Jhunjhunu Club

Jhunjhunu Club Jhunjhunu Club is the organization to explore the people of Jhunjhunu District. Jhunjhunu district needs much to be done for its development.

There should be a Defense Research & Development Organisation (DRDO) lab, Agriculture and Livestock Research Institute, Medical and Engineering College, Entrepreneurship and Skill Development Institute, Military School, Defense University, Small and Middle scale Industries, Agro-food processing Industries, Mines and Mineral based Industries, Inclusion of Jhunjhunu in NCR, Network of Roads to each

Village, Promotion of science and technology in agriculture, Drinking water for All (free from fluoride, germs etc.), promotion of floriculture, horticulture and forestry, Improved healthcare system and e-healthcare, Enhanced e-governance and people grievance system, welfare and rehabilitation of retired and ex-service persons, more facilities to military persons and for their families, and much is needed to improve in education, administration, child-women empowerment, and for youth employment.

अजीत भारती पर एट्रोसिटी एक्ट मे FIR हुई है।माजरा कुछ यूँ है कि भारती ने "सवर्णों के समर्थन मे "कुछ फायरब्रांड" कहा। जवाब...
25/08/2026

अजीत भारती पर एट्रोसिटी एक्ट मे FIR हुई है।

माजरा कुछ यूँ है कि भारती ने "सवर्णों के समर्थन मे "कुछ फायरब्रांड" कहा। जवाब मे, किसी "अवर्ण" ने कह दिया कि अपनी बहन को चंद्रशेखर रावण से ब्याह दो।

यदि यह सत्य है, तो अजीत क्या, किसी का भी पारा चढ़ेगा। उन्होंने तमाम बाउंड्रीज तोड़कर जवाब दिया। तो अगले ने उनपर एट्रोसिटी मे FIR करवा दी।
•••••
पोस्ट अजीत भारती पर नहीं, गाँधी पर है।

गाँधी ने अछूत उद्धार पर 1933 से काम शुरू किया। दरअसल, 1932 मे उन्होंने राजनीति से एक तरह से सन्यास ले लिया था। कांग्रेस की चवन्नी सदस्यता छोड़ दी। हरिजन अख़बार शुरू किया। हरिजन सेवक संघ बनाया।

दलितों को समाज की मुख्यधारा मे स्पेस देने के लिए देश के हर राज्य मे घूमते रहे।अछूतोंदार यात्रा निकाली। उन्हें मंदिरों में प्रवेश दिलाने के लिए प्रयत्न किया।
•••
अस्पृश्यता को उन्होंने मानवता के प्रति जघन्य अपराध कहा। ।
उड़ीसा कर्नाटक और दक्षिण के इलाकों में काफी घूमे।सेलिब्रिटी होने के नाते उन्हें बहुत से विवाह कार्यक्रम में आमंत्रित भी किया जाता।

तब एक बात उन्होंने बहुत स्पष्ट कहीं- मैं केवल ऐसे विवाह में जाऊंगा.. जिसमें एक पक्ष हरिजन हो।

दरअसल गांधी ने यह समझ लिया था की कानून,दबाव या दीगर तरीके से जाति खत्म नहीं होगी। यह तभी जाएगी जब समाज में वैवाहिक संबंध जातिगत बंधनों को तोड़कर बने।
•••
अपने तमाम सवर्ण, लिबरल साथियों को यह कहते देखता हूं कि वह तो जाति नहीं मानते। सबको बराबर समझते हैं, साथ बैठते, खाते पीते हँसते हैँ। पर अगर यह प्रश्न करो - कि क्या किसी अपने भाई, बहन, बेटा, बेटी का किसी दलित लड़के/लड़की से विवाह करेंगे??

वे प्रश्न का बुरा मान जाते हैं।

पर सत्य यह है कि उनके साथ खाने पीने पीने, बैठने, हंसने बोलने लेने से, जातिगत विभाजन खत्म नहीं होगा। यहाँ तो युवाओं मे प्रेम भी, जाति देखकर होता है। ऊंच-नीच की आदत, उसकी विरासत, पीढ़ी दर पीढ़ी कायम रहती है।
•••
वह गाँधी के प्रयास के 90 साल बाद भी समाज मे इतनी मज़बूत है, की कोई अजीत, अपनी बहन के किसी दलित से ब्याह जाने की मांग पर, गालियां दे देता है।

