Mithila School of Art

Mithila School of Art Mithila School of Art is a research institute of Madhubani Painting.

प्यार सबको आजमाता हैं,सोलह हज़ार एक सौ आठ रानियों से मिलने वाला श्याम, बस एक राधा को तरस जाता हैं।राधा और कृष्ण कदंब की ...
10/03/2024

प्यार सबको आजमाता हैं,
सोलह हज़ार एक सौ आठ रानियों से मिलने वाला श्याम, बस एक राधा को तरस जाता हैं।

राधा और कृष्ण कदंब की डाल में झूला डाले शायद ऊपर लिखी पंक्तियों को गलत बता हमें समझा रहे हैं की प्रेम का मतलब सिर्फ पा लेना नहीं होता -

यदि प्रेम का मतलब सिर्फ पा लेना होता,
तो हर हृदय में राधा-कृष्ण का नाम नही होता।

CraftVala.com के कलाकारों द्वारा हैंडलूम घीचा सिल्क टेबल डाई साड़ी पर हाथों द्वारा चित्रित यह मधुबनी पेंटिंग राधा और कृष्ण के उसी सच्चे प्रेम को समझने वालों को समर्पित है l

मिथिला चित्रकला से विलुप्त हो चुके तंत्र पेंटिंग को पुनर्जीवित करने के इस प्रयास में आप सभी का स्वागत है l कार्यशाला में...
04/06/2023

मिथिला चित्रकला से विलुप्त हो चुके तंत्र पेंटिंग को पुनर्जीवित करने के इस प्रयास में आप सभी का स्वागत है l कार्यशाला में सहभागिता वास्ते नीचे दिए गए लिंक का उपयोग करें या फिर QR कोड स्कैन करके भी इस कार्यशाला से जुड़ सकते हैं l 

इस कार्यशाला की विषिष्टता -

संस्कृत में लिखी गई तंत्रशास्त्र के पुस्तकों में वर्णित यंत्र निर्माण विधि (यंत्रोद्धार) का संस्कृत के स्कॉलर द्वारा विस्तृत विश्लेषण और इनके दिशा-निर्देश में प्रमाणिक यंत्रों के चित्रण का प्रशिक्षण सिद्धस्त मास्टर ट्रेनर आर्टिस्ट के द्वारा l ताकि जो भी यंत्र बने उसके प्रमाणिकता पर कोई संदेह ना रहे l

https://docs.google.com/forms/d/e/1FAIpQLSc8NU6jpRMJkWlbSCgDnA0UVpQdqcONuWs4j1m2V3tX5SQDtA/viewform?usp=sf_link

पुस्तक "मिथिला चित्रकला का सिद्धांत" का विमोचन मुख्य अतिथि आदरणीय संजय झा, मंत्री जल संसाधन सह सूचना जनसंपर्क मंत्री बिह...
25/05/2023

पुस्तक "मिथिला चित्रकला का सिद्धांत" का विमोचन मुख्य अतिथि आदरणीय संजय झा, मंत्री जल संसाधन सह सूचना जनसंपर्क मंत्री बिहार सरकार के हाथों शुक्रवार दिनांक 26/5/23 दिन के 3 बजे 11-स्ट्रैंड रोड, पटना पर होना तय हुआ है l आप सभी सम्मनित जन से आग्रह है की इस कार्यक्रम में अपनी गरिमामयी उपास्थिति रूपी आशीर्वाद दे हमें कृतार्थ करें l

राकेश झा
लेखक -मिथिला चित्रकला का सिद्धांत

यह पुस्तक विश्व प्रसिद्ध भारतीय लोककला मधुबनी चित्रकला अथवा मिथिला चित्रकला के सैद्धान्तिक विश्लेषण पर आधारित है। मिथिला...
16/05/2023

