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01-10-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन“मीठे बच्चे - माया से डरो मत, भल कितना भी भुलाने क...
01/10/2026

01-10-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - माया से डरो मत, भल कितना भी भुलाने की कोशिश करे लेकिन थको नहीं, अमृतवेले उठ याद में रहने का पूरा-पूरा पुरुषार्थ करो''

प्रश्नः-
पुरुषार्थ में आगे नम्बर कौन से बच्चे लेते हैं?

उत्तर:-
जो बाप पर पूरा-पूरा बलि चढ़ते हैं अर्थात् कुर्बान जाते हैं, सबसे आगे वही जाते। बाप पर बच्चे कुर्बान जाते और बच्चों पर बाप कुर्बान जाते। तुम अपना कखपन, पुराना तन-मन-धन बाप को देते और बाप तुम्हें विश्व की बादशाही देता इसलिए उसे गरीब निवाज़ कहा जाता है। गरीब भारत को ही दान देने बाप आये हैं।

गीत:-
नयनहीन को राह दिखाओ....

ओम् शान्ति।
मीठे-मीठे अति मीठे, ऐसे कहेंगे ना! बेहद का बाप और बेहद का प्यार है। कहते हैं मीठे सिकीलधे बच्चों ने गीत सुना। राह एक बाप ही दिखाते हैं। भक्ति मार्ग में राह बतलाने वाला कोई है नहीं। वहाँ ही ठोकरें खाते रहते हैं। अभी भल राह मिली है फिर भी माया बाप के साथ बुद्धियोग लगने नहीं देती है। समझते भी हैं एक बाप को याद करने से हमारे सब दु:ख दूर हो जायेंगे, फिकरात की कोई बात नहीं रहेगी, फिर भी भूल जाते हैं। बाप कहते हैं - अपने को आत्मा समझ मुझ पतित-पावन बाप को याद करो। बाप ज्ञान का सागर है ना। वही गीता ज्ञान दाता है। स्वर्ग की बादशाही अथवा सद्गति देते हैं। श्रीकृष्ण को ज्ञान का सागर नहीं कह सकते। सागर एक ही होता है। इस धरती के चारों तरफ सागर ही सागर है। सारा सागर एक ही है। फिर उनको बांटा गया है। तुम विश्व के मालिक बनते हो तो सारा सागर, धरनी के मालिक तुम बनते हो। ऐसे कोई कह न सके, यह हमारा टुकड़ा है। हमारी हद के अन्दर न आओ। यहाँ तो सागर में भी टुकड़े-टुकड़े कर दिये हैं। तुम समझते हो सारा विश्व ही भारत था, जिसके तुम मालिक थे। गीत भी है बाबा आपसे हम विश्व की बादशाही लेते हैं जो कोई छीन न सके। यहाँ देखो पानी के ऊपर भी लड़ाई है। एक दो को पानी देने के लिए लाखों रूपया देना पड़ता है। तुम बच्चों को सारे विश्व की राजाई कल्प पहले मिसल मिल रही है। बाप ने ज्ञान का तीसरा नेत्र दिया है। ज्ञान दाता है ही परमपिता परमात्मा। इस समय आकर ज्ञान देते हैं। सतयुग में लक्ष्मी-नारायण के पास यह ज्ञान नहीं होगा। हाँ, ऐसे कहेंगे आगे जन्म में ज्ञान लेकर यह बने हैं। तुम ही थे। तुम कहते हो बाबा आप वही हो। आपने हमको विश्व का मालिक बनाया था। बाप कहते हैं - मेरी मत कोई लम्बी चौड़ी नहीं है। वह पढ़ाई कितनी लम्बी चौड़ी होती है। यह तो बहुत सहज है। रचता और रचना के आदि-मध्य-अन्त को तुम जानकर औरों को बताते रहते हो। कैसे 84 का चक्र लगाया है। अभी वापिस जाना है बाप के पास। यह भी बाप ने बतलाया है - माया के तूफान बहुत आयेंगे, इनसे डरो मत। सुबह को उठकर बैठेंगे, बुद्धि और-और ख्यालातों में चली जायेगी। दो मिनट भी याद नहीं रहेगी। बाप कहते हैं थकना नहीं है। अच्छा एक मिनट याद रही फिर कल बैठना, परसों बैठना। अन्दर में यह पक्का जरूर करो कि हमें याद करना है। अगर कोई विकार में जाता होगा फिर तो बहुत तूफान आयेंगे। पवित्रता ही मुख्य है। आज यह दुनिया पतित वेश्यालय है। कल पावन शिवालय होगा। जानते हो यह पुराना शरीर है। बाप को याद करते रहेंगे तो कोई भी समय शरीर छूट जाए तो स्वर्ग में चलने लायक बन जायेंगे। बाप से कुछ न कुछ ज्ञान तो सुना है ना। ऐसे भी हैं जो यहाँ से भागन्ती हो गये हैं फिर भी आकर अपना वर्सा ले रहे हैं। यह भी समझाया है अन्त मती सो गति होगी। समझो कोई शरीर छोड़ते हैं, संस्कार ज्ञान के ले जाते हैं तो छोटेपन में ही इस तरफ उनको खींच होगी। भल आरगन्स छोटे हैं, बोल नहीं सकते परन्तु खींच लेंगे। छोटेपन से ही संस्कार अच्छे होंगे। सुखदाई बनेंगे। आत्मा को ही बाप सिखलाते हैं ना। जैसे बाप मिलेट्री वालों का मिसाल समझाते हैं। संस्कार ले जाते हैं तो लड़ाई में फिर भरती हो जाते हैं। जैसे शास्त्र पढ़ने वाले संस्कार ले जाते हैं तो छोटेपन में ही शास्त्र कण्ठ हो जाते हैं। उनकी महिमा भी निकलती है। तो यहाँ से जो जाते हैं तो छोटेपन में महिमा निकलती है। आत्मा ही ज्ञान धारण करती है ना। बाकी रहा हुआ हिसाब-किताब चुक्तू करना पड़ता है। स्वर्ग में तो आयेंगे ना। बाप के पास आकर मालेकम् सलाम करेंगे। प्रजा तो ढेर बनेगी। बाप से तो वर्सा लेंगे। पिछाड़ी में कहा है ना - अहो प्रभू तेरी लीला...

