Jhunjhunu Club

Jhunjhunu Club Jhunjhunu Club is the organization to explore the people of Jhunjhunu District. Jhunjhunu district needs much to be done for its development.

There should be a Defense Research & Development Organisation (DRDO) lab, Agriculture and Livestock Research Institute, Medical and Engineering College, Entrepreneurship and Skill Development Institute, Military School, Defense University, Small and Middle scale Industries, Agro-food processing Industries, Mines and Mineral based Industries, Inclusion of Jhunjhunu in NCR, Network of Roads to each

Village, Promotion of science and technology in agriculture, Drinking water for All (free from fluoride, germs etc.), promotion of floriculture, horticulture and forestry, Improved healthcare system and e-healthcare, Enhanced e-governance and people grievance system, welfare and rehabilitation of retired and ex-service persons, more facilities to military persons and for their families, and much is needed to improve in education, administration, child-women empowerment, and for youth employment.

24/05/2026

विदेश मंत्री, सॉरी , अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो (Marco Rubio) ने कहा है कि वेनेजुएला की कार्यवाहक राष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिग्स (Delcy Rodríguez) अगले सप्ताह भारत आने वाली हैं। दिलचस्प बात यह है कि इस यात्रा की जानकारी पहले अमेरिका की ओर से सामने आई, जबकि भारत सरकार की तरफ से उस समय तक कोई औपचारिक घोषणा तक नहीं हुई थी।

क्या भारत से जुड़ी घोषणाएं अब वॉशिंगटन करेगा?

रूबियो ने यह बयान भारत यात्रा और ऊर्जा सहयोग पर चर्चा के दौरान दिया। इसका साफ साफ मतलब ये है कि अमेरिका कह रहा है कि वेनेजुएला का पेट्रोल अमेरिका भारत को बेचेगा।

24/05/2026

वेनेजुएला का ज्यादातर कच्चा तेल heavy sour crude माना जाता है। यानी वह गाढ़ा होता है और उसमें सल्फर भी ज्यादा होता है। ऐसे तेल को निकालना, ढोना और रिफाइन करना सामान्य light sweet crude की तुलना में महंगा पड़ता है। वेनेजुएला का तेल इतना चिपचिपा होता है कि उसे पाइपलाइन में बहाने के लिए हल्के तेल के साथ मिलाना पड़ता है।

लेकिन भारत की कुछ बड़ी रिफाइनरियां, खासकर जामनगर जैसी कॉम्प्लेक्स रिफाइनरी, इसी तरह के भारी और खट्टे तेल को प्रोसेस करने के लिए बनी हैं। ऐसे तेल पर आमतौर पर डिस्काउंट मिलता है। इसलिए अगर खरीद सस्ती हो तो रिफाइनिंग की अतिरिक्त लागत के बाद भी कुल सौदा फायदे का हो सकता है। इसी वजह से Reliance, BPCL और HMEL जैसी कंपनियां वेनेजुएला का तेल खरीद रही हैं।

लेकिन भौगोलिक रूप से देखें तो वेनेजुएला भारत से बहुत दूर है। रूस का तेल कई बार बाल्टिक सागर या ब्लैक सी से आता है, जबकि ईरान भारत के काफी करीब है। वेनेजुएला से तेल को अटलांटिक पार करके लाना पड़ता है। इसलिए शिपिंग कॉस्ट और आने में लगने वाला समय दोनों ज्यादा होते हैं। इसलिए वेनेजुएला से तेल लेना घाटे का सौदा साबित हो सकता है।

लेकिन अभी वैश्विक हालात सामान्य नहीं हैं। हॉर्मुज़ संकट और ईरान युद्ध की वजह से पश्चिम एशिया रूट जोखिम भरा हो गया है। ऐसे में हो सकता है भारत सिर्फ दूरी नहीं, आपूर्ति की सुनिश्चितता भी देख रहा हो। अगर खाड़ी क्षेत्र में सप्लाई रुकती है तो दूर का तेल भी रणनीतिक रूप से जरूरी हो जाता है।