यह पुस्तक विश्व प्रसिद्ध भारतीय लोककला मधुबनी चित्रकला अथवा मिथिला चित्रकला के सैद्धान्तिक विश्लेषण पर आधारित है। मिथिला जो बिहार का सांस्कृतिक क्षेत्र है, मिथिला चित्रकला उसी मैथिल समाज की चित्रात्मक अभिव्यक्ति है। इसलिए पुस्तक में सभी तथ्य मिथिला की सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के आधार पर लिखे गए हैं। अब तक जितने भी मिथिला चित्रकला पर किताबें लिखी हैं, वो कहीं न कहीं किसी मिथिला पेंटिंग कलाकार या इस कला के किसी खास पक्ष पर लिखा गया है। ऐसे में मेरा यह मानना है की यह पहली किताब है जो मिथिला चित्रकला के सैद्धान्तिक पक्ष और उनका मिथिला के साथ सांस्कृतिक संबंध पर प्रामाणिकता के साथ के साथ लिखी गई है । मिथिला चित्रकला में किस विषय को कब, कहाँ, क्यों और कैसे चित्रित किया गया है, इसे पढ़ने के बाद पाठकों को इसका उत्तर मिल जाएगा ऐसा मेरा विश्वास है l amazon और google play book के माध्यम से आप इस पुस्तक की प्रति को अपने लिए सुरक्षित कर सकते हैं जहाँ यह बिक्री के लिए उपलब्ध है l

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Mithila Chitrakala Ka Sidhant - Ebook written by RAKESH KUMAR JHA. Read this book using Google Play Books app on your PC, android, iOS devices. Download for offline reading, highlight, bookmark or take notes while you read Mithila Chitrakala Ka Sidhant.

Sketch Practice by Student
26/12/2022

Sketch Practice by Student

01/01/2021
21/10/2020

झिझिया और जोग-टोन

झिझिया बिहार का पारंपरिक तंत्र-मंत्र पूरित अनुष्ठानिक गीतात्मक लोक नृत्य है । यह नृत्य शारदीय नवरात्र के दसों दिन प्रथम दिन से आरंभ होता है और अंतिम दिन की रात्रि तक गांव-घर की महिलाओं और कुँवारी कन्याओं के द्वारा सम्पूर्ण बिहार यहां तक कि नेपाल के मधेश क्षेत्र में भी की जाती है । समाज में डायन-जोगिन (योगिन) से जुड़ी शक्तियों के प्रति यह धारणा है कि ऐसी बुरी शक्तियों से स्त्रियां अपने परिवार (खास कर मायका पक्ष) की रक्षा इस अनुष्ठानिक लोक नृत्य के माध्यम से करती है । समाज मे बड़े-बुजर्गों के मुहँ से हमने ये बात जरूर सुनी होगी की शारदीय नवरात्र के अष्टमी तिथि की मध्य रात्रि के दौरान ही डायनों को अपनी जोग-टोन (जादू-टोना) में सिद्धि प्राप्त होती है । जिसके परीक्षण हेतू वो गर्भवती स्त्रियों के गर्भ पर या नवजात शिशु पर या फिर नौजवान बेटे पर अपने मारक शक्ति का प्रयोग करती है । इसलिए हम आप आज भी देखते है कि हमारे घरों की बुजुर्ग महिलाओं द्वारा शारदीय नवरात्र के समय नवजात बच्चों को काला कपड़े में लहसुन की कलियाँ, हींग, राई जैसी चींजों को लपेट उसे काले धागे में बांध गले मे बाँधा जाता है । ताकि बच्चों को बुरी नजरों से बचाया जा सके । मतलब साफ है कि जन सामान्य में व्याप्त इस इस तरह की धारणाओं से बचाव के लिए झिझिया नृत्य लोक व्यवहार में शामिल है । एक कथा के अनुसार इस अष्टमी की रात्रि में डायन अपने जोग-टोन से मृत मिट्टी में गड़े बच्चा को मिट्टी से निकाल उसे अपनी तंत्र शक्ति से फिर से जिंदा करती हैं तथा बच्चे का श्रृंगार कर उसे अपने साड़ी पर सुला खुद नग्न रूप में नाचती हुई दूर निकल जाती है । अगर इस दौरान कोई व्यक्ति बच्चा को देख उसको लेकर गांव की ओर भागता है तो फिर डायन उसका पीछा करती हुई उसे घूर ताक-घूर ताक ( बार-बार वापस पीछे देखने को कहना) कहते खदेड़ती है । अगर वह व्यक्ति बिना वापस पीछे देखे भागते हुवे गाँव की सीमा में प्रवेश कर जाता है तो फिर बच्चा अपनी पूरी आयु जीता है । नही अगर भागने वाला पीछे मुड़ देखता है तो वे दोनों वहीं मर जाते हैं । कहने का मतलब इस तरह की जितनी भी कहानियाँ हैं वो भले ही अंधविश्वास हो पर उसने जन सामान्य के दिलों में इतनी मजबूती से घर गया कि इन लोगों ने ना केवल इसे सच माना बल्कि इससे बचने के उपाय तक को अपने लोक व्यवहारों में जगह दे दी । झिझिया नृत्य इसी का एक उदाहरण है । जिसके माध्यम से एक स्त्री बहन-बेटी बन अपने परिवार की मंगल के लिए झिझिया नृत्य कर गाती है ---

