02/01/2017
वातापी के चालुक्य (solanki)Vans ki history शासक. शासक शासनकाल
जयसिंह चालुक्य
रणराग-
पुलकेशी प्रथम(550-566 ई.).
कीर्तिवर्मा प्रथम(566-567 ई.)
मंगलेश(597-98 से 609 ई.)
पुलकेशी द्वितीय(609-10 से 642-43 ई.)
विक्रमादित्य प्रथम(654-55 से 680 ई.)
विनयादित्य(680 से 696 ई.)
विजयादित्य(696 से 733 ई.)
विक्रमादित्य द्वितीय(733 से 745 ई.)
कीर्तिवर्मा द्वितीय(745 से 753 ई.)
जयसिंह चालुक्य - जयसिंहकोचालुक्यसाम्राज्यका प्रथमशासक माना जाता है। कैरा ताम्रपत्र अभिलेखीय साक्ष्य से यह प्रमाणित होता हैकि, जयसिंह, चालुक्य राजवंश का प्रथम ऐतिहासिक शासक था।रणराग, -- वातापी केचालुक्यनरेशजयसिंहका पुत्र एवं उत्तराधिकारी था।
*.रणराग सम्भवतः 520 ई. मेंवातापीकेराज्यसिंहासन पर बैठा।*.गदायुद्धमें कुशल होने के कारण उसने 'रण रागसिंह' की उपाधि धारण की थी
।पुलकेशी प्रथम(550-566 ई.), चालुक्य नरेशरणरागका पुत्र था। पुलकेशी प्रथम को पुलकेशिन प्रथम के नाम सेभी जाना जाताथा।*.यह चालुक्य वंश का सबसे प्रतापी राजा था।*.पुलकेशी प्रथम दक्षिण मेंवातापीमेंचालुक्य वंशका प्रवर्तक था।*.दक्षिणापथ मेंचालुक्य साम्राज्यके राज्य की स्थापना छठीसदीके मध्य भाग में हुई, जब किगुप्त साम्राज्यका क्षय प्रारम्भ हो चुका था।*.यह निश्चित है, कि 543 ई. तक पुलकेशी नामक चालुक्य राजा वातापी (बीजापुर ज़िलेमें,बादामी) को राजधानी बनाकर अपने पृथक व स्वतंत्र राज्य की स्थापनाकर चुका था।*.महाराजमंगलेशके 'महाकूट अभिलेख' से प्रमाणित होता है कि, उसने 'हिरण्यगर्भ','अश्वमेध', 'अग्निष्टोम', 'अग्नि चयन', 'वाजपेय', 'बहुसुवर्ण', 'पुण्डरीक'यज्ञकरवाया था।*.इसने 'रण विक्रम', 'सत्याश्रय', 'धर्म महाराज', 'पृथ्वीवल्लभराज' तथा 'राजसिंह' आदि की उपाधियाँ धारण की थीं।*.उनका प्राचीनइतिहास अन्धकार में है, परउसने वातापी के समीपवर्ती प्रदेशों को जीत कर अपनी शक्ति का विस्तार किया था, औरउसी उपलक्ष्य में अश्वमेध यज्ञ भी किया था। इस यज्ञ के अनुष्ठान से सूचित होता है कि, वह अच्छा प्रबल और दिग्विजयी राजा था।
कीर्तिवर्मा प्रथम. बादामीकेचालुक्यवंशके नरेशपुलकेशी प्रथमका पुत्र था। वह लगभग 566-67 ई. में सिंहासन पर बैठा था और चालुक्य राजा बना। कई दृष्टियों से उसे चालुक्यों की राजनीतिक शक्ति का संस्थापक कहा जा सकता है। यह माना जाता हैकि कीर्तिवर्मा की विजयी सेना ने उत्तर मेंबिहारऔरबंगालतक तथा दक्षिण मेंचोलऔरपांड्यक्षेत्रों तक प्रयाण किया था। किंतु कदाचित् यह अत्युक्तिपूर्ण प्रशंसा हैं।*.कीर्तिवर्मा अपनेपिताके समान प्रतापीऔर विजेता था।*.अभिलेखोंमें उसेमगध,अंग,बंग,कलिंग, मुद्रक,गंग, मषक,पाण्ड्य,चोल, द्रमिक,मौर्य, नल,कदम्बआदि राज्यों का विजेता कहा गया है।*.