20/05/2026
Jay jalaram bapa
Jay jay Ambemaa
🌹 विवाह लक्षण अध्याय🌹
🌹 विवाह लक्षण अध्याय में हमारी हिंदू परंपरा रीति के अनुसार एवं हमारे शास्त्रों के अनुसार मनुस्मृति एवं अन्य शास्त्रों के अनुसार कन्या का विवाह ,हमारी आर्य परंपरा में कन्या को धन माना गया है। यह ऐसा धन है जो भोग्य नहीं है, देय है। इसे तदनुरूप योग्य वर को दिया जाता है। इसे ही कन्यादान कहते हैं। कंन्यादान महादान है। कन्या रत्न है। इसलिये यह सब प्रकार से रक्षणीय है। रजस्वला होने के पूर्व नारी कन्या है। कन्या का अर्थ है- शुद्ध शुचि शिवा रजस्वला होने पर यदि नारी किसी पुरुष का चिन्तन नहीं करती, कामासक्त नहीं होती, पुरुष संस्पर्श से दूषित नहीं होती तो वह कन्या है ऐसा समझना चाहिये। ऋतुधर्म ग्रहण करने के उपरान्त कंन्यादान निषिद्ध है। इसलिये १०वें १२वें वर्ष में कन्यादान की परंपरा रही है। इन वर्षों में विवाह कर दिया जाता किन्तु वर कन्या परस्पर , एक साथ न मिलते वा रहते थे। ३रे , ५वें , ७वें , ९वें वर्ष में कन्या का गौना (वर के घर कन्या का गमन) किया जाता था। यहीं से गृहस्थ जीवन प्रारंभ होता था। अर्थात् कन्या की वय दाम्पत्य सुख भोगने के समय १३, १५, १७, १९ वा २१ वर्ष होती थी। ऐसी दशा में वर एवं कन्या के हित में उनके आयुष्य के लिये बहुविध विचार एवं प्रयत्न (कर्मकाण्ड) किया जाता रहा है। किन्तु आधुनिक प्रौद्योगिकी, जीविका के साधन, जीवन जीने की परिस्थितियों में इतना परिवर्तन हो गया है कि स्मृतिशास्त्र के अनुसार कन्यादान सम्भव नहीं हो पा रहा है, विशेषकर5 नगरों एवं महानगरों के वातावरण में ऐसी दशा में वय पर ध्यान न देकर शुद्धता एवं शुचिता को देखते हुए कंन्यादान करना चाहिये। दूषित दूरसंचार माध्यम (दूरदर्शनदि)) एवं गंदे तथा निकृष्ट पत्र, पत्रिका, पुस्तकों के पढ़ने से शुचिता दुर्लभ है। पाश्चात्य रहन सहन, अंग्रेजी प्रभाव सब सामाजिक प्रदूषण में वृद्धि हुई है। पारंपारिक भारतीय सामाजिक मान्यताएँ चकनाचूर हो गई। अब कन्यादान मात्र एक पाखण्ड है। वह नारी चाहे गत-यौवना वा प्रौढ़ ही क्यों न हो यदि शुद्ध है, उसका योनिच्छद अक्षत है तो वह कन्या ही मानने योग्य है। उसका कन्यादान , वैदिक पद्धति से विवाह संस्कार करना चाहिये। अन्यथा गन्धर्व विवाह ही ठीक है। आधुनिक युग में नगरों में इसी का बोलबाला है।
🌹कन्या लक्ष्मी है। धन सम्पत्ति भी लक्ष्मी है। इसलिये कंन्या धन है। धन की श्रेष्ठ गति है, दान । इसलिये कन्या का दान किया जाता है। लक्ष्मी का पति विष्णु है। इसलिये वर को विष्णु मान के उसके चरणों को विष्णुपाद के रूप में पूजा जाता है। ब्रह्मचारी विष्णु है। आज कौन कंन्या लक्ष्मी है, कौन वर विष्णु है ? हे कलियुग । तुभ्यं नमः ।
