Jyotish Parishad Aivam Shodh Sansthan

Jyotish Parishad Aivam Shodh Sansthan ज्योतिष परिषद एवं शोध संस्थान (Reg.)

01/12/2025
29/08/2025

*** ।। श्री संकट नाशन गणेश स्तोत्र ।। ****

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श्री गणेश संकट नाशन स्तोत्रम्

नारद उवाच –
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यायं आयुः कामार्थसिद्धये॥ १॥

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम्।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्॥ २॥

लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तमं विघ्नराजम् च धूम्रवर्णं तथाष्टमम्॥ ३॥

नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम्।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम्॥ ४॥

द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो॥ ५॥

विद्यार्थी लभते विद्याम् धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम्॥ ६॥

जपेद्गणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासैः फलं लभेत्।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः॥ ७॥

अष्टेभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत्।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः॥ ८॥

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30/05/2025

ब्राह्मण और कर्मकांड
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एक ब्राह्मण कोई भी कर्मकांड पूजा , यज्ञ , कथा आदि कर्म चाहे अपने यजमान के कल्याण केलिए करे और कर्मफल यजमान को अर्पण करें । यजमान का कल्याण तो होता ही है , पर मंत्रोचार कर रहा मुँह-देह तो ब्राह्मण का है और वो कभी अफल नही होता। वैकुंठ , कैलास, ब्रह्मलोक , मणिपुर लोक के अवश्य अधिकारी वो होते है ।

जो लोग कहते है दक्षिणा के लिए करते है , तो हमारा सवाल है वो क्यों मुफ्त में कर्म करे ?

हम हमारे बच्चों को पढ़ाते है और इंजीनियर , डॉक्टर , वकील या अन्य कोई पद प्राप्त करते है , व्यापार करते है , खेती करते है और हजारों लाखों कमाते है । ब्राह्मण बच्चा बचपन से वेदाभ्यास करे और निपुण होकर कर्मकांड करे तो क्यों दक्षिणा न ले ?

हम उनको कितनी दक्षिणा दे देते है ? घर के किसी भी प्रसंग मे भोजन खर्च , मंडप डेकोरेशन , डीजे , ऑर्केस्ट्रा , बरात , फटाका आदि मे कई कई लाखो रुपये खर्च करते है । डॉक्टर को रोग ग्रस्त होने पर , किसी समस्या और वाद विवाद कोर्ट कचेरी में कई कई लाखों रूपये हम खर्च देते है । इनके सबके के सामने ब्राह्मण का सर्व श्रेष्ठ कर्म के लिए जीवन की कोई भी समस्याओं का निराकरण करे तो इनको दक्षिणा 101 , 501 , 10001 बस । आज तक मेने कभी नही सुना किसी ने ब्राह्मण को 51000 दक्षिणा दी हो , जब के आर्केस्टा का 1 से 20 तक लाख देते है । याद रहे ईश्वर के दरबार मे इनकी भी ब्यौरा होता ही है ।

ब्राह्मण को कर्मकांड पूजा उपासना केलिए गौरव ही होना चाहिए । उनके प्रजाहित के लिए किये गए कर्मकांड , पूजा , अनुष्ठान , यज्ञ यागादि कर्म के बराबर दुनिया का कोई भी सेवा कार्य नही है । गायत्री मंत्र ओर त्रिकाल संध्या के बरोबर कोई उपासना नही है ।

एक दृष्टांत
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एक बार अकबर ने एक ब्राह्मण को दयनीय हालत में जब भिक्षाटन करते देखा तो बीरबल की ओर व्यंग्य कसकर बोला - 'बीरबल! ये हैं तुम्हारे ब्राह्मण जिन्हें ब्रह्म देवता के रुप में जाना जाता है। ये तो भिखारी है'।

बीरबल ने उस समय तो कुछ नहीं कहा। लेकिन जब अकबर महल में चला गया तो बीरबल वापिस आये और ब्राह्मण से पूछा कि वह भिक्षाटन क्यों करता है' ?

ब्राह्मण ने कहा मेरे पास धन, आभूषण, भूमि कुछ नहीं है और मैं ज्यादा शिक्षित भी नहीं हूँ। इसलिए परिवार के पोषण हेतू भिक्षाटन मेरी मजबूरी है'।

बीरबल ने पूछा भिक्षाटन से दिन में कितना प्राप्त हो जाता है'?

ब्राह्मण ने जवाब दिया 'छह से आठ अशर्फियाँ।

बीरबल ने कहा आपको यदि कुछ काम मिले तो क्या आप भिक्षा मांगना छोड़ देंगे ?'

