Shri Lal Bahadur Shastri National Sanskrit University

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Shri Lal Bahadur Shastri National Sanskrit University Traditional Sanskrit University A Central University established by an act of parliament

भारतीय ज्ञान-परम्परा के मूल्यों से ही शिक्षा बनेगी संस्कारवान और लोकमंगलकारी : कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठकशिवशक्ति यज्ञ...
14/08/2026

भारतीय ज्ञान-परम्परा के मूल्यों से ही शिक्षा बनेगी संस्कारवान और लोकमंगलकारी : कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक
शिवशक्ति यज्ञ के साथ श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में सत्र 2026–27 का औपचारिक मंगलारम्भ

श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में नवीन शैक्षणिक सत्र 2026–27 के विधिवत् मंगलारम्भ के अवसर पर आयोजित शिवशक्ति यज्ञ में विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने भारतीय ज्ञान-परम्परा, शिक्षा, संस्कार और आधुनिक शैक्षणिक उत्कृष्टता के समन्वय पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रत्येक शुभ एवं मंगलकारी कार्य का आरम्भ ईश्वर-स्मरण, मंगलाचरण और सकारात्मक संकल्प के साथ करने की समृद्ध परम्परा रही है।विश्वविद्यालय की गौरवशाली वैदिक एवं सांस्कृतिक परम्परा के अनुरूप देवसदनम् परिसर में आयोजित शिवशक्ति यज्ञ विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक के मार्गदर्शन, सान्निध्य एवं अध्यक्षता में वैदिक मंत्रोच्चार और विधि-विधानपूर्वक सम्पन्न हुआ। यज्ञ के माध्यम से नवीन शैक्षणिक सत्र के सफल, निर्विघ्न एवं मंगलमय संचालन की कामना की गई।इस अवसर पर कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने कहा कि शिवशक्ति यज्ञ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि भारतीय ज्ञान-दृष्टि में निहित ज्ञान, शक्ति, संस्कार, साधना और लोकमंगल की भावना का सशक्त प्रतीक है। उन्होंने कहा कि शिव तत्व चेतना, कल्याण और आत्मबोध का संदेश देता है, जबकि शक्ति सृजन, ऊर्जा और सकारात्मक परिवर्तन की प्रेरणा प्रदान करती है। इन दोनों के समन्वय में भारतीय संस्कृति की व्यापक जीवन-दृष्टि निहित है।कुलपति प्रो. पाठक ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन अथवा बौद्धिक विकास तक सीमित नहीं होना चाहिए। शिक्षा के माध्यम से व्यक्तित्व का निर्माण, संस्कारों का संवर्धन तथा समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना का विकास भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल डिग्री प्रदान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे ऐसे जागरूक, संवेदनशील और संस्कारवान नागरिकों के निर्माण के केंद्र हैं, जो ज्ञान और मूल्यों के माध्यम से समाज के विकास में अपनी सार्थक भूमिका निभा सकें।उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान-परम्परा में निहित शाश्वत जीवन-मूल्यों को आधुनिक शिक्षा और समकालीन आवश्यकताओं के साथ समन्वित करना समय की आवश्यकता है। विद्यार्थियों को ज्ञान के साथ संस्कार, अनुशासन, साधना, अनुसंधान और उत्कृष्टता की दिशा में निरन्तर आगे बढ़ना होगा। कुलपति प्रो. पाठक ने कहा कि भारतीय ज्ञान-परम्परा की शक्ति को आत्मसात करते हुए आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के नए आयामों से जुड़ना ही समग्र एवं सार्थक शिक्षा का मार्ग है।नवीन शैक्षणिक सत्र 2026–27 के अवसर पर कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने विश्वविद्यालय के समस्त आचार्यों, अधिकारियों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों को शुभकामनाएँ प्रदान कीं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह शैक्षणिक सत्र ज्ञान-सृजन, अनुसंधान, साधना और शैक्षणिक उत्कृष्टता के नए प्रतिमान स्थापित करेगा। उन्होंने विश्वविद्यालय परिवार का आह्वान किया कि वह अपनी गौरवशाली वैदिक एवं सांस्कृतिक विरासत को आत्मसात करते हुए आधुनिक शिक्षा की चुनौतियों और आवश्यकताओं के अनुरूप निरन्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर रहे।उल्लेखनीय है कि यद्यपि विश्वविद्यालय में नवीन शैक्षणिक सत्र का आरम्भ जुलाई माह में हो चुका था, तथापि भारतीय परम्परा एवं विश्वविद्यालय की सांस्कृतिक विरासत के अनुरूप शिवशक्ति यज्ञ के माध्यम से सत्र का विधिवत् मंगलारम्भ किया गया। वेद-पौरोहित्य विभाग द्वारा आयोजित इस पावन अनुष्ठान में भगवान शिव एवं शक्ति की विधिवत् उपासना एवं आराधना की गई तथा विश्वविद्यालय की निरन्तर उन्नति, विद्यार्थियों के ज्ञान एवं सर्वांगीण विकास तथा विश्व-कल्याण की मंगलकामना की गई।यज्ञ का आचार्यत्व एवं निर्देशन पौरोहित्य विभागाध्यक्ष प्रो. रामराज उपाध्याय ने किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलसचिव आचार्य पवन कुमार शर्मा, वित्ताधिकारी श्री संतोष कुमार श्रीवास्तव, पौरोहित्य विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. वृन्दावन दास, वेद विभागाध्यक्ष प्रो. देवेंद्र प्रसाद मिश्र, प्रो. गोपाल प्रसाद शर्मा, प्रो. रामानुज उपाध्याय, प्रो. सुन्दर नारायण झा, प्रो. हनुमान मिश्र तथा डॉ. ओंकार यशवंत सेलुकर सहित विभिन्न विभागों के आचार्यगण एवं विश्वविद्यालय के अधिकारी उपस्थित रहे।पौरोहित्य विभाग के सहायकाचार्य डॉ. मधुसूदन शर्मा, डॉ. रविन्द्र कुमार पण्डा एवं डॉ. नितेश कुमार झा ने भी वैदिक अनुष्ठान में सहभागिता की। वेद-पौरोहित्य विभाग के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक यज्ञ में भाग लिया।वैदिक मंत्रोच्चार, यज्ञाहुति एवं पूर्णाहुति के साथ सम्पन्न इस आयोजन ने विश्वविद्यालय परिसर में आध्यात्मिक, सकारात्मक एवं संस्कारमय वातावरण का संचार किया। आयोजन के माध्यम से भारतीय ज्ञान-परम्परा, वैदिक संस्कृति और संस्कृत शिक्षा के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ आधुनिक शिक्षा के समन्वय का सशक्त संदेश दिया गया।