🌹वैदिक कर्म पद्धति लड़खड़ाती हुई चल रही है। जो है, उसे नकार कर, जो नहीं है, उसे माना जा रहा है। दूषित युवती को शुद्ध मानकर उसका कन्यादान करना चाहिये। भ्रष्ट वर को ब्रह्मचारी मानकर उसका पैर धोना (पाद पूजा करना चाहिये। श्वसुर और दामाद में झगड़ा होगा ही, ऐसा मानना चाहिये। यह पूर्व सिद्ध , प्रतिपादित है। दक्ष प्रजापति भगवान शंकर के श्वसुर थे। उन्होंने अपनी ६० कन्याओं में से सती नाम की एक कन्या शंकर को व्याही। इसलिये शिवजी उनके दामाद हुए। शिव और दक्ष में विवाद हुआ। शिव ने दक्ष का सिर कटवा दिया। अर्थात् दामाद द्वारा श्वसुर का अपमान हुआ। आज भी श्वसुर लोग दामादों से अपमानित होते हैं। दामाद, श्वसुर के लिये दसवाँ यह है। इस ग्रह की शांति के लिये श्वसुर अनैतिक साधनों से धन इकट्ठा करता और उसे देता है। दामाद दुष्ट मह है: राहु से भी अधिक दुष्ट । यह दुष्ट मह चण्डी रूप पत्नी पाकर शान्त होता है। इस व्यवस्था के नियन्ता नारायण को मेरा नमस्कार ।
🌹सृष्टि में यह व्यवस्था है- जो जीतता है, वह हारता है तथा जो हारता है, वह जीतता है। श्वसुर एक बार अपने दामाद का पैर धो लेता है तो इसके बदले में वह उस दामाद से अपनी दुहिता का जीवन भर पैर धुलवाता है। यह सत्य प्रत्यक्ष है। पुरुष अपनी पत्नी का दास हो जाता है। शिव अपनी मृत पत्नी सती के शव को अपने कन्धे पर रखकर उन्मत्त होकर तीनों लोकों का चक्कर लगा रहे थे। विष्णु ने उस शव के १२ टुकड़े कर शिव को उससे मुक्त किया। आज के इन स्त्रैण , स्वीमोही पुरुषों की दुर्दशा का मैं क्या वर्णन करूं ? जो भगवान् विष्णु की शरण में नहीं जाता, उसका दुर्दशापस्त होना अवश्यम्भावी है। मैं विष्णु की शरण में हूँ । द्विजों के लिये विवाह एक संस्कार है। ऋषियों ने इसे केवल संस्कार तक ही सीमित न रखकर एक व्यापक रूप दिया है। संस्कार में वैदिक मंत्रों का प्रयोग विशिष्ट कर्मकाण्ड के साथ होता है। विवाह, संस्कार मात्र न रहकर जब केवल विवाह होता है तो विवाह का अर्थ हुआ-स्त्री-पुरुष का मिथुनीकरण, एकीकरण, सम्मिलन, सम्भोग, संगम, सहवास, परिरम्भ, अभिष्यज्ञ। यह अर्थ आठ प्रकारों से सिद्ध होता है। अखिल भूमण्डल में ८ प्रकार के विवाह विभिन्न रूपों में होते चले आये हैं। यह ८ की संख्या विवाह को दूषित करती है। ८ अशुभ अंक है। ७ सप्तम भाव का द्योतक अंक है। इन दोनों का योग होता है तो विवाह + विवाह प्रकार = ७ + ८ १५ की संख्या आती है। १५ = १ +५= ६ अशुभ शत्रु संख्या है। अतएव विवाह किसी के लिये शुभ नहीं है। इसीलिये शुकदेव जी ने अपने पिता व्यास जी के आग्रह को सतर्क अस्वीकार करते हुए विवाह नहीं किया। ऐसे शुकदेव को मैं नमन करता हूँ।
