Alankaar "अलंकार" MBM Engineering College

Alankaar "अलंकार" MBM Engineering College एम बी एम इंजीनियरिंग कॉलेज के सांस्कृ?

प्रस्तुत क्लब की स्थापना इंजीनियरिंग कॉलेज में साहित्य की आवश्यकताओं को पूर्ण करने हेतु की गयी है| इसकी नियमित बैठकों में लगभग साहित्य की समस्त विधाओं जैसे शायरी , कविता ,कहानी,व्यंग्य, किस्सागोई व् मंच संचालन के विभिन्न पहलुओं पर विमर्श व् चिंतन किया जाता है|
इस क्लब की संयोजक,मार्गदर्शक व् पथ प्रदर्शक इलेक्ट्रिकल विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ जयश्री वाजपेयी मैडम हैं जिनकी छत्र छाया में कॉलेज के सांस्कृतिक क्लब आई सी सी के बैनर तले "अलंकार" विगत पांच वर्षों से पुष्पित पल्लवित हो रहा है|

...क्या आप ए रेवती को जानते हैं.....                                   ● सतीश छिम्पा(लावा सा दहकता जीवन संघर्षों के बल प...
06/07/2020

...क्या आप ए रेवती को जानते हैं.....
● सतीश छिम्पा

(लावा सा दहकता जीवन संघर्षों के बल पर जिसने बना दिया दोस्तों और फूलों की तासीर का... अद्भुत है कि एक तमिल (भारतीय) ट्रांस जेंडर लेखिका का नाम कोलंबिया यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में माया एंगलो, टोनी मॉरिसन, मारमॉन सिल्को और शांजे जैसे मशहूर लेखकों के नाम के साथ लिखा है. ए. रेवती)

( तमिल ट्रांसवुमन ए. रेवती जिसने थर्ड जेंडर वर्ग की पहली आत्मकथा लिखी और बहुत गंभीर मुद्दों और लेखन के क्षेत्र में भरतीय स्तर पर ही चर्चित नही है बल्कि संसार भर में अपनी अलग पहचान बना चुकी है। उनकी पहली किताब सन 2004 ई. में छपी थी।)

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हम सब कुछ या बहुत कुछ जानने की बहुत थोथी और झूठी बातों या सनक के अधीन या तो मूर्खतापूर्ण तरीके से अतिआत्ममुग्ध हो जाते हैं या अपने ही बनाए दायरों में सिमटकर संकुचित हो जाते हैं। हमारे पास ट्रांस जेंडर या कहें तीसरे लिंग की कोई सटीक बात या सच्चाइयों की कोई किसी भी तरह की जानकारी नही होती या अस्तित्व की या चेहरे और घटनाओं की कोई कहानी नही होती है बल्कि उनका जीवन इन कुछ झूठी बातें, आरोप और किस्सों के जरिए जीवन का ऑपरेशन करते रहने वाला समाज सड़कर गलने के लिए तैयार हो रहा है।
तीसरे लिंग के अस्तित्व के बारे में जानने की रुचि जिस समाज मे नही है, वो ही समाज झूठे लांछनों के साथ इनकी बाते जो जुड़ी ही नही है इनके साथ, फैला देते हैं यथा जादू, टोना और तिलिस्मी काली ताकतों से लेकर बच्चे चुराने, सेक्स विकृति को लेकर सेक्सयूएलिटी के गलत दिशा या वैश्यावृति या देह व्यापार से लेकर लिंग काटकर हत्या कर देने तक के तमाम झूठ है। उनके जीवन का वो काला पक्ष जो बचपन और किशोरावस्था में सबसे ज्यादा जो मुहल्ले और पारिवारिक लड़कों पुरुषों तक से बलात्कृत होते अबोध जो कुकर्म की इस दर्दनाक वहशियाना पीड़ा को उम्र भर खुद से अलग नही कर पाते हैं।
समाज की बीमारू सोच के लिए कोई सशक्त और महान उदाहरण है ए. रेवती जिसने बौद्धिक जगत में एक अलग मगर ठोस पहचान के साथ प्रकाश पाया है। उनके बहुत मुशकील भरे मगर साहसी जीवन और सृजन ने जो पहचान बना ली वो पूरे भारतीय भाषा समूह में ट्रांस जेंडर वर्ग ही नही बल्कि आम लेखक लेखिकाओं से भी नही बन पाई है। यह ना ही आम बात है और ना ही छोटी या साधारण कि तीसरे लिंग की या कहें एक ट्रांस जेंडर तमिल लेखिका का नाम कोलंबिया यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में माया एंगलो, टोनी मॉरिसन, मारमॉन सिल्को और शांजे जैसे मशहूर लेखकों के नाम के साथ लिखा गया है। कोलंबिया की केंद्रीय पुस्तकालय में लेखकों के नाम लिखे हुए हैं। अरस्तू, प्लेटो, होमर, डेमोस्थेनेस और सिसेरो जैसे महान लेखक और चिंतक वहाँ है। जिनक बीच लिखा हुआ है ए. रेवती का नाम।

उनकी चर्चित और कालजई आत्मकथा उन्होंने इंग्लिश में लिखी थी जिसका असंख्य लोगों पाठको की डिमांड और भाषाई पक्ष की पुख्तगी के लिए तमिल भाषा में भी वेल्लाई मोझी के नाम से प्रकाशित करवाया था। एक साक्षात्कार में रेवती कहती है कि "पेरुमल मुरुगन ने उनके लेखन को परिष्कृत करने में मदद की थी".... और उनके बारे में बहुत से संस्मरण उनके पास है।

हक़ीक़ते ही है कि लेखक वर्ग इनकी जीवन के सबसे अंधियारे, रोगी एयर जालिम और बहुत कठिन भाग और उसकी पीड़ाओं के पक्ष को उभारा ही नही जाता है। पुरुष प्रधान समाज मे मरदानगी शब्द सबसे ज्यादा अश्लील और हरामी और नापाक शब्द है जो कुंठाओ की पहले पहल की गांठ तैयार करके जीवन का सन्ताप में बदल जाता है।

फेसबुक के इस सोशल वर्चुएल वर्ल्ड के समय मे यह बुरी आदत या फितरत या मानसिक रोग बहुत ज्यादा बढ़ गया है। चेहरे पर अच्छाई या आदमी होने का मुखोटा पहनकर जी हुजूरी करते हुए संपादकों और रिसालों में पैठ बनाकर छपने और चर्चित होने वाले ये कृत्रिम अवमूल्यों के लोग थर्डजेंडर के बारे में यहां वहाँ जो मुद्दे आते हैं वे जमीनी नही होने के कारण लाइक्स और कमेंट्स की सिरप तक ही जीवित रहता है और बाद मे मर जाता है।

तमिल ट्रांसवुमन ए. रेवती लेखन के क्षेत्र में चर्चित ही नही विख्यात भी है। उनकी पहली किताब सन 2004 ई. में छपी थी। यह पहली ही किताब थी जो एक ट्रांस वूमेन द्वारा ही ट्रांसजेंडर वर्ग पर लिखी गई थी। जिसका नाम "उनरवम"था - इसमे कोई अतिशयोक्ति नही है अगर हम कहें कि इस किताब के प्रकाशन के बाद से ही ट्रांसजेंडर या थर्ड जेंडर समुदाय या वर्ग पर एक स्वस्थ द्वंद्वात्मक बहस को जन्म दिया- कालांतर में इससे थर्ड जेंडर विमर्श का बहुत बड़ा और ठोस मंच तैयार हुआ। आज तक इस पर गंभीरता से काम किया जा रहा है। लेकिन जिस जरूरी और बहुत ही साफ मगर वैज्ञानिक ढंग से इस विमर्श को लगातार जारी रखते हुए पुष्ट करना था- वो उत्तर भारत मे आगे बढ़ा ही नही। जो थोड़ा बहुत है वो कहानी या उपन्यास तक ही सीमित रहता है।