पुस्तकालय ज्ञान, शोध और बौद्धिक चेतना के विकास का सशक्त केंद्र हैं : कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्...
14/08/2026

पुस्तकालय ज्ञान, शोध और बौद्धिक चेतना के विकास का सशक्त केंद्र हैं : कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक

राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस पर केंद्रीय पुस्तकालय में गरिमामय आयोजन, दुर्लभ एवं संदर्भ अनुभाग का उद्घाटन

नई दिल्ली। पद्मश्री डॉ. एस. आर. रंगनाथन की 134वीं जयंती एवं राष्ट्रीय पुस्तकालयाध्यक्ष दिवस के अवसर पर श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के केंद्रीय पुस्तकालय में गरिमामय समारोह का आयोजन किया गया। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक की अध्यक्षता में आयोजित समारोह में पुस्तकालयों की ज्ञानपरक भूमिका, पठन-पाठन की संस्कृति तथा सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के वर्तमान दौर में पुस्तकालयों की बदलती भूमिका पर सार्थक विमर्श हुआ।इस अवसर पर कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने केंद्रीय पुस्तकालय में नवनिर्मित दुर्लभ एवं संदर्भ अनुभाग का उद्घाटन कर उसे विश्वविद्यालय परिवार को समर्पित किया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीपप्रज्ज्वलन, देवी वाग्देवी के पूजन तथा पद्मश्री डॉ. एस. आर. रंगनाथन को पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुआ।अपने अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने कहा कि पुस्तकालय किसी भी विश्वविद्यालय की ज्ञान-परंपरा, शोध-संस्कृति और बौद्धिक चेतना के सशक्त केंद्र होते हैं। पुस्तकें व्यक्ति के ज्ञान का विस्तार करने के साथ-साथ उसके चिंतन को परिष्कृत करती हैं और उसे व्यापक जीवन-दृष्टि प्रदान करती हैं। उन्होंने विद्यार्थियों एवं संकाय सदस्यों का आह्वान किया कि वे केंद्रीय पुस्तकालय का अधिकाधिक उपयोग करते हुए अपनी अध्ययनशीलता, ज्ञान और बौद्धिक क्षमता का निरंतर विकास करें।

