02/03/2025
हमारे तमाम ही क़ाबिले एहतराम मोअज़्जिन हज़रात से दरख़्वास्त है कि सहरी का वक्त ख़त्म होने से 3 घंटा पहले हर दो मिनट पर अलग अलग मस्जिद से वक्त बताने की ज़हमत न फ़रमायें।
आज इलाक़े में सहरी का वक्त 5:23 पर ख़त्म होना था लेकिन लोग दो-सवा दो बजे से हर दो मिनट पर मुख़्तलिफ़ मस्जिदों से माइक पर बुलंद आवाज़ में वक्त बताने में लगे हुए थे कि सभी हज़रात खाने-पीने की तैयारी कर लें (गोया रमज़ानुल मुबारक का मक़सद यही रह गया है और फिर ये भी कोई बताने की चीज़ है?) और ख़त्म के वक्त 5:14 से एक होड़ लगी थी कि हर जगह से अलग अलग वक्त पर सहरी के ख़त्म होने का ऐलान था।
लोग इबादत में या नींद में मसरुफ़ होते हैं, आजकल बोर्ड इम्तिहान चल रहें हैं तो बच्चे तैयारी भी करते हैं। ग़ैर मुस्लिम हज़रात भी बिला वजह परेशान होते हैं।
फिर टेक्नोलॉजी और ख़ासकर मोबाइल के दौर में किसी को भी हर दो मिनट पर वक्त बताने की ज़रूरत नहीं है। मोबाइल में वक्त ख़ुद ही सेट होता है और एक इलाक़े तमाम लोगों के लिए बराबर होता है, तो ये ज़रुरत वैसे ही ख़त्म हो गयी।
इस किस्म की ग़ैर इस्लामी हरकतों से दीन की न सिर्फ़ बदनामी होती है बल्कि इन पर अथोरिटीज़ की तरफ़ से जब कार्रवाई होती है तो फिर जायज़ चीज़ों तक को करने की आज़ादी ख़त्म हो जाती है।
हमारे दीन में इंसान की जान,माल, इज़्ज़त आबरु को ख़ाना-ए- काबा से बढ़कर बताया गया है, मुसलमान तो वो है कि जिसके हाथ पैर और ज़बान से दूसरे लोग महफ़ूज़ रहें, पड़ोसी को तकलीफ़ देने वाले के तो ईमान ही में शक है, और फिर ये सब दीन समझकर और दीन के नाम पर किया जाये वो भी मुक़द्दस महीने में तो ये अल्लाह के ग़ज़ब को दावत देने वाली बात है।
हमनें भी दीन का मतलब अपनी मर्ज़ी और अपने शौक़ पूरे करने को समझ लिया है, हमारा दीन हल्ला-गुल्ला, ठिठोली करने, लोगों की जिंदगियां दूभर करने के लिए नहीं आया है,ये तो सरापा फ़रमाबरदारी, और मख़लूक़ की रिआयत करने वाला दीन है। रमज़ानुल मुबारक ख़ुद पैग़ाम दे रहा है कि पूरे साल जायज़ बल्कि वाजिब रहने वाली चीज़ों ( खाना पीना)तक को अल्लाह ने मना करके बता दिया है कि इंसानों की ख्वाहिशात और मनमर्जी वाला दीन नहीं है बल्कि रब के हुक्म को उसके नबी के बताये तरीक़े के मुताबिक मानने और अमल करने का नाम इस्लाम है।
इस्लाम का मतलब ख़ुद surrender and submission to God यानी अपने आपको ख़ुदा के हवाले करना है।
कुछ साल पहले मुसलसल इस तरीक़े के बारे में वालिद साहब ने इलाक़े की तमाम मस्जिदों में लोगों से कहा था,सहरी के वक्त भी ऐलान करके बार बार समझाया लेकिन किसी ने तवज्जो नहीं दी।
मुसलमानों के लिए अपने दीन पर अमल करने की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है और उसमें हमारी इस क़िस्म की हरकतों का काफ़ी रोल है।
अल्लाह तआला समझ और हिदायत अता फ़रमाए।