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21 दिसम्बर सन सत्रह सौ चार...     छह महीने से पड़े मुगलों के घेरे को तोड़ कर अपनी चार सौ की फौज के साथ गुरु गोविन्द सिंह न...
22/12/2022

21 दिसम्बर सन सत्रह सौ चार...
छह महीने से पड़े मुगलों के घेरे को तोड़ कर अपनी चार सौ की फौज के साथ गुरु गोविन्द सिंह निकल गए थे। वहाँ से निकलने के बाद सबको सिरसा नदी को पार करना था। जाड़े की भीषण बरसात के कारण उफनती हुई नदी, और रात की बेला! आधे से अधिक लोगों को नदी लील गयी। जो बचे वे तीन हिस्सों में बंट गए। एक हिस्से में गुरुजी की दोनों पत्नियां और कुछ सिक्ख, दूसरे हिस्से में दो छोटे साहबजादों के साथ गुरुजी की माता गुजरी देवी जी और तीसरे हिस्से में गुरुजी के साथ उनके दो बड़े साहबजादे और 40 और सिक्ख।
43 सिक्खों का काफिला भागता दौड़ता एक छोटे से गाँव चमकौर पहुँचा और वहाँ एक कच्ची हवेली में शरण ली। उधर मुगल सेना को पता चला कि गुरुजी निकल गए तो पीछे दौड़ी। अगले दिन 22 दिसम्बर को मुगलों की फौज चमकौर में थी। बजीर खान की सरदारी में लाखों की फौज गुरुजी को जीवित या मृत पकड़ने के लिए पागल थी।
लाखों की मुगल सेना, 43 सिक्ख! भूल जाइए युद्ध को, बस इतना याद रखिये कि सिक्खों में 36 मरे और मुगलों में लगभग सब! आश्चर्य होगा न? आश्चर्य का नाम ही गुरु गोविंद सिंह जी था। मध्यकालीन भारत के हिन्दुओं ने जो जो किया है वह आश्चर्य ही है। हजारों सैनिकों के बीच में 5-5 सिक्खों का जत्था निकलता था और लगभग सबको मार कर वलिदान होता था। 18 वर्ष के साहबजादे अजीत सिंह जी और 14 वर्ष के साहबजादे जुझार सिंह जी भी अपने जत्थों के साथ निकले और बिना घबड़ाये हजारों को काट कर स्वयं का बलिदान दे दिया। आसमान रो रहा था, और हवेली की छत से अपने बेटों के अद्भुत शौर्य देख कर पिता गर्व से खिल रहा था।
जब केवल दस बचे थे तो सबने कहा, आप निकलिए गुरुजी! पंथ के लिए आपका निकलना आवश्यक है। लाशों के बीच निकलते भाई दया सिंह जी ने कहा, गुरुजी रुकिये! तनिक साहबजादे के शव को अपनी चादर से ढक दूँ।
गुरुजी ने कहा, तुम्हारे पास छत्तीस चादरें हैं? अगर मेरे छत्तीस साहबजादों के शव पर चादर डाल सकते हो तो डाल दो, नहीं तो साहबजादे अजीत सिंह और जुझार सिंह के शव भी अन्य सिक्खों की तरह खाली ही रहेंगे।। इस मिट्टी को याद रहना चाहिए कि उसके लिए उसके बच्चों ने कैसी कुर्बानी दी है।
पाँच दिनों बाद गुरुजी को पता चला, माता गुजरी के साथ गए दोनों छोटे साहबजादों को मुगलों ने पकड़ लिया था और वे सरहिंद के नवाब के यहाँ कैद थे...
बताया गया कि नवाब ने कचहरी में छोटे साहबजादों से बार-बार कहा, " धर्म बदल लो तो जान बख्स दी जाएगी... 7 वर्ष के जोरावर सिंह जी और 5 वर्ष के फतेह सिंह बार-बार उनकी बात काट कर कहते रहे- जो बोले सो निहाल, सतश्री अकाल..." क्रुद्ध नवाब ने उन्हें एक ठंडे कमरे में कैद कर दिया, जहां उनके शरीर पर कोई कपड़ा भी नहीं था।
दोनों छोटे बच्चे नहीं टूटे तो अगले दिन उन्हें दीवाल में चुनवा देने का हुक्म दिया गया। दीवाल में चुनवाने का मतलब जानते हैं? बच्चों को खड़ा कर उनके चारों तरफ मसाले से ईंट थाप दी गयी। बच्चे मरे पर डरे नहीं... दीवाल गर्दन तक पहुँची तबतक दोनों बेहोश हो गए थे। फिर उन्हें बाहर निकाल कर गला.... शायद वह 27 दिसम्बर था।
बड़े साहबजादों के बलिदान ने पिता की कमर तोड़ दी थी, छोटे साहबजादों के बलिदान ने पिता का हृदय तोड़ दिया... सात दिनों के अंदर राष्ट्र के लिए अपने चारों बेटों की बलि दे चुके पिता देर तक शून्य में देखते रहे। किससे कहें, क्या कहें....
बहुत देर बात मुख से कुछ शब्द फूटे, " ईश्वर! तू देख रहा है न? तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा..."
बस तीन सौ वर्ष ही तो बीते हैं उस दिन को... अधिकांश लोग भूल गए! हम बेईमानों की यादाश्त कमजोर होती है। अब तो बजीर खान दोस्त है...

