शिवकुमार शौर्य

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05/07/2025

जब महात्मा गांधी ने जम्मू कश्मीर जाने वाली भारतीय फौज को अपना आशीर्वाद दिया।

माउंटबेटन चाहते थे कि महाराजा हरिसिंह 15 अगस्त से पहले कश्मीर को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय करें। जब माउंटबेटन यह प्रस्ताव लेकर कश्मीर पहुंचे तो महाराजा ने पेट दर्द का बहाना कर उनसे बात नहीं की। क्योंकि महाराजा अपनी रियासत को हर कीमत पर स्वतंत्र रखने के सपने देख रहे थे।

उन्होंने अपनी रियासत को स्वतंत्र बनाये रखने के लिए
श्रीनगर स्थित जगमगाते हुए दरबार हाल में एक भव्य सामारोह का आयोजन किया। उन्होंने इस कार्यक्रम में अपनी रियासत के सभी प्रतिष्ठित लोगों से राजभक्ति का वचन लिया। रियासत के सभी प्रतिष्ठित लोग एक एक करके उनके सिंहासन के पास आते और रेशमी रूमाल में लिपटी हुई स्वर्ण मुद्रा का नजराना राजसी हाथों में रखकर अपनी राजभक्ति का प्रमाण दे रहे थे।

जिस समय यह भव्य कार्यक्रम चल रहा था ठीक उसी समय श्रीनगर से 50 मील दूर कुछ पाकिस्तानी घुसपैठियों ने एक विद्युत केंद्र के कन्ट्रोल रूम में डायनामाइट लगाकर जोर का विस्फोट किया और महाराजा हरिसिंह के भव्य महल के बिल्लूरी फानूसों में जगमगाती हुई सैकड़ों बत्तियां अचानक गुल हो गईं। डल झील के झिलमिलाते पानी पर फूलों से सजी हुई कमरे के आकार की नावों पर अचानक सन्नाटा पसर गया। यह अपशकुन पाकिस्तानी कबायली हमले के कारण हुआ और कबायली एक दो दिन में महाराजा के महल पर हमला करने वाले थे।

माउंटबेटन को यह समाचार दिल्ली में उस समय मिला जब वे थाईलैंड के विदेश मंत्री के सम्मान में भोज दे रहे थे। इस कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू भी मौजूद थे। जब सब अतिथि चले गए तब वाइसराय ने नेहरू को कुछ देर रुकने को कहा और कश्मीर के सारे बदलते हालात की जानकारी दी।

पाकिस्तान के कबायली हमले से घबराए महाराजा हरिसिंह ने 24 अक्टूबर 1947 को भारत सरकार से सैनिक सहायता के लिए संदेश भेजा। 25 अक्टूबर को सुबह प्रधानमंत्री नेहरू की अध्यक्षता में सुरक्षा समिति की बैठक हुई जिसमें यह तय किया गया कि वी पी मेनन को तत्काल कश्मीर भेजा जाए। उसी दिन मेनन हवाई जहाज से श्रीनगर पहुंचे और सीधे कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री मेहरचंद महाजन के घर गए। मेनन ने महाराजा हरिसिंह को कश्मीर से जम्मू भाग जाने की सलाह दी क्योंकि उनकी जान को खतरा था।

26 अक्टूबर को मेहरचंद महाजन, वीपी मेनन के साथ दिल्ली पहुंचे । सुरक्षा समिति की दूसरी बैठक बुलाई गई जिसमें माउंटबेटन, प. नेहरू, सरदार पटेल भी मौजूद थे। माउंटबेटन ने सलाह दी कि सेना भेजने से पहले महाराजा हरिसिंह के विलय पत्र पर हस्ताक्षर करा लिए जाएं।

मेनन तत्काल जम्मू रवाना हुए जहां एक महल में महाराजा हरिसिंह ने शरण ले रखी थी। जब मेनन महल में पहुंचे तो महाराजा गहरी नींद में सो रहे थे। वे एक दिन पहले ही श्रीनगर से जम्मू आये थे और अपने सहायक से यह कहकर सोए थे कि अगर वीपी मेनन सुबह तक नहीं आएं तो मुझे रिवाल्वर से गोली मार देना। लेकिन मेनन इसके पहले ही उनके पलंग के पास पहुंच गए और विलय पत्र पर उनके हस्ताक्षर करा लिए गए।

जिस समय कश्मीर का यह पूरा मसला चल रहा था महात्मा गांधी उस समय आसाम में थे। वे 1 अगस्त 1947 को जम्मू कश्मीर का दौरा करने गए थे और वहां उन्होंने कश्मीर की पूरी नब्ज समझ ली थी और वहां से लौटकर उन्होंने माउंटबेटन सहित नेहरू व पटेल को पूरी स्थिति की जानकारी दे दी थी।

जब सरदार पटेल ने कश्मीर में फौज भेजने की बात महात्मा गांधी को तार द्वारा बतलाई तो महात्मा गांधी ने कश्मीर में फौज भेजने के कदम का स्वागत किया। उन्होंने आसाम से खबर भेजी कि पाकिस्तान की बदमाशी का मुकाबला करो , फौज भेजो कश्मीर और वहां से पाकिस्तान को खदेड़ कर बाहर कर दो।

सरदार पटेल ने महात्मा गांधी को तार से यह भी सूचित किया कि भारत सरकार ने पाकिस्तान के हिस्से का शेष बचा 55 करोड़ रुपया न देने का फैसला किया है क्योंकि पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया है। अगर हम इस 55 करोड़ पाकिस्तान को देते हैं तो वे लोग इससे हथियार व गोलाबारूद खरीदेंगे और हमारे ही लोगों को मारेंगे। सरदार पटेल ने कहा कि 55 करोड़ देने की ये बेवकूफी तो मैं नहीं कर सकता। बिल्कुल बाजिव तर्क था सरदार पटेल का।