इस किताब के आने के बाद ही इस हाशिए के मगर उपेक्षित और शोषित समुदाय में बौद्धिक तबके के ट्रांसवूमन या कहें ट्रांस जेंडर ने अपना दृष्टिकोण उन्नत करते हुए एक नया विज़न बनाकर विकसित कर लिया जिसके चलते ट्रांसजेंडर महिला ट्रांसजेंडर वर्ग के सदस्यों के जीवन, जीवन संघर्ष, मनस्थिति और सरोकारों को उसी के नजरिए से देखना और काम करने की शुरुआत हुई थी। इससे उनकी पीड़ाओं और दुखों को नैसर्गिक और स्वाभाविक रूप से हकीकतन बयान किया जा सकता है।

एक ट्रांसवुमन जिसने अपने बूते पर एक बहुत गरिमामय मंच और उस पर हुए -बौद्धिक, साहित्यिक विमर्श को केंद्र में स्थापित कर दिया था। उन्हें भी अनेक तरह के आरोप, अपमान धौंस और जाने क्या क्या सहन करने पड़ते हैं। कितना भी बड़ा पद, सम्मान और बौद्धिक क्षमता हो या अन्य कुछ चीजें, वे उस अपमान की आग को कम नही कर पाते हैं। सब शांत और सहज दिखता तो है लेकिन उसी के भीतर जैसे सब कुछ सुलगने जलने लगता है- व्यथित अपमानित महसूस करके मन बहुत भारी होकर दुखता है। पीड़ाओ पर ध्यान दे मैंने क्या अपराध किया है ? सवाल है, बस जवाब नही होता किसी केपास भी। बलात्कार, कुकर्म, बेइज्जती, धक्का शाही और जाने क्या क्या ।

ए. रेवती की जो किताब मैंने सबसे पहले पढ़ी थी वो' थी, "हमारी कहानियां- हमारी बातें" थी जिसमें थर्ड जेंडर वर्ग की ट्रांसवुमन की जीवनियां थीं। यह बहुत ही अलग, अद्भुत और दुस्साहस भरा मेहनत का काम था। रेवती का सम्मान, आदर और आदर्श रूप छवि मेरी नजर में उनके इन्ही मौलिक काम और स्थापनाओं के कारण है जो बढ़ता ही रहा है। अक्सर सोचता हूँ कि इस तरह के अद्भुत और उच्च दृष्टिकोण के बौद्धिक ट्रांस जेंडर पंजाबी और राजस्थानी में भी होने चाहिए थे। ना हुए तो कम से कम इनकी रचनाओं को अनुदित करके विस्तार दिया जाना चाहिए।

ए. रेवती की आत्मकथा ने इस समुदाय के हर एक भाग या कहें हिस्से, विचार और जीवन और संघर्षों को विमर्श में बदल कर ठेठ अमेरिका के बुद्धिक जमात तक ले कर गई थी। जहां भरपूर चर्चाओं और सम्मान के बूते आज रेवती ना केवल तमिल या भारतीय बल्कि वैश्विक ट्रांस जेंडर वर्ग में स्थापित हुई बौद्धिक है जिनकी आत्मकथा "द ट्रुथ अबाउट मी: अ हिजड़ा लाइफ़ स्टोरी' छप कर चर्चित हुई थी।

नए बने मित्र साथी रामचन्द्र कोऊबत का बहुत बड़ा अहसान हैं कि इन्होंने अपने प्रोजेक्ट के चलते इस किताब जो विश्व साहित्य में भी चर्चा के केंद्र में रही है का अपने स्तर पर जो अनुवाद कर रहे हैं वो एक बहुत बड़ा और बेहतरीन काम है। हार्दिक शुभकामनाएं

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क्या आप श्याम पोकरा को जानते हो.... ?????     (लेख से एक अंश)                                                       ● सत...
06/07/2020

क्या आप श्याम पोकरा को जानते हो.... ?????
(लेख से एक अंश)
● सतीश छिम्पा।

( रावतभाटा जिला कोटा (राजस्थान।) के रहवासी भाई श्याम पोकरा का सन 2000 ई. में 'मज़दूर मंडी' नाम से पहला कहानी संग्रह छपा था- जिनके अब तक दस हिंदी कहानी संग्रह, एक उपन्यास हिंदी में और एक राजस्थानी में भी प्रकाशित है। दो नाटक भी प्रकाशित है। दो दशकों की लंबी लेखकीय यात्रा और अल्पज्ञात अभिशाप भी साथ।)



विगत दो दशकों से बिसरा देने और हाशिए पर धकेलने और नाम तक छोड़ने की पीड़ा और इस अन्याय से पीड़ित एक बेहतरीन कथाकार है श्याम पोकरा। श्याम पोकरा का नाम पहले पहल सन 2007 ई में सुना और पढा था- आग का दरिया थी या जाने कौनसा संग्रह था जो इन्होंने बाबा नागार्जुन साहित्य सम्मान के किए आवेदन स्वरूप (लंबी चर्चा के इस विषय पर बाद में विस्तार से लिखूंगा।) भेजा था। दो कहानी संग्रह उस समय पढ़े भी थे- मगर जाने की विडंबना रही कि ये अल्पज्ञात उपेक्षित ही रहे। प्रदेश के इक्का दुक्का लेखक बन्धुओं के अलावा कहीं नाम ही नही है। बुहत बुरी बात है जिसको आदतन सुधार जाना ही चाहिए।

श्याम पोकरा, एक ऐसा जरूरी कथाकार है जो लगभग दो- ढाई दशकों से लगातार सृजनरत है। इतना समय और अवदान के बावजूद वे अल्पज्ञात है। ना केवल पाठक वर्ग बल्कि कुछ आलोचक भी इनके बारे में नही जान पाए हैं। पिछले बीस सालों से उन्हें हाशिए पर छोड़ रखा है। श्याम एक ऐसा प्रतिबद्ध रचनाकार जो सही मायनों में लोक का लोक ही के लिए सृजनरत है। दुखद है। कई कहानी संग्रह छप चुके हैं। यहां तक कि उदयपुर अकादमी से सम्मानित भी है।

कथाकर श्याम राजनीति, अखाड़ेबाजी और छल छद्म से दूर और तटस्थ होकर ईमानदारी से सृजनरत रहने वाले इस कथाकार ने ना केवल कथा क्षेत्र बल्कि गद्य के लिए भी एक नया और स्तरीय प्लेटफार्म तैयार करके दिया है। कह सकते हैं कि श्याम इस समय का उपेक्षित प्रतिभाशाली लेखक है।

कहानी लिखते हुए श्याम ऐसे बिंबात्मक दृश्य खड़ा करते हैं जैसे, लगता है वर खुद वहां मौजूद हो।राजनीति और गुटबाजी से दूर रहने वाले पोकरा एक अलग ही जगत घड़ते हैं कहानी में कि भावनात्मक भूकंप की तरह चीजे बिखरती है और कथ्य में समेट ली जाती है।