कुलपति ने कहा कि वर्तमान समय सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के तीव्र विस्तार का युग है। ऐसे समय में पुस्तकालयों की भूमिका और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। आधुनिक तकनीकी संसाधनों का प्रभावी उपयोग करते हुए पुस्तकालयों को विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं शिक्षकों की बदलती शैक्षणिक और शोध संबंधी आवश्यकताओं के अनुरूप निरंतर विकसित होना चाहिए।उन्होंने केंद्रीय पुस्तकालय के कर्मचारियों के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि सीमित स्थान और विभिन्न चुनौतियों के बावजूद विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं संकाय सदस्यों को आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने पुस्तकालय की सेवाओं को और अधिक प्रभावी, आधुनिक एवं उपयोगी बनाने के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर बल दिया।पद्मश्री डॉ. एस. आर. रंगनाथन के योगदान का स्मरण करते हुए कुलपति ने कहा कि पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान के क्षेत्र में उनका योगदान अतुलनीय है। उनके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं और डिजिटल युग में भी पुस्तकालयों के मूल उद्देश्यों तथा उपयोगकर्ता-केंद्रित सेवाओं के लिए मार्गदर्शक बने हुए हैं।कार्यक्रम की मुख्य वक्ता जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. मनोरमा त्रिपाठी ने अपने संबोधन में डॉ. एस. आर. रंगनाथन के पुस्तकालय एवं सूचना विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के वर्तमान दौर के संदर्भ में डॉ. रंगनाथन द्वारा प्रतिपादित पुस्तकालय विज्ञान के पांच प्रसिद्ध सिद्धांतों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।उन्होंने कहा कि तकनीकी परिवर्तन के बावजूद पुस्तकालय का मूल उद्देश्य ज्ञान तक सहज, व्यवस्थित और व्यापक पहुंच सुनिश्चित करना है। आधुनिक तकनीक को पुस्तकालय सेवाओं से जोड़कर विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं शिक्षकों के लिए ज्ञान-संसाधनों को अधिक प्रभावी एवं सुलभ बनाया जा सकता है।विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. पवन कुमार शर्मा ने केंद्रीय पुस्तकालय द्वारा किए जा रहे सकारात्मक प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के ज्ञानवर्धन तथा शैक्षणिक उन्नयन के लिए इस प्रकार के प्रयास निरंतर जारी रहने चाहिए।विश्वविद्यालय की अधिष्ठाताएं प्रो. कल्पना जैन, प्रो. भागीरथी नंद तथा प्रो. सुजाता त्रिपाठी ने केंद्रीय पुस्तकालय की सेवाओं एवं विश्वविद्यालय के शैक्षणिक परिवेश में उसके महत्वपूर्ण योगदान की सराहना की। उन्होंने विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के शैक्षणिक विकास में पुस्तकालय की भूमिका को रेखांकित करते हुए उपलब्ध ज्ञान-संसाधनों के अधिकाधिक उपयोग पर बल दिया।वित्ताधिकारी श्री संतोष कुमार श्रीवास्तव ने अपने संबोधन में विद्यार्थियों के जीवन में नियमित पठन-पाठन की आदत के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पुस्तकें केवल पाठ्यक्रम की आवश्यकताओं को पूरा करने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि व्यक्ति के ज्ञान, चिंतन, दृष्टिकोण और व्यक्तित्व को समृद्ध बनाने का प्रभावी साधन भी हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से पुस्तकालय का नियमित उपयोग करने तथा अध्ययन एवं पठन की संस्कृति को अपने दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाने का आह्वान किया।उन्होंने केंद्रीय पुस्तकालय के सुचारु संचालन की सराहना करते हुए कहा कि ज्ञान-संसाधनों को सुदृढ़ करना विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गुणवत्ता को और अधिक मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने पुस्तकालय के विकास, आवश्यक संसाधनों की उपलब्धता तथा उसकी शैक्षणिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से हरसंभव वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया।

