IERT PrayagRaj - unofficial

IERT PrayagRaj - unofficial Subsequently in the year 1982 the Institute was awarded Academic Autonomy by the State Government. In 1962 U.P.

The Institute Of Engineering and Rural Technology Allahabad (IERT) was established in 1955.In the year 1962 it became the institution of the State under Grant in Aid. Government took over this Institute by constituting a registered society named " Allahabad Engineering Polytechnic, Allahabad. "

The Engineering Degree Division of the Institute Of Engineering and Rural Technology, Allahabad was set

up in 2001,when the college started offering degree courses in engineering with affiliation from U.P. Technical University , Lucknow (UP)

The campus of INSTITUTE OF ENGINEERING AND RURAL TECHNOLOGY, Allahabad, UP, India spreads over 26.5 acres (107,000 m2) of land and is absolutely pollution free. It has elegant buildings, beautiful landscaped spacious lawns and well laid roads. The Institution has fully furnished hostel and mess facilities for boys and girls separately. The Institute had a full fledged production house inside the campus, where lab jobs of diploma students were sold at premium market prices - reflecting the high level of craftsmanship which was character of the IERT spirit.

MUST WATCH MOVIE:-Since DD National has been overlooked by many in recent times, please share this with all your groups ...
18/05/2024

MUST WATCH MOVIE:-

Since DD National has been overlooked by many in recent times, please share this with all your groups to ensure that anyone who missed this film previously has the opportunity to watch it now on DD National.

बिलकुल सच बात है, “दो भारत थे”एक 2014 से पहले का भारत, जब टीवी, अख़बार, रेडियो, प्लेटफार्म हर जगह ये बताया जाता था कि अन...
01/05/2024

बिलकुल सच बात है, “दो भारत थे”

एक 2014 से पहले का भारत, जब टीवी, अख़बार, रेडियो, प्लेटफार्म हर जगह ये बताया जाता था कि अनजान वस्तुओं को ना छुए, वो बम हो सकता है।

वो भारत जिसमें आये दिन बम ब्लास्ट होना, आतंकी हमले होना, सैनिकों का सर काटकर ले जाना एक आम घटना की तरह अक्सर हुआ करती थी।

सिलेंडर, मोबाईल सिम, यूरिया, सरकारी राशन की दुकानों पर घण्टो लंबी लाईन में खड़े होने की आदत सी पड़ गई थी।

डिजिटल इण्डिया तो छोड़िए, हर नागरिक के हाथ में स्मार्ट फ़ोन होने की तो कल्पना मात्र भी करना बेवक़ूफ़ी मानी जाती थी।

पटरी पर ट्रेन कम, लोग शौच करने ज्यादा जाते थे।

90 के दशक के कई विद्यार्थी लालटेन और ढिबरी में बोर्ड के एग्जाम की तैयारी करते थे। गाँवों में बिजली शिफ्ट में आती थी।

— दूसरा 2014 के बाद का भारत

जन्हा ब्लास्ट करना तो दूर आतंकी घुसने से भी डरते है।
अब देश में आतंकी नहीं घुसते बल्कि देश आतंकियों घर में घुसकर सर्जिकल और एयर स्ट्राइक करता है।

प्लेटफार्म पर अब अनजान वस्तुओं को ना छूने का एनाउसमेंट नहीं, बल्कि वन्दे भारत और अमृत भारत जैसे ट्रेनों के आने का होता है।

लाइन लगाकर सिलेंडर इत्यादि ख़रीदना तो पुराने जमाने की बात है, आजकल ये काम सिर्फ़ मोबाइल से हो जाता है।

अब बैंक अकाउंट खोलने के लिए बैंक नहीं जाना पड़ता, बल्कि बैंक ख़ुद चलकर आपके घर आता है।

आज सिर्फ़ हर ग़रीब के पास स्मार्ट फ़ोन ही नहीं बल्कि GPay और Paytm की सुविधा है।

अन्य बहुत से बदलाव इस देश में 2014 के बाद हुए जिसे एक ट्वीट लिखना मुश्किल है।

अब आप सोचिए को इस चुनाव के बाद आपको इसी भारत रहना है या 2014 से पहले वाले भारत में?