यह विडंबना ही है कि आलोचकों, संपादकों और कला मर्मज्ञों के पक्षपाती रवैये या उनकी अज्ञानता या अल्पज्ञानता जैसी कमियों के कारण एक बेहतरीन प्रतिभा दबी ही रह गई। श्याम पोकरा जैसे अनेक महत्वपूर्ण सहेजने वाले रचनाकार उपेक्षित हैं जिनमे मेहरचंद धामू, निशांत, दुर्गेश, ओम प्रकाश भाटिया और अनेक नाम है... जैसे इन रचनाकारों को गुमनामी के अंधेरों में ही गुम हो जाना होता है। मुझे याद नहीं कि कभी राजस्थानी साहित्य अकादमी, उदयपुर ने अपनी राजस्थान के लेखकों पर निकलने वाली मोनोग्राफ़ सीरीज़ में भी उन्हें स्थान दिया हो, शायद नहीं ही दिया है।

एक चीज जो इस लेखक को सबसे अलग और बेहतर बनाती है... वो है उनका गलेरी होंना या कहुूं बातों के उस्ताद जो हथाई में रची एक अद्भुत भाषा विकसित कर लेते है।

इस मौजूदा कला और मानव विरोधी फासिस्ट समय मे जब कलाओं का हर एक पक्ष प्रदूषित किया जा चुका है। ऐसे में प्रतिरोध की उम्मीद हम जनवादी या उसी के तरह के प्रगतिशीलों से नही कर सकते हैं। इसके लिए प्रतिबद्ध रचनाकार जो लोक की धुरी हो ही विरोध दर्ज करवा सकता है। कहानी के परंपरागत ढांचे को बहुत से लोग ढोते ढोते खुद परम्परा का अश्लील हिस्सा बन जाते हैं। यहां प्रतिबद्धता का मतलब जीवन का सम्मान करते हुए मुक्ति की मुक्त कामनाएं रखने वाले सर्जक से है। जब हम राजस्थान या भारतीय भाषाओं के स्तर पर समकालीन कहानी पर विचार करते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि ऐसे बहुत से नाम जो मुख्य धारा के रचनाकार माने जाते हैं और जयपुर की या अन्य गुटों की दया दृष्टि से बड़े बड़े प्रकाशन से छपते, बड़े मंचो पर अधमरे शब्दों की जुगाली करते ये लोग समकालीन साहित्य को प्रदूषित कर चुके हैं। इस समय कहानियों और कहानीकारों का जो स्टफ आया है उनका वर्ग और उन पर वारी वारी जाने वाला जयपुर के बौद्धिक तबके के वर्ग की पृष्ठभूमि देखना जानना इसलिए जरूरी हो जाता है क्योंकि जनवाद (डेमोक्रेसी, प्रजातन्त्र) यहां बुर्जुआओ के पैरों में गिरा नज़र आता है। आज जब जादुई यथार्थवाद और अस्तित्ववादी घनघोर तिलस्मी शैलियां निरन्तर विकसित और स्थापित (परम्परागत रूप में नही बल्कि अस्तित्वजीवी अवमूल्यों के साथ जो पहले से ही तठस्थ और अवसरवाद की कालिख में कलुषित होकर अनेक चीजे फिक्सिंग के मार्फ़त पाया है और नकली असली कई कथाकार लेखक लेखिकाएं पैदा भी की है।

श्याम पोकरा की कहानी 'आम का पेड़' जिन लोकतांत्रिक रेशों से बनी है- उसमें उसका जीवन दृष्टिकोण उन तमाम आयातित और जबरन स्थापित किए गए मूल्यों की परख करने के बाद निर्मम नकार इस दौर की कहानियों को जो वैचारिक आधार भूमि और शैल्पिक मापक देता है, वो बेहतरीन है इसमें कोई दो राय नही हैं मगर कुविचारों के कपटी यूटोपियाई क्षद्म आधार जो यदा कदा अपने उसी रूप में आ जाते हैं जो घनघोर अराजकता का कारण है- यहां विचलन का खतरा बना रहता है। वे लोक का चित्रण करते अचानक कहीं अलग ही जगहों पर चले जाते हैं - कि हम सहज अनुमान नही लगा पाते और कयासों पर निर्भर होकर उन सबको देखने का प्रयास करते हैं और संवेदना का जख्म छू लेने का असफल प्रयास करते हैं, यह कहानीकार की सफलता है। आप उसको किसी मापक से नही माप सकते हैं- जो नयापन दिखता है वो व्यवस्था के मार्फ़त एक बीमार पीढ़ी राजसत्ता की टाऊट बनकर आई है - और आकर स्थापित होकर इस लोकधर्मी साहित्य को मानवद्रोही करकट में बदल दिया...,


चेखव जिस तरह अपने असाधारण विचार बिंबों और असाधारण ही कथ्यगत तत्व और विचार को आम से रूप में लिखने के कारण वे आज युग हैं। जबकि उस शैली को अब अधिक उबाऊ, नीरस और फिजूल समझा जाता है मगर यह दिलचस्प और महत्वपूर्ण बनती है । हमे रचनाओ का मूल्यांकन द्वंद्वात्मक शैली से करने ही होगा, मानव इतिहास को समझने के लिए बहुत सारे तथ्यात्मक क्योंकि ऐसे अनेक नाम है जो इस अदबी लंपटता के धक्के चढ़कर शहीद हो चूतिए हैं। वे सृजनात्मकता का जो तत्व बौद्धिकता के के है वह लेखक-कलाकार की जिन्दगी, उसके जाने-अनजाने परिवेशों, प्रसंगों अनुभवों एवं विचारों के कई ऐसे पक्षों से निर्धारित और नियंत्रित होता है जिसके अन्वेषण में एक नया निदानात्मक दृष्टिकोण उभरकर आठ है। यह रचनाकार नही बल्कि विचार की उदात्तता को पकड़ना पड़ता है।

श्याम पोकरा की कहानियां आपको बार बार आभास देती है जैसे वे इस संसार के समांतर एक और संसार है जो निरतंर चलायमान है।.... वहाँ कहानी के सर्जनात्मकता पक्ष के बीच कथ्य का वैविध्य उभकर आता है। ये एक ऐसी प्रक्रिया है जो आम कथ्यगत ढांचे को भी विशिष्ट बनाकर स्थापित करती है,.. जैसे चेखव जिस तरह अपने असाधारण विचार बिंबों और असाधारण ही कथ्यगत तत्व और विचार को आम से रूप में लिखने के कारण वे आज युग हैं। जबकि उस शैली को अब अधिक उबाऊ, नीरस और फिजूल समझा जाता है मगर यह दिलचस्प और महत्वपूर्ण बनती है । हमे रचनाओ का मूल्यांकन द्वंद्वात्मक शैली से करना ही होगा, पदार्थ की चेतनावस्था से लेकर संवाद धर्मिता के मूल्यों तक को सम्हालना होगा और इसे समझने के लिए बहुत जरूरी तौर पर वैज्ञानिक दीठ के तर्क स्तर को गंभीरता से लेना होगा ताकि अल्पज्ञात का यह ठप्पा फिर किसी के नाम के साथ ना जुड़ पाए।

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‘असही सही न जाय’- प्रतिरोध की एक लोक – कथाएक राहगीर अपनी राह पर जा रहा था | मारग में उसे एक खेत दिखाई दिया | हरियल लहलहा...
19/06/2020

