सनातन अंतर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक विश्वज्ञानालय

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हनुमान जी और अंगद जी दोनों ही समुद्र लाँघने में सक्षम थे, फिर पहले हनुमान जी लंका क्यों गए?*"अंगद कहइ जाउँ मैं पारा।* *ज...
12/05/2026

हनुमान जी और अंगद जी दोनों ही समुद्र लाँघने में सक्षम थे, फिर पहले हनुमान जी लंका क्यों गए?

*"अंगद कहइ जाउँ मैं पारा।*
*जियँ संसय कछु फिरती बारा॥"*

अंगद जी बुद्धि और बल में बाली के समान ही थे! समुद्र के उस पार जाना भी उनके लिए बिल्कुल सरल था।

किन्तु वह कहते हैं कि लौटने में मुझे संसय है।

कौन सा संसय था लौटने में ?

बालि के पुत्र अंगद जी और रावण का पुत्र अक्षय कुमार दोनों एक ही गुरु के यहाँ शिक्षा प्राप्त कर रहे थे |

अंगद बहुत ही बलशाली थे और थोड़े से शैतान भी थे।

वो प्रायः अक्षय कुमार को थप्पड़ मार देते थे जिससे की वह मूर्छित हो जाता था।

अक्षय कुमार बार बार रोता हुआ गुरुजी के पास जाता और अंगद जी की शिकायत करता,,,एक दिन गुरुजी ने क्रोधित होकर अंगद को श्राप दे दिया कि अब यदि अक्षय कुमार पर तुमने हाथ उठाया तो तुम उसी क्षण मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे।

अगंद जी को यही संसय था कि कंही लंका में उनका सामना अक्षय कुमार से हो गया तो श्राप के कारण गड़बड़ हो सकती है,,इसलिए उन्होंने पहले हनुमान जी से जाने को कहा। और ये बात रावण भी जानता था,इसलिए जब राक्षसों ने रावण को बताया बड़ा भारी वानर आया है और अशोक वाटिका को उजाड़ रहा है तो रावण ने सबसे पहले अक्षय कुमार को ही भेजा वह जानता था वानरों में इतना बलशाली बाली और अंगद ही है जो सो योजन का समुंद्र लांघ कर लंका में प्रवेश कर सकते हैं,बाली का तो वध श्री राम के हाथों हो चुका है तो हो न हो अंगद ही होगा और अगर वह हुआ तो अक्षय कुमार उसका बड़ी सरलता से वध कर देगा।

पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा॥

आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।

किन्तु जब हनुमान जी ने अक्षय कुमार का राम नाम सत्य कर दिया और राक्षसों ने जाकर यह सूचना रावण को दी तो उसने सीधे मेघनाथ को भेजा और कहा उस वानर को मारना नही बंधी बनाकर लाना में देखना चाहता हूँ बाली और अंगद के सिवाय और कोनसा वानर इतना बलशाली है

*सुनि सुत बध लंकेस रिसाना।*
*पठएसि मेघनाद बलवाना॥*
*मारसि जनि सुत बाँधेसु ताही।*
*देखिअ कपिहि कहाँ कर आही॥*

जय बजरंगबली,जय श्री हनुमान, जय पवनपुत्र 🚩
्रीराम,

गुप्त साम्राज्य के काल में भारत केवल राजनीतिक रूप से ही नहीं, बल्कि शिल्प, व्यापार और आर्थिक गतिविधियों के क्षेत्र में भ...
12/05/2026

गुप्त साम्राज्य के काल में भारत केवल राजनीतिक रूप से ही नहीं, बल्कि शिल्प, व्यापार और आर्थिक गतिविधियों के क्षेत्र में भी अत्यंत विकसित था।

तक्षशिला, अहिच्छत्र, मथुरा, कौशांबी, राजघाट और पाटलिपुत्र जैसे नगर शिल्प उत्पादन के बड़े केंद्र थे, जहाँ मिट्टी के बर्तन, धातु उपकरण, काँच की वस्तुएँ, मनके, आभूषण और रेशमी वस्त्र बनाए जाते थे।

इस काल में “क्षौम” और “पट्टवस्त्र” जैसे रेशमी कपड़े प्रसिद्ध थे। मंदसौर अभिलेख से पता चलता है कि दक्षिण गुजरात से रेशम बुनकरों का एक संघ पश्चिम मालवा आकर बस गया था।

व्यापार को संगठित करने के लिए “श्रेणी” या गिल्ड प्रणाली विकसित थी। व्यापारी और शिल्पकार अपने संगठनों के माध्यम से उत्पादन, व्यापार और सुरक्षा का कार्य करते थे।

गुप्त शासकों द्वारा जारी स्वर्ण, रजत और ताम्र मुद्राएँ उस समय की समृद्ध व्यापार व्यवस्था और उत्कृष्ट शिल्पकला को दर्शाती हैं।

हालाँकि समाज में शिल्पकारों की स्थिति समान नहीं थी। स्वर्णकार जैसे समृद्ध कारीगर नगरों में प्रतिष्ठित थे, जबकि कुम्हार और टोकरी बनाने वाले ग्रामीण क्षेत्रों में निम्न सामाजिक स्तर पर माने जाते थे।

समय के साथ कुछ इतिहासकारों के अनुसार शहरी शिल्प और व्यापार में गिरावट आने लगी, जिससे समाज कृषि पर अधिक निर्भर होता गया।

'गर्भगृह' का ध्वनि विज्ञान: आगम शास्त्र का रहस्य
11/05/2026

'गर्भगृह' का ध्वनि विज्ञान: आगम शास्त्र का रहस्य

02/05/2026
तिथियों और नक्षत्रों का और उनके देवता तथा उनके पूजन का फलविभाजन के समय प्रतिपद् आदि सभी तिथियां अग्नि आदि देवताओं को तथा...
02/05/2026