अभी तुम समझते हो - अहो बाबा आपकी लीला ड्रामा प्लैन अनुसार ऐसी है। बाबा आपका एक्ट सभी मनुष्य मात्र से न्यारा है। जो बाप की अच्छी सर्विस करते हैं उनको फिर इनाम भी बड़ा अच्छा मिलता है। विजय माला में पिरोये जाते हैं। यह है रूहानी ज्ञान, जो बाप रूह, रूहों को देते हैं। मनुष्य तो सब शरीरों को ही याद करेंगे, कहेंगे शिवानन्द, गंगेश्वरानंद... आदि यह ज्ञान देते हैं। यहाँ तो कहेंगे निराकार शिवबाबा ज्ञान देते हैं। मैं ऊंच ते ऊंच हूँ। मुझ आत्मा का नाम है शिव। शिव परमात्माए नम: कहते हैं। फिर ब्रह्मा विष्णु शंकर को कहेंगे देवताए नम:, यह भी रचना है, उनसे कोई वर्सा नहीं मिल सकता। तुम आपस में भाई-भाई हो। भाई को याद करने से वर्सा नहीं मिलेगा। यह (ब्रह्मा दादा) भी तुम्हारा भाई है, स्टूडेन्ट है ना। पढ़ रहे हैं, इससे वर्सा नहीं मिलेगा। यह खुद ही वर्सा पा रहे हैं शिवबाबा से। पहले यह सुनते हैं। बाप को कहता हूँ बाबा हम तो आपका पहला-पहला बच्चा हूँ। आप से हम कल्प-कल्प वर्सा लेते हैं। कल्प-कल्प आपका रथ बनता हूँ। शिव का रथ ब्रह्मा। ब्रह्मा द्वारा विष्णुपुरी की स्थापना। तुम ब्राह्मण भी मददगार हो फिर तुम मालिक बनेंगे। अभी तुम जानते हो हम 5 हजार वर्ष पहले मुआफिक बाप द्वारा राज्य भाग्य लेते हैं, जिन्होंने कल्प पहले राज्य भाग्य लिया है, वही आयेंगे। हर एक के पुरुषार्थ से पता लग जाता है - कौन महाराजा-महारानी बनेंगे, कौन प्रजा बनेंगे। पिछाड़ी में तुमको सब साक्षात्कार होगा। सारा पुरुषार्थ पर मदार है। कुर्बान भी होना होता है। बाप कहते हैं - मैं गरीब निवाज हूँ। तुम गरीब ही मुझ पर कुर्बान होते हो। दान हमेशा गरीबों को ही दिया जाता है। समझो कोई कॉलेज बनवाते हैं, वह कोई गरीबों को दान नहीं होता। वह कोई ईश्वर अर्थ होता नहीं है, परन्तु दान तो करते हैं ना। कॉलेज खोलते हैं तो उनका फल मिलता है। दूसरे जन्म में अच्छा पढ़ेंगे। यह आशीर्वाद मिलती है। भारत में ही सबसे जास्ती दान-पुण्य होता है। इस समय तो बहुत दान होता है। तुम बाप को दान करते हो। बाप तुमको दान करते हैं। तुमसे कखपन ले तुमको विश्व की बादशाही देते हैं। इस समय तुम तन-मन-धन सब बाप को दान में देते हो। वे लोग तो मरते हैं तो विल करके जाते हैं। फलाने आश्रम को देना या यह आर्यसमाज ले लेवे। वास्तव में दान गरीबों को देना होता है, जो भूखे होते हैं। अभी भारत गरीब है ना। स्वर्ग में भारत कितना साहूकार होता है। तुम जानते हो वहाँ जितना अनाज धन आदि तुम्हारे पास होता है उतना और कोई के पास नहीं हो सकता। वहाँ तो कुछ भी पैसा नहीं लगेगा। मुट्ठी चावल दान करते हैं, तो रिटर्न में 21 जन्मों के लिए महल मिल जाते हैं। जागीर भी मिलेगी। अभी तत्व भी तमोप्रधान होने कारण दु:ख देते हैं, वहाँ तत्व सतोप्रधान होते हैं। तुम जानते हो - सतयुग में कौन-कौन आयेंगे। फिर द्वापर में फलाने-फलाने आयेंगे। कलियुग के अन्त में छोटी-छोटी टालियाँ मठ पंथ आदि निकलते रहते हैं ना। अभी तुम्हारी बुद्धि में झाड़, ड्रामा आदि की नॉलेज है। बाप के पार्ट को भी जानते हो। महाभारत लड़ाई में दिखाते हैं - 5 पाण्डव बचे। अच्छा फिर क्या हुआ? जरूर जो राजयोग सीखे वही जाकर राज्य करेंगे ना। आगे तुम भी कुछ जानते थोड़ेही थे। बाबा भी गीता आदि पढ़ते थे। नारायण की भक्ति करते थे। गीता के साथ भी बहुत प्यार था। ट्रेन में जाते थे तो भी गीता पढ़ते थे। अब देखते हैं कुछ भी समझा नहीं, डिब्बी में ठिकरी। भक्तिमार्ग में जो कुछ करते आये परन्तु उद्धार तो हुआ नहीं। दुनिया में तो कितना झगड़ा है। यहाँ भी तो सब पवित्र बन न सकें, इसलिए झगड़ा पड़ता है। बाप शरण लेते भी हैं फिर कहते हैं बीमारी उथलेगी जरूर। बच्चे आदि याद पड़ेंगे, इसमें नष्टोमोहा होना पड़े। समझना है हम मर गये। बाप के बने गोया इस दुनिया से मरे। फिर शरीर का भान नहीं रहता। बाप कहते हैं - देह सहित जो भी सम्बन्ध हैं, उनको भूल जाना है। इस दुनिया में जो कुछ देखते हो वह जैसे कुछ भी है नहीं। यह पुराना शरीर भी छोड़ना है। हमको जाना है घर। घर जाकर फिर आकर नया सुन्दर शरीर लेंगे। अभी श्याम हैं फिर सुन्दर बनेंगे। भारत अभी श्याम है, फिर सुन्दर बनेगा। अभी भारत है कांटों का जंगल। सब एक दो को काटते रहते हैं। कोई बात पर बिगड़ पड़ते हैं तो गाली देते हैं, लड़ पड़ते हैं। तुम बच्चों को घर में भी बहुत मीठा बनना है। नहीं तो मनुष्य कहेंगे इसने तो 5 विकार दान दिये हैं फिर क्रोध क्यों करते। शायद क्रोध दान नहीं दिया है। बाप कहते हैं - बच्चे झोली में 5 विकार दान में दे दो तो तुम्हारा ग्रहण छूट जाए। चन्द्रमा को ग्रहण लगता है ना। तुम भी अब सम्पूर्ण बनते हो तो बाप कहते हैं यह विकार दान में दे दो। तुमको स्वर्ग की बादशाही मिलती है। आत्मा को बाप से वर्सा मिलता है। आत्मा कहती है इस पुरानी दुनिया में बाकी थोड़ा टाइम है। काम उतार देना है। ख्यालात कोई भी उतार देने चाहिए। बाबा जानते हैं अनेक प्रकार के ख्यालात आयेंगे। धन्धे के ख्यालात आयेंगे। भक्ति मार्ग में भक्ति करते समय ग्राहक, धंधाधोरी याद पड़ता है तो फिर अपने को चुटकी से काटते हैं। हम नारायण की याद में बैठा हूँ फिर यह बातें याद क्यों आई! तो यहाँ भी ऐसे होता है। जब इस रूहानी सर्विस में अच्छी रीति लग जाते हैं तो फिर समझाया जाता है - अच्छा छोड़ो धन्धेधोरी को। बाबा की सर्विस में लग जाओ। कहते हैं छोड़ो तो छूटे । देह-अभिमान छोड़ते जाओ। सिर्फ बाप को याद करो तो बन्दर से मन्दिर लायक बन जायेंगे। भ्रमरी का, कछुओं का भी सब मिसाल बाप देते हैं जो फिर भक्ति मार्ग में वो लोग दृष्टान्त देते हैं। अभी तुम जानते हो कीड़े कौन हैं। तुम हो ब्राह्मणियाँ। तुम भूँ-भूँ करती हो। यह दृष्टान्त अभी का है। वह बता न सकें। त्योहार आदि सब इस समय के हैं। सतयुग त्रेता में कोई त्योहार होता नहीं। यह सब है भक्ति मार्ग के।

