04/01/2026
डॉ. अम्बेडकर पीठ को बंद करना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि संविधान और सामाजिक न्याय पर सीधा हमला है।
राजस्थान विश्वविद्यालय में हाल की घटनाएँ बताती हैं कि यह कोई साधारण शैक्षणिक फैसला नहीं, बल्कि एक सुनियोजित वैचारिक हमला है। इससे पहले महात्मा ज्योतिराव फुले को राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रम से हटाया गया था, जिसे छात्रों के संघर्ष के बाद पुनः शामिल करना पड़ा।
अब उसी मानसिकता ने संविधान निर्माता बाबासाहेब के नाम से स्थापित डॉ. अम्बेडकर पीठ को ही समाप्त कर दिया। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि एक खतरनाक संकेत है। दैनिक नवज्योति की रिपोर्ट के अनुसार यह निर्णय बिना सार्वजनिक सूचना, बिना पारदर्शी प्रक्रिया और बिना जवाबदेही के लिया गया।
यह और गंभीर इसलिए है क्योंकि भाजपा सरकार, शिक्षा विभाग, राजस्थान शिक्षा आयोग और विश्वविद्यालय प्रशासन को जानकारी होने के बावजूद चुप्पी साधे रखना लापरवाही नहीं, बल्कि सहमति और संरक्षण को दर्शाता है।
अम्बेडकर को मिटाने का अर्थ केवल एक पीठ को खत्म करना नहीं, बल्कि संविधान, सामाजिक न्याय, समानता, आरक्षण और वंचित तबकों के अधिकारों पर हमला है। जो ताकतें अम्बेडकर को शैक्षणिक संस्थानों से बाहर करना चाहती हैं, वे संविधान को कमजोर करना चाहती हैं।
विश्वविद्यालय में नियुक्तियों में अनियमितताओं, कथित “गैंग” और भ्रष्टाचार के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं, फिर भी सरकार और शिक्षा आयोग मौन हैं। सवाल यह नहीं कि पीठ क्यों बंद की गई, सवाल यह है कि किसके इशारे पर और किस वैचारिक एजेंडे के तहत यह किया गया।
हम स्पष्ट माँग करते हैं—
1. अम्बेडकर पीठ की तत्काल बहाली हो।
2. जिम्मेदार कुलपति व अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए।
3. शिक्षा आयोग व विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका की स्वतंत्र न्यायिक जाँच कराई जाए।
डॉ. अम्बेडकर किसी इमारत का नाम नहीं, बल्कि बराबरी, अधिकार और संविधान की जीवंत आवाज़ हैं। जो लोग उन्हें मिटाने की कोशिश कर रहे हैं, वे भ्रम में न रहें—इतिहास उन्हें कभी माफ़ नहीं करेगा।
आशीष भारतीय Ashish Bhartiya
छात्र नेता, डॉ. अम्बेडकर स्टूडेंट्स फ्रंट ऑफ़ इंडिया (DASFI)
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र (हरियाणा)