ब्राह्मण ने पूछा 'मुझे क्या करना होगा ?'

बीरबल ने कहा आपको ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करके प्रतिदिन 101 माला गायत्री मन्त्र का जाप करना होगा और इसके लिए आपको प्रतिदिन भेंटस्वरुप 10 अशर्फियाँ प्राप्त होंगी।'

बीरबल का प्रस्ताव ब्राह्मण ने स्वीकार कर लिया। अगले दिन से ब्राह्मण ने भिक्षाटन करना बन्द कर दिया और बड़ी श्रद्धा भाव से गायत्री मन्त्र जाप करना प्रारम्भ कर दिया और शाम को 10 अशर्फियाँ भेंटस्वरुप लेकर अपने घर लौट आता। ब्राह्मण की सच्ची श्रद्धा व लग्न देखकर कुछ दिनों बाद बीरबल ने गायत्री मन्त्र जाप की संख्या और अशर्फियों की संख्या दोनों ही बढ़ा दी। गायत्री मन्त्र की शक्ति के प्रभाव से ब्राह्मण को भूख, प्यास व शारीरिक व्याधि की तनिक भी चिन्ता नहीं रही। गायत्री मन्त्र जाप के कारण उसके चेहरे पर तेज झलकने लगा। लोगों का ध्यान ब्राह्मण की ओर आकर्षित होने लगा। दर्शनाभिलाषी उनके दर्शन कर मिठाई, फल, पैसे, कपड़े चढाने लगे। अब उसे बीरबल से प्राप्त होने वाली अशर्फियों की भी आवश्यकता नहीं रही। यहाँ तक कि अब तो ब्राह्मण को श्रद्धा पूर्वक चढ़ाई गई वस्तुओं का भी कोई आकर्षण नहीं रहा। बस वह सदैव मन से गायत्री जाप में लीन रहने लगा।

ब्राह्मण सन्त के नित्य गायत्री जप की खबर चारों ओर फैलने लगी। दूरदराज से श्रद्धालु दर्शन करने आने लगे। भक्तों ने ब्राह्मण की तपस्थली में मन्दिर व आश्रम का निर्माण करा दिया। ब्राह्मण के तप की प्रसिद्धि की खबर अकबर को भी मिली। बादशाह ने भी दर्शन हेतू जाने का फैंसला लिया और वह शाही तोहफे लेकर राजसी ठाठबाट में बीरबल के साथ सन्त से मिलने चल पड़ा। वहाँ पहुँचकर शाही भेंटे अर्पण कर ब्राह्मण को प्रणाम किया। ऐसे तेजोमय सन्त के दर्शनों से हर्षित हृदय सहित बादशाह बीरबल के साथ बाहर आ गए।

तब बीरबल ने पूछा 'क्या आप इस सन्त को जानतें हैं ?'

अकबर ने कहा - 'नहीं, बीरबल मैं तो इससे आज पहली बार मिला हूँ।

फिर बीरबल ने कहा - 'महाराज आप इसे अच्छी तरह से जानते हो। यह वही भिखारी ब्राह्मण है, जिस पर आपने व्यंग्य कसकर एक दिन कहा था ये हैं तुम्हारे ब्राह्मण जिन्हें ब्रह्म देवता कहा जाता है ?'

आज आप स्वयं उसी ब्राह्मण के पैरों में शीश नवा कर आए हैं। अकबर के आश्चर्य की सीमा नहीं रही। बीरबल से पूछा लेकिन यह इतना बड़ा बदलाव कैसे हुआ ?'

बीरबल ने कहा महाराज वह मूल रुप में ब्राह्मण ही है। परिस्थितिवश वह अपने धर्म की सच्चाई व शक्तियों से दूर था। धर्म के एक गायत्री मन्त्र ने ब्राह्मण को साक्षात् 'ब्रह्म' बना दिया और वह कैसे बादशाह को चरणों में गिरने के लिए विवश कर दिया। यही ब्राह्मण आधीन मन्त्रों का प्रभाव है। यह नियम सभी ब्राह्मणों पर सामान रुप से लागू होता है। क्योंकि ब्राह्मण आसन और तप से दूर रहकर जी रहे हैं, इसीलिए पीड़ित हैं।

