College of Agriculture Lakhimpur Kheri, Campus CSA Kanpur

College of Agriculture Lakhimpur Kheri, Campus CSA Kanpur College of Agriculture

कृषि महाविद्यालय में फ्रेशर्स पार्टी का आयोजनकृषि महाविद्यालय परिसर में नए विद्यार्थियों का स्वागत किया गया I कार्यक्रम ...
24/12/2025

कृषि महाविद्यालय में फ्रेशर्स पार्टी का आयोजन
कृषि महाविद्यालय परिसर में नए विद्यार्थियों का स्वागत किया गया I कार्यक्रम का शुभारंभ पारंपरिक दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। कार्यक्रम का आयोजन महाविद्यालय की संस्कृतिक समिति के मार्गदर्शन में द्वितीय वर्ष के छात्रों द्वारा किया गया l बीएससी प्रथम वर्ष के छात्रों ने कार्यक्रम में
बढ़-चढ़कर भाग लिया। नवागंतुक विद्यार्थियों द्वारा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए, जिनमें समूह नृत्य, एकल नृत्य, गायन तथा कवितायें शामिल थी, जिनके माध्यम से छात्रों के आत्मविश्वास, अभिव्यक्ति कौशल और व्यक्तित्व का मूल्यांकन किया गया। इस अवसर पर अधिष्ठाता महोदय ने छात्रों को संबोधित करते हुए महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय की तरफ से उनका स्वागत किया और कहा कि फ्रेशर्स पार्टी जैसे कार्यक्रम विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इससे न केवल नए छात्रों को महाविद्यालय के वातावरण में घुलने-मिलने का अवसर मिलता है, बल्कि उनमें नेतृत्व, रचनात्मकता और आत्मविश्वास भी विकसित होता है। उन्होंने सभी प्रतिभागियों की सराहना करते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की। इस अवसर पर महाविद्यालय के सभी शिक्षक कर्मचारी एवं छात्र उपस्थित रहे l

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आलू की बुआई से पूर्व बीजोउपचार हेतु कंद का शोधन
वैज्ञानिक विधियाँ, सावधानियाँ और व्यावहारिक सुझाव

(डॉ.) राज कुमार
सह-अध्यापक, कृषि महाविद्यालय लखीमपुर खीरी कैम्पस चन्द्र शेखर आजाद कृषि प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कानपुर, उ०प्र०

आलू उत्पादन की सफलता बीज से ही तय होती है। खेत की उपज कभी भी बीज की गुणवत्ता से आगे नहीं जा सकती। इसलिए बुआई से पहले कंद का शोधन ऐसा है जैसे पौधों की एक छोटी सेना को रोगों के खिलाफ कवच पहनाना। यह प्रक्रिया रोगजनित फफूंद, जीवाणु और सतही संक्रमणों को कम करती है, अंकुरण को बेहतर बनाती है और पौधे की शुरुआती वृद्धि को सुरक्षित करती है। सही तरीके से किया गया बीज-शोधन खेती की संपूर्ण लागत घटाता है और उत्पादन 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़ा सकता है।

1. बीज कंद का सही चयन

शोधन की पहली शर्त

बीज-शोधन का प्रभाव तभी दिखता है, जब कंद स्वयं स्वस्थ और गुणवत्तापूर्ण हों। इसलिए सबसे पहले खेत में उपयोग होने वाले बीज का चयन सावधानी से करें।

कंद का आकार: मध्यम आकार (40–50 ग्राम) के कंद सर्वोत्तम माने जाते हैं।

दिखावट: कंद की सतह चमकदार, सख्त एवं दाग-धब्बों से मुक्त होनी चाहिए। काले धब्बे, सड़न, दरारें या कीट सुरंगें रोग की उपस्थिति का संकेत हैं।

अंकुर की स्थिति: छोटा, मोटा और हल्का हरा अंकुर आदर्श होता है। बहुत लंबा अंकुर टूट जाने का खतरा रहता है।

कंद की परिपक्वता: अधपके, बहुत ताजे या अत्यधिक सिकुड़े हुए कंद शोधन के बाद भी खराब प्रदर्शन देते हैं।

कंद चयन में थोड़ी अतिरिक्त सावधानी आगे की पूरी फसल को सुरक्षित बना देती है।

2. कंद की पूर्व-सफाई

शोधन के लिए कंद तैयार करना
शोधन के पहले कंद को साफ पानी से हल्का धोना एक छोटी-सी परंतु महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। मिट्टी, धूल और फफूंद के बीजाणु कंद की सतह पर चिपके होते हैं। यदि इन्हें हटाया न जाए, तो दवा का प्रभाव कम हो जाता है। इसलिए....
*कंद को पानी से धोकर
*छाया में 1–2 घंटे सुखाना चाहिए
*ताकि कंदों की सतह हल्की नम रहे और दवा अच्छी तरह चिपक सके।

3. बीज कंद के शोधन की वैज्ञानिक विधियाँ

A. डुबोकर शोधन (Dipping Treatment)

यह सबसे प्रभावी और लोकप्रिय तरीका है, जो ब्लैक स्कर्फ, सिल्वर स्कर्फ, राइजोक्टोनिया, सूखी सड़न एवं कई कवकीय रोगों को नियंत्रित करता है।