🌹ब्राह्म,
2 दैव,
3 आर्य,
4 प्राजापत्य,
5 आसुर,
6 गान्धर्व,
7 राक्षस,
8 पैशाच-ये ८ विवाह हैं।
🌹योग्य वर को सम्मानपूर्वक अपने घर बुलाकर उसे वस्त्रालंकृत कन्या को देना, ब्राह्म विवाह है।
कर्मशील वर को वस्त्राभूषणों से सुसज्जित कर कन्या देना, दैव विवाह है।
🌹कन्या के लिये वर से वस्त्राभूषण लेकर, कन्यादान करना, आर्ष विवाह है।
🌹गृहस्थ धर्म में प्रवृत्त होने के लिये वर कन्या का पाणिग्रह, प्राजापत्य विवाह है।
🌹कन्या पक्ष को यथाशक्ति धन देकर उसे अपना कर पत्नी बनाना आसुर विवाह है।
🌹मुसलमानों में इसको प्रशस्त माना गया है। परस्पर कामातुर होकर संयुक्त होना, गान्धर्व विवाह है।
🌹पाश्चात्य देशों में ईसाई मतानुयायियों में इसका विशेष प्रचलन है। कन्या पक्ष की इच्छा के विरुद्ध बल का प्रयोग करते हुए कन्या का अपहरण करके उसे पत्नी बनाना, राक्षस विवाह है।
🌹राजपरिवारों में इस विवाह की मान्यता है। कन्या को बहका कर फुसला कर धोखा देकर उससे संभोग करना, पैशाच विवाह है। यह अत्यन्त निकृष्ट है। असामाजिक दुष्ट लोग ऐसा करते हैं।
🌹६ और ८ के अंक के बीच में ७ का अंक पड़ता है। ७ के ये दो पड़ोसी छः और आठ अच्छे नहीं हैं। ये दोनों अशुभ हैं। इस दुस्संग के कारण ७ का अंक दुःखद हो गया है। ७= विवाह वा मैथुन। विवाह करने वाला .. विवाह करने का प्रयत्न करने वाला .. विवाह की इच्छा वाला ऐसा कौन व्यक्ति है, जो दुःखी न हो। विवाह एवं मैथुनादि कर्म दुःख के स्रोत हैं। ये ऐसे दुःख हैं जो सुखस्वरूप हैं। इस दुःखमय सुख में शुकदेव जैसा ज्ञानी कैसे फँस सकता है ? शुकदेव एवं शुक्रदेव में अन्तर है। शुक्रावेशित संसार में यह उक्ति है...
🌹"नारि पटहुवा कूपजल अरु बरगद की छाँह ।
गरमी में शीतल करहि जाड़े में शीतलाहि ॥"
🌹 जैसे 'पटाहुवा कोठा वाला घर, कुएँ का जल तथा बरगद वृक्ष की छाया गरमी में शीतलता देती है। तथा जाड़े में उष्णता प्रदान करती है, ठीक वैसे ही नारी (युवती स्त्री) पुरुष को गरमी में ठण्ड देती है तथा जाड़े में गरमी देती है। तात्पर्य यह कि नारी सर्वदा सुख देती है। यह एक पक्ष है। यहीं नारी भाग्य बिगड़ने पर पुरुष को जब ठण्ड में कंपाती है तथा गरमी में जलाती है तो नारि सकल दुःखखानि ऐसा कहा जाता है। उस विधाता को मैं नमस्कार करता हूँ जो स्त्री रूपी पाश से बाँध कर पुरुष को नचा रहा है। मूर्ख पुरुष इसे समझता नहीं। इस पाश की कोमलता का ऐसा प्रभाव है कि पुरुष अपने को छुड़ा नहीं पाता। इससे छूटने के लिये परमात्मा की शरण लेनी पड़ती है। सत्संग, सद्विचार, तप स्वाध्याय और ईशानुकम्पा के बिना कौन छूट सकता है ?