तिथियों और नक्षत्रों का और उनके देवता तथा उनके पूजन का फल
विभाजन के समय प्रतिपद् आदि सभी तिथियां अग्नि आदि देवताओं को तथा सप्तमी भगवान सूर्य को प्रदान की गई। जिन्हें जो तिथि दी गई, वह उसका ही स्वामी कहलाया। अत: अपने दिन पर ही अपने मंत्रों से पूजे जाने पर वे देवता अभीष्ट प्रदान करते हैं
ज्योतिष 5 पक्ष तिथि वार
चन्द्र मास के दो पक्ष, ३० तिथियां एवं सप्ताह के ७ वार।
पक्ष व तिथि
सूर्य से चन्द्र की दूरी ही तिथियों का आधार है। १२ अंश की दूरी से एक तिथि का निर्माण होता है। जब सूर्य और चन्द्र एक ही अंश (३४९ वें अंश से ००० या ३६० अंश तक) पर हो तो अमावस्या और अधिकतम (१६९ वें अंश से १८० अंश तक) दूरी पर हों तो पूर्णिमा होती है। ३६०÷१२=३० तिथियां।
तिथियां संख्या में कुल तीस हैं, पंद्रह तिथियां शुक्ल पक्ष (बढ़ता चन्द्र/सुदी) की तथा १५ तिथियां कृष्ण पक्ष (घटता चन्द्र/बदी) की हैं
पक्ष १५ तिथियों (लगभग १५ दिन) का होता है। चाँद के महीने में दो पक्ष होते, एक जब चन्द्र घट रहा होता है और दूसरा जब चन्द्र बढ़ रहा होता है। घटते पक्ष को कृष्ण तथा बढ़ते पक्ष को शुक्ल कहते हैं।
दोनो पक्षों की प्रतिपदा (पहली) से चतुर्दशी (चौदहवीं) तक की चौदह तिथियों ने नाम व स्वामी देवता एक समान है। इसलिए प्रतिपदा से पूर्णिमा तक शुक्लपक्ष की पंद्रह तिथियां तथा अमावस्या सहित कुल सोलह नाम हैं। लेकिन अमावस्या के लिए संख्या ३० का प्रयाग करते हैं सोलह का नहीं, क्योंकि “अमवस्या” शुक्लपक्ष की पंद्रहवीं तिथि (पूर्णिमा) के बाद कृष्णपक्ष की पंद्रहवीं तिथि अर्थात् तीसवीं तिथि है।
उत्तर भारत में कृष्णपक्ष को चन्द्र मास का प्रथम पक्ष तथा शुक्ल पक्ष को दूसरा मानते हैं, इस प्रकार अमावस्या की संख्या १५ तथा पूर्णिमा की संख्या ३० होनी चाहिए, लेकिन है उल्टा और ये सिर्फ प्रचलन की बात नहीं, शास्त्रों में भी उल्टा ही लिखा है। आप जानते तो हैं लेकिन शायद आपने इस बात पर ध्यान न दिया हो कि “हमारा पंचांग शुक्ल पक्ष से ही आरंभ होता है, लेकिन हर महीना कृष्ण पक्ष से”। कहने का मतलब यह है कि हमारा नया वर्ष महीने के बीच से शुरु होता है। यदि हर नये विक्रमी संवत् का पहला पक्ष शुक्ल होता है तो महीने का पहला पक्ष भी शुक्ल ही होना चाहिए था, न कि कृष्ण पक्ष। हालांकि ज्योतिष में ढेरों बिना तर्क की बातें हैं जैसे कि “दशा” लेकिन परिणामों को देखकर विश्वास करना ही पड़ता है। लेकिन चान्द्र मास का कृष्ण पक्ष से आरंभ होना; न तो तर्क है और न ही कोई परिणाम। हालांकि कुछ लोग तर्क देते हैं “पूरणमासी”, लेकिन ये नामकरण तो प्रचलन के बाद का है।
मैं यहां उत्तर भारत में प्रचलित और प्रमाणिक ग्रंथों के मतानुसार लिख रहा हूँ। १६ कलाओं के सोलह नाम तथा सोलह ही देवता है। जोकि इस प्रकार हैं-
तिथियां देवता मतांतर से
१. प्रतिपदा अग्नि देव ब्रह्मा
२. द्वितीया ब्रह्मा विधाता
३. तृतीया गौरी विष्णु
४. चतुर्थी गणेश यम
५. पंचमी नाग देव चन्द्रमा
६. षष्ठी कार्तिकेय
७. सप्तमी सूर्य देव इन्द्र
८. अष्टमी शिव वसु/दुर्गा
९. नवमी दुर्गा अष्टवसु/सर्प
१०. दशमी यमराज/धर्मराज
११. एकादशी विश्वेदेव शिव
१२. द्वादशी विष्णु सूर्य
१३. त्रयोदशी कामदेव
१४. चतुर्दशी शिव कलि
१५. पूर्णिमा चन्द्रमा विश्वदेव
३०. अमावस्या पितृ
तिथि तथा वार से योग से तिथियों की नन्दा आदि है- नन्दा को शुक्रवार; भद्रा को बुधवार; जया को मंगलवार; रिक्ता को शनिवार तथा पूर्णा को गुरुवार हो तो वह तिथि “सिद्धा” कहलाती है।
तिथियों की नन्दादि संज्ञा
१, ६ व ११ नन्दा
२, ७ व १२ भद्रा
३, ८ व १३ जया
४, ९ व १४ रिक्ता
५, १०, १५ व ३० पूर्णा।
तिथियों के विषय में विस्तार से यहां पुण्डीरजी की पोस्ट पढ़ें।
वार
वारों का निर्धारण होरा से होता है, जिस दिन पहली होरा जिस ग्रह की होती है उसी ग्रह के नाम पर वह दिन होता है। एक अहोरात्र में चौबीस होराएं होती हैं। पच्चीसवीं होरा जिस ग्रह की होती है अगला दिन उसी ग्रह के नाम पर होता है।
वार स्वामी देवता नियंत्रक देवता
१. रविवार सूर्य/रुद्र सूर्य देव
२. सोमवार गौरी चन्द्र देव
३. मंगलवार सकन्द/गणेश मंगल देव
४. बुधवार विष्णु बुध देव
५. गुरुवार ब्रह्मा/सरस्वती बृहस्पति देव
६. शुक्रवार इन्द्र/लक्ष्मी शुक्राचार्य
७. शनिवार यम/शिव शनि देव
सूर्य ने अग्नि को प्रतिपदा, ब्रह्मा को द्वितीया, यक्षराज कुवेर को तृतीया और गणेश को चतुर्थी तिथि दी है। नागराज को पंचमी, कार्तिकेय को षष्ठी, अपने लिए सप्तमी और रुद्र को अष्टमी तिथि प्रदान की है। दुर्गादवी को नवमी, अपने पुत्र यमराज को दशमी, विश्वेदेवगणों को एकादशी तिथि दी गई है। विष्णु को द्वादशी, कामदेव को त्रयोदशी, शंकर को चतुर्दशी तथा चंद्रमा को पूर्णिमा की तिथि दी है। सूर्य के द्वारा पितरों को पवित्र, पुण्यशालिनी अमावास्या तिथि दी गई है। ये कही गई पंद्रह तिथियां चंद्रमा की हैं। कृष्ण पक्ष में देवता इन सभी तिथियों में शनै: शनै: चंद्रकलाओं का पान कर लेते हैं। वे शुक्ल पक्ष में पुन: सोलहवीं कला के साथ उदित होती हैं। वह अकेली षोडशी कला सदैव अक्षय रहती है। उसमें साक्षात सूर्य का निवास रहता है। इस प्रकार तिथियों का क्षय और वृद्धि स्वयं सूर्यनारायण ही करते हैं। अत: वे सबके स्वामी माने जाते हैं। ध्यानमात्र से ही सूर्यदेव अक्षय गति प्रदान करते हैं।दूसरे देवता भी जिस प्रकार उपासकों की अभीष्ट कामना पूर्ण करते हैं, संक्षेप में वह इस प्रकार है:
