Education and business

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29/10/2021

इतिहास के पन्नों में ऐसे कई नाम छिपे हैं, जिनका भारत की उन्नति में योगदान अमूल्य है पर पीढ़ियां उन्हें भूलते जा रही है, उन्हीं कुछ नामों में से एक हैं स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता जिन्होंने अपना पूरा जीवन भारत को समर्पित कर दिया। भारत के प्रति उनके प्रेम को उजागर करते हुए बिपिन चन्द्रपाल कहते हैं - ”निवेदिता जिस प्रकार भारत को प्रेम करती हैं, भारतवासियों ने भी भारत को उतना प्रेम किया होगा – इसमें संदेह है’’।

28 अक्टूबर, 1867 को जन्मीं निवेदिता का वास्तविक नाम ‘मार्गरेट एलिजाबेथ नोबल’ था। एक अंग्रेजी-आइरिश सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक, शिक्षक एवं स्वामी विवेकानन्द की शिष्या- मार्गरेट ने 30 साल की उम्र में भारत को ही अपना घर बना लिया।

मात्र 10 साल की उम्र में अपने पिता को खोने के बाद उनका जीवन गरीबी में बीता। उनकी शिक्षा इंग्लैंड के एक चैरिटेबल बोर्डिंग स्कूल में हुई। सिर्फ 17 साल की उम्र में अपनी पढाई पूरी करने के बाद उन्होंने शिक्षक की नौकरी कर ली। 25 साल की उम्र में उन्होंने अपना भी एक स्कूल खोला और वह उस समय शिक्षा में अलग-अलग प्रयोग करने के लिए मशहूर थीं। इसके अलावा वे ज़िन्दगी का सच्चा सार जानना और समझना चाहती थीं और इसीलिए उन्हें महान विचारकों और सुधारकों की संगत बेहद पसंद थी।

साल 1895 में मार्गरेट के जीवन में सबसे बड़ा बदलाव आया। दरअसल, उन्हें एक निजी संगठन द्वारा एक ‘हिन्दू योगी’ का भाषण सुनने के लिए बुलाया गया था। यह योगी कोई और नहीं बल्कि स्वामी विवेकानंद थे। वह स्वामी जी के भाषण से इतना प्रभावित हुई की उन्होंने भारत आने का फैसला कर लिया।

जब विवेकानंद मार्गरेट से मिले तो उन्हें भी समझ में आ गया कि मार्गरेट भारतीय महिलाओं के उत्थान में योगदान कर सकती हैं। मार्गरेट ने उसी पल यह मान लिया कि भारत ही उनकी कर्मभूमि है। इसके तीन साल बाद, जनवरी, 1898 में मार्गरेट भारत आ गयीं। स्वामी विवेकानंद ने उनको 25 मार्च 1898 को दीक्षा देकर भगवान बुद्ध के करुणा के पथ पर चलने की प्रेरणा दी। दीक्षा के समय स्वामी विवेकानंद ने उन्हें नया नाम ‘निवेदिता’ दिया, जिसका अर्थ है ‘समर्पित’ और बाद में वह पूरे देश में इसी नाम से विख्यात हुईं।

दीक्षा प्राप्त करने के बाद निवेदिता कोलकाता के बागबाज़ार में बस गयीं। यहाँ पर उन्होंने लड़कियों के लिए एक स्कूल शुरू किया। जहाँ पर वह लडकियों के माता-पिता को उन्हें पढ़ने भेजने के लिए प्रेरित करती थी। निवेदिता स्कूल का उद्घाटन रामकृष्ण परमहंस की पत्नी मां शारदा ने किया था। निवेदिता ने माँ शारदा के साथ बहुत समय बिताया। उस समय बाल-विवाह की प्रथा प्रचलित थी और स्त्रियों के अधिकारों के बारे में तो कोई बात ही नहीं करता था। पर निवेदिता को पता था कि केवल शिक्षा ही इन कुरूतियों से लड़ने में मददगार हो सकती है। उन्होंने अपने जीवन मे स्त्री शिक्षा के द्वारा भारत मे व्याप्त कुरीतियों को खत्म करने का प्रयास किया।

