03/07/2020
कारगिल के इन वीरों को सलाम, खून का आखिरी कतरा भी किया देश पर
नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। कारगिल युद्ध को दो दशक पूरे हो चुके हैं। इस युद्ध में भारत ने अपने 527 जवानों को खो दिया था जबकि 1363 जवान घायल हुए थे। चार भारतीय जवानों को इस युद्ध में अदम्य साहस के लिए सेना का सर्वोच्च पदक परमवीर चक्र प्रदान किया गया था। इनमें से दो को मरणोपरांत यह पदक दिया गया था जबकि दो हमारे बीच आज भी मौजूद हैं। ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव इस पदक को पाने वाले सबसे कम उम्र के जवान हैं। भारतीय जवानों ने इस युद्ध में अपने खून का आखिरी कतरा देश की रक्षा के लिए न्यौछावर कर दिया था। इन जांबाजों की कहानियां आज भी रोंगटे खड़े कर देती हैं।
इस युद्ध में भारतीय सेना के कई रणबांकुरों ने अपने प्राणों की आहुति देकर अपने देश का मान बनाए रखा और दुश्मन को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। देश उन शहीदों को नमन कर रहा है जिन्होंने अपने प्राणों को न्यौछावर कर दिया। अदम्य साहस के बल पर पाकिस्तानी घुसपैठियों के छक्के छुड़ा दिए। विजय दिवस के मौके पर हम उन सूरमाओं के बारे में बता रहे हैं जो देश के लिए आन, बान और शान हैं।

कैप्टन मनोज कुमार पांडे
जन्म : 25 जून 1975, सीतापुर, उत्तर प्रदेश
शहीद हुए : 3 जुलाई 1999 (24 वर्षीय)
यूनिट : 11 गोरखा राइफल की पहली बटालियन (1/11 जीआर)
मरणोपरांत परम वीर चक्र
शौर्य गाथा: कारगिल युद्ध के दौरान 11 जून को उन्होंने बटालिक सेक्टर से दुश्मन सैनिकों को खदेड़ दिया। उनके नेतृत्व में सैनिकों ने जुबार टॉप पर कब्जा किया। वहां दुश्मन की गोलीबारी के बीच भी आगे बढ़ते रहे। कंधे और पैर में गोली लगने के बावजूद दुश्मन के पहले बंकर में घुसे। हैंड-टू-हैंड कॉम्बैट में दो दुश्मनों को मार गिराया और पहला बंकर नष्ट किया। उनके साहस से प्रभावित होकर सैनिकों ने दुश्मन पर धावा बोल दिया। अपने घावों की परवाह किए बिना वे एक बंकर से दूसरे बंकर में हमला करते गए।
आखिरी बंकर पर कब्जा करने तक वे बुरी तरह जख्मी हो चुके थे। यहां वह शहीद हो गए। उनके आखिरी शब्द थे- ‘ना छोड़नूं’ (नेपाली भाषा में ‘उन्हें छोड़ना नहीं’)।