08/10/2020
मिथिला चित्रकला का सबसे विवादित और अशुद्ध बनाये जाने वाला अरिपन - अष्टदल अरिपन
हम सभी जानते हैं कि किसी भी पूजा में देवताओं का आवाह्न अकेले नही होता है । इनका आवाह्न अङ्ग देवता, अस्त्र-शस्त्र, वाहन एवं पारिवार के संग होता है । इसलिए मन्त्र में कहा भी गया है- साङ्गसायुधसवाहनसपरिवार
इस प्रकार उनके स्थान के चारों ओर घेर कर उनके अंग देवता अप्रत्यक्ष रूप में अपने-अपने निर्धारित स्थान पर खुद ही स्थापित हो जाते हैं जो मुख्य देवता के आवरण के रूप में चारों ओर रहते हैं । सभी अस्त्र-शस्त्र, परिवार के सदस्य देवता, वाहन सभी का अरिपन में स्थान के साथ ही इनकी संख्या भी निर्धारित है । इसी कारण से मिथिला में पूजा के समय अरिपन देने की परंपरा है । इस अरिपन के माध्यम से पूजा क्रम में किसी भी तरह से कोई सैद्धान्तिक त्रुटि ना हो या कोई परिवारिक देवता को पूजा हेतू स्थान ना मिले इन सब कमियों से बचा जाता है ।
अरिपन की संरचना एवं उसके अंग - मिथिला चित्रकला में प्रयुक्त अरिपन मूल रूप से किसी ना किसी देवताओं को समर्पित यंत्र है । शास्त्रानुसार कर्णिका, केशर, दल और भूपुर ये यंत्र के चार अंग होते हैं । पर अरिपन में भूपुर का अंकन अब खत्म हो चुका है परंतु कर्णिका, केशर आ दल का अंकन प्रचलन में है । हाँ जहाँ केवल यंत्र का चित्रण होता है वहाँ भुपुर का भी निरूपण होता है ।
अरिपन के निरूपण में कर्णिका के स्वरूप, केसर की संख्या और दल के संख्या मे अज्ञानतावश भी परिवर्तन से पूरा का पूरा शास्त्रीय एवं कर्मकांडीय विध-व्यवहार ही उलट-पलट हो जाता है । क्योकि पूजा के दौरान मुख्यदेवता के परिजन देवता की संख्या जब निर्धारित है तब उसमे किसी भी तरह का परिवर्तन से पूरा यांत्रिक गणना ही असफल हो जाएगी ।
पंडित भवनाथ झा के अनुसार मिथिला मे देवी पूजा मे षट्दल और पुरुष देवता के पूजा मे अष्टदल अरिपन का प्रचलन है । इसलिये सत्यनारायण भगवान के पूजा मे अष्टदल अरिपन दिया जाता है । इतना ही नहीं, महादेव के विशेष पूजा मे, जैसे रुद्राभिषेक आदि मे भी अष्टदल अरिपन का निरूपण होना चाहिए । इसकी परम्परा मिथिला मे रही है । गौरीशंकर, जमुथरिक महादेव आ हाजीपुर के गौरीशंकर और अन्य जगह भी महादेव शिवलिंग स्थापना अष्टदल पर हुवा है ।
अष्टदल अरिपन के निर्माण के प्रथम चरण मे कर्णिका भी आठकोण वला होना चाहीये । जिसका निरूपण चित्र संख्या 1 के अनुसार होना चाहिए ।
इसके बाद कर्णिका को अष्टकोणीय बनाती एक रेखा दूसरी रेखा से मिलानी चाहिए जिससे चित्र संख्या 2 के हिसाब से आकृति बने ।
इसके बाद एक वृत्त बनायी जानी चाहिए । जो एक बिंदु से दूसरे बिन्दु को मिलाने से चित्र संख्या 3 के अनुसार बन जाता है । इसके बाद चित्र संख्या 4 के अनुसार इसके बाहर कमल के दल (पत्ते) के आकार में आठ दल का निरूपण करना चाहिए ।
इस तरह अष्टदल अरिपन का रेखांकन हो गया । इस प्रकार बने अरिपन में शुद्धता तब आती है जब चित्र संख्या 5 के अनुसार बीच का कर्णिका अष्टकोणीय होता है । अगर ऐसा नही होता है मतलब अरिपन अशुद्ध है । अष्टदल अरिपन में अष्टकोणीय कर्णिका आ षट्दल अरिपन मे षट्कोणीय कर्णिका का बनना अनिवार्य है । अगर आप सैद्धान्तिक रूप से सही बनाएंगे तो षट्कोणीय कर्णिका और अष्टकोणीय कर्णिका अपने आप बन जाता है । इस तरह केंद्र में बने कर्णिका के बाहर दो चक्र मे आठ त्रिभुज बनता है । ये दो चक्र ही अरिपन यंत्र का आवरण है । जिसे केसर कहा जाता है । इस तरह अरिपन में दो आवरण मे केसर का निरूपण अवश्य होना चाहिए । तभी शास्त्रीय दृष्टिकोण से पूजित भगवान के परिजन देवता के लिए स्थान बनता है । एक भी आवरण अगर भूलवश भी छूटता है तो वह अरिपन अशुद्ध ही होगा । इसके बाद दो केसर के बीच मे जो स्थान है उसमें देवता के अस्त्र-शस्त्र और हाथ मे धारण किये वस्तु का चित्रण होता है, तब जा कर शुद्धतापूर्वक अरिपन बनता है ।
पूजा करने वाले अरिपन में बीच वाले कर्णिका पर देवता के पैर का निरूपण होता है जो पुजारी के सामने की ओर होता है मतलब पूजित देवता पुजारी के सन्मुख अधिष्ठापित है ।
अष्टदल अरिपन में आठो दल पर शंख, चक्र, तलवार, गदा, कमल फूल, डमरू, स्वस्तिक और धनुषक का अंकन होता है । परन्तु ये चिह्न कौलिक परम्परानुसार और क्षेत्र विशेष अनुसार बदल भी सकते हैं ।
पंडित भवनाथ झा के अनुसार प्राचीन काल मे अरिपन के दल पर मातृका वर्ण लिखा जाता था, परंतु अब ये परम्परा समाप्त हो चुका है । शास्त्रीय ग्रन्थों में और स्थापित मूर्ति सब मे ये देखने को मिलता है । जैसे गौरी-शंकर मे आठो दल पर अ से ह तक का अक्षर लिखा जाता है ।
प्राचीन समय मे मिथिला की महिला को इतना लौकिक ज्ञान रहता था कि वे खुद से शास्त्र सम्मत विधानपूर्वक यन्त्र बना लेती थी , पर वर्तमान में ये परम्परा विलुप्त हो चुकी है । अब अरिपन का मतलब मात्र और मात्र खूबसूरत चित्रकारी तक सीमित हो चुकी है । अगर आप किसी को गलत चित्रण पर टोकते हैं तो बदले में कुवचन ही सुनने को मिलेगा । ऐसे में आज की पढ़ी लिखी मिथिलानियों से आशा अधिक हो जाती है कि वे अपनी संस्कृति का अध्ययन, चिंतन, मनन कर इसके प्रचार-प्रसार को आगे आये और अपनी परंपरा के संरक्षण एवं सम्वर्धन की बागडोर फिर से अपने हाथों में ले । धन्यवाद