मतदान करने ज़रूर निकले 🙏🏻

एक हॉस्टल जो है परिवार के जैसा है।पहला दिन, जब लगा की 3/4 साल परिवार के बिना कैसे कटेंगे, आँखों में आँशु थे जब पापा यंहा...
16/10/2023

एक हॉस्टल जो है परिवार के जैसा है।

पहला दिन, जब लगा की 3/4 साल परिवार के बिना कैसे कटेंगे, आँखों में आँशु थे जब पापा यंहा छोड़ कर जाने लगे। लगा की मैं भी चला जाऊ, नहीं रहना इस एक कमरे में जिसमे एक बेड, एक ट्यूब लाइट और एक पंखे के अलावा कुछ भी नहीं है।
कैसे कोई रह सकता है इस कमरे में दो अनजान लोगो के साथ।
पर कहते है ना कारवाँ बढ़ता गया , हमसफ़र मिलते गए।
माँ बाप चाहे यंहा ना थे पर वो दोस्त जरूर थे जो माँ बाप और भाई सब बन जाते थे।
चाहे वो रैंगिंग का गन्दा दौर हो या परीक्षा का कठिन समय।

जो एक तरफ तो पढ़ाई करने पर कहते थे अबे चलो अभी सेमेस्टर में बहुत टाइम है और दूसरी तरफ एग्जाम के टाइम पर कहते थे अबे पढ़ लो कल सो लेना।

वो दोस्त भी थे जिनसे हॉस्टल में चाहे बात भी ना होती हो, चाहे अंदर जितना भी मनमुटाव हो पर हॉस्टल के बाहर किसी बाहरी की मजाल भी थी जो ऊनके सामने हमे कुछ कह भी दे।

आखिर हम लोग थे तो होस्टलर ही।
यंहा होस्टलर का वास्तविक मतलब एक परिवार के सदस्य है।
ऐसा परिवार जिसके सदस्य हमेशा एक होकर रहते थे, ऐसा परिवार जिसमे कोई भी झगड़ा ज्यादे दिन नहीं चलता था।
ऐसा परिवार जिसमे किसी के भी मन में किसी के भी लिए द्वेष या जलन नहीं थी।

ऐसा परिवार जिसे छोड़ते हुए लगा की अब इस परिवार के बिना कैसे रहेंगे। ऐसा परिवार जिसमे शामिल होते वक़्त भी आँख में आंसू थे और छोड़ते वक़्त भी आँख में आंसू थे।

ऐसा परिवार जिसके आगे खुद का परिवार भी याद नहीं आता था।

ऐसा परिवार जिसमे मिले अनजान लोग आज जिंदगी में ख़ास बन गए।

ऐसा परिवार जिसमे फिर से जीने की इच्छा हमेशा जिन्दा रहेगी।

काश एक बार वो वक़्त फिर से लौट आता और हम अपने इस परिवार में वही बिताये हुए दिन फिर से जी पाते।

जय हो। Once IERTian always IERTian.
24/08/2023

जय हो।

Once IERTian always IERTian.

26/01/2023
90s Era Childhood Memories ग्रुप में कोई नहीं चलाएगा..... मैंने तो मटके में भी चलाये है सुतली बम आज भी चला लेता हुं और ह...
24/10/2022