गांधीजी ने एक दूसरा स्टैंड लिया । उन्होंने आसाम से खबर भेजी कि ये बात गलत है। 55 करोड़ रुपया अपनी जगह पर है और पाकिस्तान की ये बदमाशी अपनी जगह पर है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान का मुकाबला करो , फौज कश्मीर भेजो और वहां से पाकिस्तान खदेड़ कर बाहर कर दो। लेकिन 55 करोड़ रुपये को उससे क्यों जोड़ते हो? ये तो एक अलग तरह की संधि में तुमने खुद ने तय किया है। विभाजन भी तुमने ही स्वीकार किया था मुझसे पूछे बगैर। ये संधि का रुपया है, पाकिस्तान की देनदारी है, देश अभी अभी आजाद हुआ है दुनिया में तुम क्या मुंह दिखाओगे कि तुम अपनी बात से भी पीछे हट जाते हो? इतना बेसिक नैतिक सवाल उन्होंने खड़ा किया कि ये पैसा पाकिस्तान को देकर ये झंझट हमेशा के लिए खत्म करो और पाकिस्तान को कश्मीर से बाहर खदेड़ दो।

आपको जानकर आश्चर्य होगा कि अहिंसा के पुजारी ने पाकिस्तान से लड़ने वाली फौज को आशीर्वाद दिया और कहा कि जाइये और लड़िये और पाकिस्तान को वहां से खदेड़ दीजिये। अन्तराष्ट्रीय सीमा पर देश की रक्षा कैसे होगी, अहिंसा से ये रास्ता मैं अभी तक नहीं खोज पाया हूँ। इसलिए जो रास्ता तुमको (फौज) मालूम है उससे देश की रक्षा करो। उन्होंने फौज से कहा कि तुम केला खाने को नहीं रखे गए हो। तुम्हारा काम है देश की रक्षा करना।

इसलिए जो लोग यह समझते हैं कि गांधीजी क्या सीमा पर जाकर चरखा कातकर देश की रक्षा करते ? उन्हें यह प्रसंग पढ़ना चाहिए कि गांधीजी देश की सीमा के उल्लंघन को देश की देह की मर्यादा का उल्लंघन या देश की अस्मिता का चीरहरण मानते थे।

सन्दर्भ- फ्रीडम एट मिडनाइट
गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष कुमार प्रशांत के भाषण का अंश

Gandhi Darshan - गांधी दर्शन
3 जुलाई 2025

26/06/2025
27/10/2024
05/10/2024

"Educate, Agitate, Organise" - डॉ. भीमराव अंबेडकर

यह सोच न्याय प्राप्त करने का ज़रिया है - देश को दिशा देने वाला एक क्रांतिकारी खयाल है।

Educate यानी शिक्षित करो - अपने इतिहास के बारे में, अपनी आवश्यकताओं के बारे में, अपनी आकांक्षाओं के बारे में, और सबसे अधिक, अपने अधिकारों के बारे में।

Agitate यानी जागृत करो - खुद को अपने हक़ के लिए लड़ने के लिए, समाज को संवेदना और समावेशिता के लिए, और देश को न्याय के लिए।

Organise यानी संगठित हो - अन्याय के विरुद्ध लड़ने के लिए, सत्याग्रह के माध्यम से अपना हक़ प्राप्त करने के लिए, और एकता का उदाहरण बनने के लिए।

बाबासाहेब का यह संदेश हर दशक में महत्वपूर्ण है और हर युग में अत्याचार के खिलाफ शक्ति के साथ खड़े होने के लिए प्रेरणादायक है।

04/10/2024

शोधार्थियों के लिए निःशुल्क ऑनलाइन आर्काइव और डिजिटल लाइब्रेरी
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3. डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ़ इंडिया : शिक्षा मंत्रालय द्वारा संचालित और आईआईटी, खड़गपुर द्वारा विकसित इस वेबसाइट से आपको अपने शोध के संदर्भ में काफ़ी सामग्री मिल सकती है।

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जर्नल में प्रकाशित लेखों के लिए

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Reborn Manish तुम अहंकारी हो गए हो भगत..प्रसिद्धि से दिमाग खराब हो गया है। घमंड, तुम्हारे और ईश्वर के बीच आ खड़ा हुआ है।...
01/10/2024

Reborn Manish

तुम अहंकारी हो गए हो भगत..

प्रसिद्धि से दिमाग खराब हो गया है। घमंड, तुम्हारे और ईश्वर के बीच आ खड़ा हुआ है।
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लाहौर जेल में वयोवृध्द कैदी रणधीर सिंह ने भगत को डांटा। वे भी क्रांतिकारी थे, ईश्वर पर विश्वास करते। लेकिन भगत नही करता, जानकर बड़ा दुख हुआ।

तो मिलते ही बाबा ने लड़के को डांट लगाई। तब भगत सिंह ने एक लेख लिखा, जो लाहौर के द पीपुल में 27 सितंबर 1931 को प्रकाशित हुआ।

शीर्षक - मैं नास्तिक क्यो हूं..
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लिखते हैं .. नया प्रश्न आ खड़ा हुआ है।

मेरे दोस्तों को लगता है कि दिल्ली बम और लाहौर षडयन्त्र केस मे मुझे जो अनावश्यक यश मिला, शायद उस कारण मैं वृथाभिमानी हो गया हूँ। ईश्वर मे मेरी अनास्था, मेरे अहंकार का परिणाम है।

मेरा नास्तिकता कोई अभी हाल की उत्पत्ति नहीं है। मैंने तो ईश्वर पर विश्वास करना तब छोड़ दिया था, जब एक गुमनाम छात्र था।
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तब बड़ा लजालु लड़का था, थोड़ा निराशावादी प्रकृति। दादाजी, जिनके प्रभाव में बड़ा हुआ, वे रूढ़िवादी आर्य समाजी हैं। और आर्य समाजी कुछ भी हो, नास्तिक कतई नहीं होता। लाहौर छात्रावास में उनके साथ, सुबह शाम प्रार्थना, और गायत्री मंत्र घण्टों जपता।

तब मैं सकल भक्त था।

फिर पिता के साथ रहने लगा। जो धार्मिक उदारवादी हैं। उन्हीं की शिक्षा से मुझे आजादी के लिए जीवन लगाने की प्रेरणा मिली। पर नास्तिक वे भी नहीं। ईश्वर में दृढ़ विश्वास है, मुझे पूजा.प्रार्थना के लिये प्रोत्साहित करते।
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असहयोग आन्दोलन के दौर में नेशनल कॉलेज में एडमिशन लिया। पहली बार धर्म, और ईश्वर के अस्तित्व के बारे में सोचा, विचारा, आलोचना की।