साभार

29/12/2020

सोशल मीडिया के बन्धुओ आदर्शवादी के साथ यथार्थवादी भी बनिये वर्ना फिर कहि देर न हो जाये।अपना लक्ष्य निर्धारित कर भविष्य सुरक्षित कीजिये ये आपकी अपनी जिमेदारी है।

04/10/2020

शिक्षा में गुणात्मक उन्नयन के लिए आवश्यक है कि हम बच्चे के मानसिक विकास के साथ ही साथ उसके शारीरिक विकास पर भी ध्यान दें।
स्वस्थ मानसिक व सांवेगिक विकास बालक के शारीरिक विकास पर निर्भर करता है ,शिक्षा किताबी ज्ञान न होकर बालक के बौद्धिक विकास से सम्बंधित है जिसके अंतर्गत निर्णय,चिंतन,तर्क,सामंजस्य ओर नेतृत्व की क्षमता का विकास और ज्ञान भी सम्बंधित है।

19/09/2020
Education is not only educate the pertionIt's the morl service of society and humanity.
15/12/2019

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It's the morl service of society and humanity.

थिंक न्यू
09/07/2019

थिंक न्यू

प्राचीन भारत के 13 विश्वविद्यालय, जहां पढ़ने आते थे दुनियाभर के छात्र। तुर्की मुगल आक्रमण ने सब जला हिन्दू मंदिर व शिक्षा...
11/05/2019

प्राचीन भारत के 13 विश्वविद्यालय, जहां पढ़ने आते थे दुनियाभर के छात्र। तुर्की मुगल आक्रमण ने सब जला हिन्दू मंदिर व शिक्षा केन्द्र लूटे गये।
मेगास्थनीज, अलविरुनी ह्वेन सांग के ग्रन्थो मे समृद्धशाली भारत का वर्णन है।

वैदिक काल से ही भारत में शिक्षा को बहुत महत्व दिया गया है। इसलिए उस काल से ही गुरुकुल और आश्रमों के रूप में शिक्षा केंद्र खोले जाने लगे थे। वैदिक काल के बाद जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता गया। भारत की शिक्षा पद्धति भी और ज्यादा पल्लवित होती गई। गुरुकुल और आश्रमों से शुरू हुआ शिक्षा का सफर उन्नति करते हुए विश्वविद्यालयों में तब्दील होता गया। पूरे भारत में प्राचीन काल में 13 बड़े विश्वविद्यालयों या शिक्षण केंद्रों की स्थापना हुई।

8 वी शताब्दी से 12 वी शताब्दी के बीच भारत पूरे विश्व में शिक्षा का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध केंद्र था।गणित, ज्योतिष, भूगोल, चिकित्सा विज्ञान के साथ ही अन्य विषयों की शिक्षा देने में भारतीय विश्वविद्यालयों का कोई सानी नहीं था।

हालांकि आजकल अधिकतर लोग सिर्फ दो ही प्राचीन विश्वविद्यालयों के बारे में जानते हैं पहला नालंदा और दूसरी तक्षशिला। ये दोनों ही विश्वविद्यालय बहुत प्रसिद्ध थे। इसलिए आज भी सामान्यत: लोग इन्हीं के बारे में जानते हैं, लेकिन इनके अलावा भी ग्यारह ऐसे विश्वविद्यालय थे जो उस समय शिक्षा के मंदिर थे। आइए आज जानते हैं प्राचीन विश्वविद्यालयों और उनसे जुड़ी कुछ खास बातों को..

1. नालंदा विश्वविद्यालय (Nalanda university)

Nalanda university History in Hindi
यह प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण और विख्यात केन्द्र था। यह विश्वविद्यालय वर्तमान बिहार के पटना शहर से 88.5 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व और राजगीर से 11.5 किलोमीटर में स्थित था। इस महान बौद्ध विश्वविद्यालय के भग्नावशेष इसके प्राचीन वैभव का बहुत कुछ अंदाज करा देते हैं।