कदम्ब वंशका शासनवातापीके दक्षिण-पूर्व में था, और सम्भवतःमौर्यऔर नल वंशों के छोटे-छोटे राज्य भी दक्षिणापथ में विद्यमान थे।*.कीर्तिवर्मा प्रथम ने सम्भवतःबनवासीकेकदम्बों, वेलारी, कार्नूल एवंकोंकणकेमौर्योंको युद्ध में हराया।*.'महाकूटस्तम्भ' लेख से प्रमाणित होता है कि, उसने 'बहुसुवर्ण' एवं 'अग्निस्टोम'यज्ञको सम्पन्न करवाया था।*.कीर्तिवर्मा प्रथम ने 'पुरुरण पराक्रम','पृथ्वी वल्लभ' एवं 'सत्याश्रय' की उपाधि धारण की थी।*.598 ई. के लगभग कीर्तिवर्मा प्रथम की मुत्यु हो गई। उसके बादउसका भाईमंगलेशअगला चालुक्य शासक बना, चूंकि कीर्तिवर्मा के पुत्र अल्पवयस्क थे।मंगलेशने गद्दी पर बैठने के उपरान्तकलचुरियोंको पराजित किया था।कीर्तिवर्मा प्रथमके बाद उसके पुत्रपुलकेशी द्वितीयको राजा बनना चाहिए था।*.उसके चाचा (कीर्तिवर्मा के भाई)मंगलेश(597-98 से 609 ई.) ने बल प्रयोग करकेवातापीकी गद्दी पर अधिकार कर लिया, और कुछ समय तक अपने अग्रज द्वारा स्थापित राज्य का उपभोग किया।*.वल्लभी नरेश ने मंगलेश द्वारा आरम्भ किये गये विजय अभियान को रोकने का प्रयत्न किया, किंतुइस कार्य में वह अल्प सफलता ही प्राप्त कर सका।*.मंगलेश ने कदम्बों को समूल से नष्ट कर दिया था।*.ऐहोल अभिलेख के उल्लेख के आधार पर प्रतीत होता हैकि, मंगलेश अपने पुत्र को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहता था।*.इस बीच में पुलकेशी द्वितीय भी शान्त नहीं बैठा था। उसने राज्य प्राप्त करने का प्रयत्न जारी रखा था।*.अंत में गृह युद्ध द्वारा मंगलेश को मारकरपुलकेशी द्वितीयराजसिंहासन पर आरूढ़ हो गया।पुलकेशी द्वितीय,पुलकेशी प्रथमका पौत्रतथाचालुक्यवंशका चौथा राजा था, जिसने 609-642 ई. तक राज्य किया। वह महाराजाधिराजहर्षवर्धनका समसामयिक तथाप्रतिद्वन्द्वी था। उसने 620 ई. में दक्षिण पर हर्ष का आक्रमण विफल कर दिया।प्रसिद्धिवातापीके चालुक्य वंश में पुलकेशी द्वितीय सबसे अधिक शक्तिशाली और प्रसिद्ध हुआ है।मंगलेशऔर पुलकेशी के गृह-कलह के अवसर पर चालुक्य वंश की शक्ति बहुत ही क्षीण हो गई थी औरकीर्तिवर्मा प्रथमद्वारा विजित अनेक प्रदेश फिर से स्वतंत्र हो गए थे। इतना ही नहीं, अनेक अन्य राजाओं ने भीचालुक्य साम्राज्यपर आक्रमण प्रारम्भ कर दिए थे। इस दशा में पुलेकशी द्वितीय ने बहुत धीरता और शक्ति का परिचय दिया। उसने न केवल विद्रोही प्रदेशों को फिर से विजय किया, अपितु अनेकनए प्रदेशों की भी विजय की।अभिलेखीय प्रमाणअभिलेखीय प्रमाण के आधार प्रतीत होता है कि पल्लवंशी शासक नरसिंहवर्मन प्रथम ने पुलकेशिन द्वितीय को परास्त कर उसकी राजधानी बादामी पर अधिकार कर लिया। सम्भवतः अपनीराजधानी की सुरक्षा करता हुआ ही पुलकेशिन द्वितीय पल्लव सेनानायक द्वारा युद्ध क्षेत्र में ही मार दियागया। इस विजय के बाद ही नरसिंह वर्मन 'वातापिकोंड' की उपाधि धारण की।