Shah Goverdhan lal Kabra Teachers' College -Students Group

Shah Goverdhan lal Kabra Teachers' College -Students Group शिक्षक शिक्षा का मंच

14/11/2025

बच्चा कोई छोटा वैज्ञानिक नहीं,वह एक छोटा कवि है।
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बच्चे कैसे सोचते हैं,सतह से सार तक की छलांग

सुबह का समय था।चार साल की एक बच्ची ने खिड़की से झाँककर पूछा-
“माँ, बादल क्यों चलते हैं?”

माँ ने कहा, “क्योंकि हवा उन्हें धकेलती है।”बच्ची कुछ देर सोचती रही और बोली-
“तो हवा बादलों की मम्मी है क्या?”

यह वाक्य सुनकर हम मुस्कराते हैं,पर यही मुस्कान मानव सोच के सबसे गहरे रहस्य पर रोशनी डालती है।क्योंकि यह बच्ची एक analogical छलांग लगा रही है-वह अपने परिचित संसार (माँ और बच्चा) को
अपरिचित संसार (हवा और बादल) पर मैप कर रही है।यही प्रक्रिया है सोच की जन्मस्थली।

सोच की आरंभिक अवस्था-सतह का संसार

जब बच्चा दुनिया में आता है,तो उसके पास अनुभव नहीं होते,केवल संवेदनाएँ होती हैं।
वह रंग देखता है, आवाज़ सुनता है, चेहरा पहचानता है,पर अभी वह “अर्थ” नहीं समझता।

धीरे-धीरे उसका दिमाग़ सतहों को जोड़ने लगता है।वह देखता है कि दूध की बोतल हर बार भूख मिटाती है,तो “बोतल” का सार बनता है -संतोष, सुरक्षा, तृप्ति।
यह पहला analogical संबंध है,सतह (बोतल) → सार (संतोष)।

हर दिन बच्चा इस तरह सैकड़ों mapping करता है।वह यह सीखता है कि चीज़ों के पीछे एक पैटर्न होता है-
“अगर मैं मुस्कराऊँ तो माँ मुस्कराती है।”
यह पैटर्न ही सोच की बुनियाद बनता है।

समानता से सीखना — analogical brain की लय

वैज्ञानिकों ने पाया है कि बच्चों का मस्तिष्क“categorical learning” नहीं, बल्कि “analogical learning” से विकसित होता है।यानि, बच्चा चीज़ों को नियमों से नहीं,समानता से पहचानता है।

पहले वह गाय, कुत्ता, बिल्ली सबको “जानवर” कहता है,क्योंकि सतह पर सबमें समानता दिखती है,चार पैर, बाल, पूँछ।धीरे-धीरे वह सार का अंतर पहचानने लगता है कुत्ता भौंकता है, गाय रंभाती है, बिल्ली म्याऊँ करती है।यह सतह से सार तक की पहली छलांग है-
Pattern → Meaning.

इस प्रक्रिया को मनोविज्ञान में कहा गया है, Analogical Abstraction ,यानी, एक अनुभव से दूसरा अर्थ निकालने की क्षमता।यह वही शक्ति है जो मनुष्य को
मशीन से अलग बनाती है।

भाषा सीखना — उपमा की प्रयोगशाला

भाषा बच्चे के लिए एक जीवित प्रयोगशाला है।वह शब्दों को नकल करके नहीं,बल्कि mapping करके सीखता है।

उदाहरण के लिए-बच्चा गिरने पर कहता है “दर्द आया।”फिर वह देखता है कि उसका खिलौना टूट गया है,तो कहता है-“टेडी को भी दर्द हुआ।”यह वाक्य गलत नहीं,यह analogical imagination है।
बच्चा “दर्द” की अवधारणा को अपने से बाहर की दुनिया पर लागू करता है।

यह मनुष्य के सबसे गहरे मानसिक गुण-सहानुभूति (empathy) की जड़ है।
क्योंकि सोचना और महसूस करना दोनों
उपमाओं की पुलिया पर चलते हैं।

खेल-analogical सीखने का माध्यम

बच्चे खेलते क्यों हैं?क्योंकि खेल दरअसल सोचने का अभ्यास है।जब बच्ची गुड़िया को खाना खिलाती है,वह “माँ” बनने का अभिनय नहीं,बल्कि समानता की संरचना सीख रही होती है।

