14/08/2026
भारतीय ज्ञान-परम्परा के मूल्यों से ही शिक्षा बनेगी संस्कारवान और लोकमंगलकारी : कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक
शिवशक्ति यज्ञ के साथ श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में सत्र 2026–27 का औपचारिक मंगलारम्भ
श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में नवीन शैक्षणिक सत्र 2026–27 के विधिवत् मंगलारम्भ के अवसर पर आयोजित शिवशक्ति यज्ञ में विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने भारतीय ज्ञान-परम्परा, शिक्षा, संस्कार और आधुनिक शैक्षणिक उत्कृष्टता के समन्वय पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में प्रत्येक शुभ एवं मंगलकारी कार्य का आरम्भ ईश्वर-स्मरण, मंगलाचरण और सकारात्मक संकल्प के साथ करने की समृद्ध परम्परा रही है।विश्वविद्यालय की गौरवशाली वैदिक एवं सांस्कृतिक परम्परा के अनुरूप देवसदनम् परिसर में आयोजित शिवशक्ति यज्ञ विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक के मार्गदर्शन, सान्निध्य एवं अध्यक्षता में वैदिक मंत्रोच्चार और विधि-विधानपूर्वक सम्पन्न हुआ। यज्ञ के माध्यम से नवीन शैक्षणिक सत्र के सफल, निर्विघ्न एवं मंगलमय संचालन की कामना की गई।इस अवसर पर कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने कहा कि शिवशक्ति यज्ञ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि भारतीय ज्ञान-दृष्टि में निहित ज्ञान, शक्ति, संस्कार, साधना और लोकमंगल की भावना का सशक्त प्रतीक है। उन्होंने कहा कि शिव तत्व चेतना, कल्याण और आत्मबोध का संदेश देता है, जबकि शक्ति सृजन, ऊर्जा और सकारात्मक परिवर्तन की प्रेरणा प्रदान करती है। इन दोनों के समन्वय में भारतीय संस्कृति की व्यापक जीवन-दृष्टि निहित है।कुलपति प्रो. पाठक ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन अथवा बौद्धिक विकास तक सीमित नहीं होना चाहिए। शिक्षा के माध्यम से व्यक्तित्व का निर्माण, संस्कारों का संवर्धन तथा समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना का विकास भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल डिग्री प्रदान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे ऐसे जागरूक, संवेदनशील और संस्कारवान नागरिकों के निर्माण के केंद्र हैं, जो ज्ञान और मूल्यों के माध्यम से समाज के विकास में अपनी सार्थक भूमिका निभा सकें।उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान-परम्परा में निहित शाश्वत जीवन-मूल्यों को आधुनिक शिक्षा और समकालीन आवश्यकताओं के साथ समन्वित करना समय की आवश्यकता है। विद्यार्थियों को ज्ञान के साथ संस्कार, अनुशासन, साधना, अनुसंधान और उत्कृष्टता की दिशा में निरन्तर आगे बढ़ना होगा। कुलपति प्रो. पाठक ने कहा कि भारतीय ज्ञान-परम्परा की शक्ति को आत्मसात करते हुए आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के नए आयामों से जुड़ना ही समग्र एवं सार्थक शिक्षा का मार्ग है।नवीन शैक्षणिक सत्र 2026–27 के अवसर पर कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने विश्वविद्यालय के समस्त आचार्यों, अधिकारियों, कर्मचारियों एवं विद्यार्थियों को शुभकामनाएँ प्रदान कीं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह शैक्षणिक सत्र ज्ञान-सृजन, अनुसंधान, साधना और शैक्षणिक उत्कृष्टता के नए प्रतिमान स्थापित करेगा। उन्होंने विश्वविद्यालय परिवार का आह्वान किया कि वह अपनी गौरवशाली वैदिक एवं सांस्कृतिक विरासत को आत्मसात करते हुए आधुनिक शिक्षा की चुनौतियों और आवश्यकताओं के अनुरूप निरन्तर प्रगति के पथ पर अग्रसर रहे।उल्लेखनीय है कि यद्यपि विश्वविद्यालय में नवीन शैक्षणिक सत्र का आरम्भ जुलाई माह में हो चुका था, तथापि भारतीय परम्परा एवं विश्वविद्यालय की सांस्कृतिक विरासत के अनुरूप शिवशक्ति यज्ञ के माध्यम से सत्र का विधिवत् मंगलारम्भ किया गया। वेद-पौरोहित्य विभाग द्वारा आयोजित इस पावन अनुष्ठान में भगवान शिव एवं शक्ति की विधिवत् उपासना एवं आराधना की गई तथा विश्वविद्यालय की निरन्तर उन्नति, विद्यार्थियों के ज्ञान एवं सर्वांगीण विकास तथा विश्व-कल्याण की मंगलकामना की गई।यज्ञ का आचार्यत्व एवं निर्देशन पौरोहित्य विभागाध्यक्ष प्रो. रामराज उपाध्याय ने किया। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलसचिव आचार्य पवन कुमार शर्मा, वित्ताधिकारी श्री संतोष कुमार श्रीवास्तव, पौरोहित्य विभाग की पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. वृन्दावन दास, वेद विभागाध्यक्ष प्रो. देवेंद्र प्रसाद मिश्र, प्रो. गोपाल प्रसाद शर्मा, प्रो. रामानुज उपाध्याय, प्रो. सुन्दर नारायण झा, प्रो. हनुमान मिश्र तथा डॉ. ओंकार यशवंत सेलुकर सहित विभिन्न विभागों के आचार्यगण एवं विश्वविद्यालय के अधिकारी उपस्थित रहे।पौरोहित्य विभाग के सहायकाचार्य डॉ. मधुसूदन शर्मा, डॉ. रविन्द्र कुमार पण्डा एवं डॉ. नितेश कुमार झा ने भी वैदिक अनुष्ठान में सहभागिता की। वेद-पौरोहित्य विभाग के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक यज्ञ में भाग लिया।वैदिक मंत्रोच्चार, यज्ञाहुति एवं पूर्णाहुति के साथ सम्पन्न इस आयोजन ने विश्वविद्यालय परिसर में आध्यात्मिक, सकारात्मक एवं संस्कारमय वातावरण का संचार किया। आयोजन के माध्यम से भारतीय ज्ञान-परम्परा, वैदिक संस्कृति और संस्कृत शिक्षा के संरक्षण एवं संवर्धन के साथ आधुनिक शिक्षा के समन्वय का सशक्त संदेश दिया गया।