विभिन्न वंशों से युद्ध*.राजसिंहासन पर आरूढ़ होने के बाद पुलकेशी द्वितीय नेमैसूरकेगंगराजा, उत्तर कोंकण केमौर्यराजा और मलाबार केअनूप राजा को परास्त किया। लाटदेश (दक्षिणी गुजरात),मालवाऔरगुर्जरोंनेभी पुलकेशी द्वितीय के सम्मुख सिर झुकाया और इस प्रकार उत्तर दिशा में भी उसने अपनी शक्ति का विस्तार किया। इतना ही नहीं, उत्तर-पूर्व की ओर आगे बढ़कर उसने दक्षिण कौशल औरकलिंगको भी परास्तकिया। दक्षिण दिशा में विजय यात्रा करते हुए पुलकेशी द्वितीय नेवेंगी(कृष्णाऔरगोदावरीनदियों के बीच में स्थित) के राजा को जीता, औरफिरपल्लव वंशके राजा को बुरी तरह परास्त कर वहकांची(काञ्जीवरम्) के समीप तक पहुँच गया।कावेरी नदीको पार कर इस प्रतापी चालुक्य राजा नेचोल,पांड्यऔरकेरल राज्यों को अपनी अधीनता स्वीकृत करने के लिए विवश किया। इन विजयों के कारण पुलकेशी द्वितीय विन्ध्याचल के दक्षिण के सम्पूर्ण दक्षिणी भारत का अधिपति बन गया।*.कन्नौजका सम्राटहर्षवर्धन, पुलकेशी द्वितीय का समकालीन था। वह भी उत्तरी भारत में अपने साम्राज्य की स्थापना में तत्पर था।नर्मदा नदीके उत्तर के सब प्रदेश उसकी अधीनता को स्वीकृत करते थे। वस्तुतः इस समयभारतमें दो ही प्रधान राजशक्तियाँ थीं,उत्तर में हर्षवर्धन और दक्षिण में पुलकेशी द्वितीय।*.यह स्वाभाविक था, कि उनमें संघर्ष होता।नर्मदा नदीके तट पर दक्षिणी और उत्तरी राजशक्तियों में घोर युद्ध हुआ जिसमें पुलकेशी द्वितीय, हर्षवर्धन को परास्त करने में सफल हुआ।*.हर्षवर्धनके साथ संघर्ष में विजयी होकर पुलकेशी सुदूर दक्षिण की विजय के लिए प्रवृत्त हुआ थाऔर उसने वेंगि और कांची का परास्त करते हुए चोल, पांड्य और केरल राज्यों को भी अपने अधीन किया था।*.इस युग के अन्य भारतीय राजाओं के समान पुलकेशी द्वितीय भी किसी स्थायी साम्राज्य की नींव डाल सकने में असमर्थ रहा।पल्लवआदि शक्तिशाली राजवंशों के राजाओं को युद्ध में परास्त कर उन्हें वह अपना वशवर्ती बनानेमें अवश्य सफल हुआ था, पर उसने उनका मूलोच्छेद नहीं किया था। इसीलिए जब पल्लवराजनरसिंह वर्मन प्रथमने अपने राज्य की शक्ति को पुनः संगठित किया, तो वह न केवल चालुक्य राज्य की अधीनता से मुक्त हो गया, अपितु एक शक्तिशाली सेना को साथ लेकर असने चालुक्यों के राज्य पर भी आक्रमण किया और युद्ध में पुलकेशी को मारकर वातापी पर अधिकार कर लिया। इस युग की राजनीतिक दशा के स्पष्टीकरण के लिए इस घटना का महत्त्व बहुत अधिक है। जोपल्लव वंशशुरू में चालुक्यों के द्वारा बुरी तरह परास्त हुआ था, एक नये महत्त्वाकांक्षीराजा के नेतृत्व में वह इतना अधिक शक्तिशाली हो गया था कि, उसने चालुक्य राज्य को जड़ से हिला दिया था। इस काल में साम्राज्यों के निर्माण और विनाश सम्राट के वैयक्तिक शौर्य और योग्यता पर ही आश्रित थे।