सबके दुअरिया झिझिया झकमक करई
भैया के दुअरिया अन्हार कुप हो ना
बहिनी जे रहथिन्ह झिझिया खेलेथिन्ह
खेल औथिन्ह बाबा के दुअरिया हो ना......

अब झिझिया गीत में मायके पक्ष की मंगलकामना ही क्यों दृष्टिगत होती है तो दरसल कारण ये है की आज भी शारदीय नवरात्र में दुर्गा पूजा मेला देखने के दौरान जितनी भी विवाहिता नव यौवना होती है उनमें से अधिकांश को उनके मायके से बुलावा (बिदागरी) आता है और इसी शारदीय नवरात्र के दौरान ये सभी अपनी बहन, सखी-सहेलियों के साथ झिझिया नृत्य करती है । भले ही लड़कियाँ विवाहित हो जाय पर अपने मायके के प्रति अनुराग उनका कभी कम नही होता । अपने इसी अनुराग को वो मायके में इस नृत्य के लोक गीतों के माध्यम से प्रकट करती है ।

झिझिया लोक नृत्य का प्रसार क्षेत्र अधिक होने के कारण कई क्षेत्रों में इस लोक नृत्य से संबंधित कई प्रकार की लोक कथाओं का प्रमाण मिलता है । जिसको आधार मान ये कहा जा सकता है कि अमुक समय से अमुक क्षेत्र में झिझिया नृत्य और गीत की परंपरा चली आ रही है । एक ऐसी ही कथा है कि मिथिला के राजा चित्रसेन जो खुद निःसंतान थे अपने भांजा बालरूचि से बहुत अधिक स्नेह करते थे और उसे ही उन्होंने अपना युवराज घोषित किया हुआ था । राजा से कम उम्र की रूपवती पत्नी जो जादू टोने में प्रवीण थी उसका दिल बालरूचि के प्यार में पागल था । एक बार रानी ने अपना प्रणय निवेदन बालरूचि के समझ रखा पर बालरूचि ने इस निवेदन को सिरे से खारिज कर रानी को बहुत खड़ी-खोटी सुनाई । अपमानित रानी ने बालरूचि से प्रतिषोध लेने के उद्देश्य से अपने जादू से बहुत कुरूप और गंभीर रूप से बीमार होने का अभिनय राजा के समक्ष किया । घबराया राजा ने रानी का बहुत ईलाज करवाया पर रानी ने बीमारी का अभिनय बन्द नही किया । अंत में उसने राजा को अपनी बीमारी से बचने के उपाय के रूप में यह कहा कि अगर वो बालरूचि के रक्त से सने हृदय पर बैठ स्नान करेगी तो पुनः स्वस्थ और सुंदर हो जाएगी । राजा के लाख मनाही के वावजूद रानी नही मानी । अंततः राजा ने बालरूचि को मारने का आदेश दिया पर युवराज के खास सैनिकों ने युवराज को कैद कर उन्हें जंगल में ले जा कर कैद मुक्त कर गीदर के खून सने दिल को लाकर राजा को दे दिया । इसे देख रानी प्रसन्न हो अपने अभिनय को बंद कर फिर से सुंदर रूप में आ गई ।