औऱ यह गुस्सा हमें जस्टिफाइड भी लगता है।

पर यह बात समझिये कि,प्रोग्रेसिव होने का दम वहीं तक सीमित है, ज़ब तक उनकी शुद्धता और उच्चता कायम रहे। औऱ जब तक ये शुद्धता/ उच्चता का भाव कायम है,

आरक्षण एक जरूरी उपाय है।
उसे जारी रहना चाहिए।
••••
ताकि दलित औऱ शोषित जब कभी थाने, कचहरी, कोर्ट, सरकारी ऑफिस, अस्पताल, या स्कूल मे जाये। तो उसे सम्मान औऱ बराबरी से - न्याय- इलाज- शिक्षा देने वाले, उसके अपने समाज के लोग का पर्याप्त संख्या में मौजूद हो।

भले ही एंट्रेंस एग्जाम में उन्हें कम नंबर मिले थे।

आरक्षण का परपज अलग है। वह गरीबी उन्मूलन की योजना नहीं है। यह एक कंपनसेशन है। आर्थिक आधार पर आरक्षण अपने आप में बकवास है।
•••
आप या तो गांधी के रास्ते पर चलकर दलितों को बराबरी का स्पेस देंगे, रोटी बेटी का संबंध रखेंगे। आने वाले 100 साल मे समाज होमोजिनस बना देंगे।

या फिर ऐसा न करने का कंपनसेशन, संविधान अंबेडकर के रास्ते चलकर देगा। आरक्षण के रूप में देगा।
•••
लेकिन अजीत भारती,औऱ आरक्षण के खिलाफ लड़ रहे युवा दोनों हाथों में लड्डू चाहते हैं।

सो क्या आश्चर्य कि उनपर एट्रोसिटी एक्ट मे FIR हुई है।

24/08/2026

आरक्षण विरोधी आंदोलन कराने का मुख्य कारण यह है कि सरकार को रोहिणी आयोग की रिपोर्ट और उस पर सरकार की योजना को संसद में पेश करने के लिए माहौल बनाया जाए। रोहिणी आयोग अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण को वर्गीकृत करने के बारे में है।

सरकार इस रिपोर्ट को संसद के समक्ष नहीं पेश कर रही है, जबकि इसे जमा हुए तीन साल से ज़्यादा समय हो चुका है। भाजपा को पता है कि इसे संसद के सामने लाते ही उसके अधिकतर मतदाता और सरकार के सहयोगी भाग जायेंगे।

अगर वर्गीकरण का यह खेल शुरू हुआ, तो कुछ साल बाद अनुसूचित जाति और जनजाति के मामले में भी होगा।
यह भाजपा के लिए साँप-छछूंदर की स्थिति है। पर, संघ लंबा सोचता है। कॉर्पोरेट लंबा सोचता है।

यूपीए के समय में निजी क्षेत्र में आरक्षण की बात उठी थी। तब भी और अब भी भाजपा के सबसे बड़े सहयोगी नीतीश कुमार ने निजी क्षेत्र में आरक्षण की बात की थी।

कॉर्पोरेट माफ़िया ने सार्वजनिक रूप से सरकार को धमकी दी कि ऐसा किया, तो हम पूरी ताक़त से इसका विरोध करेंगे। कॉर्पोरेट के सामने लड़ने की औक़ात तब भी किसी की भी नहीं थी और आज तो छोड़ ही दें।

तब समझौता हुआ कि कॉर्पोरेट अपनी कमाई का एक चिल्लर सोशल रेस्पोंसिबिलिटी पर ख़र्च कर देगा और वंचित वर्ग से कुछ को प्रशिक्षण दे देगा। कॉर्पोरेट दबाव में मंत्री बदलने वाली मनमोहनी सरकार ने अपने को पीछे कर लिया।

मज़े की बात यह है कि कॉर्पोरेट ने अपने ही बीवियों और बच्चों तथा मालिकों के एनजीओ को सोशल रेस्पोंसिबिलिटी के नाम पर पैसा देना शुरू कर दिया। प्रशिक्षण आदि गया चूल्हे में।

दुनियादारी के खेल के ये कुछ हिस्से हैं। हर जगह यह चलता है।

23/08/2026

नीति आयोग का कहना है कि देश में लगभग 8.7 करोड़ युवा ऐसे हैं, जो न तो पढ़ाई कर रहे हैं, न कोई काम कर रहे हैं और न ही किसी तरह का प्रशिक्षण ले रहे हैं।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार की नौकरियों में खाली पदों की संख्या एक दशक में 4.2 लाख से बढ़कर 8.24 लाख हो गई है।