फिर भी पक्का आस्तिक था। लम्बे बाल रखता। सिक्ख, या अन्य धर्मों के पौराणिक सिद्धान्तों में विश्वास तो नही ही था। पर ईश्वर के होने में निष्ठा थी।
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फिॅर क्रान्तिकारी पार्टी से जुड़ा। जिस नेता से पहला सम्पर्क हुआ, पक्का धार्मिक न होते हुए भी, ईश्वर के अस्तित्व को नकारने का साहस न करते थे।

मेरे हठी सवालों पर कहते- अगर इच्छा हो, तो पूजा कर लिया करो।
यह ऐसी नास्तिकता है,जिसमें साहस का अभाव है।
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दूसरे नेता, जिनके सम्पर्क में आया,
पक्के श्रद्धालु आदरणीय कामरेड शचीन्द्र नाथ सान्याल।

वे काकोरी केस में आजीवन कारवास भोग रहे हैं। उनकी किताब बन्दी जीवन, ईश्वर की महिमा का ज़ोरदार गान है।

उनके क्रांतिकारी पर्चाे में भी ईश्वर का महिमा गान ही रहता था।
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काकोरी के चारो शहीदों ने अपने अन्तिम दिन भजन प्रार्थना में गुजारे। बिस्मिल तो रूढ़िवादी आर्य समाजी थे। राजेन लाहड़ी भी समाजवाद-साम्यवाद के वृहद अध्ययन के बावजूद, उपनिषदो, गीता के श्लोक उच्चारण की अभिलाषा रोक न सके।

बस, एक ही व्यक्ति मिला जो कभी प्रार्थना नहीं करता था। कहता था- दर्शनशास्त्र मनुष्य की दुर्बलता और ज्ञान के सीमित होने से उत्पन्न होता है। वह भी आजीवन निर्वासन की सजा भोग रहा है।

पर ईश्वर के अस्तित्व को नकारने की हिम्मत उसने भी न की।
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अब तक हम रोमान्टिक, आदर्शवान क्रान्तिकारी थे।दूसरों का अनुसरण करते। पर अब खुद ज़िम्मेदारी लेने का वक्त था। यह मेरे क्रान्तिकारी जीवन का एक निर्णायक बिन्दु था।

तब अध्ययन् की पुकार मेरे मन के गलियारों में गूँजने लगी। विरोधियों के तर्कों का सामना करने लायक बनो, अध्ययन करो। अपने मत के पक्ष में तर्क देने लायक बन जाने के वास्ते पढ़ो।

अब मैंने पढ़ना शुरू किया।
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तो मेरे विचार व विश्वास, अद्भुत परिष्कृत हुए। रोमांटिस्ज्मि की जगह गम्भीर विचारों ने ली।

मैने अराजकतावादी नेता बाकुनिन को पढ़ा। कुछ साम्यवाद के पिता मार्क्स को, किन्तु अधिक लेनिन, त्रात्स्की, व अन्य लोगों को पढा़। ये सब जो अपने देश में सफल क्रान्ति लाये थे, नास्तिक थे।

फिर मुझे निरलम्ब स्वामी की पुस्तक ‘सहज ज्ञान’ मिली। इसमें रहस्यवादी नास्तिकता थी। 1926 के अन्त तक मुझे इस बात का विश्वास हो गया कि एक सर्वशक्तिमान ईष्वर, जो ब्रह्माण्ड का सृजन, दिग्दर्शन, संचालन करे ..

कोरी बकवास है।

मैंने यह अविश्वास प्रदर्शित किया। दोस्तों से बहस की।
अब मैं घोषित नास्तिक हो चुका था।
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लेकिन, इस परीक्षण पर खरा उतरना, कठिन है।

विश्वास् कष्टों को हल्का, दुख को सुखकर बना देता हैं। ईश्वर ऐसा मानसिक सहारा है, जिसमे सान्त्वना पाने आधार मिल जाता है। उसके बगैर हमे खुद पर पूरा बोझ लेना पड़ेगा।

और तूफ़ानी झंझवात में पिता की उंगली छोड़, अपने पाँवों पर खड़ा हो जाना, कोई बच्चों का खेल नहीं। परीक्षा की घड़ियों में अहंकार यदि है, तो भाप बन कर उड़ जायेगा।

और तब मनुष्य ईश्वर को ठुकराने का साहस नहीं कर पाता।
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फिर भी कोई ऐसा कर लेता है, तो इसका मतलब यही, कि उसके पास सिर्फ़ अहंकार नहीं, कोई अन्य शक्ति है।

और आज मेरे साथ ठीक वैसी स्थिति है।

मेरे केस मे कोर्ट का निर्णय साफ है। हफ्तेभर में सार्वजनिक हो जायेगा कि मैं अपना जीवन, एक ध्येय पर न्योछावर करने जा रहा हूँ।

तो ईश्वर में विश्वास रखने वाला हिन्दू पुनर्जन्म मे पुनर्जन्म पर राजा होने की आशा कर सकता है। कोई मुसलमान या ईसाई, जन्नत के आनन्द की कल्पना कर सकता है।

पर मै ....??
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पर मैं क्या आशा करूँ?