प्रतिपदा तिथि में अग्निदेव की पूजा करके अमृतरूपी घृत का हवन करे तो उस हवि से समस्त धान्य और अपरिमित धन की प्राप्ति होती है। द्वितीया को ब्रह्मा की पूजा करके ब्रह्मचारी ब्राह्मण को भोजन कराने से मनुष्य सभी विद्याओं में पारंगत हो जाता है। तृतीया तिथि में धन के स्वामी कुबेर का पूजन करने से मनुष्य निश्चित ही विपुल धनवान बन जाता है तथा क्रय-विक्रयादि व्यापारिक व्यवहार में उसे अत्यधिक लाभ होता है। चतुर्थी तिथि में भगवान गणेश का पूजन करना चाहिए। इससे सभी विघ्नों का नाश हो जाता है। पंचमी तिथि में नागों की पूजा करने से विष का भय नहीं रहता, स्त्री और पुत्र प्राप्त होते हैं और श्रेष्ठ लक्ष्मी भी प्राप्त होती है। षष्ठी तिथि में कार्तिकेय की पूजा करने से मनुष्य श्रेष्ठ मेधावी, रूपसंपन्न, दीर्घायु और कीर्ति को बढ़ानेवाला हो जाता है। सप्तमी तिथि को चित्रभानु नामवाले भगवान सूर्यनारायण का पूजन करना चाहिए, ये सबके स्वामी एवं रक्षक हैं। अष्टमी तिथि को वृषभ से सुशोभित भगवान सदाशिव की पूजा करनी चाहिए, वे प्रचुर ज्ञान तथा अत्यधिक कांति प्रदान करते हैं। भगवान शंकर मृत्य्हरण करनेवाले, ज्ञान देने वाले और बंधनमुक्त करने वाले हैं। नवमी तिथि में दुर्गा की पूजा करके मनुष्य इच्छापूर्वक संसार-सागर को पार कर लेता है तथा संग्राम और लोकव्यवहार में वह सदा विजय प्राप्त करता है। दशमी तिथि को यह की पूजा करनी चाहिए, वे निश्चित ही सभी रोगों को नष्ट करने वाले और नरक तथा मृत्यु से मानव का उद्धार करने वाले हैं। एकादशी तिथि को विश्वेदेवों की भली प्रकार से पूजा करनी चाहिए। वे भक्त को संतान, धन-धान्य और पृथ्वी प्रदान करते हैं। द्वादशी तिथि को भगवान विष्णु की पूजा करके मनुष्य सदा विजयी होकर समस्त लोक में वैसे ही पूज्य हो जाता है, जैसे किरणमालौ भगवान सूर्य पूज्य हैं। त्रयोदशी में कामदेव की पूजा करने से मनुष्य उत्तम भार्या प्राप्त करता है तथा उसकी सभी कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। चतुर्दशी तिथि में भगवान देवदेवेश्वर सदाशिव की पूजा करके मनुष्य समस्त ऐश्वर्यों से समन्वित हो जाता है तथा बहुत से पुत्रों एवं प्रभूत धन से संपन्न हो जाता है। पौर्णमासी तिथि में जो भक्तिमान मनुष्य चंद्रमा की पूजा करता है, उसका संपूर्ण संसार पर अपना आधिपत्य हो जाता है और वह कभी नष्ट नहीं होता। अपने दिन में अर्थात् अमावास्या में पितृगण पूजित होने पर सदैव प्रसन्न होकर प्रजावृद्धि, धन-रक्षा, आयु तथा बल-शक्ति प्रदान करते हैं। उपवास के बिना भी ये पितृगण उक्त फल को देनेवाले होते हैं। अत: मानव को चाहिए कि पितरों को भक्तिपूर्वक पूजा के द्वारा सदा प्रसन्न रखे। मूलमंत्र, नाम-संकीर्तन और अंश मंत्रों से कमल के मध्य में स्थित तिथियों के स्वामी देवताओं की विविध उपचारों से भक्तिपूर्वक यथाविधि पूजा करनी चाहिए तथा जप-होमादि कार्य संपन्न करने चाहिए। इसके प्रभाव से मानव इस लोक में और परलोक में सदा सुखी रहता है। उन-उन देवों के लोकों को प्राप्त करता है और मनुष्य उस देवता के अनुरूप हो जाता है। उसके सारे अरिष्ट नष्ट हो जाते हैं तथा वह उत्तम रूपवान, धार्मिक, शत्रुओं का नाश करनेवाला राजा होता है।
इसी प्रकार सभी नक्षत्र-देवता जो नक्षत्रों में ही व्यवस्थित हैं, वे पूजित होने पर समस्त अभीष्ट कामनाओं को प्रदान करते हैं। अश्विनी नक्षत्र में अश्विनीकुमारों की पूजा करने से मनुष्य दीर्घायु एवं व्याधिमुक्त होता है। भरणी नक्षरे में कृष्णवर्ण के सुंदर पुष्पों से बनी हुई मान्यादि और होम के द्वारा पूजा करने से अग्निदेव निश्चित ही यथेष्ट फल देते हैं। रोहिणी नक्षत्र में ब्रह्मा की पूजा करने से वह साधका की अभिलाषा पूरी कर देते हैं। मृगशिरा नक्षत्र में पूजित होने पर उसके स्वामी चंद्रदेव उसे ज्ञान और आरोग्य प्रदान करते हैं। आर्द्रा नक्षत्र में शिव के अर्चन से विजय प्राप्त होती है। सुंदर कमल आदि पुष्पों से पूजे गए भगवान शिव सदा कल्याण करते हैं।
पुनर्वसु नक्षत्र में अदिति की पूजा करनी चाहिए। पूजा से संतृप्त होकर वे माता के सदृश रक्षा करती हैं। पुष्य नक्षत्र में उसके स्वामी बृहस्पति अपनी पूजा से प्रसन्न होकर प्रचुत सद्बुद्धि प्रदान करते हैं। आश्लेषा नक्षत्र में नागों की पूजा करने से नागदेव निर्भय कर देते हैं, काटते नहीं। मघा नक्षत्र में हव्य-कव्य के द्वारा पूजे गए सभी पितृगण धन-धान्य, भृत्य, पुत्र तथा पशु प्रदान करते हैं। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में पूषा की पूजा करने पर विजय प्राप्त हो जाती है और उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में भग नामक सूर्यदेव की पुष्पादि से पूजा करने पर वे विजय कन्या को अभीप्सित पति और पुरुष को अभीष्ट पत्नी प्रदान करते हैं तथा उन्हें रूप एवं द्रव्य-संपदा से संपन्न बना देते हैं। हस्त नक्षत्र में भगवान सूर्य गंध-पुष्पादि से पूजित होने पर सभी प्रकार की धन-संपत्तियां प्रदान करते हैं। चित्रा नक्षत्र में पूजे गए भगवान त्वष्टा शत्रुरहित राज्य प्रदान करते हैं। स्वाती नक्षत्र में वायुदेव पूजित होने पर संतुष्ट जो परम शक्ति प्रदान करते हैं। विशाखा नक्षत्र में लाल पुष्पों से इंद्राग्नि का पूजन करके मनुष्य इस लोक में धन-धान्य प्राप्त कर सदा तेजस्वी रहता है।