90s Era Childhood Memories
ग्रुप में कोई नहीं चलाएगा..... मैंने तो मटके में भी चलाये है सुतली बम आज भी चला लेता हुं और हाँ बच्चो को आपकी देख रेख में सावधानी से चलवाना है क्या है की एक बार रॉकेट बाण दिशा भूलकर हमारे कपड़ों में घुस गई थी हालाकिं विशेष हानि नहीं पंहुचा पाई ये हमें, बस कुछ जगह से निक्कर में छेद हो गए।😁
बचपन में हमें रौशनी के पर्व दीपावली का बेसब्री से इंतजार हुआ करता। सच तो यही है कि हमें पूजा से ज्यादा बारूद की वो गमगमाती गंध लेने का ज्यादा ही इंतजार रहता । पटाखों में पैसे खर्च करने का हौसला उन दिनों बहुत ही कम लोगों को था । फिर भी बारूद की गंध जरूरी थी त्योहार को रंगीन करने के लिए । उन दिनों एक पैकेट मुर्गा छाप ही हमारे लिए बोनांजा पैकेज हो जाया करता था और हम करीने से एक - एक लड़ियां छुड़ा - छुड़ा कर पटाखे अलग किया करते ताकि पठाखे की बाती न निकल जाए । एक - एक पटाखा हमारे लिए हीरे से भी कीमती हुआ करता । लंबी सी संठी के मुंह के सिरे पर पटाखा फंसाकर डिबिया की लौ से पटाखा फोड़ लेने का हुनर हमें बखूबी था । छुड़छुड़ी , रस्सी, अनार , लौकी , हाइड्रो बम , रेल , रॉकेट, बुलेट न जाने कितने तरह के साजों समान हुआ करते मगर नागिन की लड़ी ही हमारे खजाने का नूर हुआ करती । सांप तो हम रोजाना बनाया करते । एक काली से टेबलेट को जलाकर पूरा सांप निकाल लेना सपेरों को भी नहीं आता था जितना कि हमें। हमारे दिमाग में यह बात बैठा दी गई थी कि पटखों को जलाने का मतलब पैसा ही जलाना है और शायद इसलिए हम औरों के बुझे हुए पटाखों से बारूद निकलकर उसका प्रयोग किया करते । अधजले और बुझे हुए पटाखे ढूंढना हमारे लिए अलीबाबा के ख़ज़ाने ढूंढने से कम नहीं था । काफ़ी दुष्कर कार्य हुआ करता था। बड़ों की नजरों में आए बिना सड़कों से पटाखे हल्के पांव में चुपके से दबाते हुए उठा लेना काफी हुनर का काम था । हमें बेइज्जती की फिकर नहीं थी । फिकर थी बस पिटे जाने और शिद्दत से चुने सारे पटाखे छीनकर फेंके जाने की । ख़ैर , हम किसी तरह अपना असला तैयार कर ही लिया करते । दिवाली पूजा की देर रात से लेकर तड़के सुबह उठकर सारे बुझे हुए पटाखे हम चुन ही लिया करते और सात ही में अधजली मोमबत्तियां भी जिसे हम गला - गलाकर अलग - अलग रूप दे दिया करते । बुझे हुए पटाखे का बारीकी से परीक्षण कर हम अलग - अलग कर लेते । जिसमें कुछ भी जान बची होती उसे धूप में सुखाकर फोड़ने का प्रयास करते और बाकियों का बारूद निकलकर या तो बड़ा बम बना लिया करते या बारूद को ही सावधानी से सुलगाकर उसका अद्भुत रूप और गंध को महसूस करते । हम अकेले नहीं होते थे , पूरी की पूरी पलटन साथ हुआ करती । रातभर ओस में भींगे बुझे हुए पटाखे को जिंदा कर लेना हमें बखूबी आता था । अक्सर बारूद हमारी आंखों को अंधेर कर दिया करती मगर उसका एक अलग ही नायब अनुभव था जो बडे़ लोगों को तो कभी मयस्सर भी नहीं हुआ । हम पटाखे भले भी बुझे हुए इस्तेमाल किया करते मगर हम खुद तरोताज हुआ करते थे।
कहते हैं दिवाली पैसे वालों की होती है मगर सच तो यही है कि दिवाली का दीया तो हमारे दिलों में बिना सिक्कों की खनक के ही बखूबी जला करता जिनकी रौशनी हमारे दिलों से निकलकर पूरे मुहल्ले को जगमगाया करती और शमां गुलज़ार हुआ करती ।😊🙏