एक और बात कि तेल का हर अतिरिक्त खर्च किसी न किसी रूप में उपभोक्ता और अर्थव्यवस्था पर ही आता है, या तो पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, या सरकार टैक्स घटाकर बोझ उठाती है, या तेल कंपनियों का मार्जिन घटता है। लेकिन अगर वेनेजुएला भारी डिस्काउंट पर तेल दे दे, तो लंबी दूरी का खर्च संतुलित हो सकता है और भारत को कुल मिलाकर अरबों डॉलर की बचत भी हो सकती है।

24/05/2026

भारतीय मीडिया के अनुसार, चीन ने भारत को कहा है कि वह तिब्बत में अगले दलाई लामा के चयन में हस्तक्षेप नहीं करे। भारत को करना भी नहीं चाहिए।

तिब्बत दलाई लामा की ग़ुलामी से मुक्त होकर अब बहुत अच्छी स्थिति में है।

पिछले साल जुलाई में अगले दलाई लामा को लेकर उनकी योजना और चीन की सरकार की समझ को लेकर विवाद खड़ा हुआ था। अब फिर विवाद हो रहा है।

ऐसे में यह समझना ज़रूरी है कि तिब्बत से उनके पलायन की पृष्ठभूमि क्या रही थी।

जब 1912 में चीन में क़िंग वंश का शासन समाप्त हुआ, तो अगले साल 13वें दलाई लामा ने तिब्बत की स्वतंत्रता की घोषणा कर द। कई साल बाद जब चीन में माओ के नेतृत्व में जनवादी गणराज्य की स्थापना हुई, तो उसने तिब्बत की कथित स्वतंत्रता को रद्द कर दिया और 1950 में तिब्बत के बड़े हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया।

अगले साल दोनों पक्षों में समझौता हुआ- तिब्बत चीन के अधीन हुआ, पर उसे स्वायत्तता मिली। तब चीन और अमेरिका के संबंध बहुत ख़राब हो गए थे, चीन को संयुक्त राष्ट्र से बाहर कर दिया गया और उसकी जगह ताइवान टापू को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बना दिया गया। उसी समय कोरिया का भयानक युद्ध भी अमेरिका और चीन-सोवियत संघ के बीच शुरू हुआ।

साल 1954-55 में दलाई लामा और पंचेन लामा चीन की राजधानी में रहे तथा संबंधों को लेकर बात करते रहे। संलग्न चित्र उसी समय के हैं। माओ, चाऊ एन लाई, देंग श्याओ पिंग समेत अनेक शीर्ष नेताओं से लामाओं की बातचीत हुई।

अगले साल दलाई लामा एक बौद्ध सम्मेलन के लिए भारत आए। इसी दौरान अमेरिका की कुख्यात ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए तिब्बती असंतुष्ट समूह से गठजोड़ बना चुकी थी।

भूमि सुधार और दासों को मुक्त करने को लेकर बौद्ध मठाधीशों और चीनी सरकार में तनाव बढ़ता जा रहा था। अंतत: 1959 में दलाई लामा ने अपने तांत्रिक भविष्यवक्ता से पूछा। तांत्रिक ने बताया कि उन्हें यहीं रहना चाहिए, पर बाद में उन्हें कहा गया कि रात ही वे ल्हासा छोड़ दें।

पहले माओ भी चाहते थे कि लामा चले जाएँ, पर तुरंत उन्होंने अपना विचार बदल दिया। ख़ैर, लामा ने पलायन के दौरान नेहरू सरकार से शरण देने का आग्रह किया। उसी समय पंडित नेहरू के कार्यालय में सीआईए का पत्र भी आया। भारत ने दलाई लामा और उनके साथियों को पनाह दे दी।

फिर भारत-चीन युद्ध हुआ। सीआईए ने तिब्बतियों को सशस्त्र संघर्ष के लिए उकसाया। समय बीतता गया। सत्तर के दशक के शुरू में अमेरिका ने चीन से निकटता बढ़ानी शुरू की। चीन संयुक्त राष्ट्र में वापस आया। तिब्बत को लेकर सीआईए ने अपना सहयोग बंद कर दिया। इस पर लामा बड़े नाराज़ हुए और कहा कि अमेरिका अपने स्वार्थ के लिए यह सब कर रहा था।