उत्कर्ष कालअपने उत्कर्ष काल मेंचालुक्य साम्राज्यइतना विस्तृत और शक्तिशाली था, कि पुलकेशी द्वितीय नेईरानके शाह ख़ुसरू द्वितीय के पास अपने राजदूत भेजेथे। ये दूत 652 ई. मेंईरानगए थे। बदले में ख़ुसरू द्वितीय ने भी अपने दूत पुलकेशी की सेवा में भेजे।अजन्ताके एक चित्र मेंएक ईरानी राजदूत के आगमन को अंकित भी कियागया है। पुलकेशी द्धितीय की कीर्ति सुदूरवर्तीफ़ारसदेश तक पहुँच गयी थी। फ़ारस के शाह ख़ुसरो द्वितीय ने 625-26 ई. में पुलकेशी द्वितीय के द्वारा भेजे गये दूतमंडल से भेंट की थी। इसके बदले मेंउसने भी अपना दूतमंडल पुलकेशी द्वितीय कीसेवा में भेजा।अजंता की गुफासंख्या 1 में एक भित्तिचित्र में फ़ारस के दूतमंडलको पुलकेशी द्वितीय के सम्मुख अपना परिचयपत्र प्रस्तुत करते हुए दिखाया गया है। चीनी यात्रीह्वेनसांग641 ई. में उसके राज्य में आया था औरउसके राज्य का भ्रमण किया था। उसने पुलकेशी द्वितीय के शौर्य और उसके सामंतों की स्वामिभक्ति की प्रशंसा की है। किन्तु 642 ई. में इस शक्तिशाली राजा को पल्लव राजानरसिंह वर्मन प्रथमने एक युद्ध में पराजित कर मारडाला। उसने उसकी राजधानी पर भी अधिकार कर लिया और कुछ समय के लिए उसके वंश का उच्छेद कर दिया।उपधिऐहोलप्रशस्ति के अनुसारकीर्तिवर्मन प्रथमका पुत्र पुलकेशिन द्वितीय अपने चाचामंगलेशकी हत्या कर सिंहासन पर बैठा। उसने 'सत्याश्रय', 'श्री पृथ्वी वल्लभमहाराज' की उपाधि धारण की। उसने अपने सैन्य अभियान के अन्तर्गत कदम्बों की राजधानी बनवासी पर आक्रमण कर विजयी हुआ। इसके अतिरिक्त पुलकेशिन द्वितीय ने गंग राज्य, कोंकण राज्य, लाट राज्य, मालवा राज्य एवं गुर्जन राज्य पर विजय उपधि धारण की।विक्रमादित्य प्रथम. ..पुलकेशी द्वितीयका पुत्र था, तथापिताकी मृत्यु के बाद राज्य का वास्तविक उत्तराधिकारी था। पुलकेशी द्वितीय की मृत्यु के बादबादामीसहित कुछ अन्य दक्षिणी प्रान्तों की कमानपल्लवोंके हाथों में रही। इस दौरान 642 से 655 ई. तकचालुक्योंकी राजगद्दी ख़ाली रही। 655 में विक्रमादित्य प्रथम राजगद्दी पर विराजित होने में कामयाब हुआ। उसने बादामी को पुन: हासिल किया और शत्रुओं द्वारा विजित कई अन्य क्षेत्रों को भी पुन: अपने साम्राज्य में जोड़ा। उसने 681 ई. तक शासन किया था।*.पल्लवराजनरसिंह वर्मन प्रथमसे युद्ध करते हुएपुलकेशी द्वितीयकी मृत्यु हो गई थी और वातापी पर भी पल्लवों का अधिकार हो गया था।*.संकट के इस समय में भी चालुक्यों की शक्ति का पूरी तरह से अन्त नहीं हुआ था।*.विक्रमादित्य प्रथम अपनेपिताके समान ही वीर और महात्वाकांक्षी था।*.उसने लगभग 655 से 681 ई. में चालुक्य राजगद्दी प्राप्त की थी।*.उसके सिंहासनारूढ़होने के समयचोलों,पाण्ड्योंएवं केरलों ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया था।