इधर बालरूचि कैद से मुक्त हो जंगल मे भूख प्यास से बेहाल भटकते हुवे एक जादूगरनी बुढ़िया के पास पहुँचा । बूढ़ी जादूगरनी को उस पर दया आ गई । इस तरह बालरूचि और बूढ़ी जादूगरनी दोनों जंगल मे ही साथ-साथ रहने लगे । बहुत सालों के एक बार राजा और रानी की सवारी उस जंगल से गुजरी । जिस दौरान उसके डोली के एक कहार की मृत्यु हो गयी । अब जंगल मे कौन राजा की डोली को उठाये ये एक समस्या आ गयी । ऐसे में जब खोजबीन हुई तो बालरूचि जंगल मे मिला उसने राजा का कहार बनना स्वीकार कर लिया । रास्ते मे राजा एक गीत गा रहा था जो वो बचपन मे बालरूचि को सुनाया करता था । अचानक राजा गीत की पंक्ति को भूल गया । बार-बार दोहराने पर भी राजा गीत की पंक्ति को पूरा नही कर पा रहा था ऐसे में कहार बना बालरूचि ने उस पंक्ति को जिसे राजा भूल गया था गा कर पूरा किया । राजा के आश्चर्य का ठिकाना नही रहा । उसने कहार को अपना वास्तविक परिचय देने को जब मजबूर किया तो बालरूचि ने अपना असली परिचय दिया । राजा ने बालरूचि को गले से लगा लिया । रानी ने जब ये देखा तो उसे अपने किये पर बहुत शर्मिंदा होना पड़ा । रानी ने बालरूचि से माफी माँगी और संग चलने को कहा । बालरूचि तैयार हो गया पर ये बात बूढ़ी जादूगरनी को बिल्कुल ही पसंद नही आई । उसने वालरुचि पर अपने जादू-टोना का प्रहार कर दिया, जिससे बालरूचि मूर्छित हो गया । यह देख रानी जो खुद जादू-टोना में सिद्धस्त थी उसने जादूगरनी के जादू को काटना शुरू किया । इस तरह रानी और जादूगरनी में भयानक मायावी शक्तियों की लड़ाई शुरू हो गयी । अंत मे इस लड़ाई में जादूगरनी परास्त हुई और राजा-रानी बालरुचि के साथ राजधानी अपने महल को लौट आये और दोनों ने बालरुचि को राजगद्दी पर बैठा राजा घोषित कर दिया । साथ ही बालरूचि कि लंबी उम्र की कामना और डायनों के जोग-टोन से रक्षा के उद्देश्य से प्रतिवर्ष झिझिया तांत्रिक अनुष्ठान का आयोजन करने लगी । जिसे बाद में समाज के सभी वर्गों ने अपना लिया । इस तरह झिझिया जनसामान्य के लोक व्यवहार में शामिल हो गया ।

झिझिया नृत्य में जो छिद्रयुक्त घड़े का प्रयोग होता है जिसके अंदर दुर्गा माँ के आशीर्वाद का प्रतीक स्वरूप दीपक को जलाया जाता है । नाचने के क्रम में इस बात का ख्याल रखा जाता है कि दीपक ना बुझे और ना ही घड़ा नीचे गिर कर टूटे । घड़े का टूटना और दीपक का बुझना दोनों ही अपशकुन माना जाता है । साथ ही घड़े को माथे पर रख तेज गति से नाचा जाता है ताकि घड़े के छिद्र का गिनती ना किया जा सके ।
झिझिया की शुरुआत सबसे पहले ग्राम देवता ब्रह्म बाबा के स्थान से होता है । उनके आशीर्वाद के बाद झिझिया करने वाली गांव की गलियों में पूरी रात घूम-घूम के गीत गाती हुई नाचती है । गीतों में सबसे पहले ब्रह्म बाबा को गोहार लगाती हुई कहती है-

तोहरे भरोसे ब्रहम बाबा झिझिया बनइलिअइ हो
ब्रहम बाबा झिझिया बनइलिअइ हो.....
ब्रहम बाबा झिझरी पर होईअऊ न असवार
अबोधवा तोहर किछियो न जानय छौ हो.....
ब्रहम बाबा झिझरी पर होईअऊ न असवार

तोहरे अंगनमा ब्रहम बाबा जुड़वा बनइलिअइ हो
ब्रहम बाबा जुड़वा बनइलिअइ हो.....
ब्रहम बाबा जुड़वा पर होईअऊ न असवार
अबोधवा तोहर किछियो न जानय छौ हो....

ब्रह्मबाबा के गोहार ( विनती) के बाद देवी गीत गाती हुवे कहती है-

देवी मोरे अयलिन निहुरि पईयाँ लागू
की देखे अयलिन मैया की देख मुसकईलिन
दुधवा देखे अयलिन मैया पूत देख मुसकईलिन
देवी मोरे अयलिन निहुरि पईयां लागू .......