‘असही सही न जाय’- प्रतिरोध की एक लोक – कथा

एक राहगीर अपनी राह पर जा रहा था | मारग में उसे एक खेत दिखाई दिया | हरियल लहलहाता खेत | खेत में अंगूर रस भरे मन मोहक बेलों पर लटक रहे थे | राहगीर को एक जगह कुछ हलचल दिखीं | उसने देखा कि एक गदहा अंगूर खा रहा है | यह बात उसे असहनीय लगी | उसने पत्थर गदहे पर फेंका | गदहा रेंकते हुए भागा,राह चलते राहगीर के पास से निकला और उसके घुटनों पर दुल्लती जड़ कर भाग गया |
एक चीख के साथ राहगीर घुटने पकड़ कर बैठ गया | पास से दूसरा राहगीर निकल रहा था | वह यह सब देख रहा था | उसने पास आकर अपने सिखाऊ अंदाज में कहा-
‘भले आदमी ! न यह तेरा खेत था और न ही तेरा गदहा था,पत्थर फेंकने का क्या फायदा हुआ ? तूंने व्यर्थ ही बीच में घुटने तुड़वा लिए |’
राहगीर को घुटनों में दर्द हो रहा था, पर उसने साथी राहगीर को संयत होकर कहा – ‘तुम ठीक कह रहे हो भाई! बात फायदे-नुकसान की नहीं है | न यह मेरा खेत है और न ही यह मेरा गदहा | पर मैं गदहे को दाखें (अंगूर) खाते हुए नहीं देख सकता, इसलिए घुटने तुड़वा लिए |’
कवि ‘सम्मन’ ने इस पर कहा है –
‘सम्मन पराये खेत में, देख दाख खर खात |
हानि-लाभ कछु भी नहिं, असहि सही न जात ||’ साथियो! आज के समय की ‘असही’ को पहचानो |

खेजड़ल्यां प्यासी खड़ी,प्यासी सरवर पाळ |थार उडीकै सांवरा!  गाजे नीं गोपाळ ||-आई जी
18/06/2020

खेजड़ल्यां प्यासी खड़ी,प्यासी सरवर पाळ |
थार उडीकै सांवरा! गाजे नीं गोपाळ ||
-आई जी

18 अप्रैल 2015 की पोस्ट राजस्थानी-भाषा की मान्यता का सवाल –                         जब भी किसी भाषा के सम्बन्ध में बात च...
01/06/2020