वह समझ रही होती है कि देखभाल, प्रेम, जिम्मेदारी क्या होती है।यह सब अनुभव सतह पर खेल हैं,पर सार में यह जीवन की शिक्षा है।

इसीलिए शिक्षा के महान विचारक Jean Piaget ने कहा था-“Play is the work of childhood.”और होफ्स्टैड्टर इसे इस तरह आगे बढ़ाते हैं “Play is analogical practice in disguise.”(खेल उपमात्मक अभ्यास का छिपा हुआ रूप है।)

दिमाग़ का “मैपिंग इंजन”

जब बच्चे के सामने कोई नया अनुभव आता है,तो उसका दिमाग़ दो चीज़ें करता है ,पुराने अनुभवों को खंगालता है,उनके पैटर्न को नये संदर्भ में लागू करता है।

यह प्रक्रिया ठीक वैसी है जैसे कंप्यूटर में “pattern recognition algorithm” चलता है,पर फर्क यह है कि बच्चे का दिमाग़ अर्थ बनाता है,
कंप्यूटर केवल डेटा जोड़ता है।

उदाहरण के लिए-अगर बच्चा बर्फ़ देखता है और कहता है “यह आइसक्रीम जैसी है”,
तो वह तापमान या रासायनिक संरचना नहीं समझता,पर उसके भीतर समानता का बीज अंकुरित हो चुका है।वह सतह (ठंडक, सफेदी) से सार (समान अनुभूति) तक जा चुका है।

उपमा से नैतिकता तक

बच्चों की नैतिक समझ भी उपमा पर टिकी होती है।जब कोई कहता है, “तुम जैसा करोगे, वैसा भरोगे,”तो यह सिर्फ़ चेतावनी नहीं, बल्कि एक analogical rule है।
बच्चा “क्रिया और परिणाम” के पैटर्न को समझता है।

वह देखता है अगर उसने किसी को मारा,
तो दूसरे ने भी उसे मारा,यह अनुभव “न्याय” की पहली समझ है।धीरे-धीरे वह इसे सार रूप में सीखता है,“दूसरों के साथ वैसा करो जैसा तुम चाहते हो कि वे तुम्हारे साथ करें।” यह नैतिक उपमा है,जिसे हर संस्कृति अपने शब्दों में दोहराती है।

कल्पना की उड़ानसोच का विस्तार

Analogical thinking केवल सीखने का नहीं,बल्कि कल्पना का आधार भी है।
जब बच्चा कहता है-अगर मैं चिड़िया होता तो उड़ जाता,”तो वह असंभव नहीं बोल रहा,वह अपने भीतर स्वतंत्रता की अनुभूति का रूपक बना रहा है।

यही प्रक्रिया बड़े होकर कला, विज्ञान और दर्शन में लौटती है।जब आइंस्टीन ने कहा था, “Imagination is more important than knowledge,”तो वे भी इसी बात की ओर इशारा कर रहे थे-ज्ञान सीमित है, पर analogical imagination असीम।

गलती-सीखने का औज़ार

बच्चे की “गलतियाँ” असल में
उसके analogical प्रयोग हैं।जब वह कहता है - “मैं दौड़ा हूँ” की जगह “मैं दौड़ाया गया हूँ,”तो वह भाषा के नियम नहीं तोड़ रहा,वह नए संदर्भ में पुराने पैटर्न को लागू कर रहा है।

यह overgeneralization मनुष्य की सोच का प्रमाण है हम केवल अनुकरण नहीं करते,हम पैटर्न का स्थानांतरण (transfer) करते हैं।और यही सोच की जड़ है।

समाज और analogical शिक्षा

हर संस्कृति बच्चे को सिखाने के लिए कहानियाँ,उपाख्यान, प्रतीक और उदाहरणों का प्रयोग करती है।
“सिंह और चूहा,” “कछुआ और खरगोश,”
या “शेर और सियार”-ये सब analogical पाठ हैं।

कहानी की सतह पर जानवर हैं,सार में जीवन के सिद्धांत।इस तरह समाज analogical mapping के माध्यम से
ज्ञान को पीढ़ी दर पीढ़ी पहुँचाता है।

