10/08/2022
"इस लेख-माला तथा आलेख के लेखक की पीएच.डी. के शोध-कार्य से रामजी राय द्वारा साहित्यिक-चोरी की एक औपचारिक शिकायत डॉ. बी. आर. अंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली (एयूडी) में लगभग दो वर्ष पूर्व 8 जून, 2020 को दाखिल की गयी थी। तकरीबन 2 वर्षों तक विश्वविद्यालय की अलग-अलग समितियों द्वारा इस मसले को संस्थागत रूप से कुछए की चाल से देखा-परखा गया और मोटा-मोटी तौर पर संबंधित शोध-निर्देशक प्रो. गोपालजी प्रधान द्वारा गोपनीय पीएच.डी. थीसिस किसी बाहरी (रामजी राय) को प्रेषित (लीक) करने के कृत्य को गंभीर अनैतिक चूक के रूप में लिया गया है जिस बाबत अप्रैल 2022 मे जाकर युनिवर्सिटी प्रशासन ने कुछ एक्शन और निर्णय भी लिए हैं। इस प्रसंग में ध्यातव्य तथ्य यह है कि शोधार्थी के पीएच.डी. कार्य का रामजी राय तक अनुचित तरीके से पहुँचना और तत्पश्चात दोनों कार्यों में गंभीर समानता के बावजूद और साथ ही आंतरिक समिति की रिपोर्ट में इस बाबत यह रेखांकित करने के बावजूद कि रामजी राय, शोधार्थी अनूप कुमार बाली के काम से लाभ/अंतर्दृष्टि प्राप्त करते मालूम होते हैं, यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा साहित्यिक-चोरी के इस स्पष्ट मामले को प्लेजीरिस्म कहने से बचना और पूरे मामले को केवल गोपनीयता के विच्छेद तक सीमित करते हुए और अनैतिक कृत्य बताते हुए शोध-निर्देशक प्रो. गोपालजी प्रधान पर तथाकथित अनुशासनात्मक कारवाई तक ही लेकर जाना, कहीं न कहीं अकादमिक उत्पादन में प्लेजीरिस्म की भूमिका को विश्लेषित करने की ज़रूरत को रेखांकित करता है, जिसे हमने अन्यत्र विश्लेषित करने का प्रयास किया है[।दरअसल यह उन राजनीतिक सवालों की लीपापोती है जिससे विश्वविद्यालय तो क्या पार्टी-बौद्धिकी भी बचती नज़र आ रही है। छात्र-मजदूर की संवेदनशील क्रियाओं का संस्थागत अधिग्रहण। राय के वैयक्तिक अधिग्रहण को छिपाते-बचाते हुए विश्वविद्यालय दरअसल अपने इसी अधिग्रहण को बचा रहा है।"................
"हम देख सकते हैं कि इटैलीसाइज़ की गयी आखिरी पंक्ति को छोड़ दिया जाये तो पता चलता है कि रामजी भाई तो विकिपीडिया के पूरे ही परिच्छेद को बिना हिचकिचाहट के अपने नाम से चला देते हैं और मालूम हो कि आखिरी पंक्ति भी दरअसल हिंदी-जगत के एक अन्य विद्वान की है जिसका यथास्थान उल्लेख किया जाएगा। बहरहाल, इसे रामजी भाई की दबंगई ही कहना चाहिए कि वे न केवल विकिपीडिया जैसे व्यापक स्तर पर पढ़े जाने वाले स्रोतों से अपने आलेख के लिए सामग्री को उड़ाते चलते हैं बल्कि इससे भी आगे बढ़ते हुए वे हिंदी-जगत के नामचीनों के वर्क-इन-प्रोग्रैस को भी लपेट लेते हैं।
