04/01/2026
बंदर और भालू के साथ खेलता आदमी
एक गाँव के बाहर एक आदमी रहता था, जो बंदर और भालू को नचाकर अपना गुज़ारा करता था। वह दोनों जानवरों को बचपन से ही पाल रहा था। बंदर फुर्तीला था और भालू ताक़तवर। आदमी रोज़ बाज़ार में लोगों के सामने उनके करतब दिखाता और पैसे कमाता।
लोग तालियाँ बजाते, हँसते और खुश होते।
आदमी को लगता था कि वह बहुत चालाक है—
“मैं इन्हें नचाता हूँ, ये मेरी बात मानते हैं,” वह घमंड से सोचता।
एक दिन वह जंगल के रास्ते जा रहा था। रास्ते में उसे बहुत तेज़ प्यास लगी। उसने बंदर और भालू को एक पेड़ के नीचे बैठाया और बोला—
“यहीं रुको, मैं अभी पानी लेकर आता हूँ।”
आदमी जैसे ही गया, बंदर ने शरारत में भालू के कान खींच दिए।
भालू को गुस्सा आ गया।
अब बंदर डरकर पेड़ पर चढ़ गया और भालू ज़ोर-ज़ोर से दहाड़ने लगा।
तभी आदमी वापस आया। उसने दोनों को लड़ते देखा और गुस्से में चिल्लाया—
“रुको! तुम दोनों मेरे बिना कुछ नहीं हो!”
यह सुनकर भालू आगे बढ़ा और आदमी को ज़मीन पर गिरा दिया। बंदर पेड़ से चिल्लाया, लेकिन मदद नहीं कर पाया। आदमी को पहली बार समझ आया कि जिनसे वह खेल समझकर व्यवहार कर रहा था, वे कितने ख़तरनाक हो सकते हैं।
किसी तरह आदमी बच गया।
उस दिन के बाद उसने बंदर और भालू को आज़ाद कर दिया और कभी किसी को अपनी ताक़त या स्थिति का घमंड नहीं किया।
शिक्षा (Moral):
👉 किसी की ताक़त या स्वभाव को हल्के में नहीं लेना चाहिए।
जो आज खेल लगता है, वही कल ख़तरा बन सकता है।
घमंड हमेशा नुकसान ही देता है।