सर्वेश तिवारी श्रीमुख
गोपालगंज, बिहार।

22/12/2022

महान हिन्दू योद्धा महाराणा प्रताप के बारे में कुछ रोचक जानकारी

1... महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे।

2.... जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे । तब उन्होने अपनी माँ से पूछा कि- हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर आए ? तब माँ का जवाब मिला- ”उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकर आना, जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना ।”
लेकिन बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था |
“बुक ऑफ़ प्रेसिडेंट यु एस ए ‘ किताब में आप यह बात पढ़ सकते हैं |

3.... महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलोग्राम था और कवच का वजन भी 80 किलोग्राम ही था|
कवच, भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाएं तो कुल वजन 207 किलो था।

4.... आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं |

5.... अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है, तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे, पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी|

लेकिन महाराणा प्रताप ने किसी की भी अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया |

6.... हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए |

7.... महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना हुआ है, जो आज भी हल्दी घाटी में सुरक्षित है |

8.... महाराणा प्रताप ने जब महलों का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगों ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा कि फौज के लिए तलवारें बनाईं | इसी समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गाढ़िया लोहार कहा जाता है| मैं नमन करता हूँ ऐसे लोगो को |

9.... हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें पाई गई।
आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में मिला था |

10..... महाराणा प्रताप को शस्त्रास्त्र की शिक्षा "श्री जैमल मेड़तिया जी" ने दी थी, जो 8000 राजपूत वीरों को लेकर 60000 मुसलमानों से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे । जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे |

11.... महाराणा के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था |

12.... मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में
अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था । वो महाराणा प्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा बिना भेदभाव के उन के साथ रहते थे ।

आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत हैं, तो दूसरी तरफ भील |

13..... महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक महाराणा को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ | उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहाँ वो घायल हुआ वहां आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है, जहाँ पर चेतक की मृत्यु हुई वहाँ चेतक मंदिर है |

14..... राणा का घोड़ा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके
मुँह के आगे दुश्मन के हाथियों को भ्रमित करने के लिए हाथी की सूंड लगाई जाती थी । यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे|

15..... मरने से पहले महाराणा प्रताप ने अपना खोया हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था । सोने चांदी और महलो को छोड़कर वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे ।

16.... महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो और लम्बाई 7’5” थी, दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे हाथ में।

महाराणा प्रताप के हाथी की कहानी:
मित्रो, आप सब ने महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक के बारे में तो सुना ही होगा,
लेकिन उनका एक हाथी भी था। जिसका नाम था रामप्रसाद। उसके बारे में आपको कुछ बाते बताता हुँ।
रामप्रसाद हाथी का उल्लेख अल- बदायुनी, जो मुगलों की ओर से हल्दीघाटी के
युद्ध में लड़ा था ने अपने एक ग्रन्थ में किया है।

वो लिखता है की- जब महाराणा प्रताप पर अकबर ने चढाई की थी, तब उसने दो चीजो को ही बंदी बनाने की मांग की थी । एक तो खुद महाराणा और दूसरा उनका हाथी रामप्रसाद।

आगे अल बदायुनी लिखता है की- वो हाथी इतना समझदार व ताकतवर था की उसने हल्दीघाटी के युद्ध में अकेले ही अकबर के 13 हाथियों को मार गिराया था ।
वो आगे लिखता है कि- उस हाथी को पकड़ने के लिए हमने 7 बड़े हाथियों का एक
चक्रव्यूह बनाया और उन पर14 महावतो को बिठाया, तब कहीं जाकर उसे बंदी बना पाये।

अब सुनिए एक भारतीय जानवर की स्वामी भक्ति।
उस हाथी को अकबर के समक्ष पेश किया गया ।
जहा अकबर ने उसका नाम पीरप्रसाद रखा।
रामप्रसाद को मुगलों ने गन्ने और पानी दिया।
पर उस स्वामिभक्त हाथी ने 18 दिन तक मुगलों का न तो दाना खाया और न ही
पानी पिया और वो बलिदान हो गया।

तब अकबर ने कहा था कि- जिसके हाथी को मैं अपने सामने नहीं झुका पाया, उस महाराणा प्रताप को क्या झुका पाउँगा.?

21/12/2022

क्या आपने कभी पढ़ा है कि हल्दीघाटी के बाद अगले १० साल में मेवाड़ में क्या हुआ..

इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं उन्हें वापस संकलित करना ही होगा क्यूंकि वही हिन्दू रेजिस्टेंस और शौर्य के प्रतीक हैं.
इतिहास में तो ये भी नहीं पढ़ाया गया है कि हल्दीघाटी युद्ध में जब महाराणा प्रताप ने कुंवर मानसिंह के हाथी पर जब प्रहार किया तो शाही फ़ौज पांच छह कोस दूर तक भाग गई थी और अकबर के आने की अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई है. ये वाकया अबुल फज़ल की पुस्तक अकबरनामा में दर्ज है.

क्या हल्दी घाटी अलग से एक युद्ध था..या एक बड़े युद्ध की छोटी सी घटनाओं में से बस एक शुरूआती घटना..
महाराणा प्रताप को इतिहासकारों ने हल्दीघाटी तक ही सिमित करके मेवाड़ के इतिहास के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है. वास्तविकता में हल्दीघाटी का युद्ध , महाराणा प्रताप और मुगलो के बीच हुए कई युद्धों की शुरुआत भर था. मुग़ल न तो प्रताप को पकड़ सके और न ही मेवाड़ पर अधिपत्य जमा सके. हल्दीघाटी के बाद क्या हुआ वो हम बताते हैं.

हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा के पास सिर्फ 7000 सैनिक ही बचे थे..और कुछ ही समय में मुगलों का कुम्भलगढ़, गोगुंदा , उदयपुर और आसपास के ठिकानों पर अधिकार हो गया था. उस स्थिति में महाराणा ने “गुरिल्ला युद्ध” की योजना बनायीं और मुगलों को कभी भी मेवाड़ में सेटल नहीं होने दिया. महाराणा के शौर्य से विचलित अकबर ने उनको दबाने के लिए 1576 में हुए हल्दीघाटी के बाद भी हर साल 1577 से 1582 के बीच एक एक लाख के सैन्यबल भेजे जो कि महाराणा को झुकाने में नाकामयाब रहे.

हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप के खजांची भामाशाह और उनके भाई ताराचंद मालवा से दंड के पच्चीस लाख रुपये और दो हज़ार अशर्फिया लेकर हाज़िर हुए. इस घटना के बाद महाराणा प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया और दिवेर पर हमले की योजना बनाई। भामाशाह ने जितना धन महाराणा को राज्य की सेवा के लिए दिया उस से 25 हज़ार सैनिकों को 12 साल तक रसद दी जा सकती थी. बस फिर क्या था..महाराणा ने फिर से अपनी सेना संगठित करनी शुरू की और कुछ ही समय में 40000 लडाकों की एक शक्तिशाली सेना तैयार हो गयी.

उसके बाद शुरू हुआ हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको इतिहास से एक षड्यंत्र के तहत या तो हटा दिया गया है या एकदम दरकिनार कर दिया गया है. इसे बैटल ऑफ़ दिवेर कहा गया गया है.

बात सन १५८२ की है, विजयदशमी का दिन था और महराणा ने अपनी नयी संगठित सेना के साथ मेवाड़ को वापस स्वतंत्र कराने का प्रण लिया. उसके बाद सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूंक दिया..एक टुकड़ी की कमान स्वंय महाराणा के हाथ थी दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे.

कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में हल्दीघाटी को Thermopylae of Mewar और दिवेर के युद्ध को राजस्थान का मैराथन बताया है. ये वही घटनाक्रम हैं जिनके इर्द गिर्द आप फिल्म 300 देख चुके हैं. कर्नल टॉड ने भी महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, तेज और देश के प्रति उनके अभिमान को स्पार्टन्स के तुल्य ही बताया है जो युद्ध भूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से यूँ ही टकरा जाते थे.

दिवेर का युद्ध बड़ा भीषण था, महाराणा प्रताप की सेना ने महाराजकुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर थाने पर हमला किया , हज़ारो की संख्या में मुग़ल, राजपूती तलवारो बरछो भालो और कटारो से बींध दिए गए।
युद्ध में महाराजकुमार अमरसिंह ने सुलतान खान मुग़ल को बरछा मारा जो सुल्तान खान और उसके घोड़े को काटता हुआ निकल गया.उसी युद्ध में एक अन्य राजपूत की तलवार एक हाथी पर लगी और उसका पैर काट कर निकल गई।

महाराणा प्रताप ने बहलोलखान मुगल के सर पर वार किया और तलवार से उसे घोड़े समेत काट दिया। शौर्य की ये बानगी इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलती है. उसके बाद यह कहावत बनी की मेवाड़ में सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया जाता है.ये घटनाये मुगलो को भयभीत करने के लिए बहुत थी। बचे खुचे ३६००० मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्म समर्पण किया.
दिवेर के युद्ध ने मुगलो का मनोबल इस तरह तोड़ दिया की जिसके परिणाम स्वरुप मुगलों को मेवाड़ में बनायीं अपनी सारी 36 थानों, ठिकानों को छोड़ के भागना पड़ा, यहाँ तक की जब मुगल कुम्भलगढ़ का किला तक रातो रात खाली कर भाग गए.

दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुन्दा , कुम्भलगढ़ , बस्सी, चावंड , जावर , मदारिया , मोही , माण्डलगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण ठिकानो पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद भी महाराणा और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ कोछोड़ के मेवाड़ के सारे ठिकाने/दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए.

अधिकांश मेवाड़ को पुनः कब्जाने के बाद महाराणा प्रताप ने आदेश निकाला की अगर कोई एक बिस्वा जमीन भी खेती करके मुसलमानो को हासिल (टैक्स) देगा , उसका सर काट दिया जायेगा। इसके बाद मेवाड़ और आस पास के बचे खुचे शाही ठिकानो पर रसद पूरी सुरक्षा के साथ अजमेर से मगाई जाती थी.

दिवेर का युद्ध न केवल महाराणा प्रताप बल्कि मुगलो के इतिहास में भी बहुत निर्णायक रहा। मुट्ठी भर राजपूतो ने पुरे भारतीय उपमहाद्वीप पर राज करने वाले मुगलो के ह्रदय में भय भर दिया। दिवेर के युद्ध ने मेवाड़ में अकबर की विजय के सिलसिले पर न सिर्फ विराम लगा दिया बल्कि मुगलो में ऐसे भय का संचार कर दिया की अकबर के समय में मेवाड़ पर बड़े आक्रमण लगभग बंद हो गए.

इस घटना से क्रोधित अकबर ने हर साल लाखों सैनिकों के सैन्य बल अलग अलग सेनापतियों के नेतृत्व में मेवाड़ भेजने जारी रखे लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली. अकबर खुद 6 महीने मेवाड़ पर चढ़ाई करने के मकसद से मेवाड़ के आस पास डेरा डाले रहा लेकिन ये महराणा द्वारा बहलोल खान को उसके घोड़े समेत आधा चीर देने के ही डर था कि वो सीधे तौर पे कभी मेवाड़ पे चढ़ाई करने नहीं आया.

ये इतिहास के वो पन्ने हैं जिनको दरबारी इतिहासकारों ने जानबूझ कर पाठ्यक्रम से गायब कर दिया है. जिन्हें अब वापस करने का प्रयास किया जा रहा है।
साभार...

12/12/2022

“ अरे बुढिया तू यहाँ न आया कर , तेरा बेटा तो चोर-डाकू था . इसलिए गोरों ने उसे मार दिया“
जंगल में लकड़ी बिन रही एक मैली सी धोती में लिपटी बुजुर्ग महिला से वहां खड़ें भील ने हंसते हुए कहा ...

