सनातन अंतर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक विश्वज्ञानालय

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01/08/2026

पद्म पुराण में वर्णित पुष्कर, प्रयाग और काशी का तुलनात्मक माहात्म्य

01/08/2026

गुरु -
शास्त्रों में गुरु के १२ भेद बतलाये
गए हैं ---
1अध्यापक
२ पिता
३ज्येष्ठभाई
४राजा
५मामा
६श्वसुर
७ रक्षक
८नाना
९ पितामह
१०बन्धु
११अपने से बड़ा
१२ चाचा
उपाध्यायः पिता ज्येष्ठभ्राता
चैव महीपतिः!
मातुलः श्वसुरस्त्राता
मातामहपितामहौ !!
बन्धुर्ज्येष्ठः पितृव्यश्च पुन्स्येते
गुरवः स्मृताः !!
स्त्री वर्ग में भी कौन २ गुरु हैं –
इसकी भी परिगणना की गयी है
–नानी ,मामी ,मौसी,सास, दादी, अपने से बड़ी जो भी हो तथा जो पालन करने वाली है !
देखें ----
मातामही मातुलानी तथा
मातुश्च सोदरा !
श्वश्रूः पितामही ज्येष्ठा
धात्री च गुरवः स्त्रीषु !!
किन्तु जब प्राणी के ह्रदय में
मुमुक्षा जागृत होती है तब उसे
कहाँ जाना चाहिए इसका निर्देश
भगवती श्रुति स्वयं कर रही है –
तद्विज्ञानार्थं स गुरु
मेवाभिगच्छेत्
समित्पाणिः श्रोत्रियं
ब्रह्मनिष्ठम् !
श्रोत्रिय
=शास्त्रवेत्ता ब्रह्मनिष्ठ गुरु
के पास समिधा (एक बित्ते
की कनिष्ठिका जितनी मोटी
३लकडियाँ) लेकर जाय ,इससे
अपनी दीनता भी प्रकट
होगी और राजा गुरु
तथा देवता के पास रिक्त हस्त
नहीं जाना चाहिए –रिक्तहस्तं
नोपेयाद् राजानं दैवतं गुरुम् !---
इस शास्त्र आज्ञा का पालन
भी !ऐसे गुरुजन संसार से पूर्ण
विरक्त आत्मचिंतननिष्ठ होते
हैं ! तपश्चर्या और आत्मबल से
परिपूर्ण इनका दर्शन
भगवत्कृपा से ही संभव है ---
लभ्यतेपि तत्कृपयैव—
नारदभक्तिसूत्र ! ये ३ प्रकार के
होते हैं ! जो विभाग इनकी क्रिया शैली के आधार पर किया गया है ---
१ स्पर्श दीक्षाप्रद गुरु ---
स्पर्शमात्र से जो गुरुजन
दीक्षा देते है वे इस कोटि में आते
हैं इनके स्पर्श मात्र से कुण्डलिनी महाशक्ति का जागरण हो जाता है ! ये अपने स्पर्श से ही शिष्य का पोषण करने में समर्थ होते हैं !
उदाहरण के रूप
में आप देख सकते हैं की पक्षी अपने बच्चों को चारा चुंगाता है पर उनका संवर्धन अपने पंखों के द्वारा बार बार उन्हें पूर्ण स्पर्श पूर्वक ढककर करता है !
केवल आहार से पक्षियों के बच्चे
नहीं बढते बल्कि माँ के स्पर्श से
उनकी वृद्धि होती है!
इसी श्रेणी के प्रथम गुरुजन हैं !
२ दृग्दीक्षाप्रद गुरु ---
दृष्टि मात्र से जो जीवों का कल्याण करने में समर्थ होते है वे गुरुजन इस
श्रेणी में आते हैं ! इसके दृष्टांत के
रूप में हम मछली को प्रस्तुत करते हैं !
मछली को दुग्ध नहीं होता इसे
प्रायः सभी लोग जानते हैं फिर
वह अपने बच्चों का पालन कैसे
करती है ?
सुनें-- जब मछली जल में
तैरती है तब छुधा पीड़ित बच्चे
उसकी आँखों के समक्ष आते हैं !
मत्स्य की दृष्टि उन पर पड़ती है
इसी से वे पुष्ट होते रहते हैं ! इस
प्रकार के गुरुजन दुर्लभ होते हैं ये
किसी भाग्यशाली को ही प्राप्त होते हैं !
३वैधदीक्षाप्रद गुरु ---
ये गुरुजन उस कोटि के हैं जो अपने ध्यान मात्र से शिष्य का कल्याण करने
में सक्षम होते हैं !
ये ध्यान मात्र से किसी की महाशक्ति कुण्डलिनी को जगा सकते हैं तथा भगवान्‌ की अविरल भक्ति प्राप्त कराने में भी समर्थ होते है इनसे एक
बार किसी सौभाग्य शाली को जुड़ने का शुभ अवसर प्राप्त हो जाय तो उसे
माया अपने मोह पाश में नहीं बाँध सकती है !भगवान्‌ कृष्णद्वैपायन व्यास जी में ये तीनों लक्षण थे !
तीर्थ, देवता और गुरु, विप्र
तथा भगवान के पावन नाम में
स्वल्प पुण्य वालों का विश्वास
नहीं होता है ---
तीर्थे देवे गुरौ विप्रे ईश
नाम्नि च पार्थिवे !
स्वल्प पुण्यवतां राजन्
विश्वासो नैव जायते !!
गुरु को ब्रह्मा इसलिए कहा गया क्योंकि वे हमारे ह्रदय में विमल ज्ञान की सृष्टि करते है –
गृ धातु से गुरु शब्द की निष्पत्ति होती है
गृणाति =उपदिशति ब्रह्म ज्ञानमिति गुरुः =जो भगवद् विषयक ज्ञान का उपदेश करें वे गुरु है ,अतः गुरु ब्रह्मा है नूतन
ज्ञान की सृष्टि करने कारण !
बार बार सचेत करते हुए उस ज्ञान का संरक्षण करते हैं इसलिए विष्णु हैं !और स्वप्रदत्त ज्ञान के द्वारा कुसंस्कारों तथा
अनिष्टकारी प्रवृत्तियों का विनाश करते हैं इसलिये संहारकारी शिव हैं ! इन्हीं कारणों से उन्हें ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा परब्रह्म कहा गया है -----
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः
गुरुर्देवो महेश्वरः !
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै
श्रीगुरवे नमः !!
हाँ एक बात और जो मैंने इन ३ प्रकार की दीक्षाओं का निरूपण किया है ,वह कुलार्णव तंत्र में भगवान शिवजी के द्वारा भगवती पार्वती को उपदिष्ट हुई हैं और भागवत की श्रीधरी टीका पर जो वंशीधरी व्याख्या है उसमें १०/२/१८ में आप देख सकते हैं !