वर्तमान में आवश्यकता है कि सभी ब्राह्मण पुनः अपने कर्म से जुड़ें, अपने संस्कारों को जानें और मानें। मूल ब्रह्मरुप में जो विलीन होने की क्षमता रखता है वही ब्राह्मण है। यदि ब्राह्मण अपने कर्मपथ पर दृढ़ता से चले तो देव शक्तियाँ उसके साथ चल पड़ती हैं। इसलिए अपनी पहचान के साथ सदैव प्रसन्न रहिये। कुछ गरीब यजमान कर्म चाहो मुफ्तमें करो , पर साधन सम्पन से पूरी दक्षिणा लीजिए आजके युगकी आवश्यकता अनुसार लीजिए । जब आप आपके कर्म के हिसाब से पूरी फीस लेंगे तब ही आपकी कद्र होगी और लोगो का भी पवित्र कर्मकांड में पूर्ण विश्वास होगा ।

महादेव आप सभी धर्मप्रेमी जनो पर कृपा करें और ब्राह्मण की प्रसन्नता स्वरूप आशीर्वाद प्राप्त करके आप सब सुखी सम्पन बने।

🚩नारायण 🚩

18/05/2025

*शनि की न्यायप्रियता की पौराणिक कहानी*

एक बार भगवान विष्णु, शंकर और ब्रह्मा के बीच एक संवाद शुरू हुआ। यह संवाद था संसार में एक न्याय अधिकारी को जन्म देने का। यह संवाद तब शुरू हुआ जब देवों और असुरों के बीच लगातार युद्ध हो रहा था। असुरों को लगता था कि जब न्याय की बात आती है तो फैसला देवों के हक में सुनाया जाता है। परंतु असुरों के गुरु शुक्राचार्य को भगवान शंकर पर पूर्ण विश्वास था कि वह देवों के साथ असुरों के हितों की भी रक्षा करेंगे। भगवान शंकर ने अपने परम भक्त शुक्राचार्य को निराश नहीं किया। भगवान् शंकर ही थे जिन्होंने शनिदेव के जन्म की पटकथा लिखी। शनिदेव का जन्म सूर्य पुत्र के रूप में हुआ जिनकी मां का नाम छाया था। एक पौराणिक कथा के अनुसार छाया ने शनि को एक जंगल में छुपा के रख उनका वही पालन-पोषण किया। यम के अलावा शनि भी एक पुत्र है। शनि देव को भी नहीं मालूम था उनके पिता स्वयं सूर्य देव है।
लेकिन यह राज बहुत दिनों तक छुप ना सका। क्योंकि संसार को उसका न्याय अधिकारी मिलना था जो कर्मों के आधार पर लोगों को न्याय और दंड देगा। इधर देवाधिपति इंद्र देव और शुक्राचार्य के बीच न्याय अधिकारी के अस्तित्व को जानने के लिए खलबली मची हुई थी। इसी खलबली का नतीजा एक चक्रवात के रूप में आया जिसका संचालन शुक्राचार्य कर रहे थे।
शुक्राचार्य को मोहरा बनाते हुए इंद्र देव ने एक षड्यंत्र रचा था। सही मायनों में इस चक्रवात के लिए इंद्रदेव जिम्मेदार थे जिन्होंने असुरों के गुरु शुक्राचार्य को उकसाया। इस चक्रवात की चपेट में शनि की माता छाया आ गई जिससे शनि देव नाराज हो गए और शंकर भगवान की कृपा से उन्हें अपनी शक्तियों का बोध हो गया और उन्होंने अपनी मां छाया को बचा लिया। इसके बाद सूर्य देव चक्रवात से क्रोधित हो गए और उन्होंने शुक्राचार्य और इंद्र देव को सूर्य लोक में बुलाया। जहां पर चक्रवात के दोषी को दंड दे कर न्याय दिया जाना था। लेकिन शुक्राचार्य की बात सुने बिना सूर्यदेव ने शुक्राचार्य को दोषी करार दे दिया इसको देखते हुए वहां शनि देव प्रकट हो गए उन्होंने न्याय अधिकारी के रूप में उचित न्याय किया।

उन्होंने सभी को बताया कि चक्रवात के असली दोषी शुक्राचार्य नहीं अपितु इंद्रदेव हैं। शनिदेव की यह बात सुनकर वहां मौजूद सभी देवता (उनके पिता सूर्यदेव) और शुक्राचार्य चकित रह गए। लेकिन शनिदेव ने कहा कि न्याय सबके लिए बराबर होता है चाहे वह देव हो या असुर। अंत में देवताओं को शनि देव के आगे झुकना ही पड़ा क्योंकि न्याय विश्व के न्याय अधिकारी के द्वारा हो रहा था। इंद्र देव को सजा के तौर पर अपना मुकुट धरती पर उतार कर रखना पड़ा।

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