*.विक्रमादित्य प्रथम ने न केवल वातापी कोपल्लवोंकी अधीनता से मुक्त किया, अपितु तेरह वर्षों तक निरन्तर युद्ध करने के बाद पल्लवराज की शक्ति को बुरी तरह कुचलकर 654 ई. मेंकांचीकी भी विजयकर ली।*.उसने पल्लवों के राज्य कांची पर अधिकार कर अपने पिता की पराजय का बदला लिया था।*.उसने 'श्रीपृथ्वीवल्लभ', 'भट्टारक', 'महाराजाधिराज','परमेश्वर', 'रण रसिक' आदिउपाधियाँ धारण की।*.विक्रमादित्य प्रथम सम्भवतः अपने शासन काल के अन्तिम दिनों में पल्लव नरेशपरमेश्वर वर्मन प्रथमसे पराजित हो गया था।*.यह विजय संदिग्ध है, क्योंकि पल्लवकालीन अभिलेख परमेश्वर वर्मन की विजय तथा चालुक्यों के अभिलेख में विक्रमादित्य प्रथम की विजय का उल्लेख मिलता है।*.वैसे निष्कर्षतः यही अनुमान लगाया जाताहै कि, अन्तिम रूप से पल्लव ही विजयी रहेथे।विनयादित्य(680 से 696 ई.). ,विक्रमादित्य प्रथमका पुत्र और राजसिंहासन का उत्तराधिकारी था। उसके समय मेंचालुक्य साम्राज्यकी शक्ति अक्षुण्ण बनी रही।*.अभिलेखों में इसका उल्लेख 'त्रैराज्यपल्लवपति' के रूप में किया गया है।*.'जेजुरी ताम्रपत्र' के अनुसार- विनयादित्य ने अपने शासन के ग्यारहवें एवं चौदहवें वर्ष मेंपल्लवों, कलभों,मालवोंएवंचोलोंपर विजय प्राप्त की थी।*.मालवों कों जीतने के उपरान्त विनयादित्य ने 'सकलोत्तरपथनाथ'की उपाधि धारण की थी।*.इसके अतिरिक्त उसने 'युद्धमल्ल', 'भट्टारक', 'महाराजाधिराज','राजाश्रय' आदिकी उपाधियाँ धारण कीं।*.'सिरसी लेख' में उसे 'सकलोन्तरापथनाथ', 'पलिध्वज', 'पंचमहाशब्द', 'पद्मरागमणि' आदिका प्राप्त कहा गया है।विजयादित्य(696 से 733 ई.), विनयादित्यका पुत्र एवं राजसिंहासन का उत्तराधिकारी था। उसके समय मेंचालुक्यसाम्राज्यकी शक्ति पुर्ण रूप से अक्षुण्ण बनी रही।*.उसके शासनकाल के अब तक लगभग 40 अभिलेख प्राप्त हो चुके हैं।*.अपने शासन के दौरान उसने लगभग चार प्रदेशों को जीता था, पर इसके विषय में स्पष्ट जानकारीका अभाव है।*.विजयादित्यका शासन कालब्राह्मणधर्मके पुनरुत्थान एवं स्थापत्य तथा ललित कलाओं के विकास का काल था।*.उसनेबीजापुर ज़िलेके 'पट्टडकल' नामक स्थान में 'विजयेश्वर शिव मंदिर' का निर्माण कराया था।*.उसकीबहन कुमकुम देवी ने 'लक्ष्मेश्वर' में 'आनेसेज्येयवसादि' नामक एक भव्य जैनमंदिर का निर्माण कराया।*.विजयादित्य पिता की भांति उसने 'श्रीपृथ्वीवल्लभ', 'महाराजाधिराज','परमेश्वर', 'सत्याश्रम', 'भट्टारक', 'साहसरसिक' तथा 'समस्त भुवनाश्रय' आदि का विरुद्ध धारण किया था।विक्रमादित्य द्वितीय(733 से 745 ई.), विजयादित्यका पुत्र और राजसिंहासन का उत्तराधिकारी था। विक्रमादित्य द्वितीय ने भी अपने समय मेंचालुक्य साम्राज्यकी शक्ति को अक्षुण्ण बनाये रखा।*.'