20/10/2022

90s Era Childhood Memories

" जब घर की रौनक बढ़ानी हो , दीवारों को जब सजाना हो ... नेरोलेक - नेरोलेक " वाला एड अब तक हमारी ज़िंदगी में नहीं आया था। घर की दीवारें कलई में नील डालकर पोती जा रही थीं। पेंट ब्रश के नाम पर हिलौरे भरती नसैनी के ऊपर चढ़े मजदूरों के हाथ कुचिया होती। वही कुचिया जो पोतती कम , आँगन ज्यादा छिटकती ... घरवाले चिल्लाते , नसैनी से दूर रहो... पर हम ठहरे ढीठ , गर्दन ऊँची उठाये दीवारें पोतते मजदूरों को देखकर सोचते
" इनसे बढ़िया तो हम पोत लेंगे " हालाँकि रोटी खाकर सोये मजदूरों की कुचिया उठाकर ये कारनामा भी किया , पर दीवारों से ज्यादा कलई की बूँदा - बाँदी हमारे चेहरे और कपड़ों पर हुई।

उन दिनों ये हाल हमारे आसपास हर बच्चे का था इसलिए हफ्तों पहले ऊपर पड़ी कलई की ये छिटकन हमें बताती कि दिवाली आने वाली है ...

आसपास बाल्टियों और डब्बों में घुली कलई , चूने , डिस्टेम्पर और बार्निश की ख़ुशबू मोहल्ले में हर तरफ उड़ती । सड़के और गलियाँ घर की सफाई में निकले पुराने सामान और रद्दी से पटी होतीं। हम नज़र बचाकर इन्हीं कूढ़े के ढेर से सामान बीनते। उस उम्र में घर - घर खेलने वाले हम बच्चों के लिए असल गृहस्थी से निकली वो टूटी - फूटी चीज़े ही कीमती खिलौने थे जो महीनों के इंतजार के बाद बस दीवाली पर मिलते ठीक वैसे ही जैसे " नए कपड़े " ।

हमारे यहाँ " सिर्फ़ दीवाली पर " ही नए कपड़े आने का सिलसिला सालों तक चला ... मुझे याद है एक बार मैंने सफेद झल्लर ( फ्रिल नहीं बोलते थे हम और ना जानते थे ) वाली फ्रॉक पहनने की ज़िद की थी । ये स्वांग किसी को देखकर उपजा था। कहने को ऐसी झल्लर वाली फ्रॉक हमारे कस्बे के किसी बाज़ार में ना थी पर मम्मी कहतीं ..." दीवाली पर आएगी " ख़ैर महीनों इंतज़ार के बाद पापा वैसी ही कोई फ्रॉक लाये तो पर हमें उसे नज़र भर दिखाया तक ना गया ... इंतज़ार दीवाली का था जो सिर्फ़ हमको ही नहीं हमारी सहेलियों को भी करना था ... हालात सबके घर यही थे ... अलमारी के ऊपर या अंदर , अपने नए कपड़ों का बन्द डब्बा हम एक दूसरे को दिखाकर बस यही कह पाते " जब दीवाली पर पहनेंगे तब देख लेना "

दीवाली का ये दिखावा भी कमाल था ...कपड़ों का तो ठीक , हम तो पटाखों का भी दिखावा कर लेते थे...वो बात अलग थी कि चरखी , सुसुरिया , साँप गोली और बंदूक में चिटपिटिया भरकर चलाने के अलावा किसी पटाखे को हाथ तक ना लगाया । खौफ़ ऐसा कि अनार चलाते हुए घरवाले हमारे कान पर लगी हथेलियाँ खींचते हुए कहते " अरे नहीं फटेगा " पर पटाखों पर हमने कभी भरोसा नहीं किया क्योंकि इन्हीं आँखों ने बोतल में रखे रॉकेट को आसमान नहीं मोहल्ले के घरों की सैर करते देखा था।

इसलिए जैसे - जैसे पटाखों का शोर बढ़ता हम रजाई में दुबककर सोने की कोशिश करते पर उधर से अम्मा की आवाज आती , कहतीं ...