16/07/2026

नारद पुराण के अनुसार प्रमुख व्रत और उनके ऐतिहासिक प्रसंग

दिल्ली का प्रसिद्ध गुरुद्वारा बंगला साहेब जो कभी राजा जयसिंह का बंगला थायह बात ऐतिहासिक सत्य है कि यह गुरुद्वारा कभी एक ...
16/07/2026

दिल्ली का प्रसिद्ध गुरुद्वारा बंगला साहेब जो कभी राजा जयसिंह का बंगला था

यह बात ऐतिहासिक सत्य है कि यह गुरुद्वारा कभी एक भव्य बंगला था, जो आमेर (जयपुर) के राजपूत राजा जयसिंह (मिर्जा राजा जयसिंह) का निवास स्थान हुआ करता था। इसे तब 'जयसिंहपुरा पैलेस' या 'बंगला' के नाम से जाना जाता था।

सिखों के आठवें गुरु, गुरु हरिकिशन साहिब जी (जिन्हें 'बाल गुरु' भी कहा जाता है) को तत्कालीन मुगल बादशाह औरंगज़ेब ने दिल्ली आमंत्रित किया था। उस समय गुरु साहिब की आयु मात्र 7-8 वर्ष के आसपास थी।

मुगल दरबार की राजनीति और उत्तराधिकार के विवादों के बीच, राजा जयसिंह ने गुरु साहिब के प्रति गहरी श्रद्धा व्यक्त की। उन्होंने गुरु हरिकिशन जी और उनके माता-पिता को दिल्ली प्रवास के दौरान अपने इसी भव्य बंगले में ठहरने का सादर निमंत्रण दिया, जिसे गुरु साहिब ने स्वीकार कर लिया।

जब गुरु हरिकिशन जी इस बंगले में रुके हुए थे, उसी दौरान दिल्ली में चेचक (Smallpox) और हैजा (Cholera) जैसी भयानक महामारियाँ फैल गईं।

गुरु साहिब ने जात-पात और धर्म का भेदभाव भूलकर पीड़ित लोगों की सेवा करना शुरू कर दिया।