इस अवसर पर केंद्रीय ग्रंथालय के पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. राजेश कुमार पाण्डेय ने कहा कि पुस्तकालय विश्वविद्यालय की शैक्षणिक एवं शोध गतिविधियों का महत्वपूर्ण आधार हैं। उन्होंने विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं संकाय सदस्यों से पुस्तकालय में उपलब्ध ज्ञान-संसाधनों का अधिकाधिक उपयोग करने तथा पठन-पाठन एवं शोध की संस्कृति को और अधिक सुदृढ़ बनाने का आह्वान किया।कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के अधिष्ठाताओं, विभागाध्यक्षों, संकाय सदस्यों, अधिकारियों, कर्मचारियों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने सक्रिय सहभागिता की। उपस्थित जनसमूह की उत्साहपूर्ण भागीदारी से समारोह का वातावरण ज्ञान, अध्ययन, शोध और पुस्तकालय संस्कृति के प्रति जागरूकता से परिपूर्ण रहा।कार्यक्रम का समापन प्रो. सुंदर नारायण झा द्वारा प्रस्तुत शांतिपाठ के साथ हुआ।

संस्कृत विद्वानों का सम्मान भारतीय ज्ञान-परंपरा के गौरव का सम्मान है : कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठकउत्तर प्रदेश नागकूप श...
13/08/2026

संस्कृत विद्वानों का सम्मान भारतीय ज्ञान-परंपरा के गौरव का सम्मान है : कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक

उत्तर प्रदेश नागकूप शास्त्रार्थ समिति द्वारा संस्कृत, भारतीय ज्ञान-परंपरा एवं शास्त्रीय विद्याओं के संरक्षण, संवर्धन और विकास में उल्लेखनीय योगदान देने वाले देश के प्रतिष्ठित विद्वानों को विभिन्न सम्मानों से अलंकृत किया जाना अत्यंत हर्ष और गौरव का विषय है।

इस अवसर पर श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने सम्मानित सभी विद्वानों को हार्दिक बधाई एवं मंगलकामनाएं प्रदान करते हुए कहा कि संस्कृत विद्वानों का सम्मान वस्तुतः भारत की गौरवशाली ज्ञान-परंपरा, शास्त्रीय चिंतन और सांस्कृतिक चेतना का सम्मान है। विद्वानों ने अपने ज्ञान, तप, साधना, अध्यापन, अनुसंधान और लेखन के माध्यम से संस्कृत वाङ्मय को समृद्ध करने के साथ-साथ भारतीय ज्ञान-परंपरा को निरंतर सशक्त और जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

कुलपति प्रो. पाठक ने कहा कि ऐसे सम्मान केवल किसी व्यक्ति विशेष की उपलब्धियों का अभिनंदन नहीं होते, बल्कि वे ज्ञान, साधना और गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति समाज की कृतज्ञता के प्रतीक भी हैं। वरिष्ठ विद्वानों का जीवन और उनका कृतित्व नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है। उनके अनुभव, शोध और चिंतन से संस्कृत तथा भारतीय ज्ञान-विज्ञान की परंपरा को नई दिशा और ऊर्जा प्राप्त होती है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भारतीय ज्ञान-परंपरा के संरक्षण और उसके व्यापक प्रसार की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है। संस्कृत केवल भाषा नहीं, बल्कि भारत की बहुआयामी ज्ञान-संपदा, सांस्कृतिक चेतना और दार्शनिक दृष्टि की आधारशिला है। इस समृद्ध विरासत के संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित विद्वानों का सम्मान समाज को अपनी बौद्धिक और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने उत्तर प्रदेश नागकूप शास्त्रार्थ समिति द्वारा सम्मानित सभी प्रतिष्ठित विद्वानों को हार्दिक बधाई एवं मंगलकामनाएं प्रदान कीं। साथ ही, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के समस्त विश्वविद्यालय परिवार की ओर से सभी सम्मानित विद्वानों के उज्ज्वल, स्वस्थ एवं सृजनशील भविष्य की कामना की गई।