18 अप्रैल 2015 की पोस्ट
राजस्थानी-भाषा की मान्यता का सवाल –

जब भी किसी भाषा के सम्बन्ध में बात चलती है तो मुझे अनायास रबीन्द्रनाथ याद आते हैं | उन्होंने अपने बचपन के एक संस्मरण द्वारा मातृभाषा का महत्व समझाया है | विश्व के सारे चिंतक मातृभाषा में शिक्षा के महत्व को स्वीकारते हैं | भारत की सुप्रसिद्ध-चिंतक रमणिका गुप्ता ने ‘वड़ोदरा गुजरात’ में हुए ‘भाषा रिसर्च एण्ड पब्लिकेशन सेंटर’के एक सम्मेलन का हवाला देते हुए कहा है कि ‘हमारे देश में 1961 के गणना अभिलेख के आधर पर 1652 मातृभाषाएँ हैं और दुनियाभर में बोली जाने वाली लगभग आठ हजार भाषाओं में से लगभग नब्बे फीसद भाषाएँ 2050 तक विलुप्त होने के कगार पर होंगी |’ आगे रमणिका जी कहतीं हैं कि ‘ इन भाषाओं के लुप्त होने का एक और बड़ा कारण है, आदिवासी क्षेत्रों में कुकुरमुत्तों की तरह अंग्रेजी माध्यम की स्कूलों का खुल जाना | इससे भी आदिवासी भाषाओं को क्षति पहुँच रही है |’ मैंने यहाँ जानबूझ कर मातृभाषाओं का मुद्दा उठाया है ताकि जीवन में मातृभाषा का महत्व जाना जा सके | मैं या कोई भी समाजचेता राजस्थान की मातृभाषा हिंदी नहीं मानेगा | राजस्थानी भाषा के संबंध में जो पहली ऐतिहासिक भूल यह हुई कि पुरुषोत्तमदास टंडन, नेहरूजी आदि राजनेताओं के कहने में आकर राजस्थान के तत्कालीन राजनेताओं ने मातृभाषा की बलि चढ़ा दी | दक्षिण भारतीय लोगों के हिंदी विरोध की बातें बनाकर, हिन्दी का तात्कालिकरूप से समर्थन करने और बाद में राजस्थानी को मान्यता की बात कहकर राजस्थान-वासियों को जिस अंधगली में धकेल दिया गया, उसकी सजा हम आज भी भुगत रहे हैं |
मातृभाषाओं के मुद्दे पर मैं यहाँ प्रमुख भाषाविद श्री सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या का वक्तव्य उल्लेखित करना मुनासिब समझता हूँ , जिससे प्रांतीय भाषाओं और बोलियों का महत्व स्थापित होता है –‘प्रांतीय भाषाओं के पुनरुद्धार से हिन्दी का आंतरप्रदेशिक महत्व किसी तरह कम नहीं हो सकता | पच्छाहीं के लोगों ने बेशक हिंदी का थोड़ा बहुत फैलाव किया है और टूटी फूटी व्याकरण-भ्रष्ट हिंदी को अपनाकर पच्छाहींके आसपास के लोगों ने हिन्दी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाया है, लेकिन राष्ट्रभाषा या आंतरप्रदेशिक भाषा में और घरेलू बच्चों की शिक्षा की बोली या प्रांतीय कामकाज की बोली में बहुत पार्थक्य है | मातृभाषा के सिवाय किसी दूसरी भाषा में मनुष्य के हृदय के भावों का पूरा-पूरा प्रकाश नहीं हो सकता और जब तक मनुष्य साहित्य में अपना पूरा प्रकाश नहीं कर सकता, तबतक वह जो साहित्य बनाने की कोशिश करता है, उसमें बहुत सी व्यर्थता आ जाती है | श्री तुलसीदासजी और विद्यापति ने जो कुछ लिखा –अपनी मातृभाषा में ही लिखा, इसीलिए भारतीय-साहित्य के उद्यान में विद्यापति के पद और तुलसीदास का ‘रामचरितमानस’ हर तरह से सफल रचना होकर अधिक से अधिक लोकप्रिय हो सकी और जन-जन की जिव्हा पर आसानी से स्थान पा सकी |
भारत में इस वक्त 15 मुख्य भाषाएँ चालू है | प्रांतीय बोलियों की तो गिनती ही नहीं की जा सकती | इन मुख्य या साहित्यिक भाषाओं में 11 भाषाएँ उत्तर भारत की गिनी जाती है और 4 दक्षिण भारत की |
इनके अतिरिक्त ऐसी कुछ भाषाएँ भी है जो आज साहित्यिक महत्त्व की अधिकारिणी तो नहीं है, परन्तु प्राचीन समय में उनका साहित्य उच्च कोटि का था और उनकी संतानों के हृदय की सभी बातें उन्हीं भाषाओं में प्रकट होती थी |
राजस्थानी और मैथिली –और बोलियों के साथ इन दो भाषाओँ के निकेन्द्रीकरण की बात आज हिंदी संसार में लाई गई है | ‘हिन्दी प्रान्त’ में जो बोलियां सिर्फ घर में और सीमित प्रांत में काम में लाई जाती है, उन बोलियों के दो जबरदस्त और नामी वकील हिन्दी साहित्य क्षेत्र में पधारे हैं | उनमें से एक हैं श्री बनारसीदास चतुर्वेदी और दूसरे हैं श्री राहुलजी सांकृत्यायन |
भाषा तात्त्विकी दृष्टि से मेरी राय यह है कि जहां सचमुच व्याकरण का पार्थक्य दिखाई दे---जहां प्राचीन साहित्य रहने के कारण प्रांतीय बोली के लिए उसके बोलने वालों में अभिमान बोध हो और जहां प्रांतीय बोली बोलने वाले बच्चों और वय:प्राप्त लोगों को हिंदी अपनाने में दिक्कत हो, वहाँ ऐसी प्रान्तीय बोली की शिक्षा और प्रांतीय कामकाज में ला देने का सवाल आ सकता है |
जहां तक हम देखते हैं व्याकरण की दृष्टि से राजस्थानी—खड़ीबोली हिंदी से पार्थक्य रखती है | राजस्थानी जनता में अपने प्राचीन साहित्य के लिए एक नई चेतना भी दिखाई दे रही है |....... राजस्थानी के प्राचीन साहित्य के बारे में कुछ बोलने की जरूरत नहीं | अगर तथाकथित ‘हिंदी’ साहित्य से राजस्थानी में लिखा हुआ साहित्य निकाल दिया जाय,तो प्राचीन हिंदी साहित्य का गौरव कितना ही घट जाएगा | चंदबरदाई के पहले के समय में और उसके बाद के समय में राजस्थानमें जितने कवि हो गये हैं, उन पर ज्यों-ज्यों प्रकाश डाला जाता है, त्यों-त्यों हमारा विस्मय और आनन्द बढ़ता जाता है | केवल राजस्थानी बोलने वालों ही को इसका गौरव नहीं है, लेकिन समस्त भारत को इसका गौरव है |
इस गौरव के वश यदि राजस्थानी लोग अपनी मातृभाषा का पुनरुद्धार और पुनःप्रतिष्ठा करना चाहते हैं, तो इसमें नाराज होने और बुरा मानने का कुछ नहीं है | भारत की प्रमुख 15 भाषाओँ में यदि राजस्थानी जैसी दो-चार भाषाएँ प्रतिष्ठित हो जाएं, तो इसमें आशंका और भय की कोई बात नहीं है | राजस्थानी लोग अपनी मूर्च्छित सी आत्मा को फिर सजग और सचेत करना चाहते हैं, इसमें समस्त भारत को लाभ पहुंचेगा, और राष्ट्रीय एकता की कोई भी हानि नहीं होगी | (श्री सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या---भारतीय भाषातत्त्व के आचार्य –कलकत्ता विश्वविद्यालय 11-2- 1944 )
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि श्री सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या का यह वक्तव्य आजादी से पहले का है | इस वक्तव्य से पहले फ्रेंच विद्वान ‘गार्सा द तासी’ अपने ग्रन्थ ‘इस्तार द ल लितरेत्यूर ए ऐं ऐंदूस्तानी’ और सर जार्ज ग्रियर्सन ‘लिंग्विस्टिक सर्वे आफ इंडिया’ में राजस्थानी का प्रमाणिक भाषा वैज्ञानिक विशलेषण कर चुके थे | राजस्थानी भाषा की जिन बोलियों का वितंडा बनाकर राजस्थानी को एक भाषा के रूप में खारिज किया जा रहा है वे बोलियाँ ही तो भाषाओं के प्राण होतीं है | सर जार्ज ग्रियर्सन के ‘लिंग्विस्टिक सर्वे आफ इंडिया’ में तो आज के मध्यप्रदेश की मालवी और हरियाणा की बांगरू तक राजस्थानी भाषा की बोलियाँ है | बोलियों से भाषाएँ समृद्ध होती है, यदि तेलुगु 36, कन्नड़ 32, मलयालम 14, कोंकणी 17, तमिल 22, नेपाली 06, गुजराती 27, पंजाबी 29, बंगाली 15, उड़िया 24, अंग्रेजी 57, और हिन्दी 43 बोलियों के होते हुए एक भाषा है तो 73 बोलियोंवाली राजस्थानी इन सबसे समृद्ध भाषा है |
भाषावैग्यानिकों में एक सुप्रसिद्ध नाम है –प्रोफेसर ज्यूल ब्लॉख | उनका ग्रन्थ ‘ल आँ दो एरिया’ में वे श्री सिलवेंलेवी ए. मेइए और श्री टर्नर जैसे भाषा-शास्त्रियों का आभार मानते कहते हैं की ‘ भाषा की प्रामाणिकता के लिए बोलने वालों की संख्या कोई महत्वपूर्ण इकाई नहीं है, यद्यपि यह रोचक तत्व हो सकता है |’ वे आगे लिखते हैं—‘आधुनिक भाषाओं की रोचकता उनके संख्या सूचक महत्व से कहीं अधिक है | उसके सामने उन भाषाओंके जानने की यहाँ आवश्यकता नहीं है ,जिनका प्राय:वर्णन किया जाता है,यद्यपि उनमें से कुछ की गणना संसार की बड़ी बड़ी भाषाओंमें की जाती है ,व्यापक अर्थ में हिंदी का उसमें छठा स्थान है, फ़्रांसिसी के मुकाबले बंगाली सातवें स्थान पर आती है , बिहारी तेरहवें, मराठी उन्नीसवें पर, पंजाबी, राजस्थानी, उड़िया क्रमशः, बाइसवें, पच्चीसवें और अठाईसवें स्थान पर | (पृष्ठ-19-20 ) समझदार पाठक विचार करें भाषा-वैज्ञानिक राजस्थानी को संसार की बड़ी बड़ी भाषाओँ में गिना रहे हैं और लाल बुझक्कड़ राजस्थानी विरोधी आँख मूंदे प्रलाप कर रहे हैं ---‘ राजस्थानी – कैसी ?’ ‘इसमें तो बोलियाँ हैं ?’ तुलसीदास जी ने ऐसे लोगों के लिए ही लिखा है –‘मूंदहुं आँख कतहु कछु नाहिं |’