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रामजी भाई मुक्तिबोध के लिए ‘शोधक’ शब्द प्रयोग में लाए हैं और विडंबना यह है कि वह अपनी किताब शोधार्थी के अप्रकाशित थीसिस को पढ़कर तथा उसके वाक्य-विन्यासों, स्थापनाओं, विचारों, अवधारणाओं, गलत अनुवादों, यहाँ तक कि संपूर्ण फ्रेमवर्क को उड़ा कर विकसित करते हैं। इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि जिस व्यक्ति ने शोध-कार्य उनके साथ साझा किया वे इस कृत्य को ढकने के लिए समकालिकता का एक खोखला विमर्श खड़ा करता है। विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर पद पर कार्यरत एक पार्टी-सदस्य (प्रो. गोपालजी प्रधान) द्वारा मुक्तिबोध पर एक गोपनीय थीसिस बिना किसी को बताए/पूछे मुक्तिबोध पर काम करने वाले अपनी ही पार्टी के पोलित-ब्यूरो सदस्य (श्रीरामजी राय) से साझा की जाती है। इस प्रक्रिया में थीसिस में मौजूद अवधारणात्मक फ्रेमवर्क को उड़ा कर कथा-23 औरकथा-24 में रामजी राय को गंभीर ज्ञानी बौद्धिक साबित करने के उद्देश्य से आलेख छापे जाते हैं, बाद में इन्हीं आलेखों को एक पुस्तक रूप में संकलित किया जाता है, जिसका संपादक-सहयोग पार्टी से ही ताल्लुक रखने वाले विश्वविद्यालय के शिक्षण गण (मृत्युंजय त्रिपाठी तथा अवधेश त्रिपाठी) करते हैं। और तो और पुस्तक को पार्टी से ही नजदीकी रखने वाले एक प्रकाशन-गृह अस्तित्व में लाता है। यह भी दृष्टव्य है कि पुस्तक का कॉपी-राइट, पार्टी के सांस्कृतिक विंग जन-संस्कृति मंच को दिया जाता है और समकालीन जनमत इस पुस्तक और लेखक के कीर्ति-व्यवसाय के प्रचार का बीड़ा उठाता है और इस तरह पार्टी का यह पूरा तंत्र ही एकजुट होकर छात्र-मजदूर की पड़ताल और आत्म-पड़ताल से उपजे ज्ञान के तनावों को मुक्तिबोध संबंधी नए ज्ञानकांडीय विमर्श से बांधते हुए पार्टी के रूप में अपने बौद्धिक संकटों को कुछ मैनेज करने का जुगाड़ बनाते चलता है। इस तरह यह पूरा ही प्रकरण पार्टी-नौकरशाही और यूनिवर्सिटी-फैक्ट्री के अतरंग संबंधों को उजागर करता है।
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प्लेजीरिस्म और जुगाड़-टेक्नॉलॉजी के इस विशिष्ट प्रसंग के आलोक में देखा जाये तो यह कीर्ति-व्यवसाय मुक्तिबोध संबंधी इस ज्ञानकांडीय प्रकरण में एक नए संदर्भ बिन्दु के रूप में रामजी भाई को नया मास्टर (मास्टर संकेतक) बनाना चाहता है और इसीलिए रामजी भाई नए मास्टर बनने की अपनी इस इच्छा के कारण ही अपने आत्म-संदर्भन या वैयक्तिक-संदर्भन के रक्षार्थ संदर्भों की सामूहिकी का अधिग्रहण करते चलते हैं। संदर्भों की सामूहिकी का यह वैयक्तिक अधिग्रहण ही एक अर्थ में हमारे लिए लिए मूलत: यूनिवर्सिटी डिसकोर्स है जहाँ ज्ञान को ज्ञान के तनावों से ज़बरदस्ती अलग करके एक सकारात्मक प्रपंच में बदल दिया जाता है।हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना में ऐसे कीर्ति-व्यवसाय का महिमामंडन इसलिए रामजी राय के रूप में नए मास्टर का महिमामंडन कहा जा सकता है। आने वाले दिनों में संकट के बढ़ते चले जाने के साथ यह देखना दिलचस्प होगा कि आखिर यह महिमामंडन टूटता है या ऐसे कीर्ति व्यवसाय और महिमामंडन जैसे अन्य तमाशे उभर रही फासीवादी प्रवृत्तियों के सामने साष्टांग दण्डवत् ही होते चले जाते हैं? तब तक कि लिए हिंदी की मार्क्सवादी आलोचना को कीर्ति-व्यवसाय का यह नया प्रपंच और अपना नया मास्टर मुबारक!"
1 रामविलास शर्मा के लिए असंतोष ही मुक्तिबोध की कविता का स्थायी भाव है। मुक्तिबोध के असंतुष्ट प्राण-मन को वे उनके स्....