अनुराधा नक्षत्र में लाल पुष्पों से भगवान मित्रदेव की भक्तिपूर्वक विधिवत पूजा करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है और वह इस लोक में चिरकाल तक जीवित रहता है। ज्येष्ठा नक्षत्र में देवराज इंद्र की पूजा करने से मनुष्य पुष्टि बल प्राप्त करता है तथा गुणों में, धन में एवं कर्म में सबसे श्रेष्ठ हो जाता है। मूल नक्षत्र में सभी देवताओं और पितरों की भक्तिपूर्वक पूजा करने से मानव स्वर्ग में अचलरूप से निवास करता है और पूर्वोक्त फलों को प्राप्त करता है। पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में अप्-देवता (जल) की पूजा और हवन करके मनुष्य शारीरिक तथा मानसिक संतापों से मुक्त हो जाता है। उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में विश्वेदेवों और भगवान विश्वेश्वर कि पुष्पादि द्वारा पूजा करने से मनुष्य सभी कुछ प्राप्त कर लेता है।
श्रवण नक्षत्र में श्वेत, पीत और नीलवर्ण के पुष्पों द्वारा भक्तिभाव से भगवान विष्णु की पूजा कर मनुष्य उत्तम लक्ष्मी और विजय को प्राप्त करता है। धनिष्ठा नक्षत्र में गन्ध-पुष्पादि से वसुओं के पूजन से मनुष्य बहुत बड़े भय से भी मुक्त हो जाता है। उसे कहीं भी कुछ भी भय नहीं रहता। शतभिषा नक्षत्र में इन्द्र की पूजा करने से मनुष्य व्याधियों से मुक्त हो जाता है और आतुर व्यक्ति पुष्टि, स्वास्थ्य और ऐश्वर्य को प्राप्त करता है। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में शुद्ध स्फटिक मणि के समान कांतिमान अजन्मा प्रभु की पूजा करने से उत्तम भक्ति और विजय प्राप्त होती है। उत्तराभाद्रपद नक्षत्र मेँ अहिर्बुध्न्य की पूजा करने से परम शांति की प्राप्ति होती है। रेवती नक्षत्र श्वेत पुष्प से पूजे गए भगवान पूषा सदैव मंगल प्रदान करते हैं और अचल धृति तथा विजय भी देते हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार भक्ति से किए गए पूजन से ये सभी सदा फल देने वाले होते हैं। यात्रा करने की इच्छा हो अथवा किसी कार्य को प्रारंभ करने की इच्छा हो तो नक्षत्र-देवता की पूजा आदि करके ही वह सब कार्य करना उचित है। इस प्रकार करने पर यात्रा में तथा क्रिया में सफलता होती है - ऐसा स्वयं भगवान सूर्य ने कहा हैं l
हमारे शास्त्रों में तिथि को बहुत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। जिस तिथि के जो देवता बताये गये हैं, उन देवताओं की पूजा उपासना उसी तिथि में करने से सभी देवता उपासक से प्रसन्न हो उसकी अभिलाषा को पूर्ण करते हैं। प्रतिपदा: इसे प्रथम तिथि भी कहा गया है, इस तिथि के स्वामी अग्नि देव हैं। इनकी उपासना से घर में धन-धान्य, आयु, यश, बल, मेधा आदि की वृद्धि होती है। द्वितीया: इस तिथि के स्वामी ब्रह्मा जी हैं। इस दिन किसी ब्रह्मचारी ब्राह्मण की पूजा करना एवं उन्हें भोजन, अन्न वस्त्र का दान देना श्रेयस्कर होता है। तृतीया: इस तिथि में गौरी जी की पूजा करने से सौभाग्य की वृद्धि होती है। कुबेर जी भी तृतीया के स्वामी माने गये हैं। अतः इनकी भी पूजा करने से धन-धान्य, समृद्धि प्राप्त होती है। चतुर्थी: इस तिथि के स्वामी श्री गणेश जी हैं जिन्हें प्रथम पूज्य भी कहा जाता है। इनके स्मरण से सारे विघ्न दूर हो जाते हैं। पंचमी: इस तिथि के स्वामी नाग देवता हैं। इस दिन नाग की पूजा से भय तथा कालसर्प योग शमन होता है। षष्ठी: इस तिथि के स्वामी स्कंद अर्थात् कार्तिकेय हैं। इनकी पूजा करने से व्यक्ति मेधावी, सम्पन्न एवं कीर्तिवान होता है। अल्पबुद्धि एवं हकलाने वाले बच्चे के लिए कार्तिकेय की पूजा करना श्रेयस्कर होता है। जिनकी मंगल की दशा हो या कोई कोर्ट केस में फंसा हो उसके लिए कार्तिकेय की पूजा श्रेष्ठ फलदायी है। सप्तमी: इस तिथि के स्वामी सूर्य हैं। सूर्य आरोग्यकारक माने गये हैं साथ ही जगत के रक्षक भी। इसलिए अच्छे स्वास्थ्य एवं आरोग्यता हेतु विशेषकर जिसे आंखों की समस्या हो उसके लिए इस दिन चाक्षुषी विद्या का पाठ करना माना गया है। अष्टमी: इस दिन के स्वामी रुद्र हैं। अतः इस तिथि में वृषभ से सुशोभित भगवान सदाशिव का पूजन करने से सारे कष्ट एवं रोग दूर होते हैं। नवमी: इस तिथि के दिन दुर्गा जी की पूजा करने से यश में वृद्धि होती है। साथ ही किसी प्रकार की ऊपरी बाधा एवं शत्रु नाश के लिए आज के दिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए। दशमी: इस तिथि के देवता यमराज हैं। इस दिन इनकी पूजा करने से ये सभी बाधाओं को दूर करते हैं एवं मनुष्य का नरक तथा अकाल मृत्यु से उद्धार करते हैं। एकादशी: इस तिथि के देवता विश्वेदेवा हैं। इनकी पूजा करने से वो भक्तों को धन धान्य एवं भूमि प्रदान करते हैं। द्वादशी: इस तिथि के स्वामी श्री हरि विष्णु जी हैं। इनकी पूजा करने से मनुष्य समस्त सुखों को भोगता है, साथ ही सभी जगह पूज्य एवं आदर का पात्र बनता है। इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना होता है। परंतु इस दिन तुलसी तोड़ना निषिद्ध है। त्रयोदशी: इस तिथि के स्वामी कामदेव हैं। इनकी पूजा करने से व्यक्ति रूपवान होता है एवं उम व सुंदर पत्नी प्राप्त करता है। साथ ही वैवाहिक सुख भी पूर्णरूप से मिलता है। चतुर्दशी: इसके स्वामी भगवान शिव हैं। अतः प्रत्येक मास की चतुर्दशी विशेषकर कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के दिन शिव जी की पूजा, अर्चना एवं रुद्राभिषेक करने से भगवान शिव मनोकामना पूर्ण करते हैं एवं समस्त ऐश्वर्य एवं सम्प प्रदान करते हैं। पूर्णिमा: इस तिथि के देवता चंद्र हैं। इनकी पूजा करने से मनुष्य का समस्त संसार पर आधिपत्य होता है। विशेषकर जिनकी चंद्र की दशा चल रही हो उनके लिए पूर्णिमा का व्रत रखना एवं चंद्र को अघ्र्य देना सुख में वृद्धि करता है। जिनके बच्चे अक्सर सर्दी जुकाम, निमोनिया आदि रोगों से ग्रसित हों उनकी मां को एक वर्ष तक पूर्णिमा का व्रत रखना चाहिए तथा चंद्र को अघ्र्य देकर अपना व्रत करना चाहिए। अमावस्या: इस तिथि पर पितरों का आधिपत्य है। अतः इस दिन अपने पितरों की शांति हेतु अन्न वस्त्र का दान देना एवं श्राद्ध करना श्रेयस्कर है। इससे प्रसन्न हो पितर देवता अपने कुल की वृद्धि हेतु संतान एवं धन समृद्धि देते हैं।