मेरे लिए तो जिस क्षण फ़न्दा लगेगा, पैरों के नीचे तख़्ता हटेगा, वहां पूर्ण विराम होगा। अन्तिम क्षण, जब मैं, मेरी आत्मा, वहीं समाप्त हो जायेगी।

खत्म हो जाएगी एक छोटी सी जूझती हुई ज़िन्दगी।
जिसकी कोई गौरवशाली परिणति नहीं।

पर यही अपने में एक पुरस्कार होगी, यदि मुझमें इस दृष्टि से देखने का साहस हो। क्येाकि इहलोक या परलोक के किसी स्वार्थ के बगैर, अनासक्त होकर मैने जीवन आजादी को दिया। मेरे पास बस यही था,

कुछ और मै क्या ही दे सकता था ??
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जिस दिन हमें ऐसी सोच के लाखों स्त्री-पुरूष मिल जायें, जो जीवन को मानवोद्धार के अलावे कहीं समर्पित कर ही नहीं सकते, मुक्ति का युग उसी दिन आरंभ होगा।

लोग शोषकों, उत्पीड़कों और अत्याचारियों को इसलिए चुनौती नही देंगे, कि राजा बनना है, पुरस्कार लेना है - यहाँ, या अगले जन्म, या मृत्योपरान्त स्वर्ग में।

वे तो दासता खत्म करने, मुक्ति एवं शान्ति को दुनिया मे स्थापित करने के लिये यह मार्ग अपनायेंगे। इस राह पर चलेंगे क्येाकि उनके शुद्ध अंर्तमन के लिये एकमात्र कर सकने योग्य काम होगा।

तब क्या इस महान ध्येय के प्रति उनके गर्व को, अहंकार कहा जायेगा?
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आलोचना और स्वतन्त्र विचार क्रान्तिकारी के दो अनिवार्य गुण हैं।

हमारे पूर्वजों ने किसी परमात्मा के प्रति विश्वास बना लिया था। सो अब कोई ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती दे, तो विधर्मी, विश्वासघाती कह दिया जाता है।

और उसके तर्क अकाट्य, प्रबल हो, तो भी निन्दा की जायेगी। कहकर कि वह घमंडी है।
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पर ये मेरा अहंकार नहीं, जो मुझे नास्तिकता की ओर ले गया। मैं तो जानता हूँ कि ईश्वर पर आस्था ने मेरा बोझ हलका कर दिया होता। उस पर अविश्वास मेरा वातावरण बेहद शुष्क कर दिया है। थोड़ा रहस्यवाद तो जीवन कवित्वमय बना सकता था।

पर मेरे भाग्य को उन्माद का सहारा नहीं चाहिए।

यथार्थवादी हूँ। अन्तस पर विवेक से विजय चाहता हूँ। हां, इसमे मैं पूरा सफल नहीं हुआ हूँ, मगर प्रयास मनुष्य का कर्तव्य है। सफलता तो संयोग तथा वातावरण पर निर्भर है।
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जब हमारे पूर्वजों ने विश्व के रहस्य, इसके भूत, वर्तमान, भविष्य, क्यों -कहाँ को समझने का प्रयास किया, तो सबने प्रश्नों को अपने अपने ढ़ंग से हल किया।

तभी तो धार्मिक मतों में इतना अन्तर है।
जो वैमनस्य और झगड़े का भी रूप ले लेता है।

पूर्व और पश्चिम में मतभेद है। पूर्व मे इस्लाम तथा हिन्दूओ मे अनुरूपता नहीं। भारत में ही बौद्ध, जैन धर्म और ब्राह्मणवाद मे अंतर हैं। ब्रहम्णवाद मे भी आर्यसमाज व सनातन विरोधी मत पाये जाते हैं। पुराने समय मे ही चार्वाक हुआ, उसने तभी ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती दे दी थी।

और सभी खुद को सही मानते है।

दुर्भाग्यवश हमने पुराने विचारकों के अनुभवों तथा विचारों को अज्ञानता के विरुद्ध लड़ाई की रोशनी नही बनाया। बल्कि बेढब चीख पुकार करते है। दरअसल हम मानवता के विकास को जड़ बनाने के दोषी हैं।
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ये अन्धविश्वास ख़तरनाक है।

दिमाग को मूढ़ और मनुष्य को प्रतिक्रियावादी बना देता है। यदि आप यथार्थवादी है तो आपको रूढ़िगत विश्वासों को चुनौती देनी होगी।

तर्क की कसौटी पर कसना होगा।

यदि वे तर्क के प्रहार से टुकड़े होकर गिर जाए तो नये दर्शन की स्थापना करनी होगी। पुराने धराशायी नए निर्माण करने होंगे।
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मुझे पूरा विश्वास है कि एक चेतन परम आत्मा का, जो प्रकृति की गति का दिग्दर्शन व संचालन करता है, कोई अस्तित्व नहीं है।

हम प्रकृति में विश्वास करते हैं और प्रगतिशीलता का ध्येय मनुष्य की सेवा के लिये प्रकृति पर विजय प्राप्त करना मानते हैं। इसको दिशा देने के पीछे कोई चेतन शक्ति नहीं है।

यही हमारा दर्शन है।
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हम आस्तिकों से कुछ प्रश्न करना चाहते हैं।

यदि आप मानते हैं, कि एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और सर्वज्ञानी ईश्वर ने सृष्टि बनाई, तो कृपया मुझे बतायें कि उसने यह रचना क्यों की?

कष्टों और संतापों से पूर्ण ये दुनिया, असंख्य दुख.. यहां एक भी व्यक्ति पूरी तरह संतृष्ट नही।

अब ये न कहें कि यही उसका नियम है। वे किसी नियम से बँधा हो, सर्वशक्तिमान नहीं है। फिर वो हमारी तरह नियमों का दास है।
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कृपया ये भी न कहें कि यह उसका मनोरंजन है।

फिर नीरो ने तो बस एक रोम जलाया था। थोड़ा दुख पैदा किया, मनोरंजन के लिये। इतिहास में क्या स्थान है उसका? चंगेज खाँ ने अपने आनन्द के लिये, बस कुछ हजार जानें लीं। हम उसके नाम से घृणा करते हैं।

तब कैसे तुम अपने ईश्वर को न्यायोचित ठहराते हो? ऐसा शाश्वत नीरो, जो हर दिन, हर घण्टे- हर मिनट असंख्य दुख देता रहा,

और दे रहा है।
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अच्छा!! तो यह इन निर्दाेष कष्ट सहने वालों को बाद मे पुरस्कार देने, और गलती करने वालों को दण्ड देने के लिये हो रहा है? ठीक है, ठीक है।

अरे, तुम कब तक उस व्यक्ति को उचित ठहराते रहोगे, जो हमारे शरीर पर घाव इसलिये करता है कि बाद में मुलायम और आरामदायक मलहम लगायेगा?

ग्लैडिएटर लड़ाने वाले क्या उचित करते थे कि एक भूखे ख़ूंख़्वार शेर के सामने मनुष्य को फेंक दो। अगर वह अपनी जान बचा लेता है, तो उसकी खूब देखभाल की जायेगी?
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ओ मुसलमानो, ईसाइयो..