दीक्षारंभ विद्यार्थियों के जीवन में ज्ञान, संस्कार और व्यक्तित्व-निर्माण की नई यात्रा का शुभारंभ : प्रो. मुरलीमनोहर पाठक...
13/08/2026

दीक्षारंभ विद्यार्थियों के जीवन में ज्ञान, संस्कार और व्यक्तित्व-निर्माण की नई यात्रा का शुभारंभ : प्रो. मुरलीमनोहर पाठक
श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में सत्र 2026-27 के दीक्षारंभ कार्यक्रम एवं एंटी रैगिंग दिवस का आयोजन स्वामी विवेकानंद सभागार में गरिमामय एवं उत्साहपूर्ण वातावरण में किया गया। समारोह में नवप्रवेशित विद्यार्थियों का विश्वविद्यालय परिवार की ओर से आत्मीय स्वागत एवं अभिनंदन किया गया। कार्यक्रम ने विद्यार्थियों की नई शैक्षणिक यात्रा का शुभारंभ करते हुए उन्हें ज्ञान, संस्कार, अनुशासन, भारतीय संस्कृति, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रबोध से जुड़ने का प्रेरणादायी संदेश दिया।समारोह का शुभारंभ मंगलाचरण एवं दीपप्रज्ज्वलन के साथ हुआ। शिक्षापीठ द्वितीय वर्ष की छात्रा कणिका ने मंगलाचरण तथा यश्वी ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। मीनू द्वारा प्रस्तुत स्वागत गीत ने समारोह के वातावरण को आध्यात्मिकता, आत्मीयता एवं उल्लास से भर दिया। इसके पश्चात विभागीय अध्यापकों द्वारा अतिथियों का स्वागत किया गया।समारोह की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने नवप्रवेशित विद्यार्थियों का आत्मीय स्वागत एवं अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि दीक्षारंभ केवल किसी पाठ्यक्रम में प्रवेश का औपचारिक अवसर नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार, व्यक्तित्व और जीवन-दृष्टि की नई यात्रा का शुभारंभ है। विश्वविद्यालय में प्रवेश विद्यार्थी के जीवन का ऐसा महत्वपूर्ण पड़ाव है, जहां वह विषयगत ज्ञान अर्जित करने के साथ-साथ अपने चिंतन, चरित्र और व्यक्तित्व को भी व्यापक आयाम प्रदान करता है।कुलपति ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल उपाधि अर्जित करना अथवा रोजगार प्राप्त करना नहीं है। वास्तविक शिक्षा वही है, जो व्यक्ति में विवेक, चरित्र, संवेदनशीलता, अनुशासन, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करे। ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह व्यक्ति के आचरण में दिखाई दे और समाज तथा राष्ट्र के कल्याण का माध्यम बने। उन्होंने विद्यार्थियों का आह्वान किया कि वे विश्वविद्यालय में अर्जित ज्ञान को अपने जीवन में आत्मसात करें तथा अपनी प्रतिभा और सामर्थ्य का उपयोग लोकमंगल एवं राष्ट्रहित में करें।भारतीय ज्ञान-परंपरा की महत्ता रेखांकित करते हुए प्रो. पाठक ने कहा कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के साथ भारतीय सांस्कृतिक एवं बौद्धिक विरासत का सम्यक् बोध विद्यार्थियों को व्यापक एवं समग्र जीवन-दृष्टि प्रदान करता है। उन्होंने परिश्रम, समयबद्धता, सदाचार, आत्मानुशासन और सकारात्मक चिंतन को विद्यार्थी जीवन की सफलता का आधार बताते हुए इन्हें जीवन का अभिन्न अंग बनाने की प्रेरणा दी।उन्होंने कहा कि प्रत्येक विद्यार्थी विश्वविद्यालय की पहचान, प्रतिष्ठा और भविष्य का प्रतिनिधि है। विद्यार्थियों की उपलब्धियां ही नहीं, बल्कि उनका व्यवहार, आचरण और सामाजिक दृष्टिकोण भी विश्वविद्यालय की छवि को प्रभावित करता है। इसलिए प्रत्येक विद्यार्थी को अपने ज्ञान, कर्म और चरित्र के माध्यम से विश्वविद्यालय की गरिमा को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का संकल्प लेना चाहिए।
एंटी रैगिंग दिवस के संदर्भ में कुलपति ने कहा कि रैगिंग विद्यार्थी जीवन की स्वस्थ एवं सकारात्मक परंपराओं के सर्वथा प्रतिकूल है। विश्वविद्यालय परिसर ऐसा होना चाहिए, जहां प्रत्येक विद्यार्थी स्वयं को सुरक्षित, सम्मानित और समान अवसरों से संपन्न महसूस करे। उन्होंने ऐसे शैक्षणिक वातावरण के निर्माण पर बल दिया, जहां ज्ञान के साथ संस्कार, प्रतिस्पर्धा के साथ सहयोग तथा वरिष्ठता के साथ स्नेह एवं मार्गदर्शन की भावना विद्यमान हो।कुलपति ने नवप्रवेशित विद्यार्थियों को शुभाशीर्वाद देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी अपनी प्रतिभा, परिश्रम, अनुशासन और संस्कारों के बल पर जीवन में नई ऊंचाइयां प्राप्त करें तथा अपने साथ विश्वविद्यालय और राष्ट्र का नाम भी गौरवान्वित करें।