निष्कर्ष - सोच की पहली आग

बच्चा कोई खाली पात्र नहीं है,वह एक जीवित अग्नि है जो हर अनुभव से अपनी सोच को प्रज्वलित करती है।

वह सतह से शुरू करता है-रंग, आवाज़, स्वाद, आकार।पर धीरे-धीरे वह सार तक पहुँचता है-प्रेम, भय, मित्रता, समय, न्याय।

यह यात्रा उपमा की यात्रा है ,सतह से सार तक, इंद्रिय से अर्थ तक।और यही यात्रा हमें भी हर दिन करनी पड़ती है,जब हम किसी नयी चीज़ को समझने की कोशिश करते हैं।
होफ्स्टैड्टर और सैंडर लिखते हैं -“The child is not a miniature scientist,he is a miniature poet.”(बच्चा कोई छोटा वैज्ञानिक नहीं,वह एक छोटा कवि है।)
और उस कवि का हर शब्द, हर खेल, हर सवाल एक नई उपमा है ,एक नई चिंगारी,जो सोच की अग्नि को जलाए रखती है।
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विचार की अग्नि

रात का समय था। कमरे में अँधेरा गहराता जा रहा था, और एक मेज़ पर खुली किताब की रोशनी में किसी के हाथ ने कलम उठाई। मन में एक प्रश्न कौंधा-
“हम सोचते कैसे हैं?” क्या विचार किसी तर्क से जन्म लेते हैं, या वे किसी चिंगारी की तरह फूट पड़ते हैं?

डग्लस होफ्स्टैड्टर ने इसी प्रश्न से अपनी दशकों की यात्रा शुरू की थी।यह जानने की कि सोचना क्या है। और उनका उत्तर सरल था, पर उतना ही गहरा:“सोचना यानी उपमाएँ बनाना।”(Thinking means making analogies.)

यह वाक्य सुनने में सीधा लगता है, पर जब आप इसके भीतर झाँकते हैं, तो यह पूरी मानवीय चेतना को समझने की चाबी देता है।

विचार की आग : Surface और Essence का संघर्ष

सोच की प्रक्रिया अग्नि की तरह है।उसके लिए तीन चीज़ें चाहिए:
पहला ईंधन (Fuel)-हमारे अनुभव, हमारी स्मृतियाँ, हमारी भाषा।
दुसरा,ऑक्सीजन (Oxygen)-नया संदर्भ, नया प्रश्न, नया दृश्य।
तीसरा.चिंगारी (Spark)-सतह और सार के बीच का टकराव।

जब हम किसी वस्तु, विचार या व्यक्ति को देखते हैं, तो पहले हमें सतह दिखाई देती है-उसका रूप, रंग, आकार, शब्द।लेकिन हमारा मन वहाँ नहीं रुकता।वह तुरंत पूछता है:“यह मुझे किसकी याद दिलाता है?”
और यही क्षण है जब सतह के भीतर सार की खोज शुरू होती है।यहीं से विचार की आग भड़कती है।

सतह: अनुभव का दृश्य

हमारी इंद्रियाँ सतहें देखती हैं।हर वस्तु, हर शब्द, हर दृश्य-एक surface pattern है।बादल चलते हैं, नदी बहती है, पत्ते गिरते हैं, और मन कहता है-“समय भी ऐसा ही बहता होगा।”

यह सतह से सार तक की पहली छलांग है।
हम सीधे अनुभव से नहीं, बल्कि उपमा से सोचते हैं।जब आप कहते हैं, “मुझे यह बात गले नहीं उतरती,”तो आप कोई भौतिक निगलना नहीं कर रहे।आप मानसिक अर्थ को पचाने की उपमा दे रहे हैं।भाषा में छिपा हर मुहावरा, हर रूपक-सोच का जीवित निशान है।

सार: अर्थ का बीज

जब हम सतह को पार करते हैं, तो सार दिखता है।सार वही नहीं जो शब्द कहता है, बल्कि वह जो शब्द संकेत करता है।

कविता में जब कोई कहता है -“वह चला गया, पर उसकी गंध अब भी हवा में है” तो यह सिर्फ किसी व्यक्ति की बात नहीं, बल्कि “स्मृति की उपस्थिति” का सार है।यहाँ ‘गंध’ सतह है, और ‘स्मृति’ उसका सार।

