16/10/2023
गौतम बुद्ध यात्राएं करते रहते थे। यात्रा में उनके शिष्य भी साथ रहते थे। समय-समय पर बुद्ध अपने शिष्यों को अपने आसपास घट रही घटनाओं के माध्यम से भी उपदेश दिया करते थे। एक दिन वे अपने शिष्य आनंद के साथ यात्रा कर रहे थे।
यात्रा करते हुए वे एक जंगल से गुजर रहे थे। उन्हें चलते-चलते काफी समय हो गया था। काफी चलने की वजह से वे थक गए थे। आराम के लिए वे एक जगह रुके।
बुद्ध ने शिष्य आनंद से कहा कि प्यास लगी है, पास में से ही एक झरने के बहने की आवाज आ रही है, वहां जाकर पीने का पानी ले आओ।
बुद्ध की आज्ञा मिलने के बाद आनंद झरने के पास पहुंच गया। वहां पहुंचकर आनंद ने देखा कि एक बैलगाड़ी पानी में से गुजरी है तो पहियों की वजह से पानी बहुत गंदा हो गया है। पानी में मिट्टी दिख रही थी, पानी पीने लायक नहीं था। आनंद गंदा पानी देखकर लौट आया।
आनंद ने लौटकर बुद्ध से कहा कि तथागत, वहां का पानी तो बहुत गंदा है, पीने लायक नहीं है।
बुद्ध ने कहा कि अब तुम कुछ देर बाद फिर से जाना। इस बार तुम्हें अच्छा पानी मिल जाएगा।
बुद्ध की बात मानकर आनंद कुछ देर बाद फिर से पानी लेने पहुंच गया। इस बार पानी शांत था, पानी में कोई हलचल नहीं थी। पानी एकदम साफ दिख रहा था। आनंद ने तुरंत ही पीने के लिए पानी भरा और बुद्ध के पास लौट आया।
बुद्ध की सीख
बुद्ध ने पानी पीकर आनंद से कहा कि हमारे जीवन में भी कई बार ऐसी स्थितियां बन जाती हैं। मन तनाव की वजह से अशांत हो जाता है। अशांति गंदे पानी की तरह है। जब तक मन अशांत रहता है, तब तक हमें कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए। पहले मन को शांत करें, इसके बाद ही सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए। मुश्किल समय में धैर्य रखें, मन शांत होने के बाद ही जरूरी निर्णय लें।