🌹जर्मन कहावत है- शीघ्र विवाह, दृढ प्रेम जैसे भूख लगने पर भोजन करना चाहिये क्योंकि विलम्ब होने पर भूख मर जाती है और पाचन मन्द होता है, वैसे ही उचित वय में काम सेवन .. विवाह करने से काम शक्ति भोग क्षमता का हास नहीं होता, स्त्री- पुरुष में पारस्परिक विश्वास घनिष्ठता एवं प्रेम बना रहता है। जब काम का ज्वार उठे, वही उचित वय है। मन में जब काम भाव उठता है तो स्त्री-पुरुष एक दूसरे से दैहिक संबंध स्थापित करने के लिये व्यम हो उठते हैं। स्मृति ग्रन्थों में काम की प्राकृतिक दृष्टि पर बल दिया गया है। ऋतुकाल में स्त्री समागम करना चाहिये। "ऋतुकालाभिगामी स्यात् स्वदारनिरतः सदा ।"
( मनु. ३ । ४५ । )
🌹माता पिता को चाहिये कि वे अपनी पुत्री को इससे वंचित न करें और शीघ्र उसका विवाह कर दें। ऋतुकाल में अपनी भार्या से पराङमुख रहने वाले को भ्रूणहत्या का पाप लगता है। 'भ्रूणहत्यमवाप्नोति ऋतौ भार्यापराडमुखः ।'( व्यासस्मृति-२ । ४६ ।) इससे स्पष्ट है ऋतुकाल में स्त्रियों की कामपिपासा प्रबल होती है। इसकी शान्ति के लिये पुरुष संसर्ग आवश्यक है। इसलिये कंन्या के विवाह में विलम्ब नहीं करना चाहिये। सभी स्मृतिकार ऐसा कहते हैं।
🌹'यदि सा दातृवैकल्यात् रजः पश्येत् कुमारिका ।
भ्रूणहत्याश्च यावत्यः पतितः स्यात्तदप्रदः ।।'
(-व्यास २ । ७)
🌹( यदि वह कुमारी कन्यादान करने को असावधानी वा विलम्ब के कारण (कन्यादान से पहले) रजस्वला हो जाये तो (विवाह से पूर्व) जितनी बार रजस्वला होगी उतनी ही भ्रूण हत्याएँ मानी जाएँगी और कन्या का दान न करने वाला व्यक्ति पतित हो जायेगा )
🌹स्मृतिशील धर्मभीरु लोग कंन्या के विवाह में तनिक विलम्ब नहीं करते। ऋतुमती होते हुए भी कंन्या का आजीवन पिता के घर में अविवाहित रहना श्रेष्ठ है, किन्तु मूर्ख गुणहीन वर के साथ कभी उसका विवाह न करे। यह स्मृति वाक्य है...
🌹 "काममामरणात् तिष्ठेद् गृहे कन्यर्तुमत्यपि ।
नचैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित् ॥"
(मनु ९।८९)
🌹( कामम् आमरणात् तिष्ठेत् गृहे कंन्या ऋतुमती अपि न च एवं एनाम् प्रयच्छेत् तु गुणहीनाय कर्हिचित् ॥ )
🌹सती कन्या ऋतुमती होने पर तीन वर्ष तक विवाह की प्रतीक्षा करे।
🌹इसके बाद (पितादि द्वारा विवाह न किये जाने पर अपने जाति एवं गुण वाले सदृश वर का स्वयं वरण करे। ऐसा मनु महाराज कहते हैं।
🌹" त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमार्यतुमती सती।
ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद्विन्देत सदृशं पतिम् ॥"
( मनु ९।२०)
🌹( त्रीणि वर्षाणि उदीक्षेत कुमारी ऋतुमती सती। ऊर्ध्वम् तु कालात् एतस्मात् विन्देत सदृशम् पतिम् ।)
🌹हमारे शास्त्रों में स्त्री-पुरुष, पत्नी और पति के रूप में एक दूसरे के बराबर हैं। कोई किसी से कम नहीं। स्त्री = पुरुष मनुस्मृति का वाक्य है...
🌹'विप्रा प्राहुस्तथा चैतयो भर्ता सा स्मृताङ्गना।"
(मनु. ९।४५)
🌹(विप्राः प्राहुः तथा च एतत् यो भर्ता सा स्मृता अंगना ।)
🌹शास्त्र में वीर्य को मल कहा गया है। अन्य मलों की तरह इसे शरीर से बाहर करने के लिये विवाह किया जाता है। मनु का कथन है...