“ नही चंदू ने आजादी के लिए कुर्बानी दी हैं “
बुजुर्ग औरत ने गर्व से कहा .उस बुजुर्ग औरत का नाम जगरानी देवी था और इन्होने पांच बेटों को जन्म दिया था , जिसमे आखरी बेटा कुछ दिन पहले ही शहीद हुआ था ...

उस बेटे को ये माँ प्यार से चंदू कहती थी और दुनियां उसे "आजाद " चंद्रशेखर आजाद के नाम से जानती है ...!

हिंदुस्तान आजाद हो चुका था , आजाद के मित्र सदाशिव राव एक दिन आजाद के माँ-पिता जी की खोज करतें हुए उनके गाँव पहुंचे ...

आजादी तो मिल गयी थी लेकिन बहुत कुछ खत्म हो चुका था ...

चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत के कुछ वर्षों बाद उनके पिता जी की भी मृत्यु हो गयी थी ...

आज़ाद के भाई की मृत्यु भी इससे पहले ही हो चुकी थी . अत्यंत निर्धनावस्था में हुई उनके पिता की मृत्यु के पश्चात आज़ाद की निर्धन निराश्रित वृद्ध माताश्री उस वृद्धावस्था में भी किसी के आगे हाथ फ़ैलाने के बजाय जंगलों में जाकर लकड़ी और गोबर बीनकर लाती थी तथा कंडे और लकड़ी बेचकर अपना पेट पालती रहीं ...

लेकिन वृद्ध होने के कारण इतना काम नहीं कर पाती थीं कि भरपेट भोजन का प्रबंध कर सकें .
कभी ज्वार कभी बाज़रा खरीद कर उसका घोल बनाकर पीती थीं क्योंकि दाल चावल गेंहू और उसे पकाने का ईंधन खरीदने लायक धन कमाने की शारीरिक सामर्थ्य उनमे शेष ही नहीं थी ...

शर्मनाक बात तो यह कि उनकी यह स्थिति देश को आज़ादी मिलने के 2 वर्ष बाद (1949 ) तक जारी रही ...

चंद्रशेखर आज़ाद जी को दिए गए अपने एक वचन का वास्ता देकर सदाशिव जी उन्हें अपने साथ अपने घर झाँसी लेकर आये थे, क्योंकि उनकी स्वयं की स्थिति अत्यंत जर्जर होने के कारण उनका घर बहुत छोटा था अतः उन्होंने आज़ाद के ही एक अन्य मित्र भगवान दास माहौर के घर पर आज़ाद की माताश्री के रहने का प्रबंध किया था और उनके अंतिम क्षणों तक उनकी सेवा की ...

मार्च 1951 में जब आजाद की माँ जगरानी देवी का झांसी में निधन हुआ तब सदाशिव जी ने उनका सम्मान अपनी माँ के समान करते हुए उनका अंतिम संस्कार स्वयं अपने हाथों से ही किया था ...

आज़ाद की माताश्री के देहांत के पश्चात झाँसी की जनता ने उनकी स्मृति में उनके नाम से एक सार्वजनिक स्थान पर पीठ का निर्माण किया . प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने इस निर्माण को झाँसी की जनता द्वारा किया हुआ अवैध और गैरकानूनी कार्य घोषित कर दिया ...

किन्तु झाँसी के नागरिकों ने तत्कालीन सरकार के उस शासनादेश को महत्व न देते हुए चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापित करने का फैसला कर लिया ...

मूर्ति बनाने का कार्य चंद्रशेखर आजाद के ख़ास सहयोगी कुशल शिल्पकार रूद्र नारायण सिंह जी को सौपा गया ...

उन्होंने फोटो को देखकर आज़ाद की माताश्री के चेहरे की प्रतिमा तैयार कर दी ...

जब केंद्र की सरकार और उत्तर प्रदेश की सरकारों को यह पता चला कि आजाद की माँ की मूर्ति तैयार की जा चुकी है और सदाशिव राव, रूपनारायण, भगवान् दास माहौर समेत कई क्रांतिकारी झांसी की जनता के सहयोग से मूर्ति को स्थापित करने जा रहे हैं तो इन दोनों सरकारों ने अमर बलिदानी शहीद पंडित चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापना को देश, समाज और झाँसी की कानून व्यवस्था के लिए खतरा घोषित कर उनकी मूर्ति स्थापना के कार्यक्रम को प्रतिबंधित कर पूरे झाँसी शहर में कर्फ्यू लगा दिया ...

चप्पे चप्पे पर पुलिस तैनात कर दी गई ताकि अमर बलिदानी चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति की स्थापना न की जा सके ...!

जनता और क्रन्तिकारी आजाद की माता की प्रतिमा लगाने के लिए निकल पड़े ...

अपने आदेश की झाँसी की सडकों पर बुरी तरह उड़ती धज्जियों से तिलमिलाई तत्कालीन सरकारों ने पुलिस को गोली मार देने का आदेश दे डाला ...

आज़ाद की माताश्री की प्रतिमा को अपने सिर पर रखकर पीठ की तरफ बढ़ रहे सदाशिव को जनता ने चारों तरफ से अपने घेरे में ले लिया ...

जुलूस पर पुलिस ने लाठी चार्ज कर दिया ...

सैकड़ों लोग घायल हुए, दर्जनों लोग जीवन भर के लिए अपंग हुए और कुछ लोग की मौत भी हुईं . (मौत की आधिकारिक पुष्टि कभी नही की गयी)...

इस घटना के कारण चंद्रशेखर आज़ाद की माताश्री की मूर्ति स्थापित नहीं हो सकी ll

11/12/2022

#बनारस में मुझे एक युवा बौद्ध मिले जो #म्यांमार के रहने वाले हैं और जो 5 सालों से भारत के दो यूनिवर्सिटीज में #बौद्ध_धर्म पर रिसर्च कर रहे हैं।

उन्होंने एमफिल से की और पीएचडी से कर रहे हैं।

उनके शोध का विषय है #गुप्त_काल में बौद्ध धर्म का फैलाव

क्योंकि वह 5 सालों से लगातार बनारस और #दिल्ली में रह रहे हैं उन्हें हिंदी भी बहुत अच्छी आती है।

वह एक बात पर बहुत आश्चर्यचकित थे कि भारत के जो #नवबौद्ध हैं वह आखिर #हिंदू_धर्म से आखिर इतना नफरत क्यों करते हैं ?