दलाई लामा को अब यह ख़ुलासा कर देना चाहिए कि पचास के दशक में दो-चार सालों में ऐसा क्या हुआ कि बनी हुई बात बिगड़ गई।

भारत को भी आत्ममंथन करना चाहिए कि इस मसले में नाक घुसेड़कर क्या हासिल हुआ।

भारत के चीफ जस्टिस ने 40% वकीलों की डिग्री को फेक बताया है। लेकिन ये नहीं बताया कि हाईकोर्ट का हर तीसरा जज किसी न किसी क...
24/05/2026

भारत के चीफ जस्टिस ने 40% वकीलों की डिग्री को फेक बताया है।

लेकिन ये नहीं बताया कि हाईकोर्ट का हर तीसरा जज किसी न किसी का अंकल है।

बकलोली इसे ही कहते हैं।

24/05/2026

देश में न्यूक्लियर बटन की गोपनीयता समझ में आती है, सैन्य अभियान की गोपनीयता भी समझ में आती है, लेकिन जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को ऐसे गोपनीय रखा जाता है मानो उससे सीधे दुश्मन देशों की मिसाइलों के कोड जुड़े हों। जनता बस इतना जानना चाहती है कि आखिर किस आधार पर किसी व्यक्ति को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया गया। उसकी योग्यता क्या थी, उसके पक्ष में क्या तर्क दिए गए, विरोध में क्या बातें उठीं। यह जान लेने से देश की सीमाएं थोड़ी न टूट जाएंगी?

दिलचस्प बात यह है कि जिन अदालतों में आम नागरिक के जीवन की सबसे निजी बातें तक खुले रिकॉर्ड का हिस्सा बन जाती हैं, वहीं जजों की नियुक्ति का मामला आते ही पूर्ण गोपनीयता को पवित्र सिद्धांत घोषित कर दिया जाता है। अगर कॉलेजियम की बैठकों का लाइव प्रसारण हो, चयन के मानदंड सार्वजनिक हों और फैसलों का कारण रिकॉर्ड में आए, तो शायद पहली बार देश को यह समझ आए कि न्यायपालिका में चयन योग्यता से हुआ, विचारधारा से हुआ, संपर्कों से हुआ या पारिवारिक नेटवर्क से। लोकतंत्र में पारदर्शिता से संस्थाएं कमजोर नहीं होतीं, बल्कि भरोसा मजबूत होता है। गोपनीयता की जरूरत तो तब पड़ती है जब व्यवस्था को जनता से ज्यादा अपने ही फैसलों पर भरोसा न हो।

दुर्भाग्य से अरविंद पनगढ़िया सही कह रहे हैं। रुपये में लिक्विड कम और झाग ज्यादा है। असल में हमने प्रोडक्टिविटी बढ़ाई नही। ...
23/05/2026

दुर्भाग्य से अरविंद पनगढ़िया सही कह रहे हैं।

रुपये में लिक्विड कम और झाग ज्यादा है। असल में हमने प्रोडक्टिविटी बढ़ाई नही। लेकिन रिजर्व का डॉलर मार्किट में डाल डाल कर उसे स्थिर रखने की कोशिश है। यह बेकार है,

रुपया गिरने देना चाहिए।
वैसे भी गिरना रोक नही पाएंगे।
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लेकिन गिरकर जब ये सेट हो जाएगा तो क्या गारंटी की हम प्रोडक्टिविटी बढा लेंगे। हमारा विमर्श हिन्दू मुस्लिम है। जेहादी कौम और भोजशाला है।

आम जनता को प्रोडक्शन बिजनेस से मतलब नही। धंधा का मतलब ट्रेड है, दलाली है, रिटेलिंग है। तो MSME के लेवल पर कुछ होगा नही।
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और जिन दो चार घरानों को बड़े बिजनेस का ठेका दिया था, वे बाहर इन्वेस्ट कर रहे हैं।