पीठाध्यक्ष प्रो. रचना वर्मा मोहन ने वाचिक स्वागत करते हुए नवप्रवेशित विद्यार्थियों का विश्वविद्यालय परिवार में आत्मीय अभिनंदन किया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय में प्रवेश विद्यार्थियों के जीवन की नई शैक्षणिक एवं व्यक्तित्व-निर्माण यात्रा का शुभारंभ है। उन्होंने विद्यार्थियों से विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गरिमा, अनुशासन और गौरवशाली परंपराओं को आत्मसात करने तथा ज्ञान के साथ संस्कार एवं नैतिक मूल्यों को अपने जीवन में प्रतिष्ठित करने का आह्वान किया।कुलसचिव प्रो. पवन कुमार शर्मा ने नवप्रवेशित विद्यार्थियों का स्वागत करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय को केवल अध्ययन एवं परीक्षा के केंद्र के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान-साधना, व्यक्तित्व-विकास और जीवन-मूल्यों के संवर्धन के केंद्र के रूप में ग्रहण किया जाना चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों को समय का सदुपयोग करने तथा विश्वविद्यालय की शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं का सम्मान करने की प्रेरणा दी।रैगिंग-मुक्त परिसर की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि वरिष्ठ और कनिष्ठ विद्यार्थियों के संबंध स्नेह, सहयोग, मार्गदर्शन एवं आत्मीयता पर आधारित होने चाहिए।छात्र कल्याण पीठ प्रमुख प्रो. सुजाता त्रिपाठी ने विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय में उपलब्ध विद्यार्थी-केंद्रित व्यवस्थाओं एवं शैक्षणिक अवसरों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय विद्यार्थियों के शैक्षणिक विकास के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए भी प्रतिबद्ध है। उन्होंने विद्यार्थियों से उपलब्ध अवसरों का सदुपयोग करने तथा विभिन्न शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता करने का आह्वान किया।वित्ताधिकारी श्री संतोष कुमार श्रीवास्तव ने विद्यार्थियों का स्वागत करते हुए कहा कि विद्यार्थी जीवन केवल पुस्तकीय ज्ञान अर्जित करने का समय नहीं, बल्कि अनुशासन, उत्तरदायित्व और सजगता विकसित करने का महत्वपूर्ण अवसर है। उन्होंने विश्वविद्यालय की सुविधाओं एवं संसाधनों का जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग करने तथा उनके संरक्षण को नैतिक दायित्व मानने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि वित्तीय अनुशासन, पारदर्शिता और संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग प्रत्येक जागरूक नागरिक के महत्वपूर्ण जीवन-मूल्य हैं।कार्यक्रम में सहायक आचार्य, शिक्षापीठ डॉ. अजय कुमार ने विभागीय अध्यापकों का परिचय प्रस्तुत किया। इससे शिक्षापीठ के अध्यापकों एवं विद्यार्थियों के मध्य शैक्षणिक संवाद और आत्मीय परिचय की भावना को बल मिला।एसीपी, दिल्ली पुलिस श्री वीर कृष्ण पाल सिंह ने एंटी रैगिंग जागरूकता संबोधन में रैगिंग के दुष्परिणामों तथा इससे संबंधित कानूनी प्रावधानों की जानकारी दी। उन्होंने विद्यार्थियों से परिसर में पारस्परिक सम्मान, सौहार्द और भाईचारे की भावना को सुदृढ़ करने तथा रैगिंग के विरुद्ध सदैव सजग रहने का आह्वान किया।कुलानुशासक प्रो. परमानंद भारद्वाज ने विश्वविद्यालय में अनुशासन एवं मर्यादित आचरण की महत्ता को रेखांकित करते हुए विद्यार्थियों से विश्वविद्यालय की नियमावली एवं अनुशासन का निष्ठापूर्वक पालन करने का आग्रह किया।कार्यक्रम के अंत में सहायक आचार्य, शिक्षापीठ डॉ. पिंकी मलिक ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन सहायक आचार्य, शिक्षापीठ डॉ. दिनेश कुमार यादव ने किया। शांतिपाठ एवं राष्ट्रगान के साथ समारोह का गरिमापूर्ण समापन हुआ।इस अवसर पर शिक्षापीठ के समस्त संकाय सदस्य, विद्यार्थी, शोधार्थी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे। सभी की उत्साहपूर्ण सहभागिता से समारोह में आत्मीयता, उल्लास और नवऊर्जा का वातावरण बना रहा। दीक्षारंभ समारोह ने विश्वविद्यालय परिसर को सुरक्षित, सौहार्दपूर्ण, अनुशासित एवं रैगिंग-मुक्त बनाए रखने की सामूहिक प्रतिबद्धता को और अधिक सुदृढ़ किया।