हर तिथि के होते हैं अलग-अलग देवता
हमारे शास्त्रों में तिथि को बहुत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। जिस तिथि के जो देवता बताये गये हैं, उन देवताओं की पूजा, उपासना उसी तिथि में करने से सभी देवता उपासक से प्रसन्न हो उसकी अभिलाषा को पूर्ण करते हैं।
प्रतिपदा: प्रथम तिथि
इसे प्रथम तिथि भी कहा गया है, इस तिथि के स्वामी अग्नि देव हैं। इनकी उपासना से घर में धन-धान्य, आयु, यश, बल, मेधा आदि की वृद्धि होती है।
द्वितीया
इस तिथि के स्वामी ब्रह्मा जी हैं। इस दिन किसी ब्रह्मचारी ब्राह्मण की पूजा करना एवं उन्हें भोजन, अन्न वस्त्र का दान देना श्रेयस्कर होता है।
तृतीया
इस तिथि में गौरी जी की पूजा करने से सौभाग्य की वृद्धि होती है। कुबेर जी भी तृतीया के स्वामी माने गये हैं। अतः इनकी भी पूजा करने से धन-धान्य, समृद्धि प्राप्त होती है।
चतुर्थी
इस तिथि के स्वामी श्री गणेश जी हैं जिन्हें प्रथम पूज्य भी कहा जाता है। इनके स्मरण से सारे विघ्न दूर हो जाते हैं।
पंचमी
इस तिथि के स्वामी नाग देवता हैं। इस दिन नाग की पूजा से भय तथा कालसर्प योग शमन होता है।
षष्ठी
इस तिथि के स्वामी स्कंद अर्थात् कार्तिकेय हैं। इनकी पूजा करने से व्यक्ति मेधावी, सम्पन्न एवं कीर्तिवान होता है। अल्पबुद्धि एवं हकलाने वाले बच्चे के लिए कार्तिकेय की पूजा करना श्रेयस्कर होता है। जिनकी मंगल की दशा हो या कोई कोर्ट केस में फंसा हो उसके लिए कार्तिकेय की पूजा श्रेष्ठ फलदायी है।
सप्तमी
इस तिथि के स्वामी सूर्य हैं। सूर्य आरोग्यकारक माने गये हैं साथ ही जगत के रक्षक भी। इसलिए अच्छे स्वास्थ्य एवं आरोग्यता हेतु विशेषकर जिसे आंखों की समस्या हो उसके लिए इस दिन चाक्षुषी विद्या का पाठ करना माना गया है।
अष्टमी
इस दिन के स्वामी रुद्र हैं। अतः इस तिथि में वृषभ से सुशोभित भगवान सदाशिव का पूजन करने से सारे कष्ट एवं रोग दूर होते हैं।
नवमी
इस तिथि के दिन दुर्गा जी की पूजा करने से यश में वृद्धि होती है। साथ ही किसी प्रकार की ऊपरी बाधा एवं शत्रु नाश के लिए आज के दिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए।
दशमी
इस तिथि के देवता यमराज हैं। इस दिन इनकी पूजा करने से ये सभी बाधाओं को दूर करते हैं एवं मनुष्य का नरक तथा अकाल मृत्यु से उद्धार करते हैं।
एकादशी
इस तिथि के देवता विश्वेदेवा हैं। इनकी पूजा करने से वो भक्तों को धन धान्य एवं भूमि प्रदान करते हैं।
द्वादशी
इस तिथि के स्वामी श्री हरि विष्णु जी हैं। इनकी पूजा करने से मनुष्य समस्त सुखों को भोगता है, साथ ही सभी जगह पूज्य एवं आदर का पात्र बनता है। इस दिन विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना होता है। परंतु इस दिन तुलसी तोड़ना निषिद्ध है।
त्रयोदशी
इस तिथि के स्वामी कामदेव हैं। इनकी पूजा करने से व्यक्ति रूपवान होता है एवं उम व सुंदर पत्नी प्राप्त करता है। साथ ही वैवाहिक सुख भी पूर्णरूप से मिलता है।
चतुर्दशी
इसके स्वामी भगवान शिव हैं। अतः प्रत्येक मास की चतुर्दशी विशेषकर कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के दिन शिव जी की पूजा, अर्चना एवं रुद्राभिषेक करने से भगवान शिव मनोकामना पूर्ण करते हैं एवं समस्त ऐश्वर्य एवं सम्प प्रदान करते हैं।
पूर्णिमा
इस तिथि के देवता चंद्र हैं। इनकी पूजा करने से मनुष्य का समस्त संसार पर आधिपत्य होता है। विशेषकर जिनकी चंद्र की दशा चल रही हो उनके लिए पूर्णिमा का व्रत रखना एवं चंद्र को अघ्र्य देना सुख में वृद्धि करता है। जिनके बच्चे अक्सर सर्दी जुकाम, निमोनिया आदि रोगों से ग्रसित हों उनकी मां को एक वर्ष तक पूर्णिमा का व्रत रखना चाहिए तथा चंद्र को अघ्र्य देकर अपना व्रत करना चाहिए।
अमावस्या
इस तिथि पर पितरों का आधिपत्य है। अतः इस दिन अपने पितरों की शांति हेतु अन्न वस्त्र का दान देना एवं श्राद्ध करना श्रेयस्कर है। इससे प्रसन्न हो पितर देवता अपने कुल की वृद्धि हेतु संतान एवं धन समृद्धि देते हैं।
कैसे करे पूजन
रोज सुबह जल्दी उठें और ब्रहम मुहूर्त में स्नान के बाद घर के मंदिर में ही तिथि के स्वामी की पूजा का प्रबंध करें। अगर मंदिर में तिथि स्वामी की मूर्ति या फोटो न हो तो उनके नाम का ध्यान करते हुए मंदिर में स्थापित देवी-देवताओं की पूजा करें। पूजा में कुमकुम, दीपक, तेल, रुई, धूपबत्ती, फूल, अक्षत – चावल, प्रसाद के लिए फल, मिठाई, नारियल, पंचामृत, सूखे मेवे, शक्कर, पान, दक्षिणा आदि अवश्य रखें। पूजा में धूप-दीप जलाएं और परेशानियों को दूर करने की प्रार्थना करें।
तिथि