🌹"वसा शुक्रमसृङ् मज्जा मूत्रविद्याणकर्णविट् ।
श्लेष्माश्रु दूषिका स्वेदो द्वादशैते मलाः ॥'
( मनु. ५।१३५ )
🌹( वसा वीर्य रक्त मज्जा मूत्र विष्ठा नाकमल कर्णमल कफ आँसू आंख का कीचड़ पसीना ये १२ मल हैं।)
🌹भगवान् विष्णु दत्तात्रेय के रूप में पृथ्वी पर अवतार लिये। ये ब्रह्मचारी रहे। उनका वीर्य स्खलित हो जाता था। इससे वे चिंतित रहा करते थे। वे विवाह कर नहीं सकते और जान बूझ कर वीर्य का त्याग नहीं कर सकते, वीर्य को स्वप्नदोषादि में गिरने से रोक भी नहीं पाते। यही उनकी चिन्ता थी। लक्ष्मी जी को अपने पति विष्णु दत्तात्रेय को यह दशा देखी नहीं गयीं। दत्तात्रेय एक कुएँ के पास अवधूत बने बैठे थे। लक्ष्मी जी दो घड़े लेकर एक साधारण स्त्री के रूप में उस कुएँ पर पानी भरने के लिये आयीं। एक घड़े से पानी निकाल कर उन्होंने दूसरे घड़े में डाला। पुनः पुनः उस घड़े से पानी निकाल करके दूसरे बड़े में डालती और पानी बह जाता था। इस घटना को दत्तात्रेय जी देख रहे थे दत्तात्रेय ने कहा-पगली स्त्री पानी क्यों बहती हो ? उस नारी लक्ष्मी ने कहा- जैसे आप (ब्रह्मचारी) का वीर्य बहता है, वैसे मैं इस जल को बहा रही हूँ। दत्तात्रेय इस उत्तर से आश्वस्त हुए और उनकी वीर्यपात सम्बन्धी चिन्ता जाती रही। लक्ष्मी जी उन्हें उपदेश देकर चली गयीं। जो पुरुष ब्रह्मचारी है, उसका वीर्य बहेगा ही धारण क्षमता से अधिक होने पर वस्तु बाहर निकलती है। वर्षा में नदी में बाढ़ आती है, समुद्र में ज्वार आता है। ऐसे ही देह में वीर्य की बाढ़ आती है वीर्यदान न करने वाले को वीर्यहानि निश्चित है।
🌹आठ प्रकार का मैथुन होता है ...
🌹"ब्रह्मचर्य सदा रक्षेद् अष्टधा मैथुन पृथक्। स्मरणं कीर्तन केलिः प्रेक्षणं मुह्यभाषणम् ॥
संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिष्पत्तिरेव च।
एतन्मैथुनमग प्रवदन्ति मनीषिणः ॥"
( दक्षस्मृति ७ ।३१-३२ )
🌹स्त्री का समरण करना, स्त्री विषयक बातों की चर्चा करना, स्त्री के साथ हास्य विनोद करना, स्त्री को ध्यान से देखते रहना, छिप कर स्त्री से वार्तालाप करना , सांकेतिक शब्दों का प्रयोग करना, स्त्री के साथ संभोग करने का विचार, स्त्री से संभोग हेतु प्रयत्न करते रहना, संभोग के कार्य को सम्पन्न करना-ये आठ प्रकार के मैथुन हैं। ब्रह्मचारी को इससे बचना चाहिये। शुकदेव एवं दत्तात्रेय इससे बच गये। जो इस मार्ग पर चलते हैं, वे धन्य हैं। मैं इन सब लोगों को प्रणाम कर कराती हूँ ।
🌹 विवाहोपरान्त स्त्री पुरुष अलग-अलग न सोएँ। दोनों की शय्या एक हो। ऐसा स्मृति वाक्य है। शयन से उठने के बाद नारी शुद्ध होती है, पुरुष अशुद्ध रहता है।
🌹अंगिरा का कथन है....
🌹"द्वावेतावशुची स्यातां दम्पत्ती शयनगती। शयनादुत्थिता नारी शुचिः स्यादशुचिः पुमान् ॥"
(अंगिरा स्मृति ४०)
🌹(द्वौ एतौ अशुची स्थाताम् दम्पत्ती शयनगती।
शयनात् उत्थिता नारी शुचिः स्यात् अशुचिः पुमान् ॥)
🌹शय्या पर शयनकाल में ये दोनों, स्त्री-पुरुष अशुद्ध होते हैं। शयन से उठने के बाद नारी तो शुद्ध होती है, पुरुष अशुद्ध शुद्ध स्पृश्य है, अशुद्ध अस्पृश्य। इससे स्पष्ट है कि स्वी शुद्ध और पुरुष अशुद्ध है। पुरुष का संग पाकर स्त्री अशुद्ध होती है। पुरुष से पृथक होने पर स्त्री शुद्ध होती है, जबकि पुरुष अशुद्ध ही रहता है। शय्यात्याग अर्थात् सहवास के बाद स्त्री का स्नानादि आवश्यक नहीं। क्योंकि वह शुद्ध है। सहवास के पश्चात् पुरुष का स्नानादि से शुद्ध होना आवश्यक है। क्योंकि वह अशक्त एवं अशुद्ध होता है। नारी स्वर्ण रत्न है। सोने और नारियों की शुद्धि वायु एवं सूर्य वा चन्द्रमा की किरणों से होती है। कहा गया है...