तो यहाँ भी कुछ न होगा।

तो एक समय के बाद रुपया थोड़ी देर ठहरेगा। उसके बाद फिर गिरेगा। यह चक्र चलता रहना है। जब तक हम युगोस्लाविया गति को प्राप्त न हो जायें।

इस देश ने यह राह चुन ली है,
और खात्मे की तरफ दौड़ रहा है।

क्यूबा में अमेरिका के खिलाफ बड़ा प्रदर्शन! हवाना में अमेरिकी दूतावास के सामने हजारों क्यूबाई लोगों ने शुक्रवार को जोरदार...
23/05/2026

क्यूबा में अमेरिका के खिलाफ बड़ा प्रदर्शन!

हवाना में अमेरिकी दूतावास के सामने हजारों क्यूबाई लोगों ने शुक्रवार को जोरदार रैली की। वे अमेरिका द्वारा अपने क्रांतिकारी नेता राउल कास्त्रो पर लगाए गए नए मुकदमे का विरोध कर रहे थे।
लोग Cuban झंडे लहराते हुए नारे लगा रहे थे —“विवा राउल!” और “पैट्रिया ओ मुर्ते!” (मातृभूमि या मौत!)
क्यूबा के राष्ट्रपति मिगुएल डियाज़-कानेल, प्रधानमंत्री मैनुएल मार्रेरो और कम्युनिस्ट पार्टी के कई बड़े नेता भी इस रैली में शामिल हुए।

राउल कास्त्रो (94 वर्ष) क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति और फिदेल कास्त्रो के भाई हैं। अमेरिका ने हाल में उन पर 1996 में दो अमेरिकी विमानों को गिराने के मामले में आरोप लगाए हैं। क्यूबा इसे राजनीतिक साजिश बता रहा है।

• 1959 में फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व वाली क्रांति के बाद दोनों देशों के संबंध खराब हो गए।
• 1961 में अमेरिका और क्यूबा के बीच राजनयिक संबंध पूरी तरह टूट गए।
• अमेरिका ने क्यूबा पर लंबे समय से आर्थिक प्रतिबंध (embargo) लगा रखा है।
• 1961 में बे ऑफ पिग्स आक्रमण और 1962 में क्यूबन मिसाइल संकट के बाद तनाव बहुत बढ़ गया।
• 2015 में ओबामा सरकार के समय दोनों देशों के बीच कुछ सुधार हुआ और दूतावास फिर खुल गए।
• लेकिन ट्रंप और बाद की सरकारों में फिर तनाव बढ़ा। दोनों देशों के बीच आज भी गहरे मतभेद बने हुए हैं।

23/05/2026

Currencies against US Dollar so far this year.

🇨🇳 China: +2.5%
🇲🇾 Malaysia: +2.3%
🇵🇰 Pakistan: +0.5%
🇸🇬 Singapore: +0.5%

🇻🇳 Vietnam: -0.2%
🇯🇵 Japan: -1.5%
🇹🇭 Thailand: -3.6%
🇵🇭 Philippines: -4.6%
🇰🇷 South Korea: -5.2%
🇮🇩 Indonesia: -6%
🇮🇳 India: -6.7%

रुपये की असली कहानीआजकल लोग कह रहे हैं कि रुपया तेजी से गिर रहा है और जल्द ही 1 डॉलर = 100 रुपये के बराबर हो जाएगा। लेकि...
23/05/2026

रुपये की असली कहानी

आजकल लोग कह रहे हैं कि रुपया तेजी से गिर रहा है और जल्द ही 1 डॉलर = 100 रुपये के बराबर हो जाएगा। लेकिन असली समस्या ये नहीं है।

