13/07/2026
🤔आखिर नालंदा विश्वविद्यालय की खोज कैसे हुई?🤔
कल्पना कीजिए कि दुनिया का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय, जहाँ कभी हजारों विद्यार्थी पढ़ते थे, जहाँ दूर-दूर के देशों से विद्वान ज्ञान प्राप्त करने आते थे, वह एक दिन पूरी तरह गायब हो जाए। उसकी इमारतें मिट्टी के नीचे दब जाएँ, जंगल उसे अपने भीतर समेट लें और आने वाली पीढ़ियाँ यह तक भूल जाएँ कि यहाँ कभी ज्ञान का इतना विशाल केंद्र हुआ करता था।
यही कहानी है नालंदा विश्वविद्यालय की।
12वीं शताब्दी के अंत में हुए विनाश के बाद नालंदा धीरे-धीरे उजड़ गया। समय बीतता गया, इमारतें ढहती गईं और उनके ऊपर मिट्टी की परतें जमती रहीं। सदियों तक यह स्थान केवल बड़े-बड़े टीलों के रूप में दिखाई देता था। स्थानीय लोगों को इतना पता था कि यहाँ किसी समय कोई प्राचीन नगर या मठ रहा होगा, लेकिन यह विश्वविख्यात नालंदा विश्वविद्यालय है, इसका किसी को पता नहीं था।
करीब 700 वर्षों तक नालंदा इतिहास के पन्नों में तो जीवित रहा, लेकिन वास्तविक दुनिया में मानो खो गया था।
19वीं शताब्दी की शुरुआत में ब्रिटिश सर्वेक्षक फ्रांसिस बुकानन-हैमिल्टन इस क्षेत्र में पहुँचे। उन्होंने इन विशाल टीलों, टूटी हुई ईंटों, प्राचीन मूर्तियों और खंडहरों का सर्वेक्षण किया। उन्होंने अपने अभिलेखों में इन अवशेषों का उल्लेख भी किया, लेकिन उस समय वे यह पहचान नहीं पाए कि ये विश्व के सबसे महान विश्वविद्यालय के अवशेष हैं।
इसके कुछ वर्षों बाद अन्य अधिकारियों और यात्रियों ने भी इन खंडहरों का अध्ययन किया। उन्हें यह स्पष्ट होने लगा कि यह कोई साधारण पुरातात्विक स्थल नहीं है। यहाँ की विशाल ईंटें, मठों जैसी संरचनाएँ और बड़ी संख्या में मिली मूर्तियाँ संकेत दे रही थीं कि यह स्थान कभी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा होगा।
लेकिन असली रहस्य तब सुलझा, जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संस्थापक अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने इस स्थान का गहन अध्ययन किया। उन्होंने केवल खंडहरों को नहीं देखा, बल्कि लगभग 1200 वर्ष पहले भारत आए चीनी यात्रियों ह्वेनसांग और यीजिंग के यात्रा-वृत्तांतों को भी पढ़ा।
ह्वेनसांग ने अपने यात्रा-वर्णन में नालंदा विश्वविद्यालय का इतना विस्तृत विवरण लिखा था कि उसमें आसपास के गाँवों, मंदिरों, मठों और दूरी तक का उल्लेख मिलता है। कनिंघम ने इन विवरणों की तुलना बिहार के इस क्षेत्र से की। जब स्थान, दूरी, भवनों की संरचना और अन्य प्रमाण एक-दूसरे से मेल खाने लगे, तब उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यही प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय है।
इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने व्यवस्थित खुदाई शुरू की। 1915 से लेकर 1937 तक कई चरणों में बड़े पैमाने पर उत्खनन हुआ। जैसे-जैसे मिट्टी हटती गई, वैसे-वैसे इतिहास की एक नई दुनिया सामने आती गई।
खुदाई में विशाल विहार, मंदिर, छात्रावास, प्रार्थना कक्ष, अध्ययन कक्ष, आँगन, कुएँ, सीढ़ियाँ, जल निकासी की व्यवस्था, हजारों मूर्तियाँ, ताम्रपत्र, मुहरें और अनेक अभिलेख मिले। इन सभी खोजों ने यह सिद्ध कर दिया कि नालंदा केवल एक बौद्ध मठ नहीं था, बल्कि विश्व का सबसे विकसित आवासीय विश्वविद्यालय था, जहाँ शिक्षा, अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संवाद का अद्भुत वातावरण था।
इतिहासकारों का मानना है कि नालंदा में भारत के अलावा चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत, श्रीलंका, इंडोनेशिया और मध्य एशिया से भी विद्यार्थी अध्ययन करने आते थे। यहाँ केवल बौद्ध दर्शन ही नहीं, बल्कि व्याकरण, तर्कशास्त्र, चिकित्सा, गणित, ज्योतिष, दर्शन और अनेक विषय पढ़ाए जाते थे।
आज नालंदा के खंडहर केवल ईंटों का ढेर नहीं हैं। वे उस युग के साक्षी हैं, जब भारत ज्ञान और शिक्षा का वैश्विक केंद्र था। यदि चीनी यात्रियों ने अपने अनुभवों को विस्तार से न लिखा होता और यदि पुरातत्वविदों ने उन विवरणों की तुलना इन खंडहरों से न की होती, तो शायद नालंदा आज भी मिट्टी के नीचे दफ़न रहता।
नालंदा की खोज हमें यह सिखाती है कि इतिहास कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। वह समय की परतों के नीचे छिप सकता है, लेकिन सत्य एक दिन अवश्य सामने आता है। यह खोज केवल एक प्राचीन विश्वविद्यालय की पहचान नहीं थी, बल्कि भारत की उस महान बौद्धिक विरासत की पुनर्खोज थी, जिसने कभी पूरी दुनिया को ज्ञान का प्रकाश दिया था।