मन यही करता है,सतहों को सार से जोड़ता है।हम हर क्षण analogical mapping करते हैं यानी, एक अनुभव के ढाँचे को दूसरे अनुभव में बिठाते हैं।यही से भाषा बनती है, कल्पना जन्म लेती है, और विज्ञान खोज करता है।

उपमा-विचार का विद्युत प्रवाह

किसी बच्चे से पूछिए,“बिजली क्या है?” वह कहेगा -“जैसे पानी पाइप में बहता है।”यह कोई गलती नहीं,यह सोच का पहला कदम है।बच्चा समझने के लिए एक सतह से दूसरी सतह पर छलांग लगाता है।

हम सब यही करते हैं ,हर ज्ञान उपमा से ही समझते हैं।भले वह गणित हो या दर्शन।
“ग्रैविटी खींचती है” कहना अपने आप में एक उपमा है,क्योंकि कोई हाथ नहीं जो खींच रहा हो,यह बस एक रूपक से निर्मित समझ है।

होफ्स्टैड्टर कहते हैं-“Without analogy, thinking stops; language freezes; meaning dies.”(बिना उपमा, सोच रुक जाती है,भाषा जम जाती है,अर्थ मर जाता है।)

सोच की आग का दृश्य — एक कहानी

एक बार एक चित्रकार ने अपने शिष्य से पूछा,“तुम इस पहाड़ को कैसे चित्रित करोगे?”
शिष्य बोला, “मैं उसे ठीक वैसा बनाऊँगा जैसा दिखता है।”
गुरु मुस्कराया, “तो तुम पहाड़ नहीं, उसकी परछाई बनाओगे।”

यही फर्क है surface और essence में।जो कलाकार, वैज्ञानिक या कवि “सार” को देख लेता है,वह सतह के भीतर की आग पकड़ लेता है।वह चीज़ों को जैसे दिखती हैं वैसा नहीं, बल्कि जैसे महसूस होती हैं वैसा चित्रित करता है।
सोच का ईंधन : समानता की खोज

विचार तब तक चलता है, जब तक हम समानता खोजते रहते हैं।हर उपमा दो चीज़ों के बीच पुल है -एक तरफ़ “जो हम जानते हैं”, दूसरी तरफ़ “जो हम नहीं जानते।”

आप कह सकते हैं,
“मन एक दर्पण है,”
“स्मृति एक बगीचा है,”
“समय एक नदी है,”“ज्ञान एक दीपक है।”

ये सब सतह और सार के बीच के पुल हैं।
यही पुल मानव सभ्यता का वास्तु है।भाषा, कला, गणित, धर्म, विज्ञान-सब इसी पुल पर बने हैं।

सतह की भूल, सार का बोध

लेकिन कभी-कभी हम सतह पर अटक जाते हैं।हम रूप को पकड़ लेते हैं, अर्थ को खो देते हैं।इसीलिए भ्रम पैदा होता है।

उदाहरण के लिए, जब लोग कहते हैं-
“दिमाग़ एक कंप्यूटर है” तो यह सतही उपमा है।सार में दोनों अलग हैं दिमाग़ सजीव है, अनुभवशील है,कंप्यूटर गणनात्मक है, पर आत्मबोधहीन।

सोचने का काम यही है-उपमा बनाना,
और फिर उपमा को पार करना।सच्चा विचार सतह से सार तक जाकर लौटता है-
जैसे नदी बादल बनकर फिर बारिश में बदल जाती है।

विचार की अग्नि को जलाए रखना

विचार की आग बुझती नहीं, जब तक उपमाएँ जीवित हैं।हर दिन हम अनजाने में सैकड़ों उपमाएँ रचते हैं-बोलने में, लिखने में, कल्पना करने में।हमारे भीतर का “सोचने वाला” जीव इन्हीं उपमाओं की ऊर्जा से जलता है।

होफ्स्टैड्टर के शब्दों में -“Analogy is the core of cognition,it is how we see ourselves in the world.”(उपमा ही संज्ञान का केंद्र है,इसी से हम दुनिया में स्वयं को देखते हैं।)इसलिए, अगर हमें सोच की अग्नि को जलाए रखना है,तो हमें उपमाओं से खेलना सीखना होगा -सतह को छूकर सार को महसूस करना होगा।
और यही है-विचार की साधना।सतह और सार के बीच की यह यात्रा मानव चेतना का सबसे सुंदर नृत्य है।
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सतह और सार का रहस्य