असली कहानी ये है कि पिछले 15 सालों में रुपया अपनी आधी कीमत खो चुका है।

अगर 15 साल पहले आपके पास 100 रुपये थे, तो आज उन्हीं 100 रुपये की खरीदारी शक्ति केवल 50 रुपये जितनी रह गई है।
- आपकी सेविंग (जमा पूंजी) की आधी वैल्यू चली गई।
- आपका रिटायरमेंट फंड (निवृत्ति भविष्य निधि) आधा कमजोर हो गया।
- जो चीजें पहले 100 रुपये में आती थीं, अब वही चीजें 200 रुपये में खरीदनी पड़ रही हैं।

मध्यम वर्ग की सैलरी अगर थोड़ी बहुत बढ़ती भी है तो महंगाई और रुपया गिरने की वजह से असल में जेब में पैसा कम हुआ ही लगता है।

- बच्चों की पढ़ाई, शादी, घर खरीदना — सब लगातार महंगा होता गया है ।
- जो लोग मेहनत करके पैसे बचाते हैं, उनका बचत का आधा हिस्सा समय के साथ बेकार हो जाता है।

रुपया धीरे-धीरे कमजोर होता जा रहा है, और ये मध्यम वर्ग के लिए चुपके से बहुत बड़ा नुकसान कर रहा है — जैसे आपकी मेहनत की कमाई आधी हो जाए।

ये सिर्फ अखबार की खबर नहीं, बल्कि आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी की समस्या है।

दुनियां की सबसे बड़ी ग़रीबों की आबादी वाले देश का प्रधानमंत्री आखिर कितना बड़ा “घर” चाहता है?भारत की प्रति व्यक्ति आय दु...
23/05/2026

दुनियां की सबसे बड़ी ग़रीबों की आबादी वाले देश का प्रधानमंत्री आखिर कितना बड़ा “घर” चाहता है?

भारत की प्रति व्यक्ति आय दुनिया के विकसित देशों की तुलना में बहुत ही कम है। करोड़ों लोग किराये के घरों, झुग्गियों, अधूरी कॉलोनियों और गांवों की टूटी छतों में जीवन काट रहे हैं। लेकिन इसी देश की राजधानी के सबसे महंगे हिस्से में सत्ता का भूगोल लगातार फैलता जा रहा है।

अब ताज़ा मामला है दिल्ली के ऐतिहासिक Delhi Gymkhana Club का।

केंद्र सरकार ने आदेश दिया है कि 27.3 एकड़ में फैला यह क्लब 5 जून 2026 तक अपनी जमीन सरकार को सौंप दे, क्योंकि यह इलाका “राष्ट्रीय सुरक्षा”, “डिफेंस इंफ्रास्ट्रक्चर” और “पब्लिक सिक्योरिटी” के लिए जरूरी है।

दिलचस्प बात यह है कि यही क्लब प्रधानमंत्री आवास 7 Lok Kalyan Marg के बिल्कुल बगल में स्थित है।

सवाल उठना स्वाभाविक है: आखिर एक ऐसे प्रधानमंत्री को, जिनका कोई पारिवारिक उत्तराधिकार नहीं है, राजधानी के हृदय में कितनी जमीन चाहिए?

पिछले वर्षों में प्रधानमंत्री सुरक्षा क्षेत्र के नाम पर कई सरकारी बंगले पहले ही सुरक्षा घेरे में समाहित किए जा चुके हैं। अब जिमखाना क्लब पर कार्रवाई ने इस आशंका को और मजबूत किया है कि लुटियंस दिल्ली का बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे एक विस्तारित सत्ता-परिसर में बदला जा रहा है।

सरकार “राष्ट्रीय सुरक्षा” कहती है। आलोचक पूछते हैं — सुरक्षा कहाँ खत्म होती है और सत्ता का विस्तार कहाँ शुरू होता है?