अब देखो श्रीकृष्ण जयन्ती थी। श्रीकृष्ण की मूर्ति मिट्टी की बनाई, उनकी पूजा की फिर जाकर लेक में डुबो दिया। अभी तुम समझते हो यह क्या करते हैं। यह है अन्धश्रद्धा। तुम किसको समझायेंगे, वह समझेंगे नहीं। कोई को बीमारी आदि हुई तो कहेंगे देखो तुमने श्रीकृष्ण की पूजा छोड़ दी है इसलिए यह हाल हुआ है। ऐसे बहुत ही आश्चर्यवत सुनन्ती, कथन्ती भागन्ती हो जाते हैं इसलिए ब्राह्मणों की माला बन नहीं सकती। ऊंच ते ऊंच यह ब्राह्मण कुल भूषण हैं। परन्तु उनकी माला बन नहीं सकती। तुम्हारी बुद्धि में है यह शिवबाबा की माला है फिर हम जाकर सतयुग में नम्बरवार विष्णु की माला के दाने बनेंगे। तुम्हारा एक-एक अक्षर ऐसा है जो कोई समझ न सके। बाप पढ़ाते रहते हैं। वृद्धि को पाते रहते हैं। प्रदर्शनी में कितने आते हैं। कहते भी हैं हम आकर समझेंगे फिर गये घर में और खलास। वहाँ की वहाँ रही। कहते हैं प्रभू से मिलने के लिए राह बहुत अच्छी बताते हैं। परन्तु हम उस पर चलें, वर्सा लेवें यह बुद्धि में नहीं आता। बहुत अच्छी सेवा कर रही हैं ब्रह्माकुमारियाँ। बस, अरे तुम भी समझो ना। जिस्मानी सेवा करते रहते हो। अब यह रूहानी सेवा करो। सोसाइटी की सेवा तो सभी मनुष्य करते रहते हैं। मुफ्त में तो कोई सेवा नहीं करते। नहीं तो खायेंगे कहाँ से। अभी तुम बच्चे बहुत अच्छी सेवा करते हो। तुमको भारत के लिए बहुत तरस रहता है। हमारा भारत क्या था फिर रावण ने किस गति में लाया है। अब हम बाप की श्रीमत पर चल वर्सा जरूर लेंगे।

अभी तुम जानते हो हम हैं संगमयुगी, बाकी सब हैं कलियुगी। हम उस पार जा रहे हैं। जो बाप की याद में अच्छी रीति रहेंगे वह ऐसे बैठे-बैठे याद करते-करते शरीर छोड़ देंगे। बस फिर आत्मा वापिस आयेगी नहीं। बैठे-बैठे बाप की याद में गया। यहाँ हठयोग आदि की कोई बात नहीं। जैसे देखते हो ध्यान में बैठे-बैठे चले जाते हैं, वैसे तुम बैठे-बैठे यह शरीर छोड़ देंगे। सूक्ष्मवतन जाकर फिर बाप के पास चले जायेंगे। जो याद के यात्रा की बहुत मेहनत करेंगे वह ऐसे शरीर छोड़ देंगे। साक्षात्कार हो जाता है। जैसे शुरू में तुमको बहुत साक्षात्कार हुए वैसे पिछाड़ी में भी तुम बहुत देखेंगे। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) मन्दिर लायक बनने के लिए देह-अभिमान छोड़ देना है। रूहानी सेवा में लग जाना है।

2) अब घर जाने का समय है इसलिए जो भी हिसाब-किताब है, धन्धे धोरी के ख्यालात हैं, उन्हें उतार देना है। याद के यात्रा की मेहनत करनी है।

वरदान:-
सतसंग द्वारा रूहानी रंग लगाने वाले सदा हर्षित और डबल लाइट भव

जो बच्चे बाप को दिल का सच्चा साथी बना लेते हैं उन्हें संग का रूहानी रंग सदा लगा रहता है। बुद्धि द्वारा सत् बाप, सत शिक्षक और सतगुरू का संग करना - यही सतसंग है। जो इस सतसंग में रहते हैं वो सदा हर्षित और डबल लाइट रहते हैं। उन्हें किसी भी प्रकार का बोझ अनुभव नहीं होता। वे ऐसा अनुभव करते जैसे भरपूर हैं, खुशियों की खान मेरे साथ है, जो भी बाप का है वह सब अपना हो गया।

स्लोगन:-
अपने मीठे बोल और उमंग-उत्साह के सहयोग से दिलशिकस्त को शक्तिवान बनाओ।

ये अव्यक्त इशारे - परोपकार की भावना से सम्पन्न बन अपकारी पर भी उपकार करो

परोपकार की भावना से सम्पन्न बनने के लिए हर आत्मा के गुणों को ही देखो। किसी की कमज़ोरी वा अवगुण को देखते भी अपनी शुभ भावना से, सहयोग की कामना से उस आत्मा को भी गुणवान बनाने की शक्ति का दान दो। अपने समय को, सुखों को, नाम, शान, मान सर्व प्राप्ति की इच्छा को कुर्बान कर, लेने की इच्छा को छोड़ देने वाले महादानी बनो तब कहेंगे परोपकार की भावना से सम्पन्न।

30-09-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन“मीठे बच्चे - इस देह-भान से मर जाओ अर्थात् इस पुरा...
29/09/2026

30-09-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - इस देह-भान से मर जाओ अर्थात् इस पुरानी पतित देह से प्रीत तोड़ एक बाप से सच्ची प्रीत जोड़ो''

प्रश्नः-
संगम पर तुम बच्चों की नेचुरल ब्युटी कौन सी है?

उत्तर:-
ज्ञान के जेवरों से सदा सजे सजाये रहना - यही तुम्हारी नेचुरल ब्युटी है। जो ज्ञान के जेवरों से सजे हुए रहते हैं उनका चेहरा खुशी में फूल की तरह खिला रहता है। अगर खुशी नहीं रहती तो जरूर कोई देह-अभिमान की आदत है, जिससे ही सब विकार उत्पन्न होते हैं।

गीत:-
महफिल में जल उठी शमा.....