भारत मे लोग जब बौद्ध धर्म स्वीकार कर रहते हैं उसके बाद वह हिंदू धर्म को गाली देते हैं जबकि बौद्ध धर्म का पूरा प्राश्रय, लालन-पालन और फैलाव हिंदुओं ने किया चाहे वह #सम्राट_अशोक हो चाहे #बिंबिसार हो चाहे गुप्तकाल हो और बहुत से दूसरे हिंदू राजाओं ने भी अपने राज्य में बौद्ध धर्म को भरपूर संरक्षण दिया और बौद्ध धर्म को फैलाया।

#पुष्यमित्र_शुंग ने #अफगानिस्तान से लेकर #इराक तक बौद्ध धर्म का फैलाव किया।

उनके अनुसार बौद्ध धर्म का असली दुश्मन तो शांतिदूत धर्म है। उन्होंने बताया कि #मेसोपोटामिया की सभ्यता यानी आज के इराक में #तिकरित शहर म्यूजियम में जो हजारो साल पुरानी बौद्ध प्रतिमाओं से लेकर बौद्ध धर्म के तमाम शिलालेख रखे थे उन्हें वालों ने तोड़ दिया। #अफगानिस्तान में पूरी पहाड़ी को काटकर बनाई गई #बामियान की दो विशाल बौद्ध प्रतिमाओं को #तालिबान ने तोप से उड़ा दिया।

अफगानिस्तान में किसी जमाने में 5% बौद्ध थे आज एक भी बौद्ध नहीं है। #पाकिस्तान में आजादी के समय 4% बुद्ध थे आज 0% है। यानी किसी भी इस्लामिक देश ने बौद्ध धर्म को न प्रश्रय दिया ना बौद्ध धर्म की निशानियां को संभाल कर रखा बल्कि उन्हें नष्ट कर दिया।

वह बता रहे थे कि कई बार #महाराष्ट्र व दूसरे राज्य से नवबौद्ध #सारनाथ आते हैं और कई भंते मिलते हैं तो वह अपनी बातों में सिर्फ और सिर्फ हिंदू धर्म की बुराइयां भगवान राम भगवान कृष्ण भगवान शंकर की बुराइयां ही करते हैं तो वह उनसे सवाल करते हैं कि जब आप ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया तब बौद्ध धर्म का पहला सिद्धांत ही यही है कि तुम किसी की बुराई मत करो तो फिर आप यह भगवा वस्त्र उतारकर सांसारिक कपड़े क्यों नहीं पहन लेते ? जब आपने भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को ही आत्मसात नहीं किया तो खुद को बहुत भंते क्यो बताते हैं ? और गांव-गांव में घूमकर दलितों के बीच में हिंदुओं और हिंदू धर्म की बुराई कर रहे हैं ? यह तो कभी भगवान गौतम बुद्ध की किसी भी किताब में कोई शिक्षा नहीं है और ना ही गौतम बुद्ध ने कहीं हिंदू धर्म की कोई निंदा की है

उन्होंने मुझे विस्तार से समझाया की म्यांमार में बौद्ध भिक्षु स्वामी विराथू ने किस तरह से अपने देश को बचा लिया यदि विराथू नहीं होते तो आज म्यांमार की हालत सोमालिया जैसी होती ।

म्यांमार पूरी तरह से बर्बाद हो जाता। म्यांमार में करीब 20% #रोहिंग्या मुस्लिम थे और उन्होंने अपनी एक और रोहिंग्या अरकान रिपब्लिक आर्मी नामक आतंकवादी संगठन बनाया था और यह चुन-चुन कर बौद्धों का कत्लेआम करते थे उन्होंने 3 साल में हजारों बौद्धों का कत्ल किया हर रोज कम से कम 10 बौद्ध लड़की का बलात्कार करते थे और तमाम बहुत सी बौद्ध लड़कियों को लव जिहाद में फंसा कर उसे अपने शांतिदूत धर्म में शामिल करते थे। वहां की सरकार भी इनसे डरती थी।

फिर बौद्ध भिक्षु विराथू सामने आए और उन्होंने फेस 1 फेस 2 और फेस थ्री करके तीन कार्यक्रम देश भर में घूम-घूम कर बताया और उसके बाद म्यांमार के लोगों ने जिस तरह से रोहिंग्या मुसलमानों का प्रतिकार किया वह पूरी दुनिया देख रही है ।

फेस वन में आर्थिक बहिष्कार से लेकर सामाजिक बहिष्कार... फिर हथियार उठाकर उनका सामना करना ...तीसरे फेज में हथियार उठाकर उन पर सामने से हमला करना ...यानी इस तरह 3 चरणों का एक प्लान बौद्ध भिक्षु #विराथू ने घूम घूम कर पूरे म्यांमार में दिया और कहा कि भले ही गौतम बुद्ध अहिंसा में मानते हैं और बौद्ध धर्म का पहला ही सिद्धांत अहिंसा है लेकिन याद रखो कि तुम कभी पागल कुत्ते के साथ रह नहीं सकते और ना ही तुम कभी पागल कुत्ते के साथ सो सकते हो और यदि कोई कुत्ता पागल हो जाए तब उसका नाश करना ही पड़ता है ।