तुम पूर्वजन्म में विश्वास नहीं करते। तब तो हिन्दुओं की तरह ये भी नही कह सकते कि जनता के कष्ट, उनके पूर्वजन्मों के फल है।

तो बताओ तुम- उस सर्वशक्तिशाली ने विश्व के उत्पत्ति के लिये छः दिन क्यों परिश्रम किया?
रोज क्यों कहता है - सब बढिया है..

बुलाओ उसे। इतिहास दिखाओ। आज के हालात दिखाओ।
देखेंगे कि वो क्या कहता है??
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जेलों की काल-कोठरी से झुग्गी बस्तियों तक,

भूख से तड़पते लाखों इन्सानों से उन शोषित मज़दूरों तक, जो पूँजीवादी पिशाच को अपना लहू पीते, धैर्यपूर्ण उदासी से देख रहे हैं

मानवता की ऐसी बर्बादी देख रहे हैं, जिसे देखकर कोई भी भय से सिहर उठेगा। ये व्यवस्था जो अधिक उत्पादन को ज़रूरतमन्द लोगों में बाँटने के बजाय, समुद्र में फेंक देना बेहतर समझने है।

राजाओं के वे महल,
जिनकी नींव मे मानव हड्डियां पड़ी है,

दिखाओ ईश्वर को, उसे और कहने दो कि हां, सब ठीक है!

अरे कैसे??
क्यों और कहाँ से?
यही मेरा प्रश्न है।

तुम चुप हो। ठीक है, तो मैं आगे चलता हूँ।
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और तुम हिन्दुओ...

तुम कहते हो कि आज जो कष्ट भोग रहे हैं, पूर्वजन्म के पापी हैं। और आज के उत्पीड़क विगत जन्मों में साधु पुरुष थे, अतः सत्ता का आनन्द लूट रहे हैं।

तब मुझे यह मानना पड़ेगा कि आपके पूर्वज बहुत चालाक थे। उननेऐसे सिद्धान्त गढ़े, जिनमें तर्क और अविश्वास के हर प्रयास को विफल करने की ताकत है।

दरअसल न्यायशास्त्र मे किसी अपराधी को दिया दण्ड, असर के आधार पर केवल तीन वजह से उचित ठहराया जा सकता है।

वे हैं - बदला, डर, और सुधार।
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बदले की निन्दा हर प्रगतिशील विचारक द्वारा की जाती है। भयभीत करने के सिद्धान्त का भी अन्त वहीं है। केवल सुधार करने का सिद्धान्त ही उचित है, जिसका ध्येय अपराधी को योग्य और शान्तिप्रिय नागरिक बनाकर, समाज को लौटाना है।

तो यदि हम मनुष्यों को अपराधी मान लें,
तो ईश्वर द्वारा उन्हें दिये गये दण्ड की क्या प्रकृति है?

तुम कहते हो वह उन्हें गाय, बिल्ली, पेड़, जड़ी-बूटी या जानवर बनाकर पैदा करता है। तुम ऐसे 84 लाख दण्ड गिनाते हो। तो मनुष्य पर इनका सुधारक के रूप में क्या असर है?

तुम ऐसे कितने व्यक्तियों से मिले हो, जो यह कहते हैं कि वे किसी पाप के कारण पूर्वजन्म में गधा के रूप में पैदा हुए थे?

एक भी नहीं !!
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अपने पुराणों से उदाहरण न दो। मेरे पास तुम्हारी पौराणिक गप्पों के लिए कोई स्थान नहीं है।

फिर क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में सबसे बड़ा पाप गरीब होना है। गरीबी एक अभिशाप है। यह एक दण्ड है।

गरीबी खुद अपराध को पोषित करती है। तो ऐसी दण्ड प्रक्रिया की कहाँ तक प्रशंसा करें, जो मनुष्य को और अपराध करने को मजबूर करे। क्या तुम्हारे बुद्धिमान ईश्वर ने यह नहीं सोचा ?

या उसे भी ये बातें मानवता से अकथनीय कष्ट झेलवाकर ही सीखनी हैं
●●
भला किसी गरीब या अनपढ़ परिवार, जैसे किसी चमार या मेहतर के यहाँ पैदा होने पर इन्सान का भाग्य क्या होगा? वह गरीब है, तो पढ़ाई नहीं कर सकता।

अपने साथियों से तिरस्कृत एवं परित्यक्त रहता है, जो ऊँची जाति में पैदा होने के कारण, खुद को ऊँचा समझते हैं।

फिर उसकी अशिक्षा, अज्ञान, गरीबी तथा उसे मिला व्यवहार, उसके हृदय को आपराधिक निष्ठुर बना दे, तो उसके किसी पाप का दोषी कौन?

वह ईश्वर??
या तुम्हारे धर्म के उपदेशक?
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उन लोगों को दण्ड क्यों, जिन्हें दम्भी ब्राह्मणों ने जानबूझ कर अज्ञानी बनाये रखा। जिन्हे तुम्हारे ज्ञान की पवित्र पुस्तकों के कुछ वाक्य सुन लेने पर कान में पिघले सीसा डलवाने की सजा भुगतनी पड़ती थी?

वे कोई अपराध करते हैं, तो उसके लिये कौन ज़िम्मेदार होगा?
और उनका प्रहार कौन सहेगा?

मेरे दोस्त !!
ये सिद्धान्त, असल मे विशेषाधिकार लिए लोगों के आविष्कार हैं। ताकि ये अपनी हथियाई हुई शक्ति, पूँजी तथा उच्चता को इन सिद्धान्तों के आधार पर सही ठहरा सकें।
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अपटान सिंक्लेयर लिखते है कि मनुष्य को बस अमरत्व में विश्वास दिला दो। फिर उसकी तमाम सम्पत्ति लूट लो। वह खुद बिना षिकायत इस कार्य में तुम्हारी सहायता करेगा।

धर्म के उपदेशकों, और सत्ताधीषों के अपवित्र गठबन्धन से ही जेल, फाँसी, कोड़े और इस तरह के सिद्धान्त उपजते हैं।
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फिर तुम्हारा सर्वशक्तिशाली ईश्वर, व्यक्ति को तब क्यों नहीं रोकता.. जब वह कोई पाप या अपराध कर रहा होता है?