सुबह की धूप खिड़की से भीतर झाँकती है।
काँच पर हल्का-सा धुंध का पर्दा है।
बाहर के पेड़, घर, और सड़कें धुँधले से दिखते हैं।हमारी आँखें जो देखती हैं, वह सतह है लेकिन उसके पार जो अर्थ छिपा है, वही सार है।सोचना यानी उस धुंध के पार देखना।

सतह का मोह -जो दिखता है, वही सच?

मनुष्य की सबसे पहली प्रवृत्ति है रूप पर भरोसा करना।हम वही मान लेते हैं जो हमें दिखता है।दुनिया हमें दृश्य रूप में मिलती है-रंग, ध्वनि, गंध, आकार, शब्द ,सब सतह हैं।परंतु सतह सत्य का पूरा चित्र नहीं, बल्कि उसका मुखौटा है।

जब बच्चा किसी गर्म वस्तु को छूता है,
तो वह केवल “गर्मी” नहीं सीखता,
वह “स्पर्श के अनुभव” के भीतर “वास्तविकता की गहराई” महसूस करता है।यानी जो दिखता है, वह मात्र आरंभ है,सोच वहीं से शुरू होती है जहाँ सतह खत्म होती है।

सतह से सार की ओर -दृष्टि की यात्रा

सोचना, दरअसल, सतह और सार के बीच यात्रा करना है।सतह वह है जो अनुभव में है,सार वह है जो अनुभव के पीछे छिपा है।
एक वैज्ञानिक जब गिरता सेब देखता है,
तो उसके लिए वह सिर्फ फल नहीं ,वह “बल का संकेत” है।
कवि जब नदी देखता है,
तो उसके लिए वह सिर्फ पानी नहीं ,“समय का प्रवाह” है।

यही अंतर है देखने और सोचने में।
देखना सतह को पकड़ना है,सोचना सतह के भीतर छिपे सार को खोज लेना है।

भाषा-सतह का संसार, अर्थ का द्वार

भाषा सतह है, पर अर्थ उसका सार है।
शब्द केवल प्रतीक हैं वे सतह पर लिखी लकीरों की तरह हैं,जो किसी गहरे अर्थ की ओर संकेत करते हैं।

जब आप कहते हैं “दिल टूट गया”,तो वास्तव में कोई दिल टूटता नहीं,यह “भावनात्मक टूटन” का सार है,जो सतह पर “दिल” के प्रतीक से व्यक्त होता है।

हम रोज़ ऐसी सैकड़ों उपमाओं में जीते हैं,
“समय उड़ रहा है”, “विचारों की बाढ़ है”, “वह आग बन गया है”,ये सब सतह और सार के मेल से बनी चिंगारियाँ हैं।इन्हीं में हमारी चेतना अपनी ऊर्जा पाती है।

सतह का रूप, सार का रूपांतरण

सतह बदलती रहती है,पर सार बार-बार नए रूप में लौटता है।कभी एक शब्द कविता में आता है,कभी वही विज्ञान में,कभी वह प्रार्थना बन जाता है,कभी प्रश्न बनकर सामने खड़ा होता है।

उदाहरण के लिए-
“प्रकाश” का सतह रूप एक भौतिक तरंग है,पर उसका सार-ज्ञान, चेतना, सत्य हर संस्कृति में अलग-अलग अर्थ लेकर प्रकट हुआ है।भारत में “प्रकाश” आत्म-जागरण का प्रतीक बना,बौद्ध परंपरा में “बोधि”,
और पश्चिम में “Enlightenment” यानी विचार की उजास।सतह बदली, पर सार एक रहा,अज्ञान के अंधकार से मुक्ति।

सोच की गहराई -जब सतह टूटती है

जब सतहें टूटती हैं, तो नए अर्थ जन्म लेते हैं।होफ्स्टैड्टर इसे कहते हैं“analogical leap” जब हम एक अनुभव से दूसरे में कूदते हैं और कुछ नया देख लेते हैं।