23/08/2026
➡️ जनगणना 2011 में राजस्थान की साक्षरता दर 66.11% थी और 28 राज्यों में इसका 26वाँ पायदान था। ➡️PLFS 2023-24 में साक्षरता...
22/08/2026

➡️ जनगणना 2011 में राजस्थान की साक्षरता दर 66.11% थी और 28 राज्यों में इसका 26वाँ पायदान था।
➡️PLFS 2023-24 में साक्षरता बढ़कर 75.8% हुई, लेकिन 28 राज्यों में राजस्थान अभी भी 25वें पायदान पर है—यानी केवल तीन राज्य इससे नीचे हैं।

👉🏻 जब इन आंकड़ों पर नजर पड़ी तो समझ आया कि जो कल हुआ वह क्यों हुआ!

22/08/2026

चाय ☕️ खतरे में है मितर,
चीनी पहुँच गई सितर ।।
ठोको ताली 😂

Bank of America की अगस्त 2026 की Fund Manager Survey भारत के शेयर बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी लेकर आई है। सर्वे क...
21/08/2026

Bank of America की अगस्त 2026 की Fund Manager Survey भारत के शेयर बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी लेकर आई है। सर्वे के मुताबिक भारत इंडोनेशिया से भी पीछे रहकर एशिया में वैश्विक फंड मैनेजरों का सबसे कम पसंद किया जाने वाला शेयर बाजार बन चुका है। करीब 32% fund managers भारत पर net underweight हैं, जबकि इंडोनेशिया के लिए यह आंकड़ा 27% रह गया है। यानी ये निवेशक अपने benchmark की तुलना में भारतीय शेयरों में कम पैसा रखना चाहते हैं। (The Times of India⁠)

यह कोई छोटे निवेशकों की online opinion poll नहीं है। BofA के सर्वे में 7 से 13 अगस्त के बीच 98 fund managers/panellists ने हिस्सा लिया, जो मिलकर करीब $272 billion की assets manage करते हैं। इसलिए इसे भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई अंतिम फैसला तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संस्थागत निवेशकों की बदलती धारणा का महत्वपूर्ण संकेत जरूर माना जाना चाहिए।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि विदेशी निवेशकों की भारत से नाराजगी का पहला कारण कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि AI और semiconductor boom में भारतीय शेयर बाजार की बेहद कमजोर हिस्सेदारी है। इस समय दुनिया का बड़ा investment theme Artificial Intelligence, chips, advanced electronics और hardware है। Taiwan और South Korea जैसे बाजार इसका सीधा फायदा उठा रहे हैं। इसके विपरीत भारत का बड़ा listed corporate sector banks, finance, conventional IT services, consumer companies, energy आदि पर अधिक निर्भर है। BofA survey में Taiwan सबसे पसंदीदा बाजारों में है, जबकि भारत नीचे पहुंच गया है। (look news india⁠)

लेकिन केवल AI से पूरी कहानी नहीं समझी जा सकती। Fund managers ने growth को लेकर चिंता, reforms की रफ्तार और महंगे valuations को भी भारत के प्रति bearish होने के कारणों में गिना है। भारत वर्षों तक दूसरे emerging markets के मुकाबले premium valuation पर ट्रेड करता रहा, क्योंकि निवेशक मानते थे कि तेज आर्थिक विकास अंततः तेज corporate earnings growth में बदलेगा। जब इस अपेक्षा और वास्तविक earnings के बीच दूरी बढ़ती है, तो वही premium valuation कमजोरी बन जाती है। (India IPO⁠)

इसके पीछे एक और गंभीर आंकड़ा है। Reuters के मुताबिक अक्टूबर 2024 से जून 2026 के बीच विदेशी निवेशकों ने भारतीय equities से $50 billion से अधिक निकाल लिए। भारतीय शेयरों में foreign ownership अब लगभग 17 साल के निचले स्तर पर है और MSCI Emerging Markets Index में भारत का weight भी 12% से नीचे आ चुका है। (Reuters⁠)

