20/01/2026
सर्वहारा वर्ग के महान शिक्षक और प्रथम समाजवादी क्रान्ति के नायक लेनिन के 102 वें स्मृतिदिवस (21 जनवरी) पर हण्ड्रेड फ्लावर्स मार्क्सिस्ट स्टडी ग्रुप - इलाहाबाद चैप्टर की ओर से राजनीतिक अर्थशास्त्र पर चलाये जा रहे तीन दिवसीय अध्ययन चक्र का आज दूसरा दिन था।
आज दूसरे दिन अध्ययन चक्र की शुरुआत सवाल-जवाब से की गई। इसे बाद श्रम और श्रम शक्ति में अन्तर, श्रम शक्ति का मूल्य, बेशी मूल्य, बेशी मूल्य का स्रोत स्थित पूँजी और परिवर्तनशील पूँजी पर बातचीत की गई।
“…मैंने जो माल तुम्हारे हाथ बेचा है, वह दूसरे मालों की भीड़ से इस बात में भिन्न है कि इसका उपभोग मूल्य का सृजन करता है, और वह मूल्य उसके अपने मूल्य से अधिक होता है। इसीलिए तो तुमने उसे खरीदा है। तुम्हारी दृष्टि में जो पूँजी का विस्तार है, वह मेरी दृष्टि में श्रम शक्ति का अतिरिक्त उपयोग है। मण्डी में तुम और मैं केवल एक ही नियम मानते हैं, और वह है मालों के विनिमय का नियम। और माल के उपभोग पर बेचने वाले का, जो माल को हस्तानांतरित कर चुका है, अधिकार नहीं होता: माल के उपभोग पर उसे खरीदने वाले का अधिकार होता है, जिसने माल को हासिल कर लिया है। इसलिए मेरी दैनिक श्रम-शक्ति के उपभोग पर तुम्हारा अधिकार है, लेकिन उसका जो दाम तुम रोज देते हो वह इसके लिए काफी होना चाहिए कि मैं अपनी श्रम शक्ति का रोजाना कुल उत्पादन कर सकूं और फिर उसे बेच सकूं। बढ़ती हुई आयु, इत्यादि के कारण शक्ति का जो स्वाभाविक ह्रास होता है, उसको छोड़ कर मेरे लिए संभव होना चाहिए कि मैं हर सुबह को पहले जैसे सामान्य बल, स्वास्थ्य तथा ताजी साथ काम कर सकूं। तुम मुझे हर घड़ी “मितव्ययिता” और “परिवर्जन” का उपदेश सुनाते रहते हो। अच्छी बात है! अब मैं भी विवेक और मितव्ययिता से काम लूंगा और अपनी एकमात्र सम्पति - यानी अपनी श्रमशक्ति - के किसी भी प्रकार के मूर्खतापूर्ण अपव्यय का परिवर्जन करूंगा। मैं हर रोज अब केवल उतनी ही श्रम शक्ति खर्च करूंगा, केवल उतनी ही श्रमशक्ति को क्रियाशील बनाऊंगा, जितनी उसकी सामान्य अवधि तथा स्वस्थ विकास के अनुरूप होगी। काम के दिन काम का मनमाना विस्तार करके, मुमकिन है कि तुम एक ही दिन में इतनी श्रम शक्ति का इस्तेमाल कर डालो, जिसे मैं तीन दिन में भी प्राप्त न कर सकूं। श्रम के रूप में तुम्हारा जितना लाभ होगा, श्रम के सारतत्व के रूप में मेरा उतना ही नुकसान हो जाएगा। मेरी श्रम शक्ति का उपयोग करना एक बात है और उसे लूट कर चौपट कर देना बिल्कुल दूसरी बात है। यदि एक औसत मजदूर (उचित मात्रा में काम करते हुए) औसतन 30 वर्ष तक जिंदा रह सकता है, तो मेरी श्रम शक्ति का वह मूल्य जो तुम मुझे रोज देते हो उसके मूल्य का 1/365x30 या 1/10950वां भाग होता है। किंतु यदि तुम मेरी श्रम शक्ति को 30 के बजाय 10 वर्षों में खर्च कर डालते हो तो तुम रोजाना मुझको मेरी श्रमशक्ति के कुल मूल्य के 1/3650 के बजाय उसका 1/10950 यानी उसके दैनिक मूल्य का केवल 1/3 ही देते हो। इस तरह तुम मेरे माल के मूल्य का 2/3 भाग प्रतिदिन लूट लेते हो। तुम मुझे दाम दोगे एक दिन की श्रम शक्ति का लेकिन इस्तेमाल करोगे तीन दिन की श्रम शक्ति का। यह हम लोगों के करार और विनिमय के खिलाफ है। इसलिए मैं मांग करता हूं कि काम का दिन सामान्य लंबाई का हो और इस मांग को मनवाने के लिए मैं तुम्हारे हृदय को द्रवित करना नहीं चाहता क्योंकि रुपए पैसे के मामले में भावनाओं को कोई स्थान नहीं होता मुमकिन है कि तुम एक आदर्श नागरिक हो। संभव है कि तुम पशु-निर्दयता-निवारण समिति के भी सदस्य हो और तुम्हारा साधुपन सारी दुनिया में विख्यात हो। लेकिन मेरे सामने खड़े हुए तुम जिस चीज का प्रतिनिधित्व करते हो उसकी छाती में हृदय का अभाव है। वहां जो कुछ धड़कता सा लगता है वह मेरे दिल की आवाज है। मैं सामान्य दीर्घता के काम के दिन की इसलिए मांग करता हूं कि दूसरे विक्रेता की ही तरह मैं भी अपने माल का पूरा पूरा मूल्य चाहता हूं।
इस तरह हम देखते हैं कि बहुत लोचदार सीमाओं के अलावा मालों के विनिमय का स्वरूप खुद काम के दिन पर, यह बेशी श्रम पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाता। पूँजीपति जब काम के दिन को ज्यादा से ज्यादा लंबा खींचना चाहता है, और मुमकिन हो, तो एक दिन को दो दिन बनाने की कोशिश करता है, तब वह खरीदार के रूप में अपने अधिकार का ही प्रयोग करता है। दूसरी तरफ उसके हाथ बेचा जाने वाला माल इस अजीब तरह का है कि उसका खरीददार एक सीमा से अधिक उसका उपयोग नहीं कर सकता, और जब मजदूर काम के दिन को घटाकर एक निश्चित एवं सामान्य अवधि का दिन कर देना चाहता है तब वह भी बेचने वाले के रूप में अपने अधिकार का ही उपयोग करता है। इसलिए असल में यहाँ दो अधिकारों का विरोध सामने आता है, एक अधिकार दूसरे अधिकार से टकराता है और दोनों अधिकार ऐसे हैं जिन पर विनिमय की मुहर लगी हुई है। जब समान अधिकारों की टक्कर होती है तो बल प्रयोग द्वारा ही निर्णय होता है। यही कारण है कि पूँजीवादी उत्पादन के इतिहास में काम का दिन कितना लंबा हो, इस प्रश्न का निर्णय एक संघर्ष के द्वारा होता है, जो संघर्ष सामूहिक पूँजी अर्थात् पूँजीपतियों के वर्ग और सामूहिक श्रम अर्थात मजदूर वर्ग के बीच चलता है।”
(पूँजी, खण्ड 1, पृ. 257-59)