सोच की सबसे बड़ी छलांगें इसी से हुईं।
आर्किमिडीज़ ने जब पानी में गिरा हुआ शरीर देखा,तो सतह पर यह बस एक स्नान दृश्य थापर सार में उसने घनत्व और उत्प्लावन का नियम देख लिया।

इसी तरह, कबीर ने जब कहा-“माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे,एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदूंगी तोहे।”तो उन्होंने सतह पर मिट्टी और कुम्हार की बात की,पर सार में जीवन और मृत्यु के चक्र का रहस्य दिखाया।

सतह और सार का खेल-रूपक का रहस्य

हर रूपक (metaphor) इसी खेल का प्रमाण है।यह दो स्तरों का मिलन है-सतह का दृश्य और सार का अनुभव।हम कहते हैं “मन का दरवाज़ा खुल गया”,क्योंकि “खुलना” शारीरिक क्रिया है,पर यहाँ उसका सार “बोध” मानसिक क्षेत्र में प्रकट होता है।

इस तरह भाषा सोच का प्रयोगशाला है -जहाँ सतह के प्रयोग से सार का निर्माण होता है।हम रोज़ इन रूपकों में सांस लेते हैं।

सतह की सीमा और सार की स्वतंत्रता

सतह सीमित है,उसका आकार, रंग, ध्वनि सब बंधे हुए हैं।लेकिन सार स्वतंत्र है,वह एक ही समय में कई रूप ले सकता है।
“जल” का सतह रूप नदियों, बादलों, बर्फ़ में बदलता है,पर सार एक ही रहता है-प्रवाह, शीतलता, जीवन।

मानव सोच इसी “सार की स्वतंत्रता” से प्रेरित है।हम किसी भी अनुभव को दूसरे के रूप में देख सकते हैं।यह लचीलापन (flexibility) ही रचनात्मकता का स्रोत है।

ग़लतफ़हमी की जड़-जब सतह को ही सार मान लिया जाए

कभी-कभी हम सोचते हैं कि जो दिखता है वही सच है।पर यही भ्रम जन्म देता है।
राजनीति, धर्म या समाज में कई संघर्ष इसी से होते हैं जब सतह को ही सार मान लिया जाता है।

जब कोई कहता है, “यह धर्म श्रेष्ठ है”,
तो वह अक्सर सतह के प्रतीक -भाषा, वेश, परंपरा को पकड़ लेता है,पर सार,करुणा, सत्य, प्रेम को भूल जाता है।
विचार की परिपक्वता यही है कि हम
सतह को सम्मान दें, पर उसमें अटकें नहीं।

सार तक पहुँचने की साधना

सार तक पहुँचना कोई एक क्षण का काम नहीं,यह एक अभ्यास है-ध्यान, जिज्ञासा और प्रश्नों का अभ्यास।कभी हम किसी विचार की सतह को देख रहे होते हैं,कभी उसे छूते हैं, और कभी भीतर उतर जाते हैं।

कवि, वैज्ञानिक, साधक,सभी इस यात्रा के यात्री हैं।उनका काम बस इतना है कि
वे सतहों के पार देखना न छोड़ें।वहीं से नई भाषा, नई खोज, और नया अर्थ जन्म लेता है।

सतह और सार का रहस्य

सतह और सार एक-दूसरे के विरोधी नहीं,
बल्कि एक ही नृत्य के दो पग हैं।सतह दिखाती है-सार अर्थ देता है।
सतह झिलमिल है -सार गहराई है।
सतह सीमित है -सार अनंत।

सोचना यानी इस द्वैत के बीच जीना।
हर उपमा, हर विचार, हर शब्द ,एक नया प्रयास है इन दोनों को जोड़ने का।

होफ्स्टैड्टर और सैंडर ने लिखा था-“We do not think by rules, we think by resemblance.”(हम नियमों से नहीं सोचते, हम समानता से सोचते हैं।) और यही समानता सतह को सार में बदल देती है।यहीं से सोच की आग जलती है,और मानव चेतना का प्रकाश फैलता है।
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उपमा का विज्ञान-Analogical Mapping

बरसात की एक दोपहर थी।डग्लस होफ्स्टैड्टर अपने घर के बाहर खड़े होकर देख रहे थे ,पानी छत से गिरकर छोटे-छोटे रास्तों में बह रहा था।उनके मन में सवाल उठा,क्या हमारे विचार भी ऐसे ही बहते हैं -पुराने रास्तों की ओर?

