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* बचपन : सिपहसलार हूँ मैं*माँ, तू अकेली नहीं मैं भी एक मददगार हूँ। अगर पिता नहीं हैं तो क्या हुआ? अब तेरा लाडला, सिपहसला...
30/10/2024

* बचपन : सिपहसलार हूँ मैं*

माँ, तू अकेली नहीं
मैं भी एक मददगार हूँ।
अगर पिता नहीं हैं
तो क्या हुआ?
अब तेरा लाडला,
सिपहसलार हूँ।

खो जाने का गम
नहीं है मुझे इस अंधेरे में
तेरे संदेशों के खातिर
अनसुलझे पथ का भी
एक मात्र घुड़सवार हूँ।

तेरे आंचल का छांव पा
बचा हूँ तीक्ष्ण किरणों से
अब मौसम अगर
बेहिसाब है तो क्या?
नहीं बहने दूंगा न तेरे आंसू
यहाँ हर प्रश्न का मैं जबाब हूँ।

इन दो चार ईंटों ने
नहीं लिखी है किस्मत मेरी
पत्थर दिलों को
पिघला नहीं पाया तो क्या?
गरीबी में भी गहरी रेखाएँ हैं
आंसुओ को जगह नहीं दी है हमने
कंकड़ों के लिए पत्थरबाज हूँ।

बेशक मैं बंचित हूँ अक्षरों से
विद्या भवन व विद्यार्थियों से
लिख-पढ़ नहीं सकता तो क्या?
तू ही गुरु, मार्गदर्शक हो मेरे
बेढंगे राहें नापी है मैंने
तेरे हर मंजर का खवाब हूँ।

दांगी सुनील कुमार 'विद्यार्थी'
धनगावां, जहानाबाद
महासचिव
ऑल इंडिया दांगी क्षत्रिय संघ
शाखा-जहानाबाद

 #काव्य मंजरी मंच #दिनांक   22/10/2024 #विधा:     पद्य #विषय :  #चित्र आधारित लेखन #नर ही हो, तुम मन को, न निराश करो अपन...
22/10/2024

#काव्य मंजरी मंच
#दिनांक 22/10/2024
#विधा: पद्य
#विषय : #चित्र आधारित लेखन #

नर ही हो, तुम मन को, न निराश करो अपना।
जीवन बेहद खाश रे या यह है निरा सपना।।

गणित का प्रतिफल अब तो आना ही था।
रम्य नीड़ न रहा अपना भले पुराना ही था।
झुक गई या टूट गई है कमर और आधार
हस्र, जवानी का एक दिन पहूँचना ही था।

फक्र था कुटुंबों पर, कल काम न आई रचना।
नर ही हो, तुम मन को, न निराश करो अपना।।

एक खोया सुन्दर सी काया, खोल रही पोल,
एक कट गई है अब, है एक लकड़ी की झोल,
भूत भी अब याद आ रही, मस्ती के सारे दिन,
भूले भी नहीं भूल रहा, दिन सुख के सारे गिन,

अचरज के कांटे हैं भाई, मर्म जो पाया अपना।
नर ही हो, तुम मन को, न निराश करो अपना।।

वृक्षों ने चल दिया था, बेहद दानी होने का दाव,
शपथ लिया था तब, सबकुछ दे खोने का भाव,
थके पथिक शुद्ध श्वांस लेते, देता रहा जब छांव,
वे तने भी याद न आते, दिखते रहे बस वो गाँव,

काले दिल हैं ले बैठे, काम, रहा है तंज कसना।
नर ही हो, तुम मन को, न निराश करो अपना।।

हे भावी पीढ़ी के मानव, कदर करो जन-जन का,
ख्यालो ये दिन तेरे भी होंगे, यहां करोगे तब क्या,
जीवन यात्रा को बना लें, पवित्र वो चारों धाम,
सुख सागर आ मिलेंगे, दिन-रात, सुबह-शाम,

करवट मत फेर यहां, नरक-स्वर्ग नहीं है रटना।
नर ही हो, तुम मन को, न निराश करो अपना।।

दांगी सुनील कुमार 'विद्यार्थी'
धनगावाॅं, जहानाबाद

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11/07/2024

मैं दांगी समाज के उन असफल प्रतियोगिता उम्मीदवारों को भी हार्दिक बधाई व शुभकामना देना चाहता हूं,जिन्होंने अपना पूरा प्रयास सफलता हेतु लगाया। यह भी कहना चाहता हूं कि असफलता रूपी भय को पास फटकने नहीं देना है। संभव यह भी है कि यह असफलता आपके और अधिक ऊॅंची सीढ़ी के इंतजार का पर्याय हो।

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