" छछुंद्दर बन्यो जो आज काजल लागाएके नहीं सोईं "

हमें छछुंद्दर बनने का कोई डर ना था सो हम तो सो जाते बिना काजल लगाए पर सुबह हमाई आँखें काजल से भरी होतीं क्योंकि मम्मी को हमारा अगले जन्म में छछुंदर बनना गवारा ना था...

सुबह हम उन्हीं काजल पुती आँखें मीढ़ते हुए उठते और सीधे छत पर दौड़ लगा देते ताकि तराजू बनाने के लिए दिवलियाँ ( मिट्टी के पारंपरिक दीपक ) इकट्ठी कर सकें। और ये काम बिल्कुल आसान नहीं था...तराजू के लिए पतली किनारी वाली दिवलियाँ ढूंढकर अपने पाले में समेटना भैया - बहन से लड़ाई का सबब जो बन जाता।
ख़ैर ... हम कोने - कोने से दिए समेटते और गुशलखाने में रखे तसले वाले पानी में भिगो आते... बाबा ख़ूब चिल्लाते...साफ़ पानी के तसले या बाल्टी में दिये डुबाना बाबा के नियमों के ख़िलाफ़ था इसलिए फटकार के बाद दिवलियाँ भिगोने के लिए हमें कोई टूटी बाल्टी या मग्गा थमा दिया जाता। बेसब्र से हम कुछ ही मिनट बाद अधभीगे दिए लेकर बुआ या चाचा के हाथ में थमा देते ... ये कहते हुए कि " पहले मेरा तराजू बनाओ "

चाचा सीढ़ियों पर बैठकर दियों में छेद करते और हम छुपाई हुयी बुआ की " ऊन " निकालते । जिसे पिरोकर तराजू तैयार होता। तराजू के ऊपर लगी डंडी की व्यवस्था " पिछली रात जली सुरसुरिया के तार या लकड़ी " से हो जाती और बाद में एक निशान भी बना दिया जाता ताकि " अपना तोड़कर मेरा तराजू कोई और ना ले ले "

फिर हमारा पूरा दिन " दिवलिया वाले तराजू के साथ दुकानदारी में बीतता। बेचने के लिए खील , बताशे और खिलौने ( हाथी , घोड़ा ) रुमाल में बँधे होते ।

मोहल्ले के लगभग हर घर के चबूतरे पर एक ऐसी ही दुकान सजी होती , दुकान... जिसका सामान ग्राहकों के इंतज़ार में बैठे दुकानदार ही खा जाते 🙂

- पूजा व्रत गुप्ता

24/02/2022

हम लड़के पिता को गले से नहीं लगते | हम लड़के पिता के गालों को नहीं चूमते और न ही हम पिता की गोद में सिर रख के सुकून से सोते हैं । पिता पुत्र रिश्ता मर्यादित होता है। अक्सर जब घर पे फोन करता हूँ , माँ सं बात होती है। पीछे से कुछ दबे दबे से शब्दों में पिता जी भी कुछ कहते हैं , सवाल पूछते हैं या फिर सलाह तो देते हैं ही ।
कुछ नहीं होता है जब कहने को तो खांसने की एक आवाज उनकी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए कई बार काफी होती हैं | पिता की शिथिल होती तबीयत का हाल भी हम लड़के माँ से ही पूछते है और माँ के ही सहारे दवाइयों, परहेज, व्यायाम इत्यादि की सलाह भी देते है। पिता पुत्र शुरुआत से ही एक दूरी पर होते हैं। दूरी अदब की, लिहाज की, संस्कृत की या फिर जनरेशन गैप की |
हर बेटे का मन करता है कि इन दूरियों को लांघता हुआ जाए और अपने पिता को गले से लगाकर कहे "आई लव यू डैड | जिस तरह मदर्स डे पे माँ को विश करते हैं उसी तरह फादर्स डे पर पिता को गले लगाकर विश करना हम सभी लड़के का स्वप्न है । मगर हम कर नहीं पाते । मां से जितना प्यार करते हैं पिता का उतना ही सम्मान और ये सम्मान की दीवार इतनी - बडी हो चुकी है कि प्यार की छलांग उसको लांघ नहीं सकती।

