03/11/2024
नचिकेता भाड़ में जाओ
~~~~~~~~~~~~
कहानी पुरानी है और कठोपनिषद की है। लेकिन जैसी मैंने पढ़ी, वैसा नहीं लिख रहा बल्कि जैसी मैंने समझी है, वैसी प्रस्तुत है। नचिकेता के पिता, वाजश्रवस, बड़े ‘दानी’ निकले। लेकिन उनका दान भी अपने किस्म का था – एकदम ‘खोटा सिक्का’। उन्होंने दान देने का इरादा किया, और दान में देने के लिए क्या चुना? बूढ़ी, मरी-मरी सी, कमजोर गायें, जिन्हें कोई मुफ्त में भी न ले। अब नचिकेता, सोच में पड़ गया कि भई, यह कैसा दान है? जिज्ञासा में उसने अपने पिता से सवाल कर डाला कि, "पिताजी, आप मुझे किसे दान करेंगे?" और एक बार नहीं बार-बार पूछा तो पिता जी ने चिढ़कर कहा, "तुझे यम को दान करता हूँ' .
अर्थात आजकल की भाषा में कहा 'नचिकेता, भाड़ में जा" यानी “नचिकेता, गो टू हेल!”
भाड़, ठठरी और नासपीटे से जुड़े मुहावरे और गालियाँ मैंने बचपन में गली-मोहल्ले की महिलाओं द्वारा सुने हैं। मुझे भाड़ और ठठरी का अर्थ भी नहीं मालूम और तो और मालूम तो मुझे नचिकेता का अर्थ भी नहीं है । गूगल देवता का आभार कि उन्होंने बताया कि नचिकेता में "न" का अर्थ होता है "नहीं" और "चिकेता" का अर्थ होता है "जानने योग्य" या "नष्ट होने वाला"। भाड़ का अर्थ भट्टी से हो सकता है, या अंग्रेजी में यातना वाली जगह जैसे नरक (हेल) । भाड़ को हम नरक मान लेते हैं क्योंकि नचिकेता यमदूत के पास गया था न कि देवदूत के पास । शेष 'ठठरी और नासपीटे' शब्दों को यहीं छोड़ते हैं, मुझे आशा है आपको ज्ञात होंगे ही ।
कहानी आगे बढ़ती है, अब जब पिता ने खुद कह दिया ‘भाड़ में जा’, तो नचिकेता ने सीरियसली ले लिया। उसने सोचा, “ठीक है, भाड़ में ही चलते हैं!” आखिर भाड़ कौन सा लोक है, कैसा है, कौन लोग रहते हैं, यह सब उसे जानने की उत्सुकता हो उठी। असल में नचिकेता को समझ नहीं आ रहा था कि ‘भाड़ में जाना’ सचमुच होता क्या है? चलो, उसने तैयारी शुरू कर दी। साथ में थोड़ा-बहुत सूखा खाना, एक लाठी और एक जिज्ञासु मन ले लिया। यहाँ, जिज्ञासु मन परम आवश्यक है, इसी के साथ नचिकेता ने ‘भाड़’ की ओर अपनी यात्रा शुरू की ।
जैसे-जैसे नचिकेता आगे बढ़ता गया, उसे ‘भाड़’ का पहला रूप दिखाई दिया। एक गांव के वृद्ध व्यक्ति ने उसे समझाया, “अरे बालक, यह भाड़ नहीं, यह तो बस एक सूनी-सुनसान जगह है, जहां लोग अनचाही चीजें फेंक देते हैं।” यह सुनकर नचिकेता को हंसी आ गई। उसने सोचा, “अरे, तो पिताजी मुझे यहां फेंकना चाहते थे जैसे कोई कबाड़खाना हो? तो यही है दान की महिमा?” उस वृद्ध व्यक्ति ने कहा, “बेटा, यही भाड़ का पहला स्वरूप है – जिसे लोग ज़रूरत के बाद छोड़ देते हैं, वह यहां आ जाता है। शायद तुम्हारे पिताजी ने भी यही सोचा होगा।”
थोड़ा और आगे बढ़ते ही, नचिकेता को एक संत मिले, जो धूनी रमाए बैठे थे। संत ने नचिकेता को रोका और पूछा, “हे बालक, तुम भाड़ में क्यों आए हो?” नचिकेता ने उन्हें अपनी कहानी सुनाई। संत ने मुस्कराते हुए कहा, “बेटा, असली दान तो वह होता है जो दिल से दिया जाए। जैसे तुम, खुद को भाड़ में भेजे जाने पर भी, अपनी जिज्ञासा के कारण यहां चले आए।”
संत ने समझाया, “दान का असली अर्थ है त्याग। और भाड़ में भेजने का मतलब है कि तुम ऐसी चीज को छोड़ दो जिसका कोई काम नहीं।” तब नचिकेता को समझ आया कि, असली दान में न तो मरी गायें हैं और न ही भाड़ जैसी जगह, बल्कि यह त्याग का प्रतीक है।
अंततः नचिकेता भटकते-भटकते यमराज के द्वार पहुंच गया। चूँकि यमराज अपने काम पर गए थे तो नचिकेता तीन दिन तक इंतज़ार करता रहा। यहाँ भी मैं एक बात समझा कि यदि आपका समय नहीं है तो नरक का द्वार भी नहीं खुलता।
जब यमराज ने उसे देखा तो आश्चर्य में पड़ गए – “यह बालक यहाँ कैसे पहुंचा?” नचिकेता ने कहा, “मुझे पिताजी ने ‘भाड़ में जाने’ का आदेश दिया था, और मैं अब भाड़ में ही पहुँच गया हूँ!”