ओम् शान्ति।
इस गीत का अर्थ कितना विचित्र है। प्रीत बनी है किसके लिए? (मरने के लिए) किससे बनी है? भगवान से क्योंकि इस दुनिया से मरकर उनके पास जाना है। ऐसी कब किसके साथ प्रीत हुई है क्या? जो यह ख्याल में आये कि मर जायेंगे। फिर कोई प्रीत रखेंगे? गीत का अर्थ कितना वन्डरफुल है। शमा से परवाने प्रीत रख फेरी पहन जल मरते हैं। तुमको भी बाप के पास आते-आते यह शरीर छोड़ना है अर्थात् बाप को याद करते-करते शरीर छोड़ना है। यह तो जैसे बड़ा दुश्मन हो गया, जिसके साथ हम प्रीत रखें और मर जाएं इसलिए मनुष्य डरते हैं। दान-पुण्य, तीर्थ यात्रा आदि करते हैं, भगवान के पास जाने के लिए। शरीर छोड़ते हैं तो मनुष्य कहते हैं भगवान को याद करो। भगवान कितना नामी-ग्रामी है। वह आते हैं तो सारी पुरानी दुनिया को खत्म कर देते हैं। तुम बच्चे जानते हो - हम इस युनिवर्सिटी में आते ही हैं - पुरानी दुनिया से नई दुनिया में जाने के लिए। पुरानी दुनिया को पतित दुनिया हेल कहा जाता है। बाप नई दुनिया में जाने का रास्ता बताते हैं सिर्फ मुझे याद करो, मैं हूँ हेविनली गॉड फादर। उस फादर से तुमको धन, मिलकियत, मकान आदि मिलेगा। बच्चियों को वर्सा मिलना नहीं है। उनको दूसरे घर भेज देते हैं। गोया वह वारिस नहीं ठहरी। यह तो बाप है सब आत्माओं का बाप, इनके पास सबको आना है, मरना है। कोई समय जरूर बाप आते हैं, सबको घर ले जाते हैं क्योंकि नई दुनिया में बहुत थोड़े मनुष्य होते हैं। पुरानी दुनिया में तो बहुत हैं, नई दुनिया में मनुष्य भी थोड़े और सुख भी बहुत होता है। पुरानी दुनिया में बहुत मनुष्य हैं तो दु:ख भी बहुत है इसलिए पुकारते रहते हैं। बापू गांधी जिसको भारत का पिता समझते थे, वह भी कहते थे हे पतित-पावन आओ। सिर्फ उनको जानते नहीं थे। समझते भी हैं पतित-पावन परमपिता परमात्मा है। वही वर्ल्ड का लिबरेटर है। राम सीता को तो सारी दुनिया नहीं मानेगी ना। यह भूल है। सारी दुनिया परमपिता परमात्मा को लिबरेटर गाइड मानती है। लिबरेट करते हैं दु:खों से। अच्छा दु:ख देने वाला कौन? बाप तो दु:ख दे न सके क्योंकि वह पतित-पावन है। पावन दुनिया सुखधाम में ले जाने वाला है। तुम हो उस रूहानी बाप के रूहानी बच्चे। जैसे बाप वैसे बच्चे। लौकिक बाप के हैं जिस्मानी बच्चे।

अभी तुम बच्चों को समझना है कि हम आत्मा हैं, परमपिता परमात्मा हमको वर्सा देने आये हैं। हम स्टूडेन्ट हैं, यह भूलना नहीं चाहिए। बच्चों की बुद्धि में रहता है शिवबाबा मधुबन में मुरली बजाते हैं। वह काठ की मुरली तो यहाँ नहीं है। श्रीकृष्ण का डांस करना, मुरली बजाना वह भक्ति मार्ग का है। तुम श्रीकृष्ण के लिए मुरली नहीं कह सकते। मुरली शिवबाबा बजाते हैं। तुम्हारे पास अच्छे-अच्छे गीत बनाने वाले आयेंगे। गीत अक्सर करके पुरुष ही बनाते हैं। तुमको कोई भक्ति मार्ग के गीत आदि नहीं गाने हैं। तुम्हें तो एक शिवबाबा को ही याद करना है। बाप कहते हैं - मुझ अल्फ को याद करो। शिव को कहते हैं बिन्दी। व्यापारी लोग बिन्दी लिखेंगे तो कहेंगे शिव। एक बिन्दी लिखें 10 हो जायेगा फिर बिन्दी लिखो तो 100... तुमको भी शिवबाबा को याद करना है। जितना शिव को याद करते हो तो आधाकल्प के लिए बहुत साहूकार बन जाते हो। वहाँ गरीब होते ही नहीं। सब सुखी रहते हैं। दु:ख का नाम नहीं। बाप की याद से विकर्म विनाश हो जायेंगे। तुम बहुत धनवान बनेंगे। इसको कहा जाता है सच्चे बाप द्वारा सच्ची कमाई। यही साथ चलेगी। मनुष्य सभी खाली हाथ जाते हैं। तुमको भरतू हाथ जाना है। बाप को याद करना है और पवित्र बनना है। बाप ने समझाया है - प्योरिटी होगी तो पीस, प्रॉसपर्टी मिलेगी। तुम आत्मा पहले पवित्र थी फिर अपवित्र बनती हो। संन्यासियों को भी सेमी पवित्र कहेंगे। तुम्हारा है फुल संन्यास। तुम जानते हो वह कितना सुख पाते हैं। थोड़ा सुख है फिर तो दु:ख ही है। वह सब है भक्ति मार्ग। भक्ति मार्ग में हनुमान की पूजा करो तो उसका दीदार हो जाता है। चण्डिका देवी का कितना मेला लगता है। उनका चित्र भी होगा, जिनका ध्यान करेंगे वह तो जरूर सामने आयेगा ही। परन्तु उससे क्या मिलेगा? अनेक प्रकार के मेले लगते हैं क्योंकि आमदनी तो होती है ना। यह सब उन्हों का धन्धा है। कहते हैं धन्धे सबमें धूर, बिगर धन्धे नर से नारायण बनाने के। यह धन्धा कोई विरला करे।

