10/08/2026
पं. दीनदयाल उपाध्याय पीठ, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा “भारतीय ज्ञान परंपरा एवं पं. दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन : वैश्विक परिप्रेक्ष्य एवं समकालीन प्रासंगिकता” विषयक तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। सम्मेलन का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा की विविधता, समृद्धि एवं समकालीन प्रासंगिकता तथा पं. दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन के विभिन्न आयामों पर वैश्विक परिप्रेक्ष्य में अकादमिक विमर्श को बढ़ावा देना है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों की मौलिकता एवं उनकी समकालीन प्रासंगिकता पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि पं. दीनदयाल उपाध्याय जैसे चिंतकों के विचारों को समझने और उन्हें समकालीन संदर्भ में सार्थक रूप से आगे बढ़ाने के लिए भारत की ऐतिहासिक एवं सामाजिक वास्तविकताओं को समझना आवश्यक है।
मुख्य वक्ता जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. शांतिश्री धुलिपुड़ी पंडित ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा बौद्धिक बहुलता, आलोचनात्मक चिंतन और अकादमिक उत्कृष्टता पर आधारित विविधतापूर्ण सभ्यतागत ज्ञान परंपरा का प्रतिनिधित्व करती हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान प्रणाली केवल वैदिक परंपरा तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें बौद्ध, जैन, सिख, तमिल, जनजातीय, मौखिक, लोक एवं विभिन्न क्षेत्रीय ज्ञान परंपराएं भी शामिल हैं।
मुख्य अतिथि श्री मिथिलेशनंदिनी शरण जी महाराज ने एकात्म मानववाद की दार्शनिक आधारभूमि की चर्चा करते हुए व्यष्टि, समष्टि, सृष्टि और परमेष्ठि की अवधारणाओं के माध्यम से पं. दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन को समझने की आवश्यकता बताई। विशिष्ट अतिथि प्रो. आर. एस. दुबे, कुलाधिपति, राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन संस्थान (NIEPA), नई दिल्ली ने भारतीय दार्शनिक चिंतन में व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और प्रकृति के पारस्परिक संबंधों को रेखांकित किया।
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