यह तो वह बहुत आसानी से कर सकता है।
क्यों नहीं उसने लड़ाकू राजाओं की लड़ने की उग्रता को समाप्त किया।

क्यों नही विश्वयुद्ध द्वारा मानवता पर पड़ने वाली विपत्तियों से बचाया? क्यो उसने अंग्रेजों के दिमाग मे भारत को मुक्त कर देने की भावना पैदा की? क्यों नहीं वह धनपतियों के दिल मे परोपकारी उत्साह भर देता..

कि उत्पादन के साधनों पर अपना व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार वे त्याग दें। और इस प्रकार न केवल मजदूरो बल्कि मानव समाज को पूँजीवादी बेड़ियों से मुक्त करें?
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ओह, तो अब आप समाजवाद की व्यावहारिकता पर तर्क करना चाहते हैं। चलिए। मै इसे आपके सर्वशक्तिमान पर ही छोड़ देता हूँ कि आए, वही लागू करे।

क्योकि जहाँ तक सामान्य भलाई की बात है, सभी लोग समाजवाद के गुणों को मानते हैं। लेकिन विरोध, इसके व्यावहारिक न होने का बहाना लेकर करते हैं।

तो आने दो परमात्मा को, ताकि वह इस चीज को सही तरीके से कर दे।
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अंग्रेजों की हुकूमत यहाँ इसलिये नहीं.. कि ईश्वर चाहता है। इसलिये है कि उनके पास ताकत है और हममें उनका विरोध करने का साहस नहीं।

वे हमको नीचे हमे ईश्वर की मदद से नहीं रखे हैं। बल्कि बन्दूकों, राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे गुलाम किया है।

यह हमारी उदासीनता है कि वे समाज के विरुद्ध सबसे निन्दनीय अपराध, याने एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र द्वारा अत्याचारी शोषण, मजे से कर रहे हैं।

कहाँ है ईश्वर? क्या वह मनुष्य जाति के इन कष्टों का मज़ा ले रहा है? एक नीरो ?? एक चंगेज??

अरे ... उसका नाश हो!
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क्या तुम मुझसे पूछते हो कि मैं इस विश्व की उत्पत्ति तथा मानव की उत्पत्ति की व्याख्या कैसे करता हूँ? ठीक है, मैं तुम्हें बताता हूँ।

चार्ल्स डारविन ने इस विषय पर कुछ प्रकाश डालने की कोशिश की है। उसे पढ़ो। यह एक प्रकृति की घटना है। विभिन्न पदार्थों के, नीहारिका के आकार में, आकस्मिक मिश्रण से पृथ्वी बनी।

कब? इतिहास देखो।

इसी प्रकार की घटना से जन्तु पैदा हुए और एक लम्बे दौर में मानव। डार्विन की ओरिजन आफ स्पीषीज पढ़ो। और फिर सारा विकास मनुष्य द्वारा प्रकृति के लगातार विरोध और उस पर विजय प्राप्त करने की चेष्टा से हुआ।

यह इस घटना की सम्भवतः सबसे सूक्ष्म व्याख्या है।
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तुम्हारा दूसरा तर्क यह हो सकता है कि क्यों एक बच्चा अन्धा या लंगड़ा पैदा होता है? क्या यह उसके पूर्वजन्म में किये गये कार्यों का फल नहीं है? जीवविज्ञान वेत्ताओं ने इस समस्या का वैज्ञानिक समाधान निकाल लिया है।

अवश्य ही तुम एक और बचकाना प्रश्न पूछ सकते हो - यदि ईश्वर नहीं है, तो लोग उसमें विश्वास क्यों करने लगे?

मेरा उत्तर सूक्ष्म तथा स्पष्ट है।
जिस प्रकार वे प्रेतों तथा दुष्ट आत्माओं में विश्वास करने लगे।
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अन्तर केवल इतना है कि ईश्वर में विश्वास विश्वव्यापी है
और दर्शन अत्यन्त विकसित।

इसकी उत्पत्ति का श्रेय उन शोषकों की प्रतिभा को है, जो परमात्मा के नाम पर लोगों को अपने प्रभुत्व में रखना चाहते थे। और अपनी विशिष्ट स्थिति का अधिकार एवं अनुमोदन चाहते थे।

दरअसल सभी धर्म, संप्रदाय, पंथ और ऐसी अन्य संस्थाएँ अन्त में निर्दयी और शोषक वर्गों की समर्थक हो जाती हैं। राजा के विरुद्ध हर विद्रोह, हर धर्म में इसलिए ही पाप रहा है।
●●
मनुष्य की सीमाओं, उसकी दुर्बलता, दोषो को समझने के बाद परीक्षा की घड़ी मे मनुष्य को उत्साहित रखने के लिए ईश्वर के काल्पनिक अस्तित्व की रचना हुई। उसे पिता समान उदारता से पूर्ण ईश्वर के रूप चित्रण किया गया।

लेकिन फिर उसका उपयोग एक भय के लिए भी होता है, ताकि कोई मनुष्य समाज के लिये ख़तरा न बन जाये। वास्तव में आदिम काल में यह समाज के लिये उपयोगी था। पीड़ा में पड़े मनुष्य के लिये ईश्वर की कल्पना उपयोगी होती है।
●●
पर आज समाज को इस विश्वास के विरुद्ध लड़ना होगा।

मनुष्य जब अपने पैरों पर खड़ा होने का प्रयास करता है तथा यथार्थवादी बन जाता है। तब उसे श्रद्धा को एक ओर फेंक देना चाहिए।

और उन सभी कष्टों, परेशानियों का स्वयं के पुरुषार्थ से सामना करना चाहिए। यही आज मेरी स्थिति है।

यह मेरा अहंकार नहीं है, मेरे दोस्त!
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यह मेरे सोचने का तरीका है, जिसने मुझे नास्तिक बनाया है। ईश्वर में विश्वास और रोज़-ब-रोज़ की प्रार्थना को मैं मनुष्य के लिये सबसे स्वार्थी और गिरा हुआ काम मानता हूँ।