🌹"शौचं सुवर्णनारीणां वायुसूर्येन्दुरश्मिभिः ।।" ( आपस्तम्भस्मृति ८।३)
🌹सहवास काल में वीर्य से वञ्चित पुरुष अशक्त होने से अशुद्ध माना गया है, वीर्य से सिञ्चित स्त्री सशक्त होने से शुद्ध मानी गई है। जिस पुरुष से स्त्री वीर्य ग्रहण करती है, उसकी सेवा से उत्तम गति तथा उसकी आज्ञा का उल्लंघन करके अधोगति को प्राप्त होती है। कहा गया है ...
🌹"पतिमुल्लंघ्य मोहात् स्त्री के कं नरकं न व्रजेत् ?
पति शुश्रूषयैव स्त्री कान्न लोकान् समुश्नते ?"
( कात्यायन स्मृति... १९ । ११-१२)
🌹स्मृति ग्रन्थों में जो कुछ है, वह सब सत्य है। अल्पज्ञ बुद्धिमान जन इस में छिद्र ढूंढ़ा करते हैं। १२ वर्ष की हो जाने पर जो पिता कन्या का विवाह नहीं करता तो प्रतिमास उसकी रज को स्वयं उसके पितर पीते हैं।
🌹 "प्राप्ते तु द्वादशे वर्षे यः कन्यां न प्रयच्छति ।
मासि मासि रजस्तस्याः पिबन्ति पितः स्वयम् ॥"
( पराशर स्मृति ७।७)
🌹पाश्चात्य म्लेच्छ देशों में स्मृति के इस कथन को विशेषता के साथ व्यवहार में लाया जाता है। एक उदाहरण है। मेरे एक कश्मीरी मित्र ऋषिकेश में गंगा के तट पर बैठे थे। उन्होंने हालैण्ड (नीदरलैण्ड) की एक युवती से कामाचार के विषय में प्रश्न पूछा। उस युवती ने कहा कि जब वह १५ वर्ष की हुई (वहाँ १५ वर्ष की वय में मासिक होता है) तो उसकी माता ने उसे खाने की गर्भनिरोधक गोलियाँ तथा गर्भनिरोधक उपकरण दिया जिससे वह मैथुन सुख को निरापद पाये, लिया करे। इन ठण्डे पश्चिमी देशों में मैथुन को भोजन सदृश अनिवार्य माना जाता है। सहशिक्षा के चलते युवक-युवती सतत मैथुन रत होते हुए अपना जीवन जीते हैं। विवाह वहाँ एक औपचारिकता है। भारतवर्ष में इसे संस्कार का रूप दिया गया है। आज भी वनवासी लोगों एवं अदूषित गांवों परिवारों में शीघ्र विवाह होता है। अर्जुन पुत्र अभिमन्यु का विवाह १५ वर्ष की वय में हुआ था। १६ वें वर्ष में वह पिता बना। राजा परीक्षित् उसी के पुत्र थे जिसे शुकदेव जी ने भागवत सुनाई। समय का ऐसा प्रवाह है कि अब इसे बाल विवाह कहकर अमान्य ठहराते हैं। १० वें, १२ वें वर्ष कन्या का विवाह घट (जल), सूर्य (दीप), अश्वत्थ (विष्णु) से करने से दोष नहीं होता।
🌹कुण्डली में १२ भाव है। अंतिम भाव अर्थात् १२वें वर्ष में इष्टदेवता को कन्यादान करके पुनः कन्या को घर में अविवाहित रखने में कोई भी दोष नहीं हैं। क्योंकि यह किसी पुरुष का चिन्तन न करती हुई परम पुरुष का चिन्तन करती और उसे पति मानती है।
🌹जब स्त्री अपने को पुरुषवत् मानकर कर्मक्षेत्र में उतरती है तो उस पर स्मृति के ये नियम लागू नहीं होते। स्त्री घर की चाहरदीवारी से बाहर होती है तो पुरुष मानी जाती है। जो कार्य पुरुष करता है, वह कार्य स्वी करती है। ऐसी दशा में वह स्वतन्त्र है। उस पर पुरुष का आधिपत्य व्यर्थ है। वह स्वयं अपना भरण पोषण रक्षण करती है। स्मृति कथित किसी भी स्त्री धर्म को मानना, व्यवहार में लाना उसके लिये आवश्यक नहीं। स्त्री आत्मनिर्भर हो और पुरुष की दासी हो, यह अनुचित है। यह युग धर्म है। युग धर्म की उपेक्षा करने वाला नष्ट हो जाता है, दुःख पाता है। ...