उन्होंने महसूस किया,हर बार जब हम कुछ “नया” सोचते हैं,तो दिमाग़ सच में नया नहीं बनाता,वह पुरानी राहों से होकर नए रास्ते तक पहुँचता है।यह राह है-Analogical Mapping,यानी, एक ज्ञात संरचना को अज्ञात संरचना में मैप करना।

सोच की अदृश्य मशीन

हमारे मस्तिष्क में अरबों न्यूरॉन्स हैं,पर उनकी सबसे अद्भुत क्षमता यह नहीं कि वे डेटा स्टोर करते हैं,बल्कि यह कि वे समानता पहचानते हैं।

जब आप किसी नए अनुभव से मिलते हैं-मान लीजिए, आपने किसी नए इंसान को देखा जो हँसने के ढंग से आपको अपने किसी पुराने मित्र की याद दिलाता है तो मस्तिष्क तुरन्त एक link बना देता है।
वह कहता है,“यह नया चेहरा उस पुराने अनुभव से मिलता-जुलता है।” यानी, आपका मस्तिष्क सतह पर दिखने वाले संकेतों को लेकर सार में एक “pattern of resemblance” खोजता है। यही analogical mapping है,जहाँ पुराना और नया एक पुल से जुड़ते हैं।

यह प्रक्रिया कैसे चलती है?

होफ्स्टैड्टर इसे एक तरल प्रक्रिया कहते हैं,जैसे पानी किसी भी आकार के पात्र में अपना रूप ले लेता है।दिमाग़ किसी नये विचार में वही अर्थ डाल देता है जो वह पहले जानता है,पर उसके भीतर थोड़ी तोड़-फोड़ और पुनर्रचना होती है।

इसे समझिए एक दृश्य से-आपके सामने एक नया विचार है: “इंटरनेट एक विशाल मस्तिष्क है।”यहाँ आप “मस्तिष्क” (brain) की संरचना को लेकरउसे “इंटरनेट” के ढाँचे पर मैप करते हैं
• न्यूरॉन्स- सर्वर
• सिनैप्स - केबल कनेक्शन
• विद्युत संकेत - डेटा ट्रैफिक
• चेतना - सामूहिक सूचना

यह उपमा पूर्णतः सही नहीं,पर यह हमें इंटरनेट को एक जीवित प्रणाली की तरह समझने का ढाँचा देती है।यही analogical mapping का चमत्कार है-यह अपूर्ण समानताओं से पूर्ण अर्थ रच देता है।

Mapping: समानता का पुल

Analogical mapping कोई स्थिर प्रक्रिया नहीं,यह एक सजीव सेतु है।
यह हमारे मस्तिष्क में लगातार चलता है,
और हर क्षण हम दुनिया को इसी के माध्यम से देखते हैं।

जब आप कहते हैं, “उसकी ज़िंदगी एक भूलभुलैया है,” तो आप एक दृश्य संरचना (maze) को मानसिक स्थिति (life confusion) पर मैप कर रहे होते हैं।
यह रूपक भाषा नहीं,यह सोच की मशीन है।

होफ्स्टैड्टर और सैंडर लिखते हैं,“Every act of understanding is an act of mapping.”(हर समझ एक मैपिंग की क्रिया है।)
इससे साफ़ है कि समझना = जोड़ना।ज्ञान का निर्माण तभी होता है जब दो अनुभव,दो सतहें, दो रूप, दो अर्थ एक-दूसरे में प्रतिबिंबित होते हैं।

“समानता”-जो हमें जोड़ती है

हम सोचते हैं कि हमारी बुद्धि “नियमों” पर चलती है कि यदि A तो B।लेकिन जीवन और भाषा कहीं ज़्यादा तरल हैं।हम नियम नहीं, रूपक से सोचते हैं।

जब आप कहते हैं-
“वह आदमी फौलाद का बना हुआ है,”
तो यह कोई तर्क नहीं, बल्कि analogical leap है।आप एक भौतिक गुण (कठोरता) को एक मानवीय गुण (दृढ़ता) पर मैप करते हैं।यह मैपिंग ही हमें अर्थ देती है।