मैंने उन नास्तिकों के बारे में पढ़ा हे, जिन्होंने सभी विपदाओं का बहादुरी से सामना किया। अतः मैं भी एक पुरुष की भाँति फाँसी के फन्दे की अन्तिम घड़ी तक सिर ऊँचा किये खड़ा रहना चाहता हूँ।
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अब देखना है कि मैं कैसे निभा पाता हूँ।

मेरे एक दोस्त ने मुझे प्रार्थना करने को कहा। जब मैंने उसे नास्तिक होने की बात बतायी, तो उसने कहा -तुम अपने अन्तिम दिनों में तुम विश्वास करने लगोगे

मैंने कहा- नहीं, प्यारे दोस्त, ऐसा नहीं होगा। मैं इसे अपने लिये अपमानजनक तथा भ्रष्ट होने की बात समझाता हूँ। स्वार्थी कारणों से मैं प्रार्थना नहीं करूँगा।

पाठकों और दोस्तों, क्या यह अहंकार है?
अगर है तो मैं स्वीकार करता हूँ।
●●
मेरे कारण, मेरी सोच...
मै नास्तिक क्यों हूं..

आपके सामने है।

- भगतसिंह

01/10/2024

"भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम वर्तमान में क्या करते हैं |"

महात्मा गांधी

मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको______________________________            अदम गोंडवीआइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को...
30/09/2024

मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको
______________________________
अदम गोंडवी

आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आपको

जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी एक कुएँ में डूब कर

है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी

चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा

कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई

कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है

थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को

डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से

आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में

होनी से बेखबर कृष्णा बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी

चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई

दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया

और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्णा थी पिता की गोद में

जुड़ गई थी भीड़ जिसमें जोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था

बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है

कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएँगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं

कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें

बोला कृष्णा से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से

पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में

दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर

क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया

कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो

देखिए ना यह जो कृष्णा है चमारो के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ

जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है

भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाँहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ

आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई

वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही

जानते हैं आप मंगल एक ही मक़्क़ार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है

कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज़्ज़त रहे्गी आपकी

बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया था

क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था

रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था

सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में

घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"

निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर

गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"

"कैसी चोरी, माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा

होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -

"मेरा मुँह क्या देखते हो ! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो"

और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी

दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था

घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ जोर से रोने लगे

"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं"

यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से

फिर दहाड़े, "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा

इक सिपाही ने कहा, "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"

बोला थानेदार, "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो

ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है, जेल है"

पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
"कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्णा का हाल"

उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को

धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को

मैं निमंत्रण दे रहा हूँ- आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में

गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही

हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए!

गांधी और भगतसिंह इतिहास की कसौटी पर________________________________(शहीद भगतसिंह की जयंती पर विशेष )महात्मा गांधी और भगत...
28/09/2024

गांधी और भगतसिंह इतिहास की कसौटी पर

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(शहीद भगतसिंह की जयंती पर विशेष )

महात्मा गांधी और भगत सिंह दोनों बहुत बड़े लोग है जिनके बारे में मेरी कुछ भी कहने की कोई हैसियत नहीं है। इन दोनों महापुरुषों के प्रति अगाध श्रद्धा प्रदर्शित करते हुए उनमें से किसी को भी छोटा या बड़ा दिखाने की कोशिश न करते हुए सिर्फ उतनी बात हम देखने की कोशिश करना चाहिए जितनी बात इतिहास में दर्ज है। सहमति असहमति सबकी अपनी जगह है पर दुराग्रह की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। दुराग्रह उसे कहते हैं कि जिसका कोई प्रमाण नहीं होता फिर भी आप उसी बात पर अड़े रहते हैं।

लाहौर की सेंट्रल जेल में फांसी के फंदे पर भगतसिंह सहित जो तीन नौजवान हंसते हंसते झूले और कुछ देर थरथराने के बाद शांत हो गए। कई बार लगता है कि इन तीन लाशों की तुलना में हम करोड़ों लोग कितने बोने हैं। आज पाकिस्तान के लाहौर सेंट्रल जेल में भगतसिंह नहीं हैं।वहां एक बड़ा सा मॉल बन गया है और एक बड़ी सड़क बन गयी है जिस पर रात दिन गाड़ियां दौड़ती रहती हैं। आज अगर ये तीन सपूत बोल सकते और वे हमसे पूछते कि हम भारत के लिए शहीद हुए या पाकिस्तान के लिए? तो न इस प्रश्न का आपके पास कोई जबाव है न मेरे पास।

इतिहास इन तीन लाशों पर रुका नहीं क्योंकि इतिहास कभी रुकता नहीं है वो तो चलता रहता है। इतिहास लाहौर से चला और सही 17 साल बाद 30 जनवरी 1948 को दिल्ली के बिड़ला हाउस पहुंच गया। यहां एक 78 साल के बूढ़े आदमी को प्रार्थना के समय जाते हुए सामने से आकर कोई गोलीं मारता है और एक बहुत बड़ा आदमी जिसे हम अपना वटवृक्ष कहते थे, तीन गोलियां खाकर भर भरा कर गिर गया। उसकी भी लाश थोड़े समय तक थरथराती है और शांत हो जाती है।दिल्ली के बिड़ला हाउस में आज गांधी नहीं हैं। वहां गांधी की यादें रह गयी हैं।

शाहिर लुधियानवी से माफी मांगते हुए यह पक्तियां प्रस्तुत हैं-

ये जश्न मुबारक हो फिर भी यह सदाकत है,
हम लोग हकीकत के अहसास से तारी हैं।
गांधी हों या भगतसिंह इतिहास की नजरों में
हम दोनों के कातिल और दोनों के पुजारी हैं।