उन्होंने बुद्ध के एक उदाहरण देकर बताया कि किस तरह से एक गांव में कुछ लोगों ने एक ऐसे पागल कुत्ते को मार डाला था जिस ने करीब 40 लोगों को काटा था और कई लोग #रैबीज से मर गए थे और उनके मन में पछतावा था कि क्या उन्होंने बुद्ध की शिक्षाओं का हनन किया है तब गौतम बुद्ध ने कहा था कि नहीं तुमने जो किया वह उचित किया क्योंकि तुमने आत्मरक्षा में यह कदम उठाया था।

बौद्ध भिक्षु विराथू म्यामार की सेना प्रमुख से मिले ....म्यामांर की शासक आन सान सू की से मिले और म्यामार की सभी विपक्षी पार्टियों से मिले और सभी एकमत पर सहमत थे इन रोहिंग्याओं का समूल नाश करना जरूरी है नहीं तो म्यांमार बर्बाद हो जाएगा।

आज यह भारत में रोहिंग्या है असल में यह दया के पात्र नहीं है इन्होंने म्यांमार में हिंदुओं और बौद्धों दोनों का कत्लेआम किया है और दोनों धर्मों की लड़कियों का बलात्कार किया हुआ है

उनके साथ मैंने फोटो भी लिया है लेकिन उनके निवेदन पर मैं उनका फोटो सोशल मीडिया पर नहीं डाल रहा हूं

लेखक : जितेन्द्र प्रताप सिंह

10/12/2022

*नेहरू ने अँग्रेजों से गुप्त संधि की और कहा था कि “मैं भी मुसलमान हूं”_ (विभाजनकालीन भारत के साक्षी )*
इस शीर्षक को पढ़ कर आप अवश्य चौकेंगे, लेकिन सत्ता पिपासा के लिए जवाहरलाल नेहरू के ये कुछ व्यक्तिगत रहस्य भी जानने से यह स्पष्ट होता है कि स्वतंत्रता के उपरान्त भी भारत क्यों अपने गौरव को पुन: स्थापित न कर सका __ विनोद कुमार सर्वोदय

श्री नरेन्द्र सिंह जी जो ‘सरीला’ रियासत (टीकमगढ़ के पास,बुंदेलखंड) के प्रिंस थे तथा बाद में गवर्नर जनरल लार्ड वेवल व लार्ड माउण्टबैटन के वे ए.डी.सी. रहे थे। इस कारण 1942 से 1948 तक की वाइसराय भवन में घटित घटनाओं के वे स्वयं साक्षी थे। उनसे इस लेख के लेखक (प्रो सुरेश्वर शर्मा) की प्रथम भेंट दिसम्बर 1966 में इण्डिया इण्टरनेशनल सेंटर दिल्ली में हुई थी l प्रिंस आफ़ सरीला श्री नरेंद्र सिंह उस समय काफी वृद्ध थे और इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर में ही रहते थे।

श्री नरेंद्र सिंह जी ने इस भेंट वार्ता में कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु लेखक को बतायें, उनके अनुसार _

“दूसरे विश्वयुद्ध के रणनीतिकार भले ही विंस्टन चर्चिल थे, लेकिन युद्ध के हीरो बने अमरीकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट रूजवेल्ट ने जापान पर एटम बम गिरा कर एक ओर तो जापान के घुटने टिकवा दिए दूसरी ओर जापानी साधनों से ब्रह्मदेश में अंग्रेजी सेना को खदेड़ रही आजाद हिन्द फौज की गति को अवरुद्ध कर दिया। इस प्रकार अमरीका के कारण इंग्लैंड युद्धजीत सका।“

“इंगलैंड युद्ध भले ही जीत गया था, लेकिन उसकी शक्ति बहुत क्षीण हो चुकी थी। सुभाषचन्द्र बोस के अद्भुत कारनामों के कारण भारत के लोगों के मनों से अंग्रेजों का डर बिल्कुल समाप्त हो गया था। उल्टे,अंग्रेजों को ही यह डर सताने लगा था कि भारत के लोग कहीं चुन-चुन कर अंग्रेजों को ही समाप्त करना न शुरु कर दें। अतः ब्रिटिश प्रधानमन्त्री एटली ने फरवरी 1946 में ही ब्रिटिश संसद में यह घोषणा कर दी कि हम भारत की सत्ता भारत के ही लोगों को सौंप कर वहाँ से निकल जाएँगे।”
माउण्टबेटन यह जानता था कि जवाहरलाल सत्ता का भूखा है। वह किसी भी कीमत पर सत्ता प्राप्त करना चाहता है। अतः उसे सत्ता सौंपने से पहले उसने भारत का विभाजन स्वीकार करा लिया। साथ ही अन्य भी वे सारी शर्तें मनवा लीं, जो ब्रिटिश-अमरीकी हितों के लिए आवश्यक थीं। जवाहर सत्ता के लिए इतना अंधा हो गया था कि उसने इन शर्तों की भनक सरदार पटेल व गान्धी को भी नहीं लगने दी।”

प्रिंस आफ सरीला ने मुझे एक टाइप किए हुए पत्र की प्रति पढ़ने के लिए दी,जोकि माऊण्टबेटन द्वारा प्रधान मंत्री एटली को लिखी गई थी। उसमें माऊण्टबेटन ने एटली को सूचित किया था कि जवाहरलाल से निम्नलिखित विषयों पर सन्धि (treaty) हो गई है और यह सन्धि 50 साल के लिए है__

1.भारत पाकिस्तान पर आक्रमण कर कभी उसे जीतने की कोशिश नहीं करेगा।

2. पाकिस्तान चाहे तो आक्रमण करके भारत की भूमि जीत सकता है।

3. यदि भारत की सेना रक्षात्मक युद्ध में पाकिस्तान को पीछे खदेड़ कर पाकिस्तान की भूमि पर कब्जा कर लेती है, तो वह भूमि भारत पाकिस्तान को वापिस करेगा।

( ध्यान देने की बात है कि 1965 व 1971 के युद्धों में भारत द्वारा जीती हुई भूमि पाकिस्तान को वापिस दी गई।)