🌹तस्मै युगधर्माय नमःll ।
🌹जो धर्म युग ,,काल से परे तथा स्वाभाविक है, उसे मानना एवं करना पड़ेगा। रजो धर्मकाल में मैथुनवर्जित है। तीन दिन तक स्त्री अभोग्य अशुद्ध होती है, चौथे दिन भोग्य शुद्ध होती है। कहा गया है...
🌹"स्नाता रजस्वला या तु चतुर्थेऽहनि शुद्धयति ।"
(पराशर स्मृति ७।१७ )
🌹"रजो निवृत्तो गम्या स्त्री गृह कर्मणि चैवहि।"
(पाशर स्मृति ७।१९)
🌹विवाह के पश्चात् स्त्री को भार्या कहा गया है। पुरुष जिस स्त्री का भरण पालन पोषण करता है, वह उसकी भार्या कहलाने की अधिकारिणी है। भार्या, धर्मपत्नी होती है। इसकी विशेषताएं बताते हुए 🌹समृतिकार कहता है ...
🌹"सा भार्या या वहेदग्नि, सा भार्या या पतिव्रता ।
सा भार्या या पतिप्राणा सा भार्या या प्रजावती ॥"
(शङ्खस्मृति ४।१४ )
🌹भार्या वह है जो पति के साथ यज्ञ में भागीदार हो, भार्या वह है जो पति के व्रतवाली हो, भार्या वह है जो पति को प्राणवत् प्रिय हो, भार्या वह है जो सन्तानवाली हो ।
🌹"लालनीया सदा भार्या, ताडनीया तथैव च।
लालिता ताडिता चैव स्त्री श्रीर्भवति नान्यथा ॥"
( शंख.४।१५)
🌹भार्या सदा लालन एवं ताडन के योग्य होती है। लालन और ताडन से स्त्री लक्ष्मी (श्रेष्ठ शीलवती) बनती है, अन्यथा नहीं (राक्षसी पिशाचिनी डाकिनी शाकिनी ) ।
🌹पतिपूजन नारी का एकमात्र धर्म है। शास्त्र कहता है...
🌹"न व्रतैनोपवासैश्व धर्मेण विविधेन च।
नारी स्वर्गमवाप्नोति प्राप्नोति पतिपूजनात् ॥"
( शंख. ५।८)
🌹नारी न व्रतों से, न उपवासों से, न ही विविध प्रकार के धर्मों के आचरण से स्वर्ग को प्राप्त करती है वह तो पति की पूजा से ही स्वर्ग (श्रेष्ठ गति) पाती है।
🌹विवाह की चक्की में पिसते हुए स्त्री और पुरुष यदि धर्म का आचरण नहीं करते, कामोपभोग करते हुए स्वाध्याय नहीं करते, शिव की शरण में नहीं जाते तो दुःखी ही रहते हैं। इससे त्राण का उपाय है ही यही । अथर्ववेद का एक मंत्र है...