05/12/2021

बचपन के उस स्कूली दौर में निब पेन का चलन जोरो पे था। बॉलपेन से लिखने वालों को तो हेय दृष्टि से देखा जाता था। मासाब भी निब पेन वालों को आगे की पंक्तियों में स्थान देकर सम्मानित करते थे।
चूंकि उस समय भैया प्रदत्त दो निब पेन मेरे पास थे तो इस विशेष योग्यता के कारण मुझे मॉनिटर का पद भी प्राप्त हुआ था।
*उस समय कैमल और चेलपार्क की ब्लू या ब्लैक या फिर ब्लू-ब्लैक स्याही प्रायः हर घर बड़े आले में रखी मिल ही जाती थी और लाल रंग की स्याही घर मे शान का प्रतीक थी*
और
जिन्होंने भी पेन में स्याही डाली होगी वो ड्रॉपर के महत्व से भली भांति परिचित होंगे,
*तब महीने में दो-तीन बार निब पेन को गरम पानी में डालकर उसकी सर्विसिंग भी की जाती थी,*
तब लगता था की निब को उल्टा कर के लिखने से हैंडराइटिंग बड़ी सुन्दर बनती है, और हर क्लास में मेरे जैसा एक ऐसा एक्सपर्ट जरूर होता था जो सभी (खास-तौर पर लड़कियों) की पेन ठीक से नहीं चलने पे ब्लेड लेकर निब के बीच वाले हिस्से में बारिकी से कचरा निकालने का दावा करके अपनी धाक जमाने का प्रयास करता था, ये अलग बात है कि मेरी लालबुझक्कड़ी धाक कभी नही जम पायी।
दुकान में *नयी निब खरीदने से पहले उसे पेन में लगाकर सेट करना फिर कागज़ में स्याही की कुछ बूंदे छिड़क कर निब उन गिरी हुयी स्याही की बूंदो पे लगाकर निब की स्याही सोखने की क्षमता नापना ही किसी बड़े साइंटिस्ट वाली फीलिंग दे जाता था,*
निब पेन कभी ना चले तो हम में से सभी ने हाथ से झटका के देखने के चक्कर में आजू बाजू वालो पे स्याही जरूर छिड़कायी होगी,
मेरे कुछ मित्र ऐसे भी होते थे जो पढ़ते लिखते तो कुछ नहीं थे लेकिन घर जाने से पहले उंगलियो में स्याही जरूर लगा लेते थे, ताकि *घरवालो को लगे कि बच्चा स्कूल में बहुत मेहनत करता है,*

उसी दौर में अपने बाजू की सीट पे एक न्यू एडमिशन सुन्दर सी लड़की आई,
लेकिन जैसे ही उसने "हीरो" की फाउंटेन पेन अपने बैग से निकाली, अपना बच्चा सा दिल छन से आवाज़ करके टूट गया

*कहाँ वो साठ रूपये वाले "हीरो" के पेन से लिखने वाला राजकुमारी और कहाँ अपन दो रूपये वाली कैमल की पेन से लिखने वाले देसी लड़के,*
दिल तो पूरा टूट ही जाता
किन्तु तभी हमारे गुरु जी ने मेरी मनःस्थिति भाँप कर सिखाया- कि _महँगी पेन खरीदना अच्छी आर्थिक स्थिति का सूचक है लेकिन पेन से सुन्दर हैंडराइटिंग बनाना टैलेंट,_
और *टैलेंट कभी भी पैसो से नहीं ख़रीदा जा सकता, तब जाकर मुझे कुछ राहत मिली।*
ऐसी अनगिनत यादों के साथ बालपन की पुनः यादें मुबारक।

💐🌹

Address

26 , Chatham Lines , Near Prayag Railway Station
Allahabad
211002

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