बाप का बनकर सब कुछ देह सहित बाप को दे देना क्योंकि तुम जानते हो हमको नया शरीर चाहिए। बाप कहते हैं - तुम कृष्णपुरी जा सकते हो परन्तु जब आत्मा तमोप्रधान से सतोप्रधान बनें। कृष्णपुरी में ऐसे नहीं कहेंगे कि हमको पावन बनाओ। यहाँ सब मनुष्य मात्र पुकारते हैं - हे लिबरेटर आओ। इस पाप आत्माओं की दुनिया से लिबरेट करो। अभी तुम जानते हो बाप आया है हमको अपने साथ ले जाने। वहाँ जाना तो अच्छा है ना। मनुष्य शान्ति चाहते हैं। अब शान्ति कहते किसको हैं - यह नहीं जानते। कर्म बिगर तो कोई रह नहीं सकते। शान्ति तो है शान्तिधाम में। फिर यह शरीर लेकर कर्म तो करना ही है। सतयुग में कर्म करते हुए शान्त रहते हैं, अशान्ति में मनुष्य को दु:ख होता है इसलिए कहते हैं शान्ति कैसे मिले। अभी तुम बच्चे जानते हो शान्तिधाम हमारा घर है। सतयुग में शान्ति सुख सब कुछ है। अब वह चाहिए या सिर्फ शान्ति चाहिए। यहाँ तो दु:ख है इसलिए पतित-पावन बाप को भी यहाँ पुकारते हैं। भक्ति करते ही हैं भगवान से मिलने के लिए। भक्ति भी पहले अव्यभिचारी फिर व्यभिचारी होती है। व्यभिचारी भक्ति में देखो क्या-क्या करते हैं। सीढ़ी में देखो कितना अच्छा दिखाया है। परन्तु पहले-पहले तो सिद्ध करना चाहिए भगवान कौन है। श्रीकृष्ण को ऐसा किसने बनाया! आगे जन्म में यह कौन था! समझाने की बड़ी युक्ति चाहिए। जो अच्छी सर्विस करते हैं, उनकी दिल भी गवाही देती है। युनिवर्सिटी में जो अच्छी रीति पढ़ेंगे वह जरूर तीखे जायेंगे। नम्बरवार तो होते ही हैं। कोई डलहेड भी होते हैं। शिवबाबा को आत्मा कहती है मेरी बुद्धि का ताला खोलो। बाप कहते हैं - बुद्धि का ताला खोलने के लिए ही तो आया हूँ। परन्तु तुम्हारे कर्म ही ऐसे हैं जो ताला खुलता ही नहीं। फिर बाबा क्या करेंगे। बहुत पाप किये हुए हैं, अब बाबा उनको क्या करेंगे! टीचर को कहेंगे, हम कम पढ़ते हैं। टीचर क्या करेंगे? टीचर तो कोई कृपा नहीं करेंगे। करके एक्स्ट्रा टाइम रखेंगे। वह तो तुमको मना नहीं है। प्रदर्शनी खाली पड़ी है, बैठकर प्रैक्टिस करो। भक्ति मार्ग में तो कोई कहेंगे माला फेरो। कोई कहेंगे यह मन्त्र याद करो। यहाँ तो बाप अपना परिचय देते हैं। बाप को ही याद करना है, जिससे वर्सा मिलता है। सतयुग में तो पारलौकिक बाप का वर्सा मिल जाता है फिर याद करने की दरकार ही नहीं रहती। 21 जन्मों के लिए वर्सा मिल जाता है, तो बाप से अच्छी रीति से वर्सा लेना चाहिए ना। इसमें भी बाप कहते हैं, विकार में कभी नहीं जाना। थोड़ी भी विकार की टेस्ट बैठी तो फिर वृद्धि हो जायेगी। सिगरेट आदि की एक बार टेस्ट करते हैं तो संग का रंग झट लग जाता है फिर उस आदत को छोड़ना मुश्किल हो जाता है। बहाना कितने करते हैं। आदत कोई नहीं डालनी चाहिए। छी-छी आदतें मिटानी हैं। बाप कहते हैं - जीते जी देह का भान छोड़ो, मुझे याद करो। देवताओं को भोग हमेशा पवित्र ही लगाया जाता है तो तुम भी पवित्र खाओ।

अभी तुम बच्चों को फूल मुआफिक हर्षित रहना चाहिए। कन्या को पति मिलता है तो मुखड़ा खिल जाता है ना। अच्छे जेवर आदि कपड़े पहनती है तो चमक उठती है। अभी तुम तो ज्ञान के जेवर पहनते हो। वहाँ स्वर्ग में तो नेचुरल ब्युटी रहती है। श्रीकृष्ण का नाम ही है सुन्दर। राजा-रानी, प्रिन्स-प्रिन्सेज सब सुन्दर होते हैं। वहाँ प्रकृति भी सतोप्रधान हो जाती है। लक्ष्मी-नारायण जैसे नेचुरल ब्युटी यहाँ कोई बना न सके। उनको कोई इन आंखों से देख थोड़ेही सकते हैं। हाँ साक्षात्कार होता है परन्तु साक्षात्कार से कोई हूबहू चित्र बना थोड़ेही सकेंगे। हाँ कोई आर्टिस्ट को साक्षात्कार हो जाए और उसी समय बैठ बनाये। परन्तु है मुश्किल। तो तुम बच्चों को बहुत नशा रहना चाहिए। अभी बाबा हमको लेने लिए आया है। बाबा से हमें स्वर्ग का वर्सा मिलता है। यह हमारे 84 जन्म पूरे हुए। ऐसे-ऐसे ख्याल बुद्धि में होने से खुशी होगी। विकार का जरा भी ख्याल नहीं आना चाहिए। बाप कहते हैं - काम महाशत्रु है। द्रोपदी ने भी इसलिए पुकारा है ना।

बाप कहते हैं - तुम एक मेरे से ही सुनो और यही श्रीमत औरों को सुनाओ। फादर शोज़ सन। सन शोज़ फादर। फादर कौन? शिव फादर। शिव और शालिग्राम का गायन है। शिवबाबा जो समझाते हैं इस पर फॉलो करो। फॉलो फादर। यह गायन उनका है, बाप कहते हैं - मीठे बच्चे फॉलो कर पवित्र बनो, फॉलो करने से ही तुम स्वर्ग के मालिक बनेंगे। लौकिक बाप को फॉलो करने से 63 जन्म तुम सीढ़ी नीचे उतरते हो। अब पारलौकिक बाप को फॉलो कर ऊपर चढ़ना है। बाप के साथ जाना है। बाप कहते हैं - एक-एक रत्न लाखों रूपयों का है। बाप रोज़ समझाते रहते हैं - मीठे-मीठे बच्चों पहले-पहले सबको दो बाप का परिचय देना है। लौकिक बाप वर्सा देते हैं पतित बनने का। पारलौकिक बाप वर्सा देते हैं पावन बनने का। कितना फ़र्क है। अब पारलौकिक बाप कहते हैं पावन बनो। विकार में जाने वाले को पतित कहा जाता है।

