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सृजन सृजन अर्थाथ अन्तश की अभिव्यक्ति द्वा?

14/09/2026

हिंद की हिंदी ,
माथे की बिन्दी ।
अ,आ,आ,ई,आ गई
पन्चमेल खिचड़ी भा गई।।
गीत-संगीत लगे मनभावन,
पन्क्षी भी करें कलरव ।
त ,थ,द,ध,न के स्वर,
बने नृत्य की थिरकन।।
तीज, त्योंहारों का रंग,
बिखरे नगर, शहर-शहर।
बर्फी, रसमलाई की मिठास,
देखो बनी हिंदी की ठाठ् ।।
हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं,,,
रचना बहल,
गाजियाबाद।

04/09/2026
22/06/2026

बच्चो क्यू घबराते हो,
क्यू बेकार मे डरते हो |
जब बल तुम्हारे साथ है ,
तो फिक्र किस बात की करते हो ||
अंधियारे मे चमके तारे,
हरियाली भी मनभावान रे |
जब जागो तब भये सवेरा,
नये सपनो ने मन को घेरा ||
मै पवन पुत्र हनुमान,
श्री राम दूत हनुमान |
कलयुग की इस धरती मै,
मै तुम्हारा पालनहार ||
स्वरचित रचना,
रचना बहल,
कानपुर

20/05/2026

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आसमान से, आग़, पारा 43°, के पार । सूरज के , सख्त तेवर, बच्चे - बूढ़े , सभी परेशान ।। कोई अचानक, हुआ बेहोश, तो कही किसी ने...
19/05/2026

आसमान से,
आग़,
पारा 43°,
के पार ।
सूरज के ,
सख्त तेवर,
बच्चे - बूढ़े ,
सभी परेशान ।।
कोई अचानक,
हुआ बेहोश,
तो कही किसी ने ,
खोया जोश ।
लू के थपेड़ो ने,
किया कैद,
घर पर बुलाने,
पढ़े वैध।।
बिन बिजली ,
पंखे रुलाए,
नल का पानी ,
भी उबाल लाए ।
गर्मी से ,
हुये बेहाल,
शरीर का तापमान,
पहुँचाये अस्पताल।।
स्वरचित रचना,
रचना बहल,
कानपुर ।।

12/05/2026

कुछ दूर तुम चले,
कुछ दूर हम चले ,
मंजिल नजदीक थी ,
फिर क्यो न हम
समझ सके ||
तकदीर दीवानी ,
महरबानो की ,
कमी रही ,
कद्रदानो की ,
रोशनाई महफिल मे,
फिर क्यो हमे
गुमनामी मिली ||
कही दूर तुम खड़े,
कही दूर हम खड़े,
वक्त के दरारो को ,
फिर क्यो न हम ,
भर सके ||
जिंदगी मुश्किल सही,
हमसफर हम यही,
माथे पर शिक़जे कई,
फिर क्यो हम न,
उन्हे सुलझा सके ||
ംംംस्वरचित रचना
रचना बहल,
कानपुर (उ.प्र)

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