कौन सी बोली किस भाषा की है, अथवा एक भाषा की बोली किसी दूसरी भाषा से कैसे नजदीकी ग्रहण करती है, यह भी भाषा-वैज्ञानिक तथ्य है | भाषाओँ की सीमाओं और उनके अंत:संबंधों को लक्षित कर सर जार्ज ग्रियर्सन बहुत पहले कहते हैं—‘ भाषाओँ की सीमाएं कृत्रिम मिश्रण द्वारा छिप जाती है,परिवर्तन अधिकांशत: धीरे- धीरे होते हैं, जिसका तात्पर्य है, दो परस्पर भिन्न भाषाएँ अतिसूक्ष्म अंतरोंवाली भाषाओँ की श्रेणी में आ जाती है, तो इससे किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए विचारणीय है, क्या भोजपुरी अपने पूर्व या पश्चिम की सीमाओं से संबंधित है ? कच्छ की भाषा क्या सिन्धी है या गुजराती ? (प्रोफेसर ज्यूल ब्लॉख—भारतीय आर्य भाषा)
सर जार्ज ग्रियर्सन का यह उद्धरण मैंने इसलिए दिया है ताकि अजानकर लोग बोलियों के वितंडे को समझ सके | जो लोग राजस्थानी को केवल मारवाड़ी समझ रहे हैं, शायद वे ग्रियर्सन की बात से बोलियों का मर्म समझ जाएं | ग्रियर्सन कच्छी बोली पर सिन्धी के प्रभाव को परिलक्षित कर रहे हैं, जो कि आज गुजराती का महत्त्वपूर्ण अंग है | आज मेवाती पर भले ही ब्रज का असर हो, अथवा वागडी पर गुजराती का प्रभाव मिले पर सर जार्ज ग्रियर्सन के मतानुसार वे अपनी मूलभाषा राजस्थानी की ही बोलियाँ मानी जाएँगी |
श्री सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या ने जिस राजस्थानी और मैथिली को एक ही स्तर पर रखा था, वह मैथिली राजनीतिक प्रभाव से संविधान की आठवीं अनुसूची में पूर्ण भाषा का दर्जा पा चुकी है, कोंकणी भी मराठी से अलग होकर आठवीं अनुसूची में पूर्ण भाषा बन चुकी है, किन्तु बाहरी तत्वों के हस्तक्षेप और राजस्थानी राजनेताओं की निष्ठाहीनता के चलते राजस्थानी समाज मान्यता के लिए संघर्षरत है |
प्रत्येक भाषा की एक केन्द्रीय उप-भाषा अथवा बोली होती है जो संपर्क भाषा का रूप ग्रहण करती है| इस संपर्क भाषा के विकसित होने के अनेक कारण होते हैं | खड़ी बोली को भी जिस तरह अन्य बोलियों ने स्वीकारा है, निश्चित रूप से राजस्थानी में भी एक सम्पर्क भाषा विकसित होने की प्रक्रिया में है | राजस्थान में विश्वविद्यालयों में यह पढाई जा रही है, आकाशवाणी और स्वतंत्र न्यूज चैनलों पर समाचार जिस राजस्थानी में पढ़े जा रहे हैं, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में जिस भाषा में लेखन हो रहा है, वही तो उसका सम्पर्क रूप है | हिंदी के अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त मनीषि प्रोफेसर नामवरसिंह ने अनेक मंचों से यह कहा है कि राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर उसे पूर्ण भाषा की मान्यता मिलनी चाहिए | उन्होंने बाड़मेर में एक साक्षात्कार में यह भी खा था, कि यह राजस्थान के लोग तय करेंगे कि उनकी सम्पर्क भाषा कौन सी बोली होगी ? आजकल जो लोग मारवाड़ी को जो राजस्थानी कह रहे हैं वे प्रकारांतर से सम्पर्क-बोली की तरफ संकेत कर रहे हैं
ओमपुरोहित ‘कागद’ के शब्दों में कहूं तो –‘अपने बच्चों की जुबान काटकर , राष्ट्र के चरणों में रखी राजस्थानियों ने |’ बोलियों और विभिन्नताओं की बात कहने वाले वे तत्व हैं , जो न तो भाषाविद हैं और न ही समाज-चिंतक | ये लोग समय समय पर अखबारों और मिडिया के चंद लोगों के माध्यम से राजस्थानी विरोध के स्वर रंगा-सियारों की तर्ज पर उछालते हैं, पर पब्लिक अभी भी इन्हें पह्चान नहीं पाई है | राजनेता उनकी चिल्लाहट और गीदड़ भभकियों में आ जाते हैं और बेतुके बयानों से राजस्थानी समाज को बरगलाते हैं | कुछ वर्षों पहले एक अखबार ने एक विमर्श चलाया, जिसमें राजस्थानी-विरोधियों को प्रमुखता दी गई | हाँ राजस्थानी समर्थकों के मतों को भी छापा गया | राजस्थानी-विरोधियों के मतों में ‘इस तरह तो हिंदी परिवार बिखर जाएगा’,अथवा ‘शांत प्रदेश कहीं जलने न लग जाय’ जैसे भावुक वक्तव्य दिए गए थे | और विमर्श बिना निष्कर्ष के समाप्त कर दिया गया | यहाँ यह उल्लेखनीय है कि यह वह समय था जब राजस्थानी की मान्यता की बात केंद्र में शीर्ष पर थी | इस प्रकार विरोध के इस हौए से मान्यता की बात टल गई |
राजस्थान राज्य अभिलेखागार के रिकार्ड से इन तथ्यों की पुष्टि होती है कि रजवाड़ों के समय राजकाज , शिक्षा, हुंडी, पट्टे-परवाने और अन्य कार्य राजस्थानी भाषा में ही होते थे | रजवाड़ों का यह स्थान भाषा के ही कारण राजस्थान कहलाया | सिन्धी, नेपाली आदि भाषाओँ को मान्यता में राज्यों का पचड़ा नहीं था, लेकिन राजस्थानी के लिए राज्य विधानसभा से मान्यता का प्रस्ताव पास करना जरूरी हो गया | राजनेता इसे टरकाते रहे | जब डॉ॰ सोनाराम बिश्नोई राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर के अध्यक्ष थे, तब 2002 के अकादमी के वार्षिकोत्सव में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने, गाँधीवादी मूल्यों में आस्था रखने के कारण श्री नेमीचंद जी जैन ‘भावुक’ और डॉ॰ सोनाराम बिश्नोई से कहा कि ‘आप राजस्थानी भाषा की मान्यता की बात करते हो, पर क्या अकादमी ने राजस्थानी भाषा में गांधीजी की आत्मकथा का अनुवाद करवाया है ? आगे बोलते हुए उन्होंने कहा कि लगभग संसार की सारी भाषाओं में गांधीजी की आत्मकथा का अनुवाद हो चुका है | यदि अकादमी इस काम को कर दे तो मैं राजस्थानी भाषा की मान्यता का संकल्प राजस्थान विधानसभा से पारित करवा दूंगा |’ श्री नेमीचंद जी जैन ‘भावुक’ और डॉ॰ सोनाराम बिश्नोई ने इस बात को गम्भीरता से लिया और भावुक साहब ने गांधीजी की आत्मकथा की प्रति डॉ॰ सोनाराम बिश्नोई को तत्काल उपलब्ध करवा दी | यह महज एक सयोग था कि डॉ॰ सोनाराम बिश्नोई और मेरे मित्र दलपत परिहार के अनुरोध पर वह काम मैंने एक निश्चित समय सीमा में किया और उसका लोकार्पण जोधपुर के गाँधी – भवन में गाँधी-जयन्ती पर 2002 में खुद मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने किया | अपने मुख्यमंत्री रहने के उस काल में राजस्थान विधानसभा के अंतिम-सत्र के अंतिम दिन मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने शिक्षा-मंत्री श्री बुलाकीदास कल्ला से राजस्थानी भाषा की मान्यता का संकल्प रखवाकर राजस्थान विधानसभा से ध्वनि-मत से पारित करवाया | ( यह भी एक संयोग था कि मुझे इस अनुवाद पर साहित्य अकादेमी नई दिल्ली का 2006 में अनुवाद पुरस्कार मिला |) मान्यता की गेंद अब दिल्ली के पाले में है | तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत और शिक्षा-मंत्री श्री बुलाकीदास कल्ला ने तो अपनी मातृभाषा का ऋण चुका दिया | अब मान्यता की बात विकास-पुरुषों के पाले में है | एक राष्ट्र , एक भाषा, एक धर्म की बात कहने वालों को मातृभाषाओं की महकती विविध रूपा फुलवारी कितनी भायेगी ,यह तो भविष्य ही बताएगा |
राजस्थानी की मान्यता का प्रश्न आधी सदी से साहित्यकार उठा रहे हैं, पर अब उससे युवा वर्ग और जनता जुड़ने लगी थी, कि अचानक बाजारू दलाल लोग बीच में आ टपके हैं जो सर्वाधिक चिंता का विषय है | समर्पित लोग जिन्होंने राजस्थानी की मान्यता की आवाज बुलन्द की थी, वे आज अपने को उपेक्षित अनुभव कर रहे हैं | युवा बाजारू दलालों की चाल-बाजियों को समझ नहीं पा रहे हैं | मूल्य-विहीनता के इस दौर में मान्यता का प्रश्न ‘नक्कारखाने में तूती’ बन कर रह गया है | राजनीतिक इच्छा-शक्ति का अभाव और आंचलिक मुद्दों में उलझे राजनेताओं से सार्थकता और मूल्यवान पहल की उम्मीद करना अपने आप को धोखा देना है | राजस्थानी संस्थानों से जुड़े बिकाऊ लोगों का चरित्र नितांत व्यक्तिवादी और स्वार्थी सिद्ध हो चुका है | शिक्षाविद ‘कागला’ से ‘क्रो’ को महत्वपूर्ण सिद्ध करने में लगे हैं, उनकी दृष्टि में चकाचौंध बाजार है, वैश्विक-सपने हैं, बाजारू टुकड़ों पर पलने वाली राजनीति भूमि-पुत्र का दर्द नहीं जानती, वह मातृभाषा की पीड़ा क्या पहचान पायेगी ?
डॉ आई जी री वॉल सूं

