11/11/2020
सहकारी इंटर कॉलेज मिहरावां में लगभग 15 वर्षों के अपने अध्यापन अनुभव के दौरान, इस परिवेश के बच्चों में, जो सबसे अधिक चिंताजनक चीज़ मैंने देखी है ,वह है, मौलिक रूप से सोचने, और कल्पना की शक्ति का भयंकर रूप से क्षीण होना।
मौलिक चिंतन, और लीक से हटकर सोचना सभ्यता की आवश्यक सामग्री है , और तीव्र कल्पनाशक्ति शोध–वृति का अनिवार्य लक्षण है। सवाल यह है कि हम बालक की मौलिक कल्पनाशक्ति को उभारने के लिए क्या करते हैं ..?!
शायद कुछ भी नहीं..
या इस क्षेत्र में हमारी कोशिश होती भी है तो नगण्य।
जबकि मौलिक कल्पना की धार को कुंद करने के लिए हर चंद कोशिश की जाती है। संस्कृति, समाज और परंपरा के नाम पर, यह कार्य योजनाबद्ध तरीके से किया जाता है।
हर बच्चा जन्म से जिज्ञासु होता है। नन्हा शिशु अपने संपर्क में आने वाली प्रत्येक वस्तु को एक जिज्ञासा एवं कौतुहल की दृष्टि से परखना चाहता है। वस्तु के बारे में बंधा–बंधाया ‘सच’ उसे मालूम नहीं होता।
नएपन की खोज वह उतावलेपन की सीमा तक जाकर कर सकता है। माता–पिता उसे खिलौना लाकर देते हैं... वह कुछ देर उससे खेलता है,मगर थोड़ी ही देर बाद उसकी आंतरिक संरचना को जानने के लिए बेचैन हो जाता है। खिलौने के बारे में दूसरों के दिए ज्ञान से उसको संतोष नहीं होता. अपने सक्रिय मष्तिष्क से वह स्वयं उसको परखना चाहता है। इस क्रम में कई बार खिलौना टूट भी जाता है और उसे डांट भी पड़ती है।
नन्हा बालक अपने कल्पना जगत को अपनी ही तरह गढ़ता है।
इसलिए वह खिलौनों के अलावा भी अन्य वस्तुओं से भी खेल सकता है। कभी कभी तो काल्पनिक वस्तुओं से भी खेल लेता है। उदाहरण के तौर पर अपने हवा में ही काल्पनिक गाड़ी का हैंडल पकड़े पीं...पीं करते गाड़ी चलाते दौड़ते बच्चों को देखा होगा।
या कल्पनिक भोजन बनाते परोसते हुए बच्चियों को देखा होगा।
किसी बंधे बंधाए ज्ञान से उसका परिचय नहीं होता अतः वह निडर होकर अपने कौतुक का अन्वेषण करता है। वह विचित्र से विचित्र प्राणी को भी अपना सकता है।
किन्तु जैसे ही उसका कौतूहल समाप्त हो जाता है, वह उकताने लगता है। उसके बाद उसे खुद से दूर करते, उपेक्षा करते उसे देर नहीं लगती।
कभी कभी उसका कौतुक डर के कारण समाप्त हो जाता है और वह विषय से दूर हट जाता है।
डर का कारण उसका स्वयं का अरुचिकर अनुभव भी हो सकता है या फिर किसी बड़े व्यक्ति के कारण उसमें विषय के प्रति घबराहट या डर उत्पन्न हुआ हो।
कारण जो भी हो किन्तु यह निश्चित रूप से स्वाभाविक जिज्ञासा के विपरीत दिशा में कार्य करता है।
लेकिन कोई खिलौना, वस्तु या विषय, बालक की संवेदना को छू जाए तो वह उसको सोते–जागते, उठते–बैठते अपने साथ भी रख सकता है।
देखा गया है कि बालक के आसपास का परिवेश रचने वाले लोग, विशेष रूप से शैक्षिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए परिवेश के लोग, उसके सीखने की रफ़्तार को लगातार कम करते रहते है।
बालक जिसके भी साथ समानता के स्तर पर संवाद करने में खुशी का अनुभव करता है, और जिसके बारे में उसको लगता है अपने बड़प्पन द्वारा वह उसकी अस्मिता को आहत करने वाला नहीं है, वही उसका मीत–सखा बन जाता है।
बालक को जिनसे लगता है कि उनके साथ खेलते–बतियाते हुए वह अपनी नैसर्गिक स्वतंत्रता का आनंद ले सकता है वह बालक के अस्मिता जगत में बहुत जल्दी जगह बना लेते हैं।
ज़रूरत है बच्चों को संवेदना के स्तर तक छूने की.. और उन्हें इस स्तर पर जोड़े रहने की।
शिक्षक और अभिभावक को स्नेहिल व्यवहार के साथ उनके मददगार के रूप में उनके साथ होना चाहिए। क्योंकि सृजनात्मकता, संरक्षण के अभाव में असमय काल–कवलित हो जाती है। उसके अभाव में बालक बड़ा होते–होते अनुसरण को अपना धर्म बना लेता है और लकीर का फकीर बन कर रह जाता है।
यह विषय बहुत विस्तृत है और इसपर कहने और विचार करने को बहुत कुछ है लेकिन इस माध्यम की भी अपनी सीमाएं हैं । अतः फिलहाल इतना ही... क्योंकि बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी..
दीपावली एवं बाल दिवस की अग्रिम शुभकामनाएं मेरे बच्चों !!
#मैडमजीकीबात