तुम्हारी मिशन है पतितों को पावन बनाने का रास्ता बताने वाली। पारलौकिक बाप भी अभी कहते हैं - पावन बनो, जबकि विनाश सामने खड़ा है। तो अब क्या करना चाहिए? जरूर पारलौकिक बाप की मत पर चलना चाहिए ना। प्रदर्शनी में यह भी प्रतिज्ञा लिखानी चाहिए। पारलौकिक बाप को फॉलो करेंगे? पतित बनना छोड़ेंगे? लिखो। बाप ही गैरन्टी लेते हैं, तुम भी गैरन्टी ले सकते हो। तुम पतित बनते ही क्यों हो जो फिर पुकारते हो हे पतित-पावन आओ। सारी बात ही है प्योरिटी पर। तुम बच्चों को दिन-प्रतिदिन खुशी रहनी चाहिए। हमको बाप स्वर्ग का वर्सा दे रहे हैं। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमॉर्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) कोई भी गन्दी (छी-छी) आदत नहीं डालनी है। जीते जी देह का भान छोड़ना है। फूल मुआफिक हर्षित रहना है।

2) पारलौकिक बाप को फॉलो कर पावन बनना है। उनकी श्रीमत पर चलने की प्रतिज्ञा करनी और करानी है।

वरदान:-
निर्विकारी वा फरिश्ते स्वरूप की स्थिति का अनुभव करने वाले आत्म-अभिमानी भव

जो बच्चे आत्म-अभिमानी बनते हैं वह सहज ही निर्विकारी बन जाते हैं। आत्म-अभिमानी स्थिति द्वारा मन्सा में भी निर्विकारीपन की स्टेज का अनुभव होता है। ऐसे निर्विकारी, जिन्हें किसी भी प्रकार की इम्प्युरिटी वा 5 तत्वों की आकर्षण आकर्षित नहीं करती - वही फरिश्ता कहलाते हैं। इसके लिए साकार में रहते हुए अपनी निराकारी आत्म-अभिमानी स्थिति में स्थित रहो।

स्लोगन:-
जीवन में अतीन्द्रिय सुख का अनुभव करने के लिए विशेष अमृतवेले एकान्तप्रिय बनो।

ये अव्यक्त इशारे - अब अपने दाता स्वरूप को प्रत्यक्ष करो

ब्राह्मण आत्माओं के पास ज्ञान तो पहले ही है लेकिन उनके प्रति दो प्रकार से दाता बनो:- 1- जिस आत्मा को, जिस शक्ति की आवश्यकता हो, उस आत्मा को मन्सा द्वारा अर्थात् शुद्ध वृत्ति, वायब्रेशन्स द्वारा शक्तियों का दान अर्थात् सहयोग दो। 2- कर्म द्वारा सदा स्वयं जीवन में गुण मूर्त बन, प्रत्यक्ष सेम्पल बन औरों को सहज गुण धारण करने का सहयोग दो, इसको कहा जाता है गुण दान। दान का अर्थ है सहयोग देना।

26-08-2026        प्रात:मुरली    ओम् शान्ति     "बापदादा"        मधुबन“मीठे बच्चे - तुम गैरन्टी करते हो कि हम अपने ही यो...
25/08/2026

26-08-2026 प्रात:मुरली ओम् शान्ति "बापदादा" मधुबन

“मीठे बच्चे - तुम गैरन्टी करते हो कि हम अपने ही योगबल से इस भारत को स्वर्ग बनायेंगे, वहाँ एक धर्म, एक राज्य होगा''

प्रश्नः-
माया के किस विघ्न से सेफ रहने वाले बहुत अच्छी कमाल कर सकते हैं?

उत्तर:-
माया का सबसे बड़ा विघ्न है - देह-अभिमान में लाकर एक-दो के नाम रूप में फँसाना। जो बच्चे इस विघ्न से सेफ रहते, माया के धोखे से बचे रहते, वे बहुत कमाल कर दिखाते हैं। उनकी बुद्धि में सर्विस के नये-नये ख्यालात चलते रहते हैं। सर्विस में उन्नति तब होगी जब देही-अभिमानी होंगे।

ओम् शान्ति।
बाप आये हैं रूहानी बच्चों को श्रीमत देने। यह तो बच्चे जानते हैं कि थोड़े समय के अन्दर ड्रामा प्लैन अनुसार सारा कार्य होना है। हम रावणपुरी को विष्णुपुरी बनाते हैं। अब बाप भी गुप्त तो पढ़ाई भी गुप्त है। सेन्टर्स तो बहुत हैं। छोटे बड़े गांव में सेन्टर्स हैं और बच्चे भी बहुत हैं। और भी दिन-प्रतिदिन बढ़ते जायेंगे। लिटरेचर में भी लिखते हैं कि हम इस भारत भूमि को स्वर्ग बनाकर छोड़ेंगे। तुमको यह भारत भूमि बहुत प्यारी है क्योंकि तुम जानते हो कि यह भारत ही स्वर्ग था। उनको 5 हजार वर्ष हुए। भारत बहुत शानदार था। तुम ब्रह्मा मुख वंशावली बच्चों को ही यह नॉलेज है। इस भारत को श्रीमत पर स्वर्ग बनाना पड़े। सबको रास्ता बताना है और कोई खिटखिट की यहाँ बात नहीं है। आपस में बैठ राय करनी चाहिए कि इन चित्रों द्वारा ऐसी क्या एडवरटाइज करें जो अखबार में भी यह चित्र डालें। आपस में इस पर सेमीनार करना चाहिए। जैसे उस गवर्मेन्ट के लोग आपस में मिलते हैं, राय करते हैं तो भारत को हम कैसे सुधारें। यह जो इतने मतभेद हो गये हैं, उनको आपस में मिलकर ठीक करें और भारत में सुख-शान्ति कैसे स्थापन हो। ऐसे तुम भी रूहानी पाण्डव गवर्मेन्ट हो, यह बड़ी ईश्वरीय गवर्मेन्ट है। पतित-पावन बाप ही पतित बच्चों को पावन बनाकर पावन दुनिया का मालिक बनाते हैं। यह राज़ तुम बच्चे जानते हो। मुख्य है ही भारत का आदि सनातन देवी-देवता धर्म। यह है रूद्र ज्ञान यज्ञ। रूद्र कहा जाता है शिवबाबा को। अब तुमको बाप ने आकर जगाया है, तुमको फिर औरों को जगाना है। ड्रामा प्लैन अनुसार तुम जगाते रहते हो। अब तक जिस-जिस ने जैसा-जैसा पुरुषार्थ किया है, उतना ही कल्प पहले भी किया था। तुम्हारी रूहानी युद्ध है। कभी माया का जोर हो जाता है, कभी ईश्वर का। कभी-कभी तो सर्विस अच्छी तेजी से चलती है। कभी कई बच्चों में माया के विघ्न पड़ जाते हैं। माया एकदम बेहोश कर देती है। लड़ाई का मैदान तो है ना। माया, राम की सन्तान को बेहोश कर देती है। लव-कुश की कहानी भी है ना। राम के दो बच्चे दिखाये हैं। यहाँ तो बाबा के ढेर बच्चे हैं। इस समय सब मनुष्य कुम्भकरण की नींद में सोये हुए हैं। वे यह भी नहीं जानते कि परमपिता परमात्मा आया है - बच्चों को वर्सा देने। बाप भारत में ही आते हैं। यह बात बिल्कुल ही भूल गये हैं। भारतवासी ही स्वर्ग के मालिक थे, इसमें कोई शक नहीं। परमपिता परमात्मा का जन्म भी यहाँ होता है तब तो शिव जयन्ती भारत में मनाते हैं। तो जरूर उसने कुछ आकर किया होगा। बुद्धि कहती है कि जरूर बाप ने आकर स्वर्ग की स्थापना की होगी। प्रेरणा से थोड़ेही स्थापना करेंगे। यहाँ तो तुम बच्चों को राजयोग सिखाया जाता है, याद की यात्रा सिखाई जाती है। प्रेरणा में कोई आवाज नहीं होता। समझते हैं शंकर प्रेरणा से विनाश करता, परन्तु इसमें प्रेरणा की बात नहीं है। तुम समझ गये हो कि ड्रामा में उन्हों का पार्ट ही है - मूसल बनाना। वे विनाश अर्थ निमित्त बने हुए हैं। प्रेरणा शास्त्रों का अक्षर है, इसमें प्रेरणा की तो बात ही नहीं है। ड्रामा अनुसार विनाश तो होना ही है। गाया हुआ है महाभारत लड़ाई में यह मूसल आदि काम में आये थे, जो पास्ट हो गया है वह फिर रिपीट होना है। तुम गैरन्टी करते हो कि हम योगबल से स्वर्ग की स्थापना करेंगे, वहाँ एक धर्म होगा। तो दूसरे सब धर्म कहाँ होंगे? जरूर विनाश हो जायेंगे। यह समझने की बात है। गाया हुआ है - ब्रह्मा द्वारा स्थापना, विष्णु द्वारा पालना तो ठीक है। लेकिन शंकर को तो शिव के साथ मिला दिया है, यह रांग है। शिव-शंकर कह देते हैं क्योंकि शंकर तो कोई काम नहीं करते तो शिव से मिला दिया है। परन्तु शिवबाबा कहते हैं मुझे तो बहुत काम करना पड़ता है। सबको पावन बनाना पड़ता है। मैं इस ब्रह्मा तन में प्रवेश कर इस साकार द्वारा स्थापना का कार्य कराता हूँ। शंकर का तो कोई पार्ट है नहीं। शिव की पूजा होती है। शिव ही कल्याणकारी झोली भरने वाला है। शिव परमात्माए नम: कहते हैं ना। यह ब्रह्मा भी प्रजापिता ठहरा। ब्रह्मा सो विष्णु, विष्णु सो ब्रह्मा यह तो बड़ी गुह्य बातें हैं। यह सिर्फ तुम बच्चे ही जानते हो। सेन्सीबुल बच्चों की बुद्धि में ज्ञान झट समझ में आ जाता है। मनुष्य को कुछ भी समझ नहीं है कि पतित-पावन बाप कब आयेंगे! अब तो कलियुग का अन्त है। अगर कहते कि कलियुग के अन्त में 40 हजार वर्ष पड़े हैं, तो अभी कितना और पतित बनेंगे? कितना दु:ख सहन करेंगे? कलियुग में सुख तो होगा नहीं। कुछ भी न जानने के कारण बिचारे घोर अन्धियारे में पड़े हैं।