सातवीं शताब्दी में भारत भ्रमण के लिए आए चीनी यात्री ह्वेनसांग और इत्सिंग के यात्रा विवरणों से इस विश्वविद्यालय के बारे में जानकारी मिलती है। यहां 10,000 छात्रों को पढ़ाने के लिए 2,000 शिक्षक थे। इस विश्वविद्यालय की स्थापना का श्रेय गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम 450-470 को प्राप्त है। गुप्तवंश के पतन के बाद भी आने वाले सभी शासक वंशों ने इसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा। इसे महान सम्राट हर्षवद्र्धन और पाल शासकों का भी संरक्षण मिला। भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी यहां शिक्षा ग्रहण करने आते थे।

इस विश्वविद्यालय की नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक अंतरर्राष्ट्रीय ख्याति रही थी। सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र में बना हुआ यह विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना था। इसका पूरा परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था। जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य द्वार था। उत्तर से दक्षिण की ओर मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक भव्य स्तूप और मंदिर थे। मंदिरों में बुद्ध भगवान की सुन्दर मूर्तियां स्थापित थीं। केन्द्रीय विद्यालय में सात बड़े कक्ष थे और इसके अलावा तीन सौ अन्य कमरे थे।

इनमें व्याख्यान हुआ करते थे। अभी तक खुदाई में तेरह मठ मिले हैं। वैसे इससे भी अधिक मठों के होने ही संभावना है। मठ एक से अधिक मंजिल के होते थे। कमरे में सोने के लिए पत्थर की चौकी होती थी। दीपक, पुस्तक आदि रखने के लिए खास जगह बनी हुई है। हर मठ के आंगन में एक कुआं बना था। आठ विशाल भवन, दस मंदिर, अनेक प्रार्थना कक्ष और अध्ययन कक्ष के अलावा इस परिसर में सुंदर बगीचे व झीलें भी थी। नालंदा में सैकड़ों विद्यार्थियों और आचार्यों के अध्ययन के लिए, नौ तल का एक विराट पुस्तकालय था। जिसमें लाखों पुस्तकें थी।

2. तक्षशिला विश्वविद्यालय (Takshashila university)

Takshashila university Story in Hindi
तक्षशिला विश्वविद्यालय की स्थापना लगभग 2700 साल पहले की गई थी। इस विश्विद्यालय में लगभग 10500 विद्यार्थी पढ़ाई करते थे। इनमें से कई विद्यार्थी अलग-अलग देशों से ताल्लुुक रखते थे। वहां का अनुशासन बहुत कठोर था। राजाओं के लड़के भी यदि कोई गलती करते तो पीटे जा सकते थे। तक्षशिला राजनीति और शस्त्रविद्या की शिक्षा का विश्वस्तरीय केंद्र थी। वहां के एक शस्त्रविद्यालय में विभिन्न राज्यों के 103 राजकुमार पढ़ते थे।

आयुर्वेद और विधिशास्त्र के इसमे विशेष विद्यालय थे। कोसलराज प्रसेनजित, मल्ल सरदार बंधुल, लिच्छवि महालि, शल्यक जीवक और लुटेरे अंगुलिमाल के अलावा चाणक्य और पाणिनि जैसे लोग इसी विश्वविद्यालय के विद्यार्थी थे। कुछ इतिहासकारों ने बताया है कि तक्षशिला विश्विद्यालय नालंदा विश्वविद्यालय की तरह भव्य नहीं था। इसमें अलग-अलग छोटे-छोटे गुरुकुल होते थे। इन गुरुकुलों में व्यक्तिगत रूप से विभिन्न विषयों के आचार्य विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान करते थे।

3. विक्रमशीला विश्वविद्यालय (Vikramshila university)

Vikramshila university in Hindi
विक्रमशीला विश्वविद्यालय की स्थापना पाल वंश के राजा धर्म पाल ने की थी। 8 वी शताब्दी से 12 वी शताब्दी के अंंत तक यह विश्वविद्यालय भारत के प्रमुख शिक्षा केंद्रों में से एक था। भारत के वर्तमान नक्शे के अनुसार यह विश्वविद्यालय बिहार के भागलपुर शहर के आसपास रहा होगा।

कहा जाता है कि यह उस समय नालंदा विश्वविद्यालय का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी था। यहां 1000 विद्यार्थीयों पर लगभग 100 शिक्षक थे। यह विश्वविद्यालय तंत्र शास्त्र की पढ़ाई के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता था। इस विषय का सबसे मशहूर विद्यार्थी अतीसा दीपनकरा था, जो की बाद में तिब्बत जाकर बौद्ध हो गया।