दो नये चन्द्रोदय के मध्य के समय को चन्द्र मास कहते है और यह 29.5 दिन के समकक्ष होता है. एक चन्द्र मास में 30 तिथि अथवा चन्द्र दिवस होते हैं. तिथि को समझने के लिए हम यह भी कह सकते है कि चन्द्र रेखांक को सूर्य रेखांक से 12 अंश उपर जाने में लिए जो समय लगता है वह तिथि है.
इसलिए प्रत्येक नये चन्द्र और पूर्ण चन्द्र के बीच में कुल चौदह तिथियां होती हैं. शून्य को नया चन्द तथा पन्द्रहवीं तिथि को पूर्णिमा कहते हैं. तिथियां शून्य यानि अमावस्या से शुरु होकर पूर्णिमा तक एक क्रम में चलती है और फिर पूर्णिमा से शुरु होकर अमावस्या तक उसी क्रम को दूबारा पूरा करती हैं तो एक चन्द्र मास पूरा होता है.
तिथियों के नाम-
सभी तिथियों की अपनी एक अध्यात्मिक विशेषता होती है जैसे अमावस्या पितृ पूजा के लिए आदर्श होती है, चतुर्थी गणपति की पूजा के लिए, पंचमी आदिशक्ति की पूजा के लिए, छष्टी कार्तिकेय पूजा के लिए, नवमी राम की पूजा, एकादशी व द्वादशी विष्णु की पूजा के लिए, तृयोदशी शिव पूजा के लिए, चतुर्दशी शिव व गणेश पूजा के लिए तथा पूर्णमा सभी तरह की पूजा से सम्बन्धित कार्यकलापों के लिए अच्छी होती है.
सूर्य और चंद्रमा के अंतराल (दूरी) से तिथियां निर्मित होती हैं। अमावस्या के दिन सूर्य एवं चंद्रमा एक सीधी रेखा में होते हैं। अत: उस दिन सूर्य और चंद्रमा का भोग्यांश समान होता है। चंद्रमा अपनी शीघ्र गति से जब 12 अंश आगे बढ़ जाता है तो एक तिथि पूर्ण होती है- ‘भक्या व्यर्कविधोर्लवा यम कुभिर्याता तिथि: स्यात्फलम्’। जब चंद्रमा सूर्य से 24 अंश की दूरी पर होता है तो दूसरी तिथि होती है। इसी तरह सूर्य से चंद्रमा 180 अंश की दूरी पर होता है तो पूर्णिमा तिथि होती है और जब 360 अंश की दूरी पर होता है तो अमावस्या तिथि होती है।
तिथि क्षय एवं वृद्धि- ग्रहों की आठ प्रकार की गति होती है। इत: ग्रहों की विभिन्न गतियों के कारण ही तिथि क्षय एवं वृद्धि होती है। एक तिथि का क्षय 63 दिन 54 घटी 33 कला पर होती है। जिसमें एक सूर्योदय हो वह शुद्ध, जिसमें सूर्योदय न हो वह क्षय और जिसमें दो सूर्योदय हो वह वृद्धि तिथि कहलाती है। क्षय और वृद्धि तिथियां शुभ कार्यों में वर्ज्य और शुद्ध तिथि शुभ होती है। तिथियों की गणना शुक्ल पक्ष से प्रारंभ होती है।
शुक्ल पक्ष की तिथि
शून्य अंश से 12 अंश तक प्रतिपदा
12 से 24 अंश तक द्वितीया
24 से 36 अंश तक तृतीया
36 से 48 अंश तक चतुर्थी
48 से 60 अंश तक पंचमी
60 से 72 अंश तक षष्ठी
72 से 84 अंश तक सप्तमी
84 से 96 अंश तक अष्टमी
96 से 108 अंश तक नवमी
108 से 120 अंश तक दशमी
120 से 132 अंश तक एकादशी
132 से 144 अंश तक द्वादशी
144 से 156 अंश तक त्रयोदशी
156 से 168 अंश तक चतुर्दशी
168 से 180 अंश तक पूर्णिमा
कृष्ण पक्ष की तिथि-(ह्रास मान अंशों के अनुसार)
180 से 168 अंश तक प्रतिपदा
168 से 156 अंश तक द्वितीया
156 से 144 अंश तक तृतीया
144 से 132 अंश तक चतुर्थी
132 से 120 अंश तक पंचमी
120 से 108 अंश तक षष्ठी
108 से 96 अंश तक सप्तमी
96 से 84 अंश तक अष्टमी
84 से 72 अंश तक नवमी
72 से 60 अंश तक दशमी
60 से 48 अंश तक एकादशी
48 से 36 अंश तक द्वादशी
36 से 24 अंश तक त्रयोदशी
24 से 12 अंश तक चतुर्दशी
12 से शून्य अंश तक अमावस्या
(कृष्ण पक्ष की गणना 180 अंश चंद्रमा से 360 अंश के संक्रमण के दौरान ह्रास मान अंशों की गति के अनुसार किया जाता है)
तिथि विवरण
प्रतिपदा तिथि- यह वृद्धि और सिद्धप्रद तिथि है। स्वामी अग्नि देवता, नन्दा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ, कृष्ण पक्ष में शुभ। इस तिथि में कूष्माण्ड दान एवं भक्षण त्याज्य है।
द्वितीया- यह सुमंगला और कार्य सिद्धिकारी तिथि है। इसके स्वामी ब्रह्मा हैं। भद्रा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ, कृष्ण पक्ष में शुभ । इस तिथि में कटेरी फल का दान और भक्षण त्याज्य है।
तृतीया तिथि- यह सबला और आरोग्यकारी तिथि है। इसकी स्वामी गौरी जी हैं। जया नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ, कृष्ण पक्ष में शुभ । इस तिथि में नमक का दान व भक्षण त्याज्य है।
चतुर्थी तिथि- यह खल और हानिप्रद तिथि है। इसके स्वामी गणेश जी हैं। रिक्ता नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ, कृष्ण पक्ष में शुभ । इस तिथि में तिल का दान और भक्षण त्याज्य है।
पंचमी तिथि- यह धनप्रद व शुभ तिथि है। इसके स्वामी नागराज वासुकी हैं। पूर्णा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में अशुभ और कृष्ण पक्ष में शुभ । इस तिथि में खट्टी वस्तुओं का दान और भक्षण त्याज्य है।
षष्ठी तिथि- कीर्तिप्रद तिथि है। इसके स्वामी स्कंद भगवान हैं। नन्दा नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण पक्ष में मध्यम फलदायी, तैल कर्म त्याज्य।
सप्तमी तिथि- मित्रप्रद व शुभ तिथि है। इसके स्वामी भगवान सूर्य हैं। भद्रा नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों में मध्यम, आंवला त्याज्य।
अष्टमी तिथि- बलवती व व्याधि नाशक तिथि है। इसके देवता शिव जी हैं। जया नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों में मध्यम, नारियल त्याज्य।
नवमी तिथि- उग्र व कष्टकारी तिथि है। इसकी देवता दुर्गा जी हैं। रिक्ता नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों में मध्यम, काशीफल (कोहड़ा, कद्दू) त्याज्य।