भारत को बदलना है तो शिक्षा व्यवस्था में भी व्यापक बदलाव आवश्यक : कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक
11/08/2026

भारत को बदलना है तो शिक्षा व्यवस्था में भी व्यापक बदलाव आवश्यक : कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक

श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में कृपापूर्वक पधारे स्वामी आनंद स्वरूप भारती; कुलपति प्रो. मुर...
11/08/2026

श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में कृपापूर्वक पधारे स्वामी आनंद स्वरूप भारती; कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक के नेतृत्व की सराहना करते हुए विश्वविद्यालय की निरंतर प्रगति हेतु शुभकामनाएँ प्रदान कीं

“माननीय कुलपति प्रोफेसर मुरलीमनोहर पाठक जी का शिक्षा पर केंद्रित उच्च स्तरीय चिंतनपरक आलेख प्रतिष्ठित रिप्यूटेशन पत्रिका...
07/08/2026

“माननीय कुलपति प्रोफेसर मुरलीमनोहर पाठक जी का शिक्षा पर केंद्रित उच्च स्तरीय चिंतनपरक आलेख प्रतिष्ठित रिप्यूटेशन पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।”

श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में कृपापूर्वक पधारे स्वामी आनंद स्वरूप भारती; कुलपति प्रो. मुर...
06/08/2026

