Dhiraj dwivedi achievers

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22/12/2025

ये असंगति ज़िंदगी के द्वार सौ-सौ बार रोई
बाँह में है और कोई चाह में है और कोई

साँप के आलिंगनों में
मौन चंदन तन पड़े हैं

सेज के सपनों भरे कुछ
फूल मुर्दों पर चढ़े हैं

ये विषमता भावना ने सिसकियाँ भरते समोई
देह में है और कोई, नेह में है और कोई

स्वप्न के शव पर खड़े हो
माँग भरती हैं प्रथाएँ

कंगनों से तोड़ हीरा
खा रहीं कितनी व्यथाएँ

ये कथाएँ उग रही हैं नागफन जैसी अबोई
सृष्टि में है और कोई, दृष्टि में है और कोई

जो समर्पण ही नहीं हैं
वे समर्पण भी हुए हैं

देह सब जूठी पड़ी है
प्राण फिर भी अनछुए हैं

ये विकलता हर अधर ने कंठ के नीचे सँजोई
हास में है और कोई, प्यास में है और कोई

स्रोत :पुस्तक : मेरे चुनिंदा गीत (पृष्ठ 107) रचनाकार : भारत भूषण प्रकाशन : अमरसत्य प्रकाशन संस्करण : 2008

प्रस्तुति: कलम और साहित्य

16/10/2021

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