दशमी तिथि- धर्मिणी और धनदायक तिथि है। इसके देवता यम हैं। पूर्णा नाम से ख्याति, शुक्ल व कृष्ण दोनों पक्षों में मध्यम, त्याज्य कर्म परवल है।
एकादशी तिथि- आनंद प्रदायिनी और शुभ फलदायी तिथि है। इसके देवता विश्व देव हैं। नन्दा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में शुभ, कृष्ण पक्ष में अशुभ, त्याज्य कर्म दाल है।
द्वादशी तिथि- यह यशोबली और सर्वसिद्धिकारी तिथि है। इसके देवता हरि हैं। भद्रा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में शुभ, कृष्ण पक्ष में अशुभ, त्याज्य कर्म मसूर है।
त्रयोदशी तिथि- यह जयकारी और सर्वसिद्धिकारी तिथि है। इसके देवता मदन (कामदेव) हैं। जया नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में शुभ, कृष्ण पक्ष में अशुभ, त्याज्य कर्म बैंगन है।
चतुर्दशी तिथि- क्रूरा और उग्रा तिथि है। इसके देवता शिवजी हैं। रिक्ता नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में शुभ, कृष्ण पक्ष में अशुभ, त्याज्य कर्म मधु है।
पूर्णिमा तिथि- यह सौम्य और पुष्टिदा तिथि है। इसके देवता चंद्रमा हैं। पूर्णा नाम से ख्याति, शुक्ल पक्ष में पूर्ण शुभ, त्याज्य कर्म घृत है।
अमावस्या तिथि- पीड़ाकारक और अशुभ तिथि है। इसके स्वामी पितृगण हैं। फल अशुभ है, त्याज्य कर्म मैथुन है।
शुभ ग्राह्य तिथियां
बच्चे नाम रखना- प्रतिपदा (कृष्ण पक्ष) तथा इसके अतिरिक्त दोनों पक्षों की 2, 3, 7, 10, 11, 12 व 13वीं तिथि तथा पूर्णिमा शुभ ग्राह्य है।
विद्यारंभ- शुक्ल पक्ष में 2, 3, 5, 7, 10, 11, 12, 13वीं तिथि तथा पूर्णिमा शुभ ग्राह्य है।
मुण्डन संस्कार- कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तथा दोनों पक्ष की 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11, 13 एवं पूर्णिमा शुभ ग्राह्य है।
दुकान एवं बहीखाता प्रारंभ करना- कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तथा दोनों पक्ष की 2, 3, 5, 7, 10, 12, 13वीं तिथि तथा पूर्णिमा शुभ ग्राह्य है।
नौकरी आरंभ करना- दोनों पक्ष की 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11, 12 एवं पूर्णिमा शुभ ग्राह्य है।
वाहन खरीदने के लिए- कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तथा दोनों पक्ष की 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11, 12, 13 एवं पूर्णिमा शुभ ग्राह्य।
गृहारंभ एवं शिलान्यास- नींव खोदने एवं मकान बनवाने के लिए कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तथा दोनों पक्ष की 2, 3, 5, 6, 7, 10, 11, 12, 13 एवं पूर्णिमा शुभ ग्राह्य।
नूतन घर में प्रवेश- कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तथा दोनों पक्ष की 2, 3, 5, 7, 10, 11, 13 तथा पूर्णिमा शुभ ग्राह्य।
भूमि खरीदने के लिए- कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तथा दोनों पक्ष की 5, 6, 10, 11, 13 तथा पूर्णिमा शुभ ग्राह्य।
विवाह मुहूर्त- कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तथा दोनों पक्ष की 2, 3, 5, 7, 8, 9, 10, 11, 12, 13 एवं पूर्णिमा शुभ ग्राह्य।
(अधिकांश कार्यों में 4, 9, 14 तिथियों को जिन्हें रिक्ता नाम से ख्याति है, त्याज्य माना गया है। )
विशेष-
यदि रविवार को द्वादशी तिथि हो तो क्रकच और दग्धा नाम कुयोग तथा प्रतिपदा, षष्ठी व एकादशी होने पर मृत्युदा (पीड़ाकारक) योग होता है। इस दिन शेष सभी तिथियां शुभ हैं।
सोमवार को एकादशी होने पर क्रकच और दग्धा कुयोग और द्वितीया, सप्तमी तथा द्वादशी होने पर मृत्युदा योग होता है। शेष सभी तिथियां शुभ हैं।
मंगलवार को दशमी होने क्रकच और पंचमी होने पर दग्ध नामक कुयोग तथा प्रतिपदा, षष्ठी व एकादशी होने पर मृत्युदा नामक योग होता है। तृतीया, अष्टमी तथा त्रयोदशी होने पर सिद्धिप्रद योग होता है।
बुधवार को नवमी होने पर क्रकच, तृतीया होने पर दग्ध नामक कुयोग और तृतीया, अष्टमी, त्रयोदशी होने पर मृत्युदा नामक योग होता है। द्वितीया, सप्तमी व द्वादशी होने पर सिद्धिप्रद योग होता है।
गुरुवार को अष्टमी, षष्ठी होने पर क्रमश: क्रकच और दग्ध कुयोग तथा चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी होने पर मृत्युदा योग, पंचमी, दशमी, पूर्णिमा होने पर सिद्धिप्रद योग होता है।
शुक्रवार को सप्तमी होने पर क्रकच, अष्टमी होने पर दग्ध नाम कुयोग, द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी होने पर मृत्युदा योग और प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी होने पर सिद्धिप्रद योग होता है।
शनिवार को षष्ठी होने पर क्रकच और नवमी होने पर दग्ध नामक कुयोग तथा पंचमी, दशमी पूर्णिमा होने पर मृत्युदा योग और चतुर्थी, नवमी, चतुर्दशी होने पर सिद्धिप्रद योग होता है।
(उपरोक्त दोष मध्याह्न के पश्चात न्यून हो जाते हैं और यदि सर्वार्थसिद्धि योग, अमृत योग, रवियोग इत्यादि दोषसंघ निवारक योग होता है तो तिथि जन्म दोष समाप्त हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त चंद्रबल यदि उत्तम है तो भी तिथि के कारण उत्पन्न कुयोगों का निवारण हो जाता है- क्रकचो मृत्यु योगाख्यो दिने दग्ध तथैव च। चंद्रे शुभे क्षयं यान्ति वृक्षा वज्राहता इव।।)
एक दिन को तिथि कहा गया है जो पंचांग के आधार पर उन्नीस घंटे से लेकर चौबीस घंटे तक की होती है। चंद्र मास में ३० तिथियाँ होती हैं, जो दो पक्षों में बँटी है