यमराज मुस्कुराए और बोले, “अरे भई, भाड़ में तो कई लोग आते हैं, पर ऐसा जिज्ञासु बालक कम ही आता है। तुमने तीन दिन प्रतीक्षा की है अतः तीन वरदान मांगो ”।
नचिकेता की जय हो, पहले वर में ही पिता के प्रेम की प्राप्ति मांग ली।
दूसरे वरदान में यमराज से उनके स्वर्ग की प्राप्ति रास्ता और विधि पूछ ली ।
और तीसरे वर में उनसे भी ऊपर कौन है और वहां कैसे जाएँ, पूछ लिया। सरल बालक अक्सर पूछते हैं, पापा से बड़ा कौन है, 'दादा '. दादा से बड़ा कौन है 'देवता' तो देवता से बड़ा कौन है, ''भगवान' . अच्छा तो भगवन से बड़ा कौन है, अंत में उत्तर मिलता है सबसे बड़े हैं 'ब्रह्मा' .
सांसारिक बातें समझते हुए यमराज ने उसे उपदेश देना शुरू किया:
“अन्यत्र लोकः अज्ञानतया भ्राम्यन्तः, प्रमाद्यन्तः वयं तु केवलं कर्मठः।”
अर्थात अन्य स्थानों पर लोग अज्ञानवश भटकते और प्रमाद करते रहते हैं, परंतु हम केवल कर्मठ (कर्म करने वाले) हैं।
तीसरे प्र्शन के उत्तर में यमराज ने थोड़ा हिचकिचाते हुए बतायाl यमराज ने नचिकेता को आत्मा, मृत्यु और सच्चे ज्ञान के बारे में सिखाया। यमराज ने उसे बताया कि जीवन में कई लोग बिना सोचे-समझे चीजों को ‘भाड़ में’ फेंक देते हैं – चाहे वह समय हो, प्रेम हो, या रिश्ते हों। असली ज्ञान यह है कि जो भी चीज मिले, उसे समझदारी और जिम्मेदारी से अपनाना चाहिए। यमराज ने कहा:
“क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया, दुर्गं पथस्तत कवयो वदन्ति।”
"यह मार्ग बहुत कठिन है, ठीक तलवार की धार पर चलने जैसा। जो इसे समझ लेता है, वह किसी चीज को बेकार में नहीं फेंकता।"
यमराज का उपदेश सुनने के बाद, नचिकेता को असली ज्ञान प्राप्त हुआ। उसे समझ में आया कि ‘भाड़ में जाना’ सिर्फ एक मुहावरा है, और असली जीवन में कोई चीज भाड़ में फेंकने लायक नहीं होती।
कमाल की बात यह है कि नचिकेता घर लौट आया और अपने पिता को बताया कि असली दान का मतलब क्या होता है। उसने समझाया कि धन की तीन गतियां होती हैं; भोग, दान और नाश। आप भोग चुके चीज़ों को देने को दान न समझो। और जो दान देने की हैं, उसको नहीं दिया तो नाश हो जायेगा।
@डॉ चंद्र शेखर मालवी, ग्वालियर