राजा जयसिंह के इस बंगले के परिसर में एक छोटा तालाब (कुआँ) था। गुरु हरिकिशन जी ने अपनी आध्यात्मिक शक्ति और करुणा से उस कुएं के जल को आशीर्वाद दिया। जो भी बीमार व्यक्ति उस जल को ग्रहण करता या उससे स्नान करता, वह ठीक होने लगा।

दूसरों को ठीक करते-करते और लगातार रोगियों के संपर्क में रहने के कारण गुरु साहिब स्वयं चेचक की चपेट में आ गए। 30 मार्च 1664 को मात्र 8 वर्ष की अल्पायु में वे इसी बंगले में 'ज्योति-जोत' समा गए (उनका निधन हो गया)।

गुरु हरिकिशन जी के प्रति राजा जयसिंह की श्रद्धा इतनी गहरी थी कि गुरु साहिब के ज्योति-जोत समाने के बाद उन्होंने इस पूरे बंगले को सिख कौम और जनता की सेवा के लिए समर्पित कर दिया।

राजा जयसिंह ने उस तालाब और बंगले को गुरु साहिब की स्मृति में एक स्मारक का रूप दे दिया। इसे सिख श्रद्धालुओं द्वारा "बंगला साहेब" कहा जाने लगा क्योंकि यह मूल रूप से राजा का बंगला था।

18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, प्रसिद्ध सिख सैन्य कमांडर सरदार बघेल सिंह ने दिल्ली पर अपनी धाक जमाने के बाद दिल्ली के ऐतिहासिक सिख स्थलों का पुनर्निर्माण कराया। उन्होंने ही राजा जयसिंह द्वारा सौंपे गए इस स्थान पर एक छोटे गुरुद्वारे का निर्माण करवाया।

समय के साथ इस स्थान का विस्तार हुआ। आज जो हम भव्य सोने के गुंबद वाला गुरुद्वारा बंगला साहेब देखते हैं, उसका निर्माण और आधुनिक स्वरूप मुख्यतः 1947 के बाद बाबा हरबंस सिंह जी के नेतृत्व में कारसेवा के माध्यम से तैयार हुआ।

राजा जयसिंह के समय का जो छोटा जलाशय था, उसे आज एक विशाल और पवित्र सरोवर का रूप दे दिया गया है, जिसके जल को आज भी श्रद्धालु 'अमृत' मानकर श्रद्धा से ग्रहण करते हैं।

गुरु साहिब की सेवा भावना को जीवित रखते हुए यहाँ 24 घंटे लंगर चलता है और बेहद कम खर्च या मुफ्त इलाज के लिए एक आधुनिक डिस्पेंसरी/अस्पताल भी संचालित है।

गुरुद्वारा बंगला साहेब का इतिहास हिंदू राजपूत राजा जयसिंह की उदारता और सिख गुरु हरिकिशन जी के प्रति श्रद्धा, गुरु की मानवता के प्रति सर्वोच्च करुणा का एक जीवंत प्रतीक है, जो एक राजा के महल से उठकर आज करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र बन चुका है।

🤔आखिर नालंदा विश्वविद्यालय की खोज कैसे हुई?🤔कल्पना कीजिए कि दुनिया का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय, जहाँ कभी हजारों विद्य...
13/07/2026

🤔आखिर नालंदा विश्वविद्यालय की खोज कैसे हुई?🤔

कल्पना कीजिए कि दुनिया का सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालय, जहाँ कभी हजारों विद्यार्थी पढ़ते थे, जहाँ दूर-दूर के देशों से विद्वान ज्ञान प्राप्त करने आते थे, वह एक दिन पूरी तरह गायब हो जाए। उसकी इमारतें मिट्टी के नीचे दब जाएँ, जंगल उसे अपने भीतर समेट लें और आने वाली पीढ़ियाँ यह तक भूल जाएँ कि यहाँ कभी ज्ञान का इतना विशाल केंद्र हुआ करता था।

यही कहानी है नालंदा विश्वविद्यालय की।

12वीं शताब्दी के अंत में हुए विनाश के बाद नालंदा धीरे-धीरे उजड़ गया। समय बीतता गया, इमारतें ढहती गईं और उनके ऊपर मिट्टी की परतें जमती रहीं। सदियों तक यह स्थान केवल बड़े-बड़े टीलों के रूप में दिखाई देता था। स्थानीय लोगों को इतना पता था कि यहाँ किसी समय कोई प्राचीन नगर या मठ रहा होगा, लेकिन यह विश्वविख्यात नालंदा विश्वविद्यालय है, इसका किसी को पता नहीं था।