अधमाः धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः ।उत्तमाः मामिच्छन्ति मानो हि महतां धनम् ॥निम्न वर्ग का व्यक्ति केवल धन की इच्छा रखत...
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अधमाः धनमिच्छन्ति धनं मानं च मध्यमाः ।
उत्तमाः मामिच्छन्ति मानो हि महतां धनम् ॥

निम्न वर्ग का व्यक्ति केवल धन की इच्छा रखता है, मध्यम वर्ग का व्यक्ति धन और मान दोनों की ही इच्छा रखता है और उत्तम वर्ग का व्यक्ति केवल मान-सम्मान की इच्छा रखता है। मान-सम्मान का धन से अधिक महत्व होता है।

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02/05/2026

भारतीय कालगणना एक चक्रीय व्यवस्था है जिसमें सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग शामिल हैं। वर्तमान समय में श्वेतावाराह कल्प और वैवस्वत मन्वन्तर का 20वां कलियुग चल रहा है, जिसकी शुरुआत ईसा पूर्व 3102 वर्ष पहले हुई थी। इस चक्र की पुनरावृत्ति शाश्वत है, अर्थात कलियुग के अंत के बाद पुनः सतयुग की शुरुआत होती है।

आइंस्टीन का सापेक्षता सिद्धांत (Time Dilation) बताता है कि समय एक निश्चित दर से नहीं बीतता, बल्कि यह गति और गुरुत्वाकर्षण पर निर्भर करता है। भारतीय ग्रंथों में इसका उदाहरण राजा काकुद्मी की कथा में मिलता है, जहाँ ब्रह्मा लोक में कुछ समय बीतने पर पृथ्वी पर लाखों वर्ष बीत जाते हैं। यह घटना आधुनिक भौतिकी के टाइम डाइलेशन के सिद्धांत से मेल खाती है, जहाँ अलग-अलग स्थानों या गति में समय का प्रवाह भिन्न होता है।

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