बच्चा जब पहली बार “कुत्ता” देखता है,
तो वह अगली बार बिल्ली देखकर कह देता है “कुत्ता!” क्योंकि उसका दिमाग़ अभी सतह और सार को अलग करना नहीं जानता,वह सिर्फ़ “pattern of four-legged animal” पहचान रहा है।
धीरे-धीरे, अनुभव से वह सतह और सार के भेद सीखता है यानी mapping refine होती जाती है।

विज्ञान में Analogical Mapping

दुनिया के सबसे बड़े खोजकर्ताओं ने हमेशा किसी न किसी analogical leap से अपनी खोजें कीं।केप्लर ने ग्रहों की गति को संगीत की ताल से तुलना की।न्यूटन ने सेब के गिरने की सतह में गुरुत्वाकर्षण का सार देखा।वॉटसन और क्रिक ने DNA को “सीढ़ी” की उपमा से समझा।फैराडे ने विद्युत रेखाओं को “तंतुओं की जाल” कहा।
इन सबके पीछे एक ही मानसिक प्रक्रिया थी पुराने अनुभव के ढाँचे को नए रहस्य पर मैप करना।यही analogical mapping विज्ञान की प्रेरक शक्ति है।

न्यूरोसाइंस का दृष्टिकोण

मस्तिष्क के अंदर यह प्रक्रिया “frontal-temporal” नेटवर्क में होती है।जब भी हम किसी नए पैटर्न को पुराने से जोड़ते हैं,
तो prefrontal cortex सक्रिय होता है-वह तय करता है कि कौन-सी समानता उपयोगी है।Hippocampus पुरानी स्मृतियों को खंगालता है,और parietal cortex उनके बीच spatial संबंध जोड़ता है।

इस पूरी प्रक्रिया में मस्तिष्क जैसे कहता है -“यह नया है, पर यह किसी पुराने जैसा ही है।” यही वाक्य मनुष्य को पशु से अलग करता है।जानवर सीखते हैं,मनुष्य समानता खोजता है,अर्थ बनाता है, उपमा रचता है।

त्रुटि और रचनात्मकता

हर mapping सही नहीं होती।कभी-कभी यह ग़लत होती है, और यहीं से रचनात्मकता जन्म लेती है।जब कोई कलाकार या वैज्ञानिक कोई “गलत” तुलना करता है,तो वह पुराने ढाँचे को तोड़ देता है और एक नई दुनिया खुलती है।

उदाहरण के लिए, जब प्रारंभिक भौतिकविदों ने कहा कि “रोशनी तरंग है”,
तो वह एक अधूरी उपमा थी,बाद में क्वांटम भौतिकी ने बताया कि यह “कण भी है और तरंग भी।”यानी, सोच की पुरानी mapping टूटकर और समृद्ध हुई।

रचनात्मकता का रहस्य यही है-पुराने ढाँचों को तोड़कर नई analogies बनाना।

समाज और संस्कृति में मैपिंग

हमारी संस्कृति भी इसी प्रक्रिया से बनती है।किसी समाज का मिथक, धर्म, कहावतें -सब analogical maps हैं।
“जीवन एक युद्ध है”, “धर्म एक नाव है”, “संसार एक रंगमंच है”-
ये सब सामाजिक अनुभवों को मानसिक नक्शे में बदलने के तरीके हैं।

हर संस्कृति का मस्तिष्क अपनी तरह के मानचित्र बनाता है।इसीलिए भारतीय दर्शन में “रूप–सार–मूल” की भाषा मिलती है,और पश्चिम में “form-essence-idea” की।दोनों के पीछे मानसिक क्रिया एक ही है-समानता में अर्थ खोजना।

सोच का संगीत-mapping की लय

अगर ध्यान से देखें तो analogical mapping किसी संगीत की तरह है,हर विचार एक सुर है,हर स्मृति एक ताल।जब दोनों संगति में आते हैं, तो अर्थ का राग बजता है।

कभी यह राग सरल होता है,“मन एक दर्पण है”,
कभी जटिल,“सृष्टि एक आत्म-संकेत है।”
लेकिन मूल लय वही रहती है,समान

साभार: Drsatyajit Sahu

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