इस तरह महिलाएं ब्रह्म बाबा और देवी का आशीर्वाद ले आगे बढ़ती हैं और खुद को डायन से ज्यादा शक्तिशाली समझ गीतों के माध्यम से डायन को ललकारती हुवे कहती हैं-

चल चल गे डयनियाँ ब्रहम तर
तोरा बेटा के खेबउ ब्रहम तर ....



#झिझिया #मिथिला

आप सबों को शारदीय नवरात्र की हार्दिक शुभकामना 🙏🙏
17/10/2020

आप सबों को शारदीय नवरात्र की हार्दिक शुभकामना 🙏🙏

मिथिला चित्रकला का सबसे विवादित और अशुद्ध बनाये जाने वाला अरिपन - अष्टदल अरिपनहम सभी जानते हैं कि किसी भी पूजा में देवता...
08/10/2020

मिथिला चित्रकला का सबसे विवादित और अशुद्ध बनाये जाने वाला अरिपन - अष्टदल अरिपन

हम सभी जानते हैं कि किसी भी पूजा में देवताओं का आवाह्न अकेले नही होता है । इनका आवाह्न अङ्ग देवता, अस्त्र-शस्त्र, वाहन एवं पारिवार के संग होता है । इसलिए मन्त्र में कहा भी गया है- साङ्गसायुधसवाहनसपरिवार

इस प्रकार उनके स्थान के चारों ओर घेर कर उनके अंग देवता अप्रत्यक्ष रूप में अपने-अपने निर्धारित स्थान पर खुद ही स्थापित हो जाते हैं जो मुख्य देवता के आवरण के रूप में चारों ओर रहते हैं । सभी अस्त्र-शस्त्र, परिवार के सदस्य देवता, वाहन सभी का अरिपन में स्थान के साथ ही इनकी संख्या भी निर्धारित है । इसी कारण से मिथिला में पूजा के समय अरिपन देने की परंपरा है । इस अरिपन के माध्यम से पूजा क्रम में किसी भी तरह से कोई सैद्धान्तिक त्रुटि ना हो या कोई परिवारिक देवता को पूजा हेतू स्थान ना मिले इन सब कमियों से बचा जाता है ।

अरिपन की संरचना एवं उसके अंग - मिथिला चित्रकला में प्रयुक्त अरिपन मूल रूप से किसी ना किसी देवताओं को समर्पित यंत्र है । शास्त्रानुसार कर्णिका, केशर, दल और भूपुर ये यंत्र के चार अंग होते हैं । पर अरिपन में भूपुर का अंकन अब खत्म हो चुका है परंतु कर्णिका, केशर आ दल का अंकन प्रचलन में है । हाँ जहाँ केवल यंत्र का चित्रण होता है वहाँ भुपुर का भी निरूपण होता है ।

अरिपन के निरूपण में कर्णिका के स्वरूप, केसर की संख्या और दल के संख्या मे अज्ञानतावश भी परिवर्तन से पूरा का पूरा शास्त्रीय एवं कर्मकांडीय विध-व्यवहार ही उलट-पलट हो जाता है । क्योकि पूजा के दौरान मुख्यदेवता के परिजन देवता की संख्या जब निर्धारित है तब उसमे किसी भी तरह का परिवर्तन से पूरा यांत्रिक गणना ही असफल हो जाएगी ।

पंडित भवनाथ झा के अनुसार मिथिला मे देवी पूजा मे षट्दल और पुरुष देवता के पूजा मे अष्टदल अरिपन का प्रचलन है । इसलिये सत्यनारायण भगवान के पूजा मे अष्टदल अरिपन दिया जाता है । इतना ही नहीं, महादेव के विशेष पूजा मे, जैसे रुद्राभिषेक आदि मे भी अष्टदल अरिपन का निरूपण होना चाहिए । इसकी परम्परा मिथिला मे रही है । गौरीशंकर, जमुथरिक महादेव आ हाजीपुर के गौरीशंकर और अन्य जगह भी महादेव शिवलिंग स्थापना अष्टदल पर हुवा है ।