4. भारत के मुसलमानों और ईसाइयों का विशेषाधिकार सुरक्षित रखा जाएगा।

5. सुभाषचन्द्र बोस को पकड़ कर भारत ब्रिटेन को सौंपेगा।

6. भारत का राष्ट्रगान ‘जन गण मन अधिनायक जय हे’ रहेगा।

7. हिन्दी के ऊपर अंग्रेजी की वरीयता रहेगी।

8. संविधान और प्रशासन-तन्त्र में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं होगा।

9. शिक्षा पद्धति नहीं बदली जाएगी।

10. सैन्य विकास पर पाकिस्तान से अधिक खर्च नहीं किया जाएगा, ताकि पाकिस्तान डरे नहीं।
इस प्रकार के 40-50 बिन्दु उस पत्र में थे। शेष मुझे याद नहीं।

पत्र के अन्त में लिखा था- “This treaty should be kept secret. It is not to be published, “

पत्र पढ़ने के बाद मैंने सरीला को कहा कि विश्वास नहीं होता कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने यह सब स्वीकार किया होगा।इस पर सरीला मुस्कराए और फिर गम्भीर हो कर बोले-

“पहले तो जवाहर लाल को ‘पंडित’ कहना बन्द करो, क्योंकि वह मुसलमान था।“

इसकी पुष्टि में उन्होंने एक प्रसंग बताया_

“जवाहर और माऊण्टबेटन की बातचीत चल रही थी। मैं साथ के ही अपने कक्ष में उनकी वार्ता सुन रहा था। जवाहर जब विभाजन के लिए तैयार नहीं हुआ, तो माऊण्टबेटन ने उसे कहा- ठीक है, हमने (अंग्रेजों ने) यहाँ की सत्ता मुसलमानों से ली थी और अब हम उन्हीं को वापिस देकर चले जाएँगे। हम सत्ता जिन्नाह को सौंप देंगे।’

“ *मैंने देखा, यह सुनते ही जवाहर का चेहरा फक्क हो गया था। उसे लगा, उसके हाथ से सत्ता गई। थोड़ी देर में वह संभला और बोला- ‘Originally I am also a muslim (मूलत: तो मैं भी मुसलमान हूँ।) यह मैने अपने कानों से सुना था*।“

प्रिंस सरीला नें अपना कथन चालू रखा_ “जहाँ तक इस पत्र – प्रतिलिपि की प्रामाणिकता की बात है, इसकी मूल प्रति भी तुम लंदन की ब्रिटिश लायब्रेरी के ‘ओरियण्टल एण्ड इंडियन कलेक्शन खण्ड’ के अभिलेखागार में देख सकते हो।वहाँ ब्रिटिश प्रधानमन्त्रियों के भारत सम्बन्धी पत्राचारों की फाइलें संचित हैं। भारत सम्बन्धी सूचनाओं को ब्रिटिश प्रधानमंत्री अमरीकी राष्ट्रपति से भी साझा करते थे, वह भी उन फाइलों में उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त साउथैम्पटन की हर्टले लायब्रेरी में माउण्टबेटन के पत्राचारों के सभी अभिलेख कियू (Kew) के पब्लिक रिकार्ड आफिस में भी प्रदर्शित हैं।”

बाद में जब वर्ष 2000 में मैं (लेखक)इंग्लैंड गया, तो साउथैम्पटन की हर्टले लायब्रेरी में मुझे माउण्टबेटन के पत्राचारों की फाइलों में वह मूल पत्र मिल गया, जिसकी प्रतिलिपि प्रिंस सरीला ने दिखायी थी। मै लन्दन की ब्रिटिश लायब्रेरी में भी गया। वहाँ मुझे ब्रिटिश प्रधानमंत्री द्वारा अमरीकी राष्ट्र को लिखे पत्रों में वह सब कुछ मिला,जिसका उल्लेख प्रिंस सरीला ने किया अर्थात् ब्रिटिश अमरीकी दुरभिसंधि।इंगलैंड के बाद मैं अमरीका गया तो वहाँ भी वाशिंगटन के अभिलेखागार में वह सारा पत्र व्यवहार विद्यमान था।

लेखक: प्रो.सुरेश्वर शर्मा
पूर्व कुलपति, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय,जबलपुर)

साभार: प्रस्तावना “विभाजनकालीन भारत के साक्षी”(पृष्ठ 5,खण्ड 2)

(श्री कृष्णानन्द सागर जी का शोध ग्रन्थ)

संकलनकर्ता एवं प्रेषक : विनोद कुमार सर्वोदय

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*Nehru made a secret treaty with the British and said that "I am also a Muslim, Witnesses of Partition India*

(Shared as received on WhatsApp, Courtesy Professor RM Thakkar (Retired Principal, Govt Polytechnic College, Ahmedabad).

09/12/2022

उपराष्ट्रपति जी,
वो भारत के भगवान बन गए हैं,
वो सरकार चला रहे हैं बिना किसी
जिम्मेदारी के,
केवल NJAC Act पूरा खारिज किया,
बाकी सभी संविधान संशोधन आंशिक
रूप से ख़ारिज हुए -

कल उप राष्ट्रपति जगदीप धनकड़ जी ने दूसरी बार सुप्रीम कोर्ट को NJAC Act, 2014 को ख़ारिज करने लिए फटकार मारी है - उन्होंने सांसदों से सही कहा कि संसद और सदन के संवैधानिक अधिकारों और गरिमा को अक्षुण्ण रखना हम सबकी जिम्मेदारी है - उनका कहना सुप्रीम कोर्ट को आइना दिखाना है कि NJAC Act सर्वसम्मति से पारित होने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट का उसे यह कहते हुए रद्द करना कि यह न्यायपालिका और संविधान के मूलभूत सिद्धांतों के विरुद्ध है, संसदीय संप्रभुता से गंभीर समझौता है -

