28/08/2026
ॐ
येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वाम् अनुबध्नामि, रक्षे मा चल मा चल।।
अर्थ —
जिस रक्षा सूत्र से दानवों के महापराक्रमी राजा बलि बाँधे गये थे (अर्थात् धर्म में प्रयुक्त किये गये थे) उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधती हूँ (अर्थात धर्म के लिये प्रतिबद्ध करती हूँ) हे रक्षासूत्र! तुम (चल, अचल स्थिति में रक्षा करना) चलायमान न हो।
भावार्थ —
मित्रों! आज रक्षाबन्धन है। अर्थात रक्षा करने के लिये प्रतिबद्ध। राखी एक रक्षासूत्र है जिसे मंत्रोच्चार करके, अभिमंत्रित करके बहिन अपने भाई की कलाई पर बांधती है। यही अभिमंत्रित रक्षा सूत्र एक व्यक्ति की किसी भी मुश्किल घड़ी में उसकी रक्षा करता है। यदि पौराणिक कथा की बात की जाये तो हमें पता चलता है कि एक बार देव और दानवों में भयंकर युद्ध हो रहा था और देवताओं की हार हो रही थी ऐसे में सभी देवता सहायता के लिए देव -गुरु बृहस्पति के पास गये तब माता शची ने सारी बातें सुनीं तथा एक रक्षासूत्र को मन्त्रों से युक्त करके,अभिमंत्रित करके राजा इन्द्र को बांधा इसके बाद इन्ही मन्त्रों की दिव्य शक्ति से देवों की जीत हुई। जिस दिन यह सूत्र बांधा गया था उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी इसीलिये रक्षासूत्र बांधने के लिये इसी दिन की परम्परा आरम्भ हो गई। इसी प्रकार एक दूसरी कथा के अनुसार राजा महाबलि बहुत निरंकुश हो रहे थे उनकी शक्तियों को सीमित करने के लिये भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया और महाराजा बलि से तीन पग जमीन मांगी पहले दो पग में उन्होने दोनो लोक नाप लिये तब उन्होने कहा कि तीसरा पग कहाँ रखूँ तो महाराजा भगवान विष्णु को पहचान गये और उन्होने अपना सिर रख दिया कि इस पर तीसरा पैर रख लीजिये। तब विष्णु जी ने उन्हें रसातल भेज दिया। वहाँ महाराजा बलि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने वरदान मांगने के लिए कहा तो महाराजा ने कहा कि हे भगवान आप सदा मेरे साथ रहे और इस प्रकार भगवान विष्णु वहीं रह गये। तब लक्ष्मी जी रसातल गई और उन्होने दानवेन्द्र महाबली को रक्षा सूत्र बांधा तो महाराजा बलि ने लक्ष्मी जी से वरदान लेने के लिये कहा तो लक्ष्मीजी ने विष्णु जी को वापस अपने लोक ले जाने के लिये मांग लिया। जिस दिन लक्ष्मी जी ने रक्षासूत्र बांधा उस दिन भी श्रावण मास की पूर्णिमा ही थी। इसी लिये इस दिन को शुभ माना जाता है। मित्रो! एक स्त्री की भक्ति में उसके मन्त्रों में इतनी शक्ति होती है कि वह अपने पति या भाई को किसी भी मुश्किल से मुश्किल परिस्थिति से बाहर निकाल सकती है। हर क्षत्राणी युद्ध में जाने से पहले अपने पति के हाथ पर रक्षा सूत्र बांधती थी जो युद्ध क्षेत्र में उसकी रक्षा करता था। तो मित्रो! यह रक्षाबन्धन का पवित्र त्यौहार पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाना चाहिये। इसकी पवित्रता और भक्ति में ही सब कुछ निहित है।
....ॐ शान्ति ॐ....