उपयुक्त रासायनिक विकल्प

निम्नलिखित रासायनिक विधियों में से किसी एक का प्रयोग करना चाहिए।

1. मैनकोजेब 0.25 प्रतिशत घोल

*250 ग्राम मैनकोजेब प्रति 100 लीटर पानी
*कंदों को 10 मिनट डुबोकर रखें
*यह फफूंदनाशक व्यापक रोग नियंत्रण क्षमता रखता है

2.कार्बेन्डाजिम 0.1 प्रतिशत घोल

*100 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति 100 लीटर पानी
*10 मिनट तक उपचार पर्याप्त है
*यह कंद की सतह में प्रवेश कर सिस्टमिक सुरक्षा देता है

3.कैप्टन 0.25 प्रतिशत या थायोफेनेट मिथाइल

यदि खेत में मिट्टी जनित रोग अधिक हों तो यह बेहतर विकल्प है।
उपचार के बाद कंदों को छाया में एक परत में फैलाकर सुखाना अनिवार्य है। गीले कंद बोने से सड़न का खतरा बढ़ता है।

B. जैव-एजेंट द्वारा शोधन

रासायनिक उपचार के बाद जैव-एजेंट लगाने से कंद पर लाभकारी सूक्ष्मजीवों की सुरक्षा परत बन जाती है। यह मिट्टी में मौजूद हानिकारक फफूंद और जीवाणुओं से रक्षा करता है।

उपयुक्त जैव-एजेंट

Trichoderma viride/T. harzianum/
Pseudomonas fluorescens (कुछ क्षेत्रों में लोकप्रिय)

खुराक

*5–10 ग्राम चूर्ण प्रति किलोग्राम बीज
*कंद हल्के नम हों ताकि जैव-एजेंट अच्छी तरह चिपक जाए

महत्वपूर्ण नियम

*रासायनिक उपचार और जैव-एजेंट को कभी एक ही घोल में मिलाकर उपयोग न करें
*पहले रासायनिक शोधन करें, कंद सूख जाएँ, फिर जैव-एजेंट का लेप दें

C. कटे हुए कंद का शोधन

कुछ किसान कट-सिड (Cut Seed) तकनीक अपनाते हैं, विशेषकर बड़े बीज-आलू के लिए। इस स्थिति में कंद को 2–4 टुकड़ों में काटकर लगाया जाता है। ऐसे कंदों के लिए शोधन और भी जरूरी हो जाता है।

सही तरीका

*कटाई साफ और तेज चाकू से करें
*कटे हुए हिस्सों को कैप्टन चूर्ण (3 ग्राम प्रति किलो बीज) या ट्राइकोडर्मा चूर्ण में लपेटें
*कंदों को 24 घंटे तक छाया में सुखाकर कट-सतह को “कार्किंग” बनने दें
पूरी तरह सूखने के बाद ही बोएँ
कट-सिड में थोड़ी सी लापरवाही भारी सड़न और फसल हानि का कारण बन सकती है।

4. शोधन के समय बरती जाने वाली पूरी सावधानियाँ

1. ताजा और स्वच्छ पानी का उपयोग
गंदे पानी में दवा की प्रभावकारिता घट जाती है।
2. धूप में उपचार न करें
धूप में दवा तेजी से सूख जाती है और अंकुर गर्म होकर क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।
3. डुबोने का समय नियंत्रित रखें
10 मिनट पर्याप्त है, अधिक समय कंद की त्वचा को कमजोर कर सकता है।
4. अंकुर सुरक्षित रखें
बीज को कंधों पर फेंकना या बोरी में दबाना अंकुर तोड़ देता है।
5. उपचारित बीज को नम न रहने दें
गीले कंद फफूंद के लिए आदर्श परिस्थिति बनाते हैं।
6. जैव-एजेंट और रसायन अलग-अलग चरण में लगाएँ
दोनों को साथ मिलाने से जैव-एजेंट नष्ट हो जाते हैं।

5. उन्नत सुझाव: बेहतर अंकुरण और समान अंकुर विकास हेतु

बीज कंदों को बोआई से 2–3 दिन पहले छाया में फैलाकर “ग्रीनिंग” या “क्योरिंग” प्रक्रिया करें।
इससे कंद मजबूत होते हैं और चोट का प्रभाव कम होता है।
यदि कंद शीतगृह से निकाले गए हों, तो उन्हें 48 घंटे कमरे के तापमान में रखकर संतुलित ताप हासिल करने दें।

अंत में....

आलू की बुआई से पहले कंद का शोधन एक छोटी-सी प्रक्रिया है, लेकिन इसका लाभ पूरे मौसम भर मिलता है। यह न केवल रोग प्रबंधन में सहायक है, बल्कि अंकुरण क्षमता, पौधे की शुरुआती वृद्धि और कुल उत्पादन को भी बेहतर बनाता है। किसान यदि ऊपर दिए गए विज्ञानसंगत तरीकों और सावधानियों को अपनाएँ, तो वे रोग के जोखिम को 50 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं और स्वस्थ, आकर्षक तथा अधिक उपज देने वाली फसल प्राप्त कर सकते हैं।

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