2026 विशेष रूप से कठिन रहा है। जनवरी-जुलाई के बीच FPIs भारतीय equities से करीब ₹2.54 लाख करोड़ net निकाल चुके थे। मार्च में लगभग ₹1.18 लाख करोड़, अप्रैल में ₹60,847 करोड़, मई में ₹32,963 करोड़ और जून में ₹49,340 करोड़ की निकासी हुई। जुलाई में जरूर तस्वीर बदली और FPIs लगभग ₹20,200 करोड़ के net buyers बने। अगस्त के पहले हिस्से में भी करीब ₹16,621 करोड़ की खरीद की खबर आई। इसलिए यह कहना गलत होगा कि विदेशी निवेशक लगातार भारत छोड़ ही रहे हैं; हाल में कुछ वापसी भी हुई है। (India Gazette⁠)

शेयर बाजार के प्रदर्शन में भी कमजोरी साफ दिखाई देती है। 19 अगस्त तक Nifty 50 साल की शुरुआत से करीब 7.9% और Sensex करीब 9.8% नीचे थे, जबकि Taiwan और South Korea जैसे Asian markets ने कहीं बेहतर प्रदर्शन किया। यानी BofA survey केवल perception नहीं है; इसके पीछे relative market performance का भी आधार है। (Reuters⁠)

लेकिन इसी दौरान भारतीय corporate earnings में हाल में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। जून 2026 quarter में Nifty 50 कंपनियों का औसत profit growth करीब 18% रहा—10 quarters में सबसे तेज। 19 sectors ने expectations को beat किया और earnings upgrades की स्थिति भी सुधरी। यही कारण है कि कुछ market analysts correction के बाद valuations और risk-reward को फिर आकर्षक मान रहे हैं। (Reuters⁠)

और शायद सबसे महत्वपूर्ण यह है कि विदेशी निवेशकों की इतनी बड़ी selling के बावजूद बाजार उस अनुपात में नहीं टूटा क्योंकि mutual funds, SIPs, insurance funds और घरेलू institutional investors लगातार पैसा लगा रहे हैं। मई 2026 में अकेले DIIs ने equities में करीब ₹82,880 करोड़ की net buying की थी। Reuters के अनुसार पिछले करीब 18 महीनों में लगभग $48 billion विदेशी पैसा निकलने के बावजूद घरेलू निवेशकों ने बाजार को काफी हद तक संभाले रखा। (Securities and Exchange Board of India⁠)

इसलिए “India is Asia’s least-preferred stock market” को “भारतीय अर्थव्यवस्था खत्म हो रही है” समझना उतना ही गलत होगा जितना इसे पूरी तरह महत्वहीन बता देना। यह relative preference है—global fund managers के पास Taiwan, Korea, Japan, China, Indonesia और भारत में से पैसा लगाने के विकल्प हैं और फिलहाल उन्हें भारत का risk-return equation कम आकर्षक लग रहा है।

लेकिन राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से यह खबर महत्वपूर्ण जरूर है। पिछले कुछ वर्षों में भारत के बारे में सबसे बड़ा narrative था—fastest-growing major economy, China+1, manufacturing destination, global capital magnet और दुनिया का अगला बड़ा investment story। यदि उसी समय विदेशी equity ownership 17 साल के निचले स्तर पर पहुंच जाए, दसियों अरब डॉलर विदेशी पूंजी निकल जाए और institutional fund managers भारत को क्षेत्र का least-preferred market बताने लगें, तो सरकार और नीति-निर्माताओं को इसे केवल “market sentiment” कहकर खारिज नहीं करना चाहिए।

असल सवाल यह है कि क्या भारत की ऊंची GDP growth को corporate earnings, manufacturing competitiveness, technological leadership, exports और पर्याप्त private investment में तेजी से बदला जा सकता है? AI और semiconductor revolution में केवल घोषणाएं या subsidies पर्याप्त नहीं होंगी; ऐसी globally competitive कंपनियां भी चाहिए जिनमें दुनिया का institutional capital निवेश करना चाहे।

फिलहाल एक दिलचस्प विरोधाभास सामने है—विदेशी संस्थागत निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ है, लेकिन भारतीय घरेलू निवेशक अपने बाजार पर पहले से कहीं ज्यादा भरोसा दिखा रहे हैं। आने वाले महीनों में यही मुकाबला तय करेगा कि BofA का यह survey एक अस्थायी bearish phase साबित होता है या भारत के प्रति global capital की सोच में किसी ज्यादा गहरे बदलाव की शुरुआत।

21/08/2026

कांग्रेस के टाइम चीनी का दाम बढ़ना महंगाई बढ़ना था
BJP के टाइम यह डायबिटीज कंट्रोल हो गया है।

बस इतना ही बदला है न्यू इंडिया में।

Address

Jhunjhunun

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Jhunjhunu Club posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share