23/01/2023
देश में चल रही चमत्कार पर बहस कहीं से तार्किक व समीचीन नहीं है, हॉ कुछ बुद्धिजीवियाें का ऐसे कृत्यों का समर्थन उनकी कुंद हाेती बुद्धि का परिचायक जरूर है।
एक समय था जब भारत सहित विश्व के कई देशाें में धर्म के नाम पर अंधविश्वास का बाेलबाला था, इसके लिए लाेगाें काे शूली पर भी चढ़ा दिया जाता था। रूढ़ियॉ एवं कुरीतियॉ चरम पर थीं जिसके बाद हम गुलाम हुये। आजादी के बाद विकास की तरफ हम अग्रसर हुये। तार्किक विचार आैर वैज्ञानिक दृश्टिकोंण हमारे लिए विकास आैर उन्नति के दरवाजे खाेलते हैं। मानवीय पहलुओं के साथ जब वैज्ञानिक तरीके से सही राह पर देश चलता है ताे युग चलता है। अंधविश्वास आैर चमत्कार ने इस देश का जितना बेड़ा गर्क किया है, उतना अंग्रेजों की दासता ने भी नहीं किया। दुनिया में जाे भी देश सर्वाधिक विकसित हैं वाे विज्ञान आैर तकनीक के कारण ही हैं किसी चमत्कार के कारण नहीं।
गीता में भगवान कृष्ण स्वयं कहते हैं-
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
(द्वितीय अध्याय, श्लोक 47)
अर्थ: कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, कर्म के फलों में कभी नहीं... इसलिए कर्म को फल के लिए मत करो। कर्तव्य-कर्म करने में ही तेरा अधिकार है फलों में कभी नहीं। अतः तू कर्मफल का हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यता में भी आसक्ति न हो।
इसलिए चमत्कार पर नहीं सात्विक कर्म पर विश्वास करें।