श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में कृपापूर्वक पधारे स्वामी आनंद स्वरूप भारती; कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक के नेतृत्व की सराहना करते हुए विश्वविद्यालय की निरंतर प्रगति हेतु शुभकामनाएँ प्रदान कीं
नई दिल्ली। श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय का शैक्षणिक एवं आध्यात्मिक वातावरण उस समय विशेष रूप से गरिमामय हो उठा, जब शांभवी पीठ के पीठाधीश्वर परम पूज्य स्वामी आनंद स्वरूप भारती विश्वविद्यालय में कृपापूर्वक पधारे। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने उनका आत्मीय स्वागत एवं अभिनंदन किया। इस अवसर पर दोनों के मध्य संस्कृत भाषा, भारतीय ज्ञान परंपरा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, मूल्यपरक शिक्षा, सांस्कृतिक पुनर्जागरण तथा विकसित भारत के निर्माण में शिक्षा की भूमिका जैसे विविध समसामयिक एवं राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर सार्थक विचार-विमर्श हुआ।स्वामी आनंद स्वरूप भारती ने विश्वविद्यालय की निरंतर प्रगति, शैक्षणिक उत्कृष्टता तथा अनुसंधान गतिविधियों की सराहना करते हुए कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान-विज्ञान परंपरा, दर्शन, संस्कृति और आध्यात्मिक चेतना की आधारशिला है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित जीवन-दर्शन, नैतिक मूल्य और वैज्ञानिक दृष्टिकोण आज भी संपूर्ण मानवता के लिए समान रूप से प्रासंगिक हैं। यदि संस्कृत एवं भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा प्रणाली से प्रभावी ढंग से जोड़ा जाए तो भारत पुनः विश्व को ज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र में दिशा प्रदान करने में सक्षम होगा।उन्होंने कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक के नेतृत्व की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हुए कहा कि उनके कुशल मार्गदर्शन में विश्वविद्यालय संस्कृत शिक्षा, अनुसंधान, नवाचार तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ अर्जित कर रहा है। उन्होंने विश्वविद्यालय परिवार को निरंतर प्रगति, शैक्षणिक उत्कृष्टता तथा संस्कृत एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के राष्ट्रीय एवं वैश्विक विस्तार के लिए अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ एवं मंगलकामनाएँ प्रदान कीं। साथ ही संस्कृत, सनातन संस्कृति एवं भारतीय जीवन मूल्यों के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए हरसंभव सहयोग का आश्वासन भी दिया।बैठक के दौरान इस बात पर विशेष बल दिया गया कि भारत की समृद्ध वैदिक, दार्शनिक एवं सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने के लिए शिक्षण संस्थानों, सामाजिक संगठनों तथा आध्यात्मिक संस्थाओं के समन्वित प्रयास समय की प्रमुख आवश्यकता हैं। शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र निर्माण, संस्कृत के व्यापक प्रचार-प्रसार, भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, सनातन जीवन मूल्यों के संवर्धन तथा युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने जैसे विषयों पर भी सकारात्मक एवं दूरदर्शी चर्चा हुई।इस अवसर पर कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने विश्वविद्यालय द्वारा संस्कृत, भारतीय ज्ञान परंपरा, वैदिक अध्ययन, दर्शन, योग तथा मूल्यपरक शिक्षा के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए संचालित शैक्षणिक, अनुसंधानात्मक एवं नवाचारपरक गतिविधियों की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा के मुख्य प्रवाह से जोड़ना विश्वविद्यालय की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है। विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल संस्कृत भाषा का संरक्षण करना नहीं, बल्कि उसे समकालीन आवश्यकताओं के अनुरूप समाजोपयोगी, शोधोन्मुख तथा वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करना भी है।कार्यक्रम में टाइम्स फाउंडेशन के मुख्य कार्यपालक अधिकारी सजीव कोरवा भी उपस्थित रहे। उन्होंने शिक्षा, संस्कृत एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के संवर्धन के लिए विश्वविद्यालय, सामाजिक संगठनों एवं आध्यात्मिक संस्थाओं के बीच समन्वित प्रयासों को समय की आवश्यकता बताते हुए कहा कि सामूहिक सहभागिता से ही भारत की गौरवशाली ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी तक प्रभावी रूप से पहुँचाया जा सकता है।सौहार्दपूर्ण, आध्यात्मिक एवं प्रेरणादायी वातावरण में संपन्न इस कार्यक्रम ने शिक्षा, संस्कृति और अध्यात्म के समन्वित प्रयासों के महत्व को पुनः रेखांकित किया। उपस्थित सभी जनों ने एक स्वर में विश्वास व्यक्त किया कि संस्कृत, भारतीय ज्ञान परंपरा और सनातन सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग की सक्रिय सहभागिता आवश्यक है। यह अवसर भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रसार, संस्कृत भाषा के उन्नयन तथा विकसित भारत के निर्माण के साझा संकल्प को और अधिक सुदृढ़ करने वाला सिद्ध हुआ।

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