14/04/2017
जयंती/ डा• भीमराव अंबेडकर
जातिविहीन और समतामूलक समाज के पक्षधर अम्बेडकर जी की छवि एक सामाजिक क्रांतिकारी, जातिवाद विरोधी, अस्पृश्यता विरोधी, सामाजिक न्याय के पक्षधर, महिलाओं के अधिकारों के अधिकारों के अग्रदूत , मनवाधिकार के पक्षधर एवं सामाजिक न्याय के समर्थक के रुप में स्थापित है । साथ ही कुछ लोग इन्हे पृथक्कतावादी और प्रयोजनवादी भी मानते है, जिसके कारण इनकी तुलना नेपोलियन एवं स्तालिन से भी की जाती है । सरोजनी नायडु ने इन्हें 'भारत का मुसोलिनी' जैसी निन्दापर संज्ञा भी प्रदान की। डा• अम्बेडकर पुरे जीवन दलित उत्थान के लिए संघर्षशील रहे। इसी क्रम में इन्होंने 25 दिसम्बर 1927 को मनुस्मृति की प्रति को जलाकर विरोध प्रकट किया। इनके इस काम पर क्रुद्ध होकर महात्मा गांधी ने कहा था कि 'अम्बेडकर हिन्दू धर्म के लिये एक चुनौती है।' वस्तुत: ये हिन्दू धर्म के विरोधी नही थे बल्कि हिन्दू धर्म में व्याप्त असमानता और रूढ़िवादिता के विरोधी थे। गांधी जी, नेहरु, लाला लाजपत आदि लोगों से इनका वैचारिकी मतभेद रहा । इनके तीन आदर्श थे- बुद्ध, कबीर एवं ज्योतिबा फूले । जीवन के अंतिम चरण में इनका व्यवहारवाद, सोद्देश्यतावाद, पृथक्कतावादी उपेक्षाओं से आच्छादित हो गया था। जनवरी 1952 में लोक सभा का चुनाव लड़ते समय इन्होंने कश्मीर विभाजन का पक्ष लिया और मुसलमानों के लिए पृथक मताधिकार की मांग की । अत: इन्हे चुनावों मे पूर्ण पराजय का सामना करना पड़ा ।
लेकिन अम्बेडकर जी का मूल्यांकन करते समय हमें यह नही भूलना चाहिए कि 'डा• अम्बेडकर आजीवन नकारात्मक हीनता के परिवेश में ही रहे। संकटों के बीच उत्पन हुए, वे उन्ही में पले-बड़े हुए।' जीवन के अंतिम दिनों में इन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। तथा इनकी मृत्यु के पश्चात अंतिम संस्कार में बहुत भारी संख्या में बौद्ध धर्मावलम्बी शामिल हुए थें। इन्होंने कई पुस्तकें और लेख लिखें, इनकी प्रसिद्ध पुस्तकें 'थॉट्स ऑन पाकिस्तान, वॉट काँग्रेस एंड गांधी हैव डन टू द अनटचेबल्स, हू वर द शुद्राज़, द अनटचेबलस: ए थीसिस ऑन द ओरिजन ऑफ अनटचेबिलिटी, दी बुद्ध एंड हिज धम्मा' हैं।
जयंती पर दलितों एवं पिछड़ों के मसीहा को श्रद्धा सुमन समर्पित !!