और अब ज़रा इस जमीन की कीमत समझिए।

दिल्ली के प्रीमियम सेंट्रल ज़ोन में जमीन की कीमत लगभग ₹180 करोड़ से ₹220 करोड़ प्रति एकड़ या उससे भी अधिक बताई जा रही है।

यदि इसी आधार पर दिल्ली जिमखाना क्लब की 27.3 एकड़ जमीन का अनुमान लगाया जाए, तो इसकी कीमत लगभग:

₹4,900 करोड़ से ₹6,000 करोड़+

बैठती है।

यानी एक ऐसा भूखंड जिसकी कीमत कई छोटे राज्यों के वार्षिक शहरी विकास बजट के बराबर हो सकती है।

और यह सब उस देश में हो रहा है जहाँ:

लाखों युवाओं के पास रोजगार नहीं,

शहरों में सस्ती आवास योजना अधूरी,

किसान कर्ज़ में,

और मध्यम वर्ग EMI तथा महंगाई में पिस रहा है।

दिल्ली जिमखाना क्लब की अपनी आलोचनाएँ भी रही हैं। यह औपनिवेशिक दौर का अभिजात्य क्लब था, जिसकी सदस्यता दशकों तक सत्ता, नौकरशाही और ऊँचे वर्ग के नेटवर्क का प्रतीक बनी रही। इसकी membership waiting list पर Reddit और अन्य मंचों पर लोग 20–30 वर्षों तक प्रतीक्षा की बातें करते रहे हैं।

लेकिन प्रश्न यह नहीं है कि Gymkhana elite था या नहीं।

प्रश्न यह है: क्या लोकतंत्र में हर “elite space” का अंत अंततः राज्य के और भी बड़े elite space में होना चाहिए?

ब्रिटिश साम्राज्य ने दिल्ली के बीचोंबीच सत्ता का एक सामंती नक्शा बनाया था। विडंबना देखिए — आज उसी क्षेत्र में लोकतांत्रिक भारत की सत्ता पहले से भी अधिक विशाल, अधिक नियंत्रित और अधिक बंद होती जा रही है।

कभी कहा जाता था कि प्रधानमंत्री “प्रधान सेवक” है।

लेकिन अगर प्रधान सेवक के लिए हजारों करोड़ की जमीन, दर्जनों बंगले, विस्तारित सुरक्षा क्षेत्र और लगातार फैलता हुआ सत्ता परिसर चाहिए — तो फिर राजा और प्रधान सेवक में फर्क कहाँ बचता है?

दिल्ली जिमखाना की कहानी सिर्फ़ एक क्लब की कहानी नहीं है।

यह पिछले बारह सालों में बनाए गए नए भारत की कहानी है !

मुझे आपत्ति है मैडम!! सड़को पर नमाज से मुझे आपत्ति है।सड़क, आवागमन के लिए है, मजहबी कर्मकांड के लिए नही। पूजा पाठ, नमाज, स...
23/05/2026

मुझे आपत्ति है मैडम!!
सड़को पर नमाज से मुझे आपत्ति है।

सड़क, आवागमन के लिए है, मजहबी कर्मकांड के लिए नही। पूजा पाठ, नमाज, सरमन, सम्मेलन के लिए अपनी जगहें है। जिसे चलाना है, वह धर्म का करोबार अपनी दुकान पे चलाये। रोड पर नही।
●●
सड़क जिस काम के लिए है, वहाँ वह हो।
उसे जाम करने की हर गतिविधि अमान्य हो।
आपराधिक माना जाये।

सड़क पर नमाज आपराधिक हो। कीर्तन आपराधिक हो बारात आपराधिक हो। निर्माण सामग्री, रेत, ईंट रखना आपराधिक हो। पार्किंग बनाना, तम्बू लगाकर बाबाजी का प्रवचन कराना, भंडारा, विसर्जन

और दुर्गा-गणेश का पूजन पंडाल आपराधिक हो।
नमाज,ऑफ कोर्स आपराधिक हो।
●●
वीआईपी मूवमेंट के नाम पर एक तरफ सम्पूर्ण ट्रेफिक रोक देना आपराधिक हो। और जो लोग, सड़क घेरकर ऐसे सारे काम करते, या करवाते धरे जाएं,

उन्हें जेल के रास्ते मे कुछ देर पागलखाने रोककर, 500 मेगावॉट का शॉक भी दिया जाना अनिवार्य किया जाये।

थैंक्स फ़ॉर योर अटेंशन ऑन दिस मैटर।
🙏❤️

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