01/06/2020

1जून2019 की एक स्मृति का पद

साधो, अजब तमाशा दुनिया।
कल तक जो चलते इतराते,
आज बने हैं मुनिया।
शाह सिकन्दर समझ गया था,
खाली हाथ कहानी।
पहला आखर यही सिखाती,
है टाबर को नानी।
लोकतंत्र में माथै गिनते,
बुद्धिजीवी या शठ हों।
समता का संदेश यहां है,
महल, झोपड़ी , मठ हों।
नेहरू, इंदिरा चले गयेजी,
मनमोहन का मुजरा।
घर में बैठे राजनाथ पर
अजब वक़्त है गुजरा।
नहीं किसी को यह छोड़े है,
दिल्ली लुटियन जाई।
गरजे उनकी लीद बिखर गई,
इतिहासों में भाई।
आखर ब्रह्म, शब्द के साधक,
जन के साथ रहो रे,
सन्तन नहीं सीकरी को पथ,
तार कबीरी गहो रे।
झीनी झीनी जग चादर में,
अपनी आंख अडावो,
सत का पथ है सदा अकेला,
मन को मत भरमावो।
बुद्धिजीवी वह नहीं ,
आंख जिसकी पीठों पर, पद में।
वह तो सदा साधता आखर,
रहे कबीरी मद में।
साधो , दुनिया है खुणखुणिया।

डॉ आई जी

07/05/2020

टूटा पहिया / धर्मवीर भारती


मैं

रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ

लेकिन मुझे फेंको मत !

क्या जाने कब

इस दुरूह चक्रव्यूह में

अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ

कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय !

अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी

बड़े-बड़े महारथी

अकेली निहत्थी आवाज़ को

अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें

तब मैं

रथ का टूटा हुआ पहिया

उसके हाथों में

ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ !

मैं रथ का टूटा पहिया हूँ

लेकिन मुझे फेंको मत

इतिहासों की सामूहिक गति

सहसा झूठी पड़ जाने पर

क्या जाने

सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले !
(डॉ धर्मवीर भारती)

03/05/2020

नमस्कार , लॉक डाउन के इस दौर में हम सब कुछ न कुछ नया करने की कोशिश कर रहे है । इसी कड़ी में अलंकार भी कुछ नया करने का प्रयास करना चाहता है ।
क्या अलंकार के इस पेज पर आप देश के महान कवियों कवियित्रियों को सुनना चाहते है ?
आप अपनी प्रतिक्रिया कमेंट में लिखे । आपकी प्रतिक्रिया के अनुसार आगे बढ़ा जाएगा ।

03/05/2020

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
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वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है।