करीब 700 वर्षों तक नालंदा इतिहास के पन्नों में तो जीवित रहा, लेकिन वास्तविक दुनिया में मानो खो गया था।

19वीं शताब्दी की शुरुआत में ब्रिटिश सर्वेक्षक फ्रांसिस बुकानन-हैमिल्टन इस क्षेत्र में पहुँचे। उन्होंने इन विशाल टीलों, टूटी हुई ईंटों, प्राचीन मूर्तियों और खंडहरों का सर्वेक्षण किया। उन्होंने अपने अभिलेखों में इन अवशेषों का उल्लेख भी किया, लेकिन उस समय वे यह पहचान नहीं पाए कि ये विश्व के सबसे महान विश्वविद्यालय के अवशेष हैं।

इसके कुछ वर्षों बाद अन्य अधिकारियों और यात्रियों ने भी इन खंडहरों का अध्ययन किया। उन्हें यह स्पष्ट होने लगा कि यह कोई साधारण पुरातात्विक स्थल नहीं है। यहाँ की विशाल ईंटें, मठों जैसी संरचनाएँ और बड़ी संख्या में मिली मूर्तियाँ संकेत दे रही थीं कि यह स्थान कभी अत्यंत महत्वपूर्ण रहा होगा।

लेकिन असली रहस्य तब सुलझा, जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संस्थापक अलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने इस स्थान का गहन अध्ययन किया। उन्होंने केवल खंडहरों को नहीं देखा, बल्कि लगभग 1200 वर्ष पहले भारत आए चीनी यात्रियों ह्वेनसांग और यीजिंग के यात्रा-वृत्तांतों को भी पढ़ा।

ह्वेनसांग ने अपने यात्रा-वर्णन में नालंदा विश्वविद्यालय का इतना विस्तृत विवरण लिखा था कि उसमें आसपास के गाँवों, मंदिरों, मठों और दूरी तक का उल्लेख मिलता है। कनिंघम ने इन विवरणों की तुलना बिहार के इस क्षेत्र से की। जब स्थान, दूरी, भवनों की संरचना और अन्य प्रमाण एक-दूसरे से मेल खाने लगे, तब उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यही प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय है।

इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने व्यवस्थित खुदाई शुरू की। 1915 से लेकर 1937 तक कई चरणों में बड़े पैमाने पर उत्खनन हुआ। जैसे-जैसे मिट्टी हटती गई, वैसे-वैसे इतिहास की एक नई दुनिया सामने आती गई।

खुदाई में विशाल विहार, मंदिर, छात्रावास, प्रार्थना कक्ष, अध्ययन कक्ष, आँगन, कुएँ, सीढ़ियाँ, जल निकासी की व्यवस्था, हजारों मूर्तियाँ, ताम्रपत्र, मुहरें और अनेक अभिलेख मिले। इन सभी खोजों ने यह सिद्ध कर दिया कि नालंदा केवल एक बौद्ध मठ नहीं था, बल्कि विश्व का सबसे विकसित आवासीय विश्वविद्यालय था, जहाँ शिक्षा, अनुसंधान और अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संवाद का अद्भुत वातावरण था।

इतिहासकारों का मानना है कि नालंदा में भारत के अलावा चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत, श्रीलंका, इंडोनेशिया और मध्य एशिया से भी विद्यार्थी अध्ययन करने आते थे। यहाँ केवल बौद्ध दर्शन ही नहीं, बल्कि व्याकरण, तर्कशास्त्र, चिकित्सा, गणित, ज्योतिष, दर्शन और अनेक विषय पढ़ाए जाते थे।

आज नालंदा के खंडहर केवल ईंटों का ढेर नहीं हैं। वे उस युग के साक्षी हैं, जब भारत ज्ञान और शिक्षा का वैश्विक केंद्र था। यदि चीनी यात्रियों ने अपने अनुभवों को विस्तार से न लिखा होता और यदि पुरातत्वविदों ने उन विवरणों की तुलना इन खंडहरों से न की होती, तो शायद नालंदा आज भी मिट्टी के नीचे दफ़न रहता।

नालंदा की खोज हमें यह सिखाती है कि इतिहास कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होता। वह समय की परतों के नीचे छिप सकता है, लेकिन सत्य एक दिन अवश्य सामने आता है। यह खोज केवल एक प्राचीन विश्वविद्यालय की पहचान नहीं थी, बल्कि भारत की उस महान बौद्धिक विरासत की पुनर्खोज थी, जिसने कभी पूरी दुनिया को ज्ञान का प्रकाश दिया था।

13/07/2026
13/07/2026

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