नरवण', 'केन्दूर', 'वक्रकलेरि' एवं 'विक्रमादित्य' की रानी 'लोक महादेवी' के 'पट्टदकल' अभिलेख से यह प्रमाणित होता है कि, विक्रमादित्य द्वितीय नेपल्लवनरेशनंदिवर्मन द्वितीयको पराजित किया।*.उसनेकांचीको भी विजित किया था और कांची को बिना क्षति पहुंचाये, वहां के 'राजसिंहेश्वर मंदिर' को अधिक आकर्षक बनाने के लिए रत्नादि भेंट किया।*.इसने इस मंदिर की दीवार पर एक अभिलेख उत्कीर्ण करवाया और साथ ही पल्लवों की 'वातापीकोड' की तरह 'कांचिनकोड' की उपाधि धारण की थी।*.सम्भवतः पल्लवों के राज्य कांची को विक्रमादित्य द्वितीय ने तीन बार विजितकिया था।*.विक्रमादित्य द्वितीय के शासनकाल में ही दक्कन परअरबोंने आक्रमण किया था।*.712 ई. में अरबों नेसिन्धको जीतकर अपने अधीन कर लिया था, और स्वाभाविक रूप से उनकी यह इच्छा थी, किभारतमें और आगे अपनी शक्तिका विस्तार करें।*.अरबों नेलाट देश(दक्षिणी गुजरात) पर आक्रमण किया, जो इस समय चालुक्य साम्राज्य के अंतर्गत था।*.विक्रमादित्य द्वितीय के शौर्य के कारणअरबों को अपने प्रयत्न में सफलता नहीं मिली और यहप्रतापी चालुक्य राजाअरबआक्रमण से अपने साम्राज्य कीरक्षा करने में समर्थ रहा।*.सम्भवतः विक्रमादित्य नेपाण्ड्यों,चोलों, केरलों, एवं कलभ्रों को भी परास्तकिया था।*.प्रथम पत्नी 'लोक महादेवी' ने 'पट्टलक' में विशाल शिव मंदिर (विरुपाक्षमहादेव मंदिर) का निर्माणकरवाया था, जो अब 'विरुपाक्ष महादेव मंदिर' के नाम से प्रसिद्ध है।*.इस विशाल मंदिर के प्रभान शिल्पी 'आचार्य गुण्ड' थे, जिन्हें 'त्रिभुवनाचारि', 'आनिवारितचारि' तथा 'तेन्कणदिशासूत्रधारी' आदि उपाधियों सेविभूषित किया गया था।*.विक्रमादित्य द्वितीय के रचनात्मक व्यक्तित्व का विवरण 'लक्ष्मेश्वर' एवं 'ऐहोल'अभिलेखोंसे प्राप्त होता है।*.विक्रमादित्य द्वितीय ने 'वल्लभदुर्येज','कांचियनकोंडु','महाराधिराज', 'श्रीपृथ्वीवल्लभ', 'परमेश्वर' आदि उपाधियां धारण की थीं।*.विक्रमादित्य ने लगभग 745 ई. तक शासन किया।कीर्तिवर्मा द्वितीय(745 से 753 ई.). ,विक्रमादित्य द्वितीयका पुत्र एवं उत्तराधिकारी था।*.अपने पिता की मृत्यु के बाद वह विशालचालुक्य साम्राज्यका स्वामी बना।*.इसने अपने युवराज काल में हीपल्लवनरेशनन्दि वर्मन को परास्त कर बहुमूल्यरत्न,हाथीएवं सुवर्ण प्राप्त किया था।*.कीर्तिवर्मा द्वितीय ही सम्भवतःबादामीकेचालुक्य शासकों की शृंखला का अंतिम शासक था।*.उसने 'सार्वभौम', 'लक्ष्मी', 'पृथ्वी का प्रिय','राजाओं का राज' एवं 'महाराज' आदि की उपाधियाँ धारण की थीं।*.चालुक्योंके सामंतदंतिदुर्ग(राष्टकूट) ने कीर्तिवर्मा द्वितीय को परास्त कर लगभग 753 ई. में अपने को स्वतंत्र शासक के रूप में स्थापित किया।*.दंतिदुर्ग की इस विजय के विषय में 'समनगढ़' अभिलेख से जानकारी मिलती है।