तुम बच्चों को आपस में मिलकर राय करनी चाहिए कि कैसे सर्विस को बढ़ायें। बाप प्लैन तो बताते रहते हैं फिर बच्चों को आपस में मिलना है। चित्रों पर अच्छी रीति समझाना है। यह भी ड्रामा अनुसार चित्र बनते जा रहे हैं। बच्चे जानते हैं कि जो-जो समय पास होता जाता है, हूबहू ड्रामा चलता रहता है। बच्चों की अवस्थायें तो कब ऊपर, कब नीचे, यह चलता रहेगा। बाबा भी साक्षी होकर देखता है। कभी-कभी बच्चों पर ग्रहचारी बैठती है तो उनको मिटाने के लिए प्रयत्न कराते हैं। बाबा घड़ी-घड़ी कहते हैं कि बाप को याद करो। लेकिन देह-अभिमान में आ जाते हैं इसलिए ठोकरें खाते हैं, इसमें देही-अभिमानी बनना पड़े। परन्तु बच्चों में देह-अभिमान बहुत है। तुम देही-अभिमानी बनो तो बाप की याद रहे फिर सर्विस की उन्नति भी होती रहेगी। जिनको ऊंच पद पाना है, वह सदैव सर्विस में लगे रहेंगे। तकदीर में अगर नहीं है तो तदबीर भी नहीं करेंगे। खुद कहते हैं कि बाबा हमको धारणा नहीं होती है। बुद्धि में नहीं बैठता। धारणा अगर नहीं होती तो खुशी भी नहीं रहती है। जिनको धारणा होती है तो खुशी भी रहती है। समझते हैं कि शिवबाबा आया हुआ है। बाप कहते हैं - बच्चे तुम अच्छी रीति समझकर फिर औरों को भी समझाओ। कोई तो सर्विस में लग जाते हैं। पुरुषार्थ करते रहते हैं। तुम बच्चे जानते हो कि जो-जो सेकेण्ड बीतता है वह ड्रामा में नूँध है फिर ऐसे ही रिपीट होता है। बच्चों को ही समझाया जाता है कि बाहर भाषण करते समय तो अनेक प्रकार के मनुष्य आते हैं। तुम बच्चे जानते हो कि सभी वेद, शास्त्र, गीता आदि पर ही भाषण करते हैं, उनको यह पता थोड़ेही है कि यहाँ ईश्वर अपना और इस रचना के आदि-मध्य-अन्त का रहस्य समझाते हैं। चित्रों में कितना अच्छी तरह दिखाया है कि परमात्मा कौन है! यह बातें प्रोजेक्टर पर तो समझा नहीं सकते। प्रदर्शनी में चित्र भी सामने खड़े हैं और फिर तुम समझाकर पूछ भी सकते हो कि अब बताओ कि गीता का भगवान कौन है? ज्ञान का सागर कौन है? पवित्रता सुख-शान्ति का सागर, लिबरेटर गाइड कौन है? श्रीकृष्ण के लिए तो कह नहीं सकेंगे। परमात्मा की महिमा अलग है। पहले लिखाना भी चाहिए, प्रोब लेना चाहिए। सबसे सही भी लेनी है।

