30/06/2021
*प्रो0 संगम लाल पाण्डेय*
30 जून को 92 वी पुण्य तिथि पर
- स्मरण -..............................
ज्ञान के प्रकाश स्तम्भ प्रो0संगम लाल पाण्डेय ने धर्म,दर्शन और राजनीति के क्षेत्र मे महत्वपूर्ण कार्य किया है उन्होनेभारतीयदर्शन, समकालीन-दर्शन,पाश्चात्य-दर्शन,अद्वैत-वेदान्त,भाषा-दर्शन, वेदांतिक-समाजवाद पर कालजयी ग्रंथो की रचना करके विश्व के पटल पर महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है | उनकी प्रमुख पुस्तकों मे भारतीय दर्शन का सर्वेक्षण ,नीतिशास्त्र का सर्वेक्षण ,मूल शांकर वेदान्त, व्हेदर इंडियन फ़िलॉसफी,प्री शंकर अद्वैत फिलॉसफी , ज्ञानमीमांसा के गूढ प्रश्न,शंकरचार्य के दर्शन का उज्जीवन,वेदांतिक समाजवाद आदि है जिनमे दर्शन और ज्ञान की नयी अभिव्यक्ति दृष्टिगोचर होती है | जिन लोगो ने उनको व्याख्यान देते सुना है वे अपने आप
उनकी ओर खिचते चले जाते थे | वरिष्ठ आइ0ए0 एस0 अधिकारी श्रीoआरoड़ीoसोनकर जी जो उनके शिष्य भी थे का कहना है कि"उनमे विलक्षण प्रतिभा थी और वह उत्कृष्टकोटि के विद्वान
थे | वास्तव मे वह विद्वानो के विद्वान थे,गुरुओं के गुरु थे | उनमे वैदिक ऋषियों जैसी
स्मरण शक्ति थी|
प्रो0 संगम लाल पाण्डेय मेरे पिता थे ।
उनका जन्म 12 जुलाई 1929 को इलाहाबाद के
समही गाँव मे हुआ था । बचपन से ही उनकी चर्चा पूरे प्रदेश में होने लगी थी | वे अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के थे । जिसके कारण प्रारम्भिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक हर परीक्षा में टॉप करते रहे ।1952 मे वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे दर्शन शास्त्र के प्रवक्ता नियुक्त हुए |1974 मे रीडर तथा1980 मे प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष| सेवा निवृति के उपरांत यूoजीo सीo ने उन्हे इमीरिटस प्रोफेसर नियुक्त कर दिया था |प्रो0 पाण्डेय की सबसे बड़ी विशेषता उनकी अद्भुत और विलक्षण स्मरण शक्ति थी । एक बार वो जिस पुस्तक को पढ़ लेते थे वह सारा ज्ञान उनके मस्तिष्क में स्थिर रहता था । उनके समकालीन , दुनिया का कोई ऐसा दार्शनिक न था जो उनकी विद्वता से प्रभावित न हुआ हो । डॉ0 राम मनोहर लोहिया उन्हें क्रियावान दार्शनिक कहते थे ।
प्रोoपाण्डेय ने भारतीय समाज में भारतीय समाजवाद की प्रकृति को समझने की मूल अन्तर्दृष्टि पैदा की थी ।
उन्होने लोकायनवाद नामक नवीन मत की स्थापना की | उनका कहना है कि वेदान्त और
उपनिषद को मिलाकर एक निर्दोष समाजव्यवस्था की स्थापना करने से न केवल भारत का कल्याण होगा बल्कि पूरे विश्व का कल्याण होगा । सामाजिक समस्याओं को लेकर वह सदैव चिंतित रहा करते थे । पिता और गुरु के रूप में उनका अनुशासन कठोर था ।पुत्र के रूप मैंने उनके कंधों पर बैठकर शहर के मेलो को देखा है , उनकी पीठ पर लेट कर गंगा में तैरना सीखा है । उनका हृदय बहुत ही विशाल और कोमल था । तत समय के सभी उच्च कोटि के साधु संतों के साथ उनकी धर्म दर्शन पर चर्चा होती रही जिससे समाज को नया दर्शन और नया विचार मिला। अक्सर वो साधु महात्माओ के बुलाने पर उनके पंडाल में प्रवचन देने और विचार विमर्श करने जाया करते थे श्रोता के रूप में मैं नीचे दरी पर बैठा रहता था यद्यपि उस समय मुझे दार्शनिक गूढ़ बाते समझ मे नही आती थी , उन दिव्य ऋषियों की आभा से ही प्रभावित होता था
। स्वामी करपात्री जी ,देवरहा बाबा , सच्चा बाबा , सभी शंकराचार्यो , श्रीपाद बाबा आदि संतो का आशीर्वाद मुझे पिता जी के साथ बचपन मे मिला । उनकी धार्मिकता ,वैज्ञानिकता , तार्किक शैली , सहजता और मानवीयता का प्रभाव मुझे आज भी उद्वेलित करता है ।अत्यंत दुखद रहा इलाहाबाद विश्वविद्यालय का भारत भूमि पर चमकने वाला यह नक्षत्र , 30 जून 2002 को भूलोक छोड़कर एक दूसरे ग्रह मे चला गया | कुछ वर्ष और ऐसे ऋषि की भू लोक में आवश्यकता थी । सम्पूर्ण विश्व उनके विचारों और कृतियों को सदैव याद करता रहेगा । हम उनकी पुण्य तिथि पर हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते है |
धन्यवाद डॉ0 आनन्द प्रकाश पाण्डेय जी 30 - 6 - 2021