26/06/2024
हे शिष्य!तू आज से ब्रह्मचारी है ।।१।।
नित्य सन्ध्योपासन भोजन
के पूर्व शुद्ध जल का आचमन किया कर ।।२।।
दुष्ट कर्मों कोछोड़ धर्म किया कर ।। ३ ।।
दिन में शयन कभी मत कर ।।४।।
आचार्य के आधीन रहके नित्य साङ्गोपाङ्ग वेद पढ़ने में पुरुषार्थ किया कर ।।५।।
एक-एक सङ्गोपाङ्ग वेद के लिये बारह-बारह वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य अर्थात्48 वर्ष तक वा जब तक सांगोपाङ्ग चारों ओर वेद संपूर्ण होवेन, तब तक
अखण्डित ब्रह्मचर्य कर ।। ६ ।।
आचार्य के आधीन धर्माचरण में रहा कर ।
परन्तु यदि आचार्य अधर्मचरण वा अधर्म करने का उपदेश करे,उस को तू कभी मत मान, और उस का आचरण मत कर ।।७।।
क्रोध और मिथ्याभाषण करना छोड़ दे ।।८।।
आठ * प्रकार के मैथुन को छोड़ देना ।।९।।
भूमि में शयन करना, पलङ्ग आदि पर कभी न सोना ।।१०।।
कौशीलव अर्थात् गाना, बजाना तथा नृत्य आदि निन्दित कर्म, गन्ध और अञ्जन का सेवन मत कर ।।११।।
अति स्नान, अति भोजन, अधिक निद्रा, अधिक जागरण, निन्दा, लोभ, मोह, भय, शोक का ग्रहण कभी मत कर ।।१२।।
रात्रि के चौथे पहर में जाग, आवश्यक शौचादि, दन्तधावन, स्नान, सन्ध्योपासन, ईश्वर की स्तुति प्रार्थना और उपासना, योगाभ्यास का आचरण नित्य किया कर ।।१३।।
क्षौर मत करा ।।१४।।
मांस, रूखा शुष्क अन्न मत खावे और मद्यादि मत पीवे ।।१५।।
बैल, घोड़ा, हाथी, ऊंट आदि की सवारी मत कर ।। १६ ।।
ग्राम में निवास,जूता और छत्र का धारण मत कर ।।१७।।
लघुशङ्का के विना उपस्थ इन्द्रिय के स्पर्श से वीर्यस्खलन कभी न करके, वीर्य को शरीर में रखके निरन्तर ऊर्ध्वरेता अर्थात् नीचे वीर्य को मत गिरने दे, इस प्रकार यत्न से वर्ता कर ।।१८।।
तैलादि से अङ्गमर्दन, उबटना, अतिखट्टा इमली आदि, अतितीखा लालमिर्ची आदि, कसेला हरड़ें आदि, क्षार अधिक लवण आदि और रेचक जमालगोटा आदि द्रव्यों का सेवन मत कर ।।१९।। नित्य युक्ति से आहार-विहार करके विद्या ग्रहण में यत्नशील हो ।।२०।।
सुशील, थोड़ा बोलनेवाला, सभा में बैठनेयोग्य गुण ग्रहण कर ।।२१।।
मेखला और दण्ड का धारण, भिक्षाचरण, अग्निहोत्र, स्नान, सन्ध्योपासन, आचार्य का प्रियाचरण, प्रातः सायं आचार्य को नमस्कार करना ये तेरे नित्य करने के कर्म, और जो निषेध किये वे नित्य न करने के हैं ।॥ २२।।