हैदराबाद निज़ाम के घर बहू बनकर आई।

मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब आलमगीर ने हिंदुस्तान में एक खास किस्म का इस्लामी कानून लागू किया था। जिसका निशाना सबसे पहले वो कलाका...
25/05/2026

मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब आलमगीर ने हिंदुस्तान में एक खास किस्म का इस्लामी कानून लागू किया था। जिसका निशाना सबसे पहले वो कलाकार बने जिनके बारे में ये राय थी कि वो इस्लामी उसूलों का पालन नहीं करते।

इसकी एक दिलचस्प मिसाल इटैलियन यात्री निकोलो मनूची ने लिखी है -

वो कहते हैं कि औरंगजेब के दौर में जब संगीत पर पाबंदी लगी तो गवैयों और संगीतकारों की रोजी-रोटी बंद हो गई।

आख़िर तंग आकर एक हज़ार कलाकारों ने जुमे के दिन दिल्ली की जामा मस्जिद से जुलूस निकाला और बाजों को जनाज़ों की शक्ल में लेकर रोते पीटते गुजरने लगे

औरंगज़ेब ने देखा तो पूछा, "ये किसका जनाज़ा लिए जा रहे हैं जिसकी ख़ातिर इस क़दर रोया पीटा जा रहा है?"

उन्होंने कहा, "आपने संगीत का क़त्ल कर दिया है, उसे दफनाने जा रहे हैं" इस पर औरंगजेब ने जवाब दिया, "कब्र जरा ग़हरी खोदना।"

Reference - Storia do Mogor or Mogul India 1653-1708: Vol. II Page No. - 8

जश्ने-ईद-मिलाद-उन-नबी यानि पैगंबर हज़रत मुहम्मद ﷺ की यौम-ए-पैदाइश को मुगलिया दौर-ए-हुकूमत में भी बड़े ही अदब और एहतराम क...
25/05/2026

जश्ने-ईद-मिलाद-उन-नबी यानि पैगंबर हज़रत मुहम्मद ﷺ की यौम-ए-पैदाइश को मुगलिया दौर-ए-हुकूमत में भी बड़े ही अदब और एहतराम के साथ मनाया जाता था।

इस पेंटिंग में 5वें मुगल बादशाह शाहजहाँ को रबी-उल-अव्वल की रात आगरा के दीवान-ए-आम में मौलवियों के साथ आगरा किले के दीवान-ए-आम में इबादत करते हुए और जश्न मनाते हुए दिखाया गया है।

शाहजहाँ बाईं जानिब तख्त पर बैठे हुए दिखाई दे रहे हैं और एक दावत से पहले उलेमाओं और दरबारियों के साथ दुआ करते हुए नज़र आ रहे हैं। उनके ठीक पीछे उनका सबसे अज़ीज़ शहजादा दाराशिकोह बैठा हुआ है, यह पेंटिंग बुलाकी नामी एक शख्स के जरिये 16 सितंबर 1633 ई. में रबी-उल-अव्वल के मौके पर हुए जश्न के दौरान बनाई गई है।

Source - ‘Muqarnas’ An Annual on the Visual Cultures of the Islamic World. Celebrating Thirty Years of Muqarnas. vol. 30 page no. - 367

, 3 नवंबर 1618 ई. में, गुजरात के दाहोद में शाहजहां और मुमताज महल के तीसरे बेटे और छठे बच्चे के रूप में औरंगजेब की पैदाईश...
25/05/2026

, 3 नवंबर 1618 ई. में, गुजरात के दाहोद में शाहजहां और मुमताज महल के तीसरे बेटे और छठे बच्चे के रूप में औरंगजेब की पैदाईश हुयी थी। उस वक्त हिन्दुस्तान पर उन के दादा जहांगीर की हुकूमत कायम थी। कुछ ही हफ्तों बाद उनके वालिद शाहबुद्दीन मुहम्मद खुर्रम ने उनकी पैदाइश का जश्न मनाया। जिसमें उन्होंने अवाम को अपने नवजात बेटे का दीदार कराया, खैरात में जवाहरात से भरी तश्तरियां बांटी, दर्जनों हाथी बांटे।

औरंगज़ेब शाहजहां के तीसरे बेटे थे, दारा शिकोह और शाह शुजा से छोटे, लेकिन उनकी पैदाइश के एक बरस बाद उन का छोटा भाई मुराद भी आ गया। ये चारों सगे भाई थे। इन सभी की पैदाइश शाहजहां की सबसे पसंदीदा बीवी मुमताज महल से हुयी थी।

शाहजहां के चारों बेटे बड़ी कमसिन उमर से ही मुग़लिया तख्त के मुक़ाबले में जकड़ गए थे। मुग़ल सेंट्रल एशिया के इस रिवाज को मानते के थे कि सियासी ताक़त हासिल करने के लिए खानदान का हर शख्स बराबर का हक़दार होगा। लेकिन अकबर ने हुकूमत पर क़ानूनन दावेदारी के इस बड़े-से घेरे को काटकर बेटों तक ही सिकोड़ दिया था माने भतीजों और चचेरे भाइयों का पत्ता साफ़ कर दिया था।

महज सोलह साल की कमसिन उम्र से ही शहजादे औरंगज़ेब को शाहजहां ने हुकूमत संभालने में मदद करने के लिए दरबार से दूर भेज दिया था।