4. वल्लभी विश्वविद्यालय (Vallabhi university)

Vallabhi university History in Hindi
वल्लभी विश्वविद्यालय सौराष्ट्र (गुजरात) में स्थित था। छटी शताब्दी से लेकर 12 वी शताब्दी तक लगभग 600 साल इसकी प्रसिद्धि चरम पर थी। चायनीज यात्री ईत- सिंग ने लिखा है कि यह विश्वविद्यालय 7 वी शताब्दी में गुनामति और स्थिरमति नाम की विद्याओं का सबसे मुख्य केंद्र था। यह विश्वविद्यालय धर्म निरपेक्ष विषयों की शिक्षा के लिए भी जाना जाता था। यही कारण था कि इस शिक्षा केंद्र पर पढ़ने के लिए पूरी दुनिया से विद्यार्थी आते थे।

5. उदांत पुरी विश्वविद्यालय (Odantapuri university)

Odantapuri university history in Hindi
उदांतपुरी विश्वविद्यालय मगध यानी वर्तमान बिहार में स्थापित किया गया था। इसकी स्थापना पाल वंश के राजाओं ने की थी। आठवी शताब्दी के अंत से 12 वी शताब्दी तक लगभग 400 सालों तक इसका विकास चरम पर था। इस विश्वविद्यालय में लगभग 12000 विद्यार्थी थे।

6. सोमपुरा विश्वविद्यालय (Somapura mahavihara)

Somapura mahavihara History in Hindi
सोमपुरा विश्वविद्यालय की स्थापना भी पाल वंश के राजाओं ने की थी। इसे सोमपुरा महाविहार के नाम से पुकारा जाता था। आठवीं शताब्दी से 12 वी शताब्दी के बीच 400 साल तक यह विश्वविद्यालय बहुत प्रसिद्ध था। यह भव्य विश्वविद्यालय लगभग 27 एकड़ में फैला था। उस समय पूरे
विश्व में बौद्ध धर्म की शिक्षा देने वाला सबसे अच्छा शिक्षा केंद्र था।

7. पुष्पगिरी विश्वविद्यालय (Pushpagiri university)

Pushpagiri university History in Hindi
पुष्पगिरी विश्वविद्यालय वर्तमान भारत के उड़ीसा में स्थित था। इसकी स्थापना तीसरी शताब्दी में कलिंग राजाओं ने की थी। अगले 800 साल तक यानी 11 वी शताब्दी तक इस विश्वविद्यालय का विकास अपने चरम पर था। इस विश्वविद्यालय का परिसर तीन पहाड़ों ललित गिरी, रत्न गिरी और उदयगिरी पर फैला हुआ था।

नालंदा, तशक्षिला और विक्रमशीला के बाद ये विश्वविद्यालय शिक्षा का सबसे प्रमुख केंद्र था। चायनीज यात्री एक्ज्युन जेंग ने इसे बौद्ध शिक्षा का सबसे प्राचीन केंद्र माना। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इस विश्ववविद्यालय की स्थापना राजा अशोक ने करवाई थी।

अन्य विश्वविद्यालय (Other Universities)
प्राचीन भारत में इन विश्वविद्यालयों के अलावा जितने भी अन्य विश्वविद्यालय थे। उनकी शिक्षा प्रणाली भी इन्हीं विश्वविद्यालयों से प्रभावित थी। इतिहास में मिले वर्णन के अनुसार शिक्षा और शिक्षा केंद्रों की स्थापना को सबसे ज्यादा बढ़ावा पाल वंश के शासको ने दिया।

8. जगददला, पश्चिम बंगाल में (पाल राजाओं के समय से भारत में अरबों के आने तक
9. नागार्जुनकोंडा, आंध्र प्रदेश में।
10. वाराणसी उत्तर प्रदेश में (आठवीं सदी से आधुनिक काल तक)
11. कांचीपुरम, तमिलनाडु में
12. मणिखेत, कर्नाटक
13. शारदा पीठ, कश्मीर मे।
साभार

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