(हॉल में चिड़िया लड़ रही हैं) इस समय सारी दुनिया में लड़ाई-झगड़ा ही है। सब आपस में लड़ते रहते हैं। 5 विकार भी मनुष्य में गाये जाते हैं। जानवरों की तो बात नहीं है। विशश वर्ल्ड और वाइसलेस वर्ल्ड मनुष्यों के लिए गाया हुआ है। कलियुग में है आसुरी सम्प्रदाय, सतयुग में हैं दैवी सम्प्रदाय। मनुष्य इतने तमोप्रधान बुद्धि हैं जो बिल्कुल समझते नहीं कि हम ही आसुरी सम्प्रदाय हैं। देवताओं के आगे जाकर गाते भी हैं हम ही नींच पापी हैं, हम निर्गुण हारे में कोई गुण नाही। तुम तो उन्हों को सिद्ध कर बता सकते हो। सीढ़ी के चित्र में बड़ा क्लीयर है। दिखाया हुआ है कि कैसे चढ़ती कला है फिर उतरती कला है। भारतवासियों के लिए मुख्य है सीढ़ी का चित्र। यह है सबसे अच्छी चीज़। इस चित्र पर बहुत अच्छा समझा सकते हो। 84 जन्म पूरे कर फिर पहला नम्बर जन्म लेना है फिर उतरती कला से चढ़ती कला में जाना पड़े। हर एक का विचार चलना चाहिए कि सबको रास्ता कैसे बतायें। ख्यालात नहीं चलेंगे तो सर्विस कैसे करेंगे। चित्रों पर समझाना बहुत सहज होता है। सतयुग के बाद सीढ़ी उतरनी ही है। बच्चे जानते हैं कि अब हम ट्रांसफर हो रहे हैं। लेकिन सीधा सतयुग में नहीं जाते। पहले शान्तिधाम में जाना है। तुम जानते हो हम पार्टधारी हैं। बाकी तुम्हारे में भी नम्बरवार हैं जो अपने को पार्टधारी समझते हैं - इस ड्रामा के। दुनिया में ऐसा कोई नहीं कह सकते कि हम पार्टधारी हैं। हम लिखते भी हैं कि हर एक मनुष्य मात्र इस बेहद ड्रामा के एक्टर्स होते हुए भी ड्रामा के मुख्य एक्टर्स, डायरेक्टर और ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त को नहीं जानते हैं, तो वह बेसमझ हैं। इस लिखने में कोई हर्जा नहीं है। एक कान से सुन दूसरे से निकाल नहीं देना चाहिए। सर्विस, सर्विस और सर्विस। बाबा जानते हैं कि बच्चों पर कभी ग्रहचारी भी बैठती है। जब ग्रहचारी बैठती तो कितना नुकसान हो जाता है, वह बाप जानते हैं। साहूकार गरीब बन पड़ते हैं। कारण तो होता है ना। बहुतों को बाबा समझाते भी रहते हैं - बच्चे नाम-रूप में कभी नहीं फँसना। नहीं तो माया ऐसी है जो नाक से पकड़ खड्डे में डाल देगी। माया बड़ा धोखा दे देगी। आशिक माशूक यहाँ नहीं बनना है। आशिक माशूक कोई विकार के लिए बनते हैं, दूसरे सिर्फ रूप पर फिदा होते हैं। तुम जानते हो सेन्टर्स पर भी ऐसे माया के विघ्न बहुत पड़ते हैं, एक-दो के नाम-रूप में फंस जाते हैं। माया ऐसी प्रबल है जो माता, माता के नाम-रूप में, कन्या, कन्या के नाम-रूप में भी फँस पड़ती है। पुरुषार्थ करते हुए भी माया एकदम पकड़ लेती है इसलिए बाबा सावधानी देते हैं कि बच्चे माया बहुत फँसाने की कोशिश करेगी, लेकिन तुमको फँसना नहीं है। देह-अभिमान में नहीं आना चाहिए। अपने को आत्मा समझ बाप को याद करना है। माया के धोखे से बचते रहना है। तुम बच्चों को बाप गुल-गुल (फूल) बनाने आये हैं, तुम्हें किसी बात में संशय नहीं आना चाहिए। अगर दिल में संशय आया तो सर्विस अच्छी तरह कर नहीं सकेंगे। अन्दर घुटका खाते रहेंगे। हिम्मत रखनी चाहिए। टाइम बहुत थोड़ा है। बाबा की मुरली सुनेंगे तो उत्साह में आयेंगे। आत्मप्रकाश बच्चा ठीक रीति चित्रों तरफ अटेन्शन दे रहा है। बाम्बे वालों के भी दिमाग में आना चाहिए। मुख्य चित्र को पहले बनाना पड़े। जांच करनी चाहिए, बाबा डायरेक्शन देते रहते हैं कि कैसे चित्रों में उन्नति होनी चाहिए। ऐसी कोई युक्ति रचो जो सीढ़ी का चित्र एरोड्रम पर रखा जाए। यह चित्र देखकर सब खुश होंगे। आखिर समझेंगे कि इनको मत देने वाला कौन है। तो बच्चों को बहुत नशा चढ़ना चाहिए। अच्छा!

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:-
1) तुम बच्चे लड़ाई के मैदान में हो, माया रावण से तुम्हारी युद्ध है। माया बहुत विघ्न डालती है। बच्चों को बहुत सावधान रहना चाहिए।

2) हर एक को अपनी उन्नति के लिए विचार करना है। चित्रों पर कैसे समझायें, सर्विस को कैसे बढ़ायें। चित्रों में ऐसा क्या डालें जो मनुष्य सहज समझ जाएं।

वरदान:-
देह-अभिमान के त्याग द्वारा श्रेष्ठ भाग्य बनाने वाले सर्व सिद्धि स्वरूप भव

देह-अभिमान का त्याग करने अर्थात् देही-अभिमानी बनने से बाप के सर्व संबंध का, सर्व शक्तियों का अनुभव होता है, यह अनुभव ही संगमयुग का सर्वश्रेष्ठ भाग्य है। विधाता द्वारा मिली हुई इस विधि को अपनाने से वृद्धि भी होगी और सर्व सिद्धियां भी प्राप्त होंगी। देहधारी के संबंध वा स्नेह में तो अपना ताज, तख्त और अपना असली स्वरूप सब छोड़ दिया तो क्या बाप के स्नेह में देह-अभिमान का त्याग नहीं कर सकते! इसी एक त्याग से सर्व भाग्य प्राप्त हो जायेंगे।

स्लोगन:-
क्रोध मुक्त बनना है तो स्वार्थ के बजाए नि:स्वार्थ बनो, इच्छाओं के रूप का परिवर्तन करो।

ये अव्यक्त इशारे - अपवित्रता के बीज को भी समाप्त कर सम्पूर्ण स्वच्छ (पवित्र) बनो

बाप के साथ आप सबने भी पान का बीड़ा उठाया है कि पवित्रता द्वारा हम प्रकृति को भी पावन करेंगे। तो ये संकल्प पूरा करने के लिए बापदादा चाहते हैं कि विश्व का हर एक बच्चा पहले लगाव मुक्त बने - चाहे साधनों से, चाहे व्यक्ति से। साधनों को यूज़ करना और चीज़ है, लगाव अलग चीज़ है। तो बापदादा हर बच्चे को पहले लगाव-मुक्त बनाना चाहते हैं।

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