22 बरस का लंबा फ़ासला यानी 1635 से 1657 तक का वक़्त उन्होंने मुग़ल-सल्तनत की सरहदें नापते हुए बिताया, बल्ख, बुंदेलखंड और कांधार में जंग के मैदानों में जूझते हुए और गुजरात, मुल्तान और दक्कन की हुकूमत संभालते हुए। इस दौरान उन्होंने अपने आप को अपने सभी भाइयों से बेहतर साबित कर के दिखाया। और जब सितंबर 1657 में शाहजहां की बीमारी के बाद तख़्त के लिए जंग छिड़ी तब वह हिंदुस्तान का तख़्त हासिल करने में कामयाब रहे।

उन्होंने ने पूरे उनचास बरस पंद्रह करोड़ लोगों पर हुकूमत की। मुग़ल-सल्तनत की सरहदों को ख़ूब फैलाया। इंसानी तवारीख़ में पहली बार ऐसा हुआ था कि किसी ने हिंदुस्तानी उपमहाद्वीप के ज्यादातर हिस्से को एक हुकूमत के साये तले समेट कर रख दिया था।

क़ानूनी संहिताओं (ज़ाब्ता) की तशरीह (व्याख्या) और उन्हें अमल में लाने के लिए औरंगजेब ने यादगार काम किए। इंसाफ़परस्ती के लिए हर तबके और हर मज़हब के लोगों ने औरंगज़ेब आलमगीर की दाद दी।

उनके दौरे हुकूमत में मुग़ल सल्तनत अपने उरूज पर थी। औरंगज़ेब अपने समय के सबसे दौलतमंद और ताक़तवर शख़्स थे। उनके समय में मुग़ल सल्तनत की सीमा काबुल से लेकर बंगाल की खाड़ी तक फैली हुयी थी, जबकि दक्षिण में दक्कन के अंतिम छोर तक फैली हुयी थी।

उन्होंने अपनी सल्तनत में शरीयत को लागू किया था। इनके ही दौर में उलेमा-ए-कराम ने पूरे आठ सालों की मेहनत लगा कर 'फतवा-ए-आलमगीरी' को तैयार किया था।
उन्होंने दक्षिण में 4 मिलियन वर्ग किलोमीटर तक सल्तनत को फैलाया और 1690 में 450 मिलियन डॉलर के वार्षिक राजस्व के साथ 15 करोड़ से अधिक की आबादी पर हुकूमत की। उनके दौर में हिंदुस्तान चीन के किंग राजवंश को पीछे छोड़ दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया था। जिसकी कीमत 90 बिलियन डॉलर से अधिक थी, जो सन 1700 में दुनिया की जीडीपी का लगभग एक चौथाई (25%) था। लेकिन फिर भी वो अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कुरान की किताबत करते थे (माने नकल तैयार करते थे) और टोपियाँ बुनते थे। ये दोनों ही उनके ख़ासे पाक क़िस्म के शौक थे। इसके अलावा उन्होंने 1660 तक मुकम्मल क़ुरान को हिफ्ज कर लिया था। (माने वो 1660 तक हाफिजे कुरान हो चुके थे)

औरंगजेब ने अपने दौर-ए-हुकूमत में 30 से ज़्यदा जंगे लड़ीं, जिनमें से 11 जंग की कमान उन्होंने खुद ही संभाली।

किसी ज़माने में ख़त लिखना भी एक हुनर था हर किसी को ख़त लिखना नहीं आते थे क्योंकि उस दौर में शिक्षा का स्तर भी ना के बराब...
25/05/2026

किसी ज़माने में ख़त लिखना भी एक हुनर था हर किसी को ख़त लिखना नहीं आते थे क्योंकि उस दौर में शिक्षा का स्तर भी ना के बराबर था बुजुर्ग किसी को पढ़ा लिखा और क़ाबिल तब भी मानते थे जब उसे ख़त लिखना सही से आ जाता था तस्वीर एक ख़त लिखने वाले की है जहां कोई व्यक्ति अपने किसी परिचित को ख़त लिखवा रहा है।

और भी हैं दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और228 साल पहले 27 दिसंबर 1797 को आगरा ...
25/05/2026

और भी हैं दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और
228 साल पहले 27 दिसंबर 1797 को आगरा में मिर्ज़ा ग़ालिब की पैदाइश हुई। मिर्ज़ा ग़ालिब का असल नाम 'मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग खान' था। मिर्ज़ा ग़ालिब मुग़ल दरबार मे शाही उस्ताद थे। उन्हें शहज़ादा फ़ख़रुद्दीन मिर्ज़ा की तरबियत के लिए मुक़र्रर किया गया था।

लेकिन दुनिया मे उनकी पहचान मुग़ल दरबार के शाही मुलाज़िम की तरह नहीं बल्कि एक अज़ीम शायर के तौर पर है। मिर्ज़ा ग़ालिब ने ज़्यादातर शेर और ग़ज़ले इश्क़ और समाज के ताने बाने के इर्द गिर्द लिखा लेकिन हुक़ूमत के खिलाफ़ ज़्यादा नहीं लिखा, चाहे मुग़ल दरबार में हों या अंग्रेजों के यहां पेंशन पर। इसके अलावा गालिब को फ़ारसी शायरी को हिंदुस्तानी जबान में लाने के लिए भी जाना जाता है। ग़ालिब को भारत और पाकिस्तान दोनों जगह मकबूलियत हासिल है। गालिब की रचनाओं का यह आलम है कि उनके लिखे खत जो पब्लिश नहीं हो सके उसे भी उर्दू अदब के लिए बहुत अहम दस्तावेज माना जाता है।

उनकी लिखी शायरी और ग़ज़लों में जितनी गहराई थी उस तह तक पहुंच पाना आज के शायरों के बस की बात नही। अपनी ज़िंदगी मे हुए गुनाहों को भी वो खुलेआम क़ुबूल करते थे।

क़ाबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'
शर्म तुम को मगर नहीं आती

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