यह संसदीय संप्रभुता से गंभीर समझौता नहीं है बल्कि संसदीय संप्रभुता के लिए न्यायपालिका से गंभीर खतरा और चुनौती है - न्यायपालिका ने अपने आप को “Supreme” साबित किया जिसकी नज़र में 125 करोड़ जनता के “जनादेश” की कोई कीमत नहीं है जबकि जनमत ही देश में सर्वोच्च होना चाहिए -आज भी यही हो रहा है -

धनकड़ जी ने 4 दिन पहले कहा था कि विधायिका और कार्यपालिका का काम नहीं कर सकती अदालतें मगर वो सब कुछ कर रही हैं जैसे उन्हीं से देश चल रहा है - अदालतों में न्यायाधीश तो भगवान बन चुके हैं - 750 सांसदों द्वारा पारित संविधान संशोधन भला 2, 3 जज कैसे ख़ारिज कर सकते हैं -

न्यायपालिका प्रशासन का कोई ऐसा कार्य नहीं है जिसमे दखल न दे रही हो - संसद द्वारा पारित कानूनों में न्यायाधीश अपने निजी मत के अनुसार कानूनों को तोड़ मरोड़ रहे हैं - उदहारण के लिए, शादी की आयु संसद के कानून ने 21 वर्ष तय की है चाहे लड़की हो या लड़का मगर अदालतें उसमे शरिया कानून घुसा रही हैं और 12, 15 वर्ष की मुस्लिम लड़कियों की भी शादी की अनुमति दे रही हैं - MTP, Act 2021 के नियमों में जो नहीं भी थे वो भी नियम जस्टिस चंद्रचूड़ ने घुसा दिए - 6 साल से नोटबंदी का केस नहीं सुना और आज रोज सरकार को झाड़ मार रहे हैं - इनकी हिम्मत इतनी है कि सेना प्रमुख और पूरी सेना को अवमानना के नोटिस की धमकी देते हैं - कॉलेजियम से जजों की नियुक्ति करने वाले राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भी आँख दिखा देते हैं -

अभी तक सुप्रीम कोर्ट ने 8 संवैधानिक संशोधन खारिज किये हैं जिनमें 7 संशोधनों को आंशिक रूप से ख़ारिज किया है परन्तु NJAC का 99वें संशोधन पूरी तरह से ख़ारिज किया गया यानी 125 करोड़ जनता द्वारा पास किया गया कानून 4 जजों ने ख़तम कर दिया जबकि न्यायपालिका खुद पक्षकार होने के नाते उस पर फैसला लेने का अधिकार नहीं रखती थी -

संविधान के 97वें संशोधन को ( Multi State Cooperative Societies से संबंधित) को ख़ारिज करते हुए जस्टिस RF Nariman, K.M. Joseph and B.R. Gavai ने कहा “We have struck down part IX B of the Constitution related to cooperative societies but we have saved the amendment.” कितना बड़ा अहसान किया -

संशोधन को ख़ारिज करने का एक आधार यह भी दिया कोर्ट ने कि इसे आर्टिकल 368 (2) में आधे राज्यों की विधान सभाओं से पास कराना जरूरी था जो नहीं हुआ - फैसला 2:1 से हुआ -

इसके विपरीत NJAC 99वां संशोधन 29 में से 16 विधान सभाओं से पास हुआ था (Ratify) था और राष्ट्रपति ने अनुमोदित कर दिया था मगर फिर भी ख़ारिज किया गया -

केशवानंद भारती केस में 1973 में कहा गया कि संविधान का मूलस्वरूप (Basic Structure) नहीं बदला जा सकता और यह भी माना गया कि Preamble संविधान का हिस्सा है मगर संविधान का 42वां संशोधन सम्पूर्ण विपक्ष को जेल में डाल कर पास कराया गया और Preamble में Socialist & Secular शब्द घुसा दिए गए मगर सुप्रीम कोर्ट उसे ख़ारिज नहीं किया -

संसद में एक प्रस्ताव पास कराया जाए जिसमे न्यायपालिका को उसकी हदें बताई जाए, सरकार के हर किसी मामले में न्यायपालिका के हस्तक्षेप को रोकना होगा -

(सुभाष चन्द्र)
"मैं वंशज श्री राम का"

08/12/2022

#एक काला आदमी लंदन में रहकर गोरो के साथ पढ़ सकता है !!

एक होस्टल के एक कमरे में रह सकता है एक मेस में खा सकता है
फिर ट्रेन में एक साथ सफर करने में फेंक दिया जाता है बात हजम नही होती !! (वास्तव में हजम होने वाली बात है क्या ???).

यही आदमी बाद में उन्हीं गोरों की सेना में सार्जेंट मेजर बनता है
दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश बोर वार में उसकी तैनाती एम्बुलेंस यूनिट में होती है

मिलिट्री यूनिफॉर्म में उन करमचंद जी की फोटो पूरे इंटरनेट पर उपलब्ध है
सार्जेंट मेजर गांधी लिखकर सर्च कर लीजिए

अचानक वे मिलिट्री यूनिफार्म उतार देते हैं
और बैरिस्टर घोषित हो जाते हैं

फिर उनको महात्मा बुद्ध की तरह शांति अहिंसा का दूत बनाकर दक्षिण अफ्रीका से सीधे
चंपारण भेज दिया जाता है
जहाँ नील उगाने वाले किसानों के आंदोलन को वे हैक कर लेते हैं
हिंसक आंदोलन को अहिंसा शांति के फुस्स आंदोलन में बदल देते हैं

महात्मा बुद्ध की तरह दिन में एक धोती लपेट कर शांति अहिंसा के नाम पर
भारतीयों के हर उग्र आंदोलन की हवा निकाल कर उसे बिना किसी परिणाम के
अचानक समाप्त कर देते हैं
अंग्रेज चैन की सांस