अष्टदल अरिपन के निर्माण के प्रथम चरण मे कर्णिका भी आठकोण वला होना चाहीये । जिसका निरूपण चित्र संख्या 1 के अनुसार होना चाहिए ।

इसके बाद कर्णिका को अष्टकोणीय बनाती एक रेखा दूसरी रेखा से मिलानी चाहिए जिससे चित्र संख्या 2 के हिसाब से आकृति बने ।

इसके बाद एक वृत्त बनायी जानी चाहिए । जो एक बिंदु से दूसरे बिन्दु को मिलाने से चित्र संख्या 3 के अनुसार बन जाता है । इसके बाद चित्र संख्या 4 के अनुसार इसके बाहर कमल के दल (पत्ते) के आकार में आठ दल का निरूपण करना चाहिए ।

इस तरह अष्टदल अरिपन का रेखांकन हो गया । इस प्रकार बने अरिपन में शुद्धता तब आती है जब चित्र संख्या 5 के अनुसार बीच का कर्णिका अष्टकोणीय होता है । अगर ऐसा नही होता है मतलब अरिपन अशुद्ध है । अष्टदल अरिपन में अष्टकोणीय कर्णिका आ षट्दल अरिपन मे षट्कोणीय कर्णिका का बनना अनिवार्य है । अगर आप सैद्धान्तिक रूप से सही बनाएंगे तो षट्कोणीय कर्णिका और अष्टकोणीय कर्णिका अपने आप बन जाता है । इस तरह केंद्र में बने कर्णिका के बाहर दो चक्र मे आठ त्रिभुज बनता है । ये दो चक्र ही अरिपन यंत्र का आवरण है । जिसे केसर कहा जाता है । इस तरह अरिपन में दो आवरण मे केसर का निरूपण अवश्य होना चाहिए । तभी शास्त्रीय दृष्टिकोण से पूजित भगवान के परिजन देवता के लिए स्थान बनता है । एक भी आवरण अगर भूलवश भी छूटता है तो वह अरिपन अशुद्ध ही होगा । इसके बाद दो केसर के बीच मे जो स्थान है उसमें देवता के अस्त्र-शस्त्र और हाथ मे धारण किये वस्तु का चित्रण होता है, तब जा कर शुद्धतापूर्वक अरिपन बनता है ।

पूजा करने वाले अरिपन में बीच वाले कर्णिका पर देवता के पैर का निरूपण होता है जो पुजारी के सामने की ओर होता है मतलब पूजित देवता पुजारी के सन्मुख अधिष्ठापित है ।

अष्टदल अरिपन में आठो दल पर शंख, चक्र, तलवार, गदा, कमल फूल, डमरू, स्वस्तिक और धनुषक का अंकन होता है । परन्तु ये चिह्न कौलिक परम्परानुसार और क्षेत्र विशेष अनुसार बदल भी सकते हैं ।

पंडित भवनाथ झा के अनुसार प्राचीन काल मे अरिपन के दल पर मातृका वर्ण लिखा जाता था, परंतु अब ये परम्परा समाप्त हो चुका है । शास्त्रीय ग्रन्थों में और स्थापित मूर्ति सब मे ये देखने को मिलता है । जैसे गौरी-शंकर मे आठो दल पर अ से ह तक का अक्षर लिखा जाता है ।

प्राचीन समय मे मिथिला की महिला को इतना लौकिक ज्ञान रहता था कि वे खुद से शास्त्र सम्मत विधानपूर्वक यन्त्र बना लेती थी , पर वर्तमान में ये परम्परा विलुप्त हो चुकी है । अब अरिपन का मतलब मात्र और मात्र खूबसूरत चित्रकारी तक सीमित हो चुकी है । अगर आप किसी को गलत चित्रण पर टोकते हैं तो बदले में कुवचन ही सुनने को मिलेगा । ऐसे में आज की पढ़ी लिखी मिथिलानियों से आशा अधिक हो जाती है कि वे अपनी संस्कृति का अध्ययन, चिंतन, मनन कर इसके प्रचार-प्रसार को आगे आये और अपनी परंपरा के संरक्षण एवं सम्वर्धन की बागडोर फिर से अपने हाथों में ले । धन्यवाद

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Town Club Road, West Side Lord Mahadev Temple
Madhubani
847211

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