23/06/2026
"अलग-अलग किरदार वो निभाती है, फिर भी वो माँ ही कहलाती है"
कभी सुबह की पहली किरण के साथ उठती है,
थकी हुई आँखों से भी मुस्कुराकर सबको जगाती है।
कभी रसोई में बसी होती है उसकी ममता,
हर निवाले में प्यार की मिठास भर जाती है।
कभी टीचर बनकर पढ़ाती है जीवन का पाठ,
गलतियों पर डांट भी लगाती है, पर आँखों में रहता है केवल प्यार का साथ।
कभी दोस्त बनकर हमारे राज़ छुपाती है,
और कभी भगवान बनकर हमारे दुख मिटाती है।
कभी वक्त की कमी में खुद को भुला देती है,
हमारे सपनों को पूरा करने को अपने अरमानों को लुटा देती है।
बचपन से लेकर बड़े होने तक,
हर मोड़ पर वो हमारे साथ चलती है चुपचाप।
ना कोई छुट्टी, ना कोई शिकायत,
बस हर दिन सेवा, हर पल करुणा की रीत निभाती है।
इतने रूप, इतने भाव… फिर भी सिर्फ एक नाम—
जिसे हम प्यार से कहते हैं ‘माँ’।
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