-अदम गोंडवी

02/05/2020

‘न होने का दर्द’ -- महत्वाकांक्षी मन की विफलताओं की रचनात्मक-चदरिया

हिन्दी के इस उपन्यास का पहला शिरा श्याम जांगिड़ के सुप्रसिद्ध उपन्यास ‘प्रेम गली अति साँकरी’ में दबा हुआ है, लेकिन उसे न पढ़ा हुआ पाठक भी इस कथा का अलग से रस ले सकता है | ‘न होने का दर्द’ नामक इस उपन्यास की कथा एक स्त्री के जीवन संघर्ष, उसके महत्वाकांक्षी मन के आसपास लेखक ने बुनी है | स्वयं उपन्यासकार इसे इस तरह अभिव्यक्त करता है – ‘इस उपन्यास में नीलमणि, उसके पति जितेन्द्र बाबू, पुत्र डा. नीलाभ , पुत्रवधू शालिनी मुख्य पात्र हैं | एक डी. के. खत्री है, जिसके कारण नीलमणि के जीवन में तूफान आता है | गाहे-ब-गाहे स्वामी प्रज्ञानंद भी उपस्थित होते हैं | परन्तु मुख्य रूप से कथा में नीलमणि का संसार है और उस संसार में है उसके जीवन में होने वाली हलचल | एक ईमानदार, समर्पित और कर्तव्यनिष्ठ महिला को किन-किन अग्नि-परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है , इस उपन्यास की कथा इसी विषय पर केन्द्रित है |’
‘अवधूत स्वामी परमानंदगिरि सेवा संस्थान’ की डायरेक्टर और सर्वेसर्वा मैडम नीलमणि जब डी. के. खत्री से मिलती है तो उसके महत्वाकांक्षी मन में तूफ़ान उठ खड़ा होता है | अल्ट्रामॉडर्न से दिखने वाले डी. के. खत्री ने नीलमणि को चारों ओर से घेरकर संस्थान पर कब्जा जमा लिया | पहले उसने नीलमणि के रूप-सौन्दर्य की प्रशंसा कर उसे बालों में डाई करने के लिए उकसाया और नीलमणि का नारी मन इस आकर्षण का शिकार हो गया | उसके पति जितेन्द्र बाबू , स्वामी प्रज्ञानन्द गिरि को यह सब अच्छा नहीं लगा था | पर नीलमणि अपने पथ पर आगे बढती गई | डी. के. खत्री ने नीलमणि को अपने जयपुर स्थित संस्थान में एक वार्षिक कार्यक्रम में मुख्यअतिथि बनाया और फिर उसके सामने पद्मविभूषण सम्मान का चुग्गा फेंका | नीलमणि डी. के. खत्री के जाल में फंस गई | अपने बालों में डाई करने से लेकर संस्थान में लडकियों के लिए इंजीनियरिंग कालेज खोलने के डी. के. के प्रस्ताव पर वह सहमत होती चली गई | डी. के. संस्थान में अपने पाँव पसारता चला गया | नीलमणि ने न अपने पति जितेन्द्र बाबू की चेतावनी की परवाह की और न घीसाराम मुनीम की | घीसाराम मुनीम भी कालांतर में डी. के. के लोभ जाल में फंस गया | स्वामी प्रज्ञानन्द गिरि अपने प्रभामंडल में रम गये थे, वे हैदराबाद आदि शहरों और देश-विदेश में घूम रहे थे, सो इस और ज्यादा ध्यान नहीं दे पा रहे थे और जब उनका ध्यान गया, तबतक डी. के. संस्थान पर कब्जा कर चुका था |
उपन्यास की शेष कथा में विधायक रूपसिंह आर्य, सी. आई. सुभाष जाखड़ और ठौरी गाँव के स्त्री-पुरुष आते हैं | लाल बत्ती वाली टाटा सफारी में घूमने वाला कॉमरेड विधायक स्वामी प्रज्ञानन्द गिरि का युवावस्था का मित्र था | इस शेष कथा में राजनीतिक छलछद्म, नौकरशाही के हथकंडे, आमजन की निरीहता, उसका दुरुपयोग-सदुपयोग आदि कहानी से पाठक परिचित होता है | कॉमरेड विधायक और स्वामी प्रज्ञानन्द गिरि आमजन की सहायता से डी. के को ‘अवधूत स्वामी परमानंदगिरि सेवा संस्थान’ से भगा देते हैं | स्वामी प्रज्ञानन्द गिरि सुशीला पाराशर को इस संस्थान की डायरेक्टर बना देते हैं |
नीलमणि और स्वामी प्रज्ञानन्द गिरि की इस कथा का गोपन-रहस्य यह है कि नीलमणि के अफसर पति जितेन्द्र बाबू शुक्राणुविहीन थे | ठौरी गाँव मैडम नीलमणि का पीहर था, वहीं स्वामी बनने से पहले प्रज्ञानन्द गिरि स्वामी परमानंदगिरि के आश्रम में थे, तब नीलमणि ने उन्हें अपने प्रेमजाल में लपेटा था | डा. नीलाभ इन्हीं की संतान था | जब डी. के. संस्थान पर कब्जा कर रहा था, तब नीलमणि ने स्वामी प्रज्ञानन्द गिरि को पुकारा था, पर वे उदासीन बने रहे | विवशत: नीलमणि अपने बेटे के पास दिल्ली चली गयी | स्वामी प्रज्ञानन्द गिरि को नीलमणि का डी. के. से मेलजोल पसंद नहीं आया, क्योंकि वह उनकी आध्यात्मिक-पत्नी जैसी थी | आध्यात्मिक-पत्नी की परमानंदगिरि सेवा संस्थान’ के प्रति लापरवाही बरतने से स्वामीजी नाराज हो गये थे क्योंकि संस्थान स्वामीजी का घर था | लेखक के शब्दों में –‘शायद यहाँ अन्य कारणों के साथ उनका प्रेमी वाला ईर्ष्या भाव भी था | उनकी आध्यात्मिक-पत्नी द्वारा जब उनके घर के प्रति घोर लापरवाही बरती गयी, तो वे एक पति की तरह ही उस पर कुपित हो गये थे |’ पर जब नीलमणि के पति जितेन्द्र बाबू नहीं रहे , तो वे पुनः नीलमणि के प्रति ममतालू हो उठे थे | इस तरह उपन्यास में कथावस्तु की बुनावट में आधुनिक समाज और उसकी संरचना जीवंत हो उठी है | धर्म का प्रभाव, राजनीति के छद्म, धन की समाज में सबलता, शिक्षा-माफियाओं के दुष्कर्म और नौकरशाही के हथकंडे, इन सबसे कथावस्तु प्रभावशाली और सम्प्रेषणीय बन गई है|
चरित्र-विश्लेषण की दृष्टि से इसकी केन्द्रीय पात्र नीलमणि ही है | डी. के. शिक्षा-माफियाओं का प्रतीक पात्र है | स्वामी प्रज्ञानन्द गिरि आधुनिक धर्माचार्य है , जो जन-मन की भलाई तो चाहता है, पर नीलमणि के प्रति अधिकार भाव भी रखता है| विधायक रूपसिंह आर्य, सी. आई. सुभाष जाखड़ सामान्य पात्र हैं | घीसाराम मुनीम , रतनगिरि, भाई किशनाराम ,सुशीला पाराशर, डा. नीलाभ, मैडम नीलमणि की बहू शालिनी , उसका बेटा चिंकू (हर्ष), स्वामीनाथन बोस आदि पात्र उपन्यास में अलग अलग मानवीय-छबियों का प्रतिनिधित्व करते हैं | नीलमणि के पति जितेन्द्र बाबू व्यावहारिक चरित्र है, जो नौकरशाही-अफसरशाही के अहंकार से ग्रस्त है और कथा-संरचना में महत्वपूर्ण स्थान रखता है |
परिवेश और आंचलिकता की दृष्टि से यह शेखावाटी अंचल की कथा है | ठौरी गाँव, ‘अवधूत स्वामी परमानदगिरि सेवा संस्थान’ इस उपन्यास का केन्द्रीय स्थान है | इस संस्थान के तुलसीदास हास्टल , रामानंद हास्टल , गार्गी हास्टल, कबीर हास्टल, संस्थान का बाजार, प्रेस, हाई स्कूल आदि इस वातावरण और परिवेश के हिस्से हैं | इस संस्थान में सीनियर स्कूल में सिलाई और कम्प्युटर-लेब है, आर्ट गेलरी है , डिग्री-कालेज है, ठौरी गाँव में मिडिल स्कूल है | पूर्ण सुविधाओं वाले इस संस्थान में स्टाफ की आवासीय कालोनी, अस्पताल, संस्कृत विद्यापीठ, गौशाला आदि मिलाकर इस संस्थान के परिवेश को जनकल्याणकारी रूप प्रदान करते है | कुछ समय कथा महानगर दिल्ली में भी प्रवेश करती है और डा. नीलाभ के परिवेश के आसपास घूमती है | दिल्ली के अस्पतालों और समाज के कुछ दृश्य इस परिवेश के हिस्से बने हैं |
भाषा की दृष्टि से यह उपन्यास सहज-सरल और संप्रेषणीय भाषा का उदाहरण है | लोकमुहावरों और कहावतों से सजी भाषा ने इसे पाठकों को पढने के लिए आकर्षित किया है | डी. के. की भाषा आधुनिक चालबाज अंग्रेजीदां व्यक्ति से मिलती है –‘’....आनरेबल मैडम ! आम फैन आफ यू ...सच कहूँ तो नारी शिक्षा में जो आपने काम किया है, उसके लिए आपको ‘मैग्सेसे एवार्ड’ मिलना चाहिए | मैडम ! मेरा मानना है कि आप ‘मेधा पाटकर’ से कम नहीं हैं ...!’’ इस तरह लेखक श्याम जांगिड़ पात्रानुकूल भाषा रचने में माहिर हैं | गणपत नामक ग्रामीण की भाषा गंवारू और गाली-गलोज वाली है –‘..तेरी ऐसी कम तेसी, तूं महाराज नै कुरसी सूं उठावै, ....नै गाड कोनी दूंगा ...|’ भाषा की इस सीढ़ी से ही लेखक ने पाठकों को उपन्यास की छत पर चढ़ाकर संसार की मनोवृतियों का विहंगावलोकन कराया है |
‘न होने का दर्द’ शीर्षक प्रतीकात्मक और रहस्यमय है | जब नीलमणि डी. के. की खुराफातों से झूझ रही थी, तब नीलमणि को स्वामी प्रज्ञानन्द गिरि के आश्रम में ‘न होने का दर्द’ था | फिर जब स्वामी प्रज्ञानन्द गिरि आश्रम लौटे, तो नीलमणि दिल्ली चली गई ,तो स्वामी प्रज्ञानन्द गिरि के लिए यह उसके ‘न होने का दर्द’ था | नीलमणि के पति जितेन्द्र बाबू के न रहने पर तो यह न केवल उसके परिवार बल्कि जितेन्द्र बाबू के पूरे परिवेश के लिए ‘न होने का दर्द’ था | और फिर जब स्वामी प्रज्ञानन्द गिरि नहीं रहे तो नीलमणि को फिर उनके ‘न होने का दर्द’ महसूस हुआ |
लेखक इस उपन्यास द्वारा मानवीय जीवन सम्बंधों की आत्मीयता, स्त्री के संघर्ष, आधुनिकतावादी समाज की विकासवादी विडम्बनाओं और मानवीय संदर्भों के उतार-चढाव का संवेदनात्मक रचाव पाठक के हाथों में सौंपना चाहता था, जिसमें उन्हें पूर्ण सफलता मिली है | श्याम जांगिड़ हिंदी और राजस्थानी के ख्यातनाम हस्ताक्षर हैं और जीवनगत विडम्बनाओं को उकेरने में उन्हें महारत हासिल है , इसलिए इस उपन्यास में भी एक ईमानदार, समर्पित और कर्तव्यनिष्ठ महिला नीलमणि के वृतांत को रचने में वे सफल रहे हैं |

- डॉ आई जी री फेसबुक वॉल सूं

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