🌹"यथा नकुलो विच्छिद्य संदधात्यहि पुनः ।
एवा कामस्य विच्छिन्नं संधेहि वीर्यावति ॥"
( अथर्व. ६।१३९।४ )
🌹[यथा नकुलः विच्छिद्य सम्-दधाति अहम् पुनः ।
एव आ-कामस्य विच्छिन्नम् सम्- धेहि वीर्य अवति ।।]
🌹वीर्यावति = धर्मपत्नी वीर्य + अबू रक्षणे अवति अबू + तिन्। वीर्य की रक्षा करने वाली, वीर्य को व्यर्थ नष्ट होने से बचाने वाली, वीर्य को अपने गर्भाशय में रखकर उसका पालन करने वाली, वीर्य की इच्छा करने वाली, वीर्य को ग्रहण करके पुरुष को सुख पहुंचाने तथा स्वयं सुख प्राप्त करने वाली नारी को वीर्यावति कहते हैं।
🌹सम् + धा दधाति धते = शान्त होना। संदधाति = शान्त होता है, लट् प्र.पु. एक वचन। संधेहि = शान्त हो जाओ, लोट् म.पु. एक वचन ।
🌹नकुलः = नेवला ।
अहिम् = सर्प ।
आकामस्य =सम्पूर्ण कामनाओं, इच्छाओं, वासनाओं का।
🌹विच्छिन्न = वि + छिद् + क्त विभक्त, वियुक्त, फाड़ा हुआ, पृथक् किया हुआ समाप्त किया गया।
🌹विच्छिद्य= वि + छिद् + यत् टुकड़े-टुकड़े कर नष्ट कर मारकर ।
🌹मन्त्रार्थ हे वीर्यावति
पनि ।
जैसे नेवला साँप को मारकर अन्ततः शान्ति को प्राप्त करता है, वैसे ही तू अपनी सम्पूर्ण भोगलिप्सा का त्याग कर अब शान्त हो जा। बहुत भोग भोगा गया है, अब तो शान्तात्मा हो जा, राम को भज, ब्रह्मभाव को प्राप्त कर । वीर्यावति नाम कामिनी का जो कामातुर, संभोग सुख की सतत इच्छुक हो, वह नारी वीर्यावति है। अवस्था ढल जाने पर पुरुष क्षमता क्षीण होता है। वह स्त्री को मैथुनानन्द का आस्वादन नहीं करा पाता। इसलिये वह स्त्री से ऐसा कहता है कि अब यह सब छोड़ो, शान्त हो जाओ। नकुल और सर्प में स्वाभाविक वैर है। नकुल बली होने से सर्प को मार डालता है। स्त्री (कामिनी) और भोगविलास में स्वाभाविक मैत्री हैं। वह भोगों से कैसे पृथक रह सकती है ? काम विषधर सर्प है। विगतकामानारी नकुल है। विगत काम होने के लिये स्त्री हो वा पुरुष सबको आप्तकाम विष्णु की शरण में जाना होगा, जो गरुण पर बैठते हैं। गरुण का आहार ही सर्प है। गरुणध्वज भगवान् विष्णु को नमस्कार करने से काम रूपी सर्प समाप्त हो जाता है। ll
🌹तस्मै विष्णवे नमः । ll
🌹जिसने सहस्रशीर्षा सहस्रपादा सहस्रनाम्ना विष्णु का यौवन में चिन्तन नहीं किया, वह बुढ़ापे में काममुक्त नहीं हो सकता। इस युग में यह प्रत्यक्ष है। बुढ़िया बाल रंगे चटकमटक पहने की युवक की खोज में तथा बुढ़ा भी बाल रंगे चोंगा बदले हुए युवती की खोज में भ्रमण करता हुआ अशान्त है।
🌹यह संसार काममय है। योगी योग की कामना करता है। ज्ञानी ज्ञान की कामना करता है। भक्त भगवान् की कामना करता है। ब्राह्मण ब्रह्म की कामना करता है। क्षत्रिय छत्र की कामना करता है। वैश्य वैभव की कामना करता है। शूद्र सेवा की कामना करता है। यह काम के वशीभूत हो गति करते है। केवल आकाश ही ऐसा है, जो अकाम है। इसमें कोई गति नहीं। यह अलेप है। इसमें सब है। यह सब में है। यह परमेश्वर है। मैं इसकी शरण में हूँ।
🌹अस्मै आकाशयनमःl ll
🌹 काम तत्व चतुर्व्यूहात्मक है। चारों केन्द्रों में यह क्रमशः शिव विष्णु ब्रह्मा एवं जीव (स्त्री वा पुरुष) के रूप में सतत विद्यमान है। जीव स्त्री वा पुरुष के रूप में परस्पर आकृष्ट होकर कामवश एक दूसरे के सामने घुटने टेकता है। कामविह्वल होकर सहवास हेतु गिड़गिड़ाता है। किन्तु इससे उसे शान्ति नहीं मिलती। यदि वह त्रिदेवों (ब्रह्म विष्णु शिव) के सम्मुख घुटने टेक दे, हार मान ले, समर्पण कर दे तो उसे शाश्वत शान्ति मिल जाये। ऐसा कोई बड़भागी जीव करता है। इन त्रिदेवों के सामने मैं घुटने टेक रहा हूँ। मेरी प्रपत्ति स्वीकार हो ।
Jay jalaram bapa
Jay jay Ambemaa