16/02/2026
नहीं,
मैं मान नहीं सकता,
की तुम पसंद हो मुझे....
ऐसा नहीं,
की मैं मान–ना नहीं चाहता,
पर,
डरता हू,
डरता हूँ अपने आप से,
अपने ख़्वाब देखने से....
जैसे अक्सर,
मैं पसंदीदा चीज़ को,
ख्वाबों में देख,
नींद टूटे पे,
उन्हें खोया करता हूँ,
तो हाँ,
मैं ख्वाब देखने से डरता हूँ...
हां,
मैं मान नहीं सकता,
के फ़िर से मुझे कोई,
पसंद आने लगा है,
वो शक्स जो अलग है मुझसे,
इतना जुदा है मुझसे,
मुझे क्यू भाने लगा है??...
ऐसा नहीं के,
मैं कोशिश नहीं करना चाहता,
हां मैंने कोशिश नहीं की,
पाने की तुम्हें,
पर वही है के,
मैं डरता हूँ,
डरता हूँ अपनी आदत से,
जो हासिल न हो सके,
हासिल करने की चाहत से,
डरता हूं....
तुमसे प्यार है,
हां नहीं है,
इसका पता नहीं,
पर हन ,
मैं मन नहीं चाहता,
के ,
तुमसे प्यार है मुझे,
लेलो वक्त,
जो लेना है तुम्हें,
तुम्हारा इंतज़ार है मुझे,
क्योंकि तुमसे ही प्यार है मुझे....
और हाँ,
मानो ना मानो,
तुम,
हमें ना जुड़ते हो,
ना बिछड़ने देते हो,
कहीं ना कहीं हमसे,
राह में टकरा की जाती हो,
नहीं तो ख्वाबों में,
तो आ ही जाते हो,
और हमें यहीं बांधे रखते हो....
नहीं,
ऐसा नहीं के,
मैं रोकना नहीं चाहता हूँ तुम्हें,
तुम ठहर जाओ ऐसा चाहता हूँ,
पर किस हक से रुकूंगा?
ये सोच के मैं ठहर जाता हूँ....
नहीं,
मैं मान नहीं सकता,
के तुम पसंद आने लगे हो मुझे,
मेरी हर कविता में नज़र आने लगे हो मुझे......
Written by = .ke.alfaaz_