24/03/2016
छात्रों भगत सिंह को कभी मत पढ़ना
Written by : रवीश कुमार
Date : 2016-03-23
नोट: वर्ना भगत सिंह को पढ़कर तुम्हारे विचार बदल सकते हैं। तुम राजनीति करने लगोगे और सरकारें तुम्हें बाग़ी करार देंगी। पिछले एक महीने से ‘मूर्खता के विद्वानों’ ने कह कहकर पका दिया है कि छात्र पढ़ने जाते हैं या राजनीति करने। सोचिये यही बात छात्रों ने मान ली होती तो हमारी आजादी का क्या होता। बेहतर है कि भगत सिंह पर बनी दोयम दर्जे की फ़िल्में देखो, उनके पोस्टर कमरे में लगाकर तेईस मार्च को एक ट्वीट कर दो। यह लेख मैंने भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण दस्तावेज़ पुस्तक से आपके लिए टाइप किया है। लखनऊ के राहुल फ़ाउंडेशन ने सत्यम के संपादन में छापा है। 1928 में भगत सिंह ने इसे किरती के लिए लिखा था।)
इस बात का बड़ा भारी शोर सुना जा रहा है कि पढ़ने वाले नौजवान राजनीतिक या पोलिटिकल कामों में हिस्सा न लें। पंजाब सरकार की राय बिल्कुल ही न्यारी है। विद्यार्थियों से कालेज में दाख़िल होने से पहले इस आशय की शर्त पर हल्ताक्षर करवाये जाते हैं की वे पोलिटिकल कामों में हिस्सा नहीं लेंगे। आगे हमारा दुर्भाग्य कि लोगों की और से चुना हुआ मनोहर, जो अब शिक्षा मंत्री है, स्कूल कॉलेजों के नाम एक सर्कुलर भेजता है कि कोई पढ़ने पढ़ाने वाला पोलिटिक्स में हिस्सा न ले। कुछ दिन हुए जब लाहौर में स्टुडेंड्स की ओर से विद्यार्थी सप्ताह मनाया जा रहा था। वहाँ भी सर अब्दुल कादर और प्रोफेसर ईश्वरचन्द्र नन्दा ने इस बात पर जोर दिया कि विद्यार्थियों को पोलिटिक्स में हिस्सा नहीं लेना चाहिए ।
पंजाब को राजनीतिक जीवन में सबसे पिछड़ा हुआ कहा जाता है। इसका क्सा कारण है? क्या पंजाब ने बलिदान कम किये हैं? क्या पंजाब ने मुसीबतें कम झेली हैं? फिर क्या कारण है कि हम इस मैदान में सबसे पीछे हैं? इसका कारण स्पष्ट है कि हमारे शिक्षा विभाग के अधिकारी लोग बिल्कुल ही बुद्धु हैं। आज पंजाब कैंसिल की कार्रवाई पढ़ कर इस बात का अच्छी तरह पता चलता है कि इसका कारण यह है कि हमारी शिक्षा निकम्मी होती है और फ़िज़ूल होती है। विद्यार्थी युवा-जगत अपने देश की बातों में कोई हिस्सा नहीं लेता। उन्हें इस संबंध में कोई भी ज्ञान नहीं होता। जब वे पढ़कर निकलते हैं तब उनमें से कुछ ही आगे पढ़ते हैं लेकिन वे ऐसी कच्ची कच्ची बातें करते हैं कि सुनकर स्वयं ही अफ़सोस कर बैठ जाने के सिवाय कोई चारा नहीं होता। जिन नौजवानों को कल देश की बागडोर हाथ में लेनी है, उन्हें आज ही अक़्ल के अन्धे बनाने की कोशिश की जा रही है। इससे जो परिणाम निकलेगा वह हमें ख़ुद ही समझ लेना चाहिए। यह हम मानते हैं कि विद्यार्थियों का मुख्य काम पढ़ाई करना है, उन्हें अपना पूरा ध्यान उस ओर लगा देना चाहिए लेकिन क्या देश की परिस्थितियों का ज्ञान और उनके सुधार के उपाय सोचने की योग्यता पैदा करना उस शिक्षा में शामिल नहीं है? यदि नहीं तो हम उस शिक्षा को भी निकम्मी समझते हैं जो सिर्फ क्लर्की करने के लिए हासिल की जाए। ऐसी शिक्षा की ज़रूरत ही क्या है? कुछ ज़्यादा चालाक आदमी यह कहते हैं कि काका तुम पोलिटिक्स के अनुसार पढ़ो और सोचो ज़रूर लेकिन कोई व्यावहारिक हिस्सा न लो। तुम अधिक योग्य होकर देश के लिए फ़ायदेमन्द साबित होगे।
बात बड़ी सुन्दर लगती है। लेकिन हम इसे भी रद्द करते हैं क्योंकि यह भी सिर्फ ऊपरी बात है। इस बात ये यह स्पष्ट हो जाता है कि एक दिन विद्यार्थी एक पुस्तक ‘appeal to the young’ Prince Kropotkin पढ़ रहा था। एक प्रोफेसर साहब कहने लगे यह कौन सी पुस्तक है? और यह तो किसी बंगाली का नाम जान पड़ता है! लड़का बोल पड़ा- प्रिन्स क्रोपोटकिन का नाम बड़ा प्रसिद्ध है। वे अर्थशास्त्र के विद्वान थे। इस नाम से परिचित होना प्रत्येक प्रोफेसर के लिए बड़ा ज़रूरी था। प्रोफेसर की ‘योग्यता’ पर लड़का हंस भी पड़ा और उसने फिर कहा- ये रूसी सज्जन थे। बस ! रूसी ! क़हर टूट पड़ा। प्रोफेसर ने कहा कि तुम बोल्शेविक हो, क्योंकि तुम पोलिटिकल पुस्तकें पढ़ते हो
देखिये आप प्रोफेसर की योग्यता! अब उन बेचारे विद्यार्थियों को उनसे क्या सीखना है? ऐसी स्थिति में वे नौजवान क्या सीख सकते हैं?
दूसरी बात यह है कि व्यावहारिक राजनीति क्या होती है? महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू ओर सुभाषचंद्र बोस का स्वागत करना और भाषण सुनना तो हुई व्यावहारिक राजनीति, पर कमिशन या वायसराय का स्वागत करना क्या हुआ? क्या वह पोलिटिक्स का दूसरा पहलू नहीं है? कहा जायेगा कि इससे सरकार ख़ुश होती है और दूसरी से नाराज़? फिर सवाल तो सरकार की खुशी या नाराज़गी का हुआ। क्या विद्यार्थियों को जन्मते ही ख़ुशामद का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए? हम तो समझते हैं कि जप तक हिन्दुस्तान में विदेशी शासन कर रहे हैं तब तक वफ़ादारी करने वाले वफ़ादार नहीं बल्कि गद्दार हैं, पेट