गांधी और भगतसिंह दोनों भारत की स्वाधीनता के लिए लड़े और अंतिम सांस तक लड़े। भगतसिंह, गांधी के प्रति पूरा सम्मान प्रदर्शित करते हैं। भगतसिंह खुद स्वीकार करते थे कि क्रांति का मतलब बम और पिस्तौल से नहीं है और इस तरह की पटाकेबाजी से क्रान्ति या बदलाव नहीं आ सकता। वे एक गम्भीर व्यक्तित्व वाले नौजवान थे जो चिंतन और विचार विमर्श को अधिक महत्व देते थे। उन्होंने कहा भी कि जब वे महात्मा गांधी के अहिंसक तरीके का विरोध कर रहे है तो इसलिए कर रहे हैं कि उनको लगता है कि महात्मा गांधी एक अत्यंत असंभव आदर्श प्रस्तुत कर रहे हैं और भारतीय समाज अभी अहिंसा के लिए तैयार नहीं है। लेकिन वे गांधी के प्रति पूर्ण सम्मान प्रदर्शित करते हुए कहते है कि महात्मा गांधी ने लोक जागरण का जो महान कार्य किया है उसके लिए उन्हें कोटि कोटि सलाम न किया जाय तो उनके प्रति बहुत बड़ा अन्याय होगा ।

गांधी और भगतसिंह दोनों के ही रास्ते, दोनों के कार्यक्रम, दोनों के संगठन, दोनों के लक्ष्य अलग थे। दोनों ही अपने विचारों से एक इंच भी सरकने को तैयार नहीं थे। फिर भी एक प्रश्न उठता है कि गांधी को भगतसिंह को बचाने की कोशिश करनी चाहिए थी। क्योंकि गांधी राष्ट्रपिता थे। एक पिता बनना ही बहुत कठिन काम है, तो राष्ट्रपिता बनना तो बहुत ही कठिन काम है। करोड़ों करोड़ लोग और उनकी आकांक्षाएं, उनकी अपनी आशा और विश्वास उन सब का बोझ जो ढो सके, उन सबके दिए घावों को जो बर्दाश्त कर सके, जो अपनी जनता के आंसू पोंछ सके वही राष्ट्रपिता बन सकता है। इसलिए गांधी पर यह जिम्मेदारी आती है कि उन्होंने अपने एक बच्चे को बचाने की कोशिश क्यों नहीं की?

महात्मा गांधी इंग्लैंड से बैरिस्टरी पढ़कर आये थे। वे जानते थे कि सारे सबूत भगतसिंह के खिलाफ हैं और अंग्रेज कानून के दायरे में उन्हें फांसी से बचाना मुश्किल है। गांधी यह भी जानते हैं कि वाइसराय इरविन को भी फांसी को रद्द करने के अधिकार नहीं। ब्रिटेन की संसद ही वाइसराय की सिफारिश पर इसे रद्द कर सकती थी।सभी ऐतिहासिक दस्तावेज पब्लिक डोमेन में हैं ,लेकिन सत्य से किसे लेना देना है और कौन इतना पढ़ेगा कि दरअसल गांधी ने भगतसिंह की फांसी को लेकर कितनी बहस वाइसराय से की और फिर वह बात कहाँ जाकर खत्म होती है। अंग्रेज ,गांधी से कहते हैं कि हम सिर्फ इतना कर सकते हैं कि लाहौर कांग्रेस होने तक फांसी न दें।

गांधी वाइसराय से कहते हैं कि देखिये या तो आप भगतसिंह की फांसी को हमेशा के लिए रद्द करें और फांसी रद्द नहीं कर सकते तो फिर मुझे कोई राहत न दें। मैं झेलूंगा जो मुझे झेलना है। लेकिन में आप से कोई घूस नहीं चाहता हूँ। अब आप गांधी की सैद्धांतिक दृणता को देखिए। वे कहते हैं कि मुझे बीच का कोई रास्ता नहीं चाहिए। फांसी का मुझ पर एक प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा लेकिन मैं उसको झेलने के लिए तैयार हूं लेकिन मैं आपसे कोई गुप्त समझौता नहीं करना चाहता।

भगत सिंह को बचाने के लिए 23 मार्च 1931 को वाइसराय को लिखी उस चिट्ठी में गांधीजी ने जनमत का हवाला देते हुए लिखा कि जनमत चाहे सही हो या गलत, सजा में रियायत चाहता है। जब कोई सिद्धांत दांव पर न हो तो लोकमत का मान रखना हमारा कर्तव्य हो जाता है. ...मौत की सजा पर यदि आप यह सोचते हैं कि फैसले में थोड़ी सी भी गुंजाइश है, तो मैं आपसे यह प्रार्थना करूंगा कि इस सजा को आगे और विचार करने के लिए स्थगित कर दें।

जब गांधी कराची कांग्रेस में पहुंचते हैं तो लाल कुर्तीधारी नौजवान भारत सभा के युवकों ने काले कपड़े से बने फूलों की माला गांधीजी को भेंट की. स्वयं गांधीजी ने कहा कि मैं यहां अपना बचाव करने के लिए नहीं बैठा था, इसलिए मैंने आपको विस्तार से यह नहीं बताया कि भगत सिंह और उनके साथियों को बचाने के लिए मैंने क्या-क्या किया? मैं वाइसराय को जिस तरह समझा सकता था, उस तरह से मैंने समझाया. समझाने की जितनी शक्ति मुझमें थी, सब मैंने उन पर आजमा देखी।

आज जब भी चर्चा भगत सिंह की छिडती है तो वह गांधी तक ही जा पहुंचती है? लेकिन जब हम दोनों शख्शियतों को देखते है तो ऐसी चर्चाएं मात्र 23 साल के भगत सिंह की अद्भुत शहादत का गुमान और एक बूढ़े गांधी द्वारा उसे बचाए न जा सकने की शिकायत एक साथ मौजूद रहती है।

आज न तो भगतसिंह हमारे बीच हैं ना गांधी। हम भारतमाता के दोनों सपूतों को नमन करते हैं । आज जब इंटरनेट के युग में सब कुछ पब्लिक डोमेन में है। किसने क्या भूमिका निभाई? भगतसिंह की डायरियों, तत्कालीन पुस्तकों में और अदालतों के अभिलेखों में सभी की भूमिकाएं दर्ज हैं। उन्हें हम चाहकर भी बदल नहीं सकते।

शहीद भगतसिंह को सादर नमन।

( नोट- प्रस्तुत लेख में कुछ अंश गांधी शांति प्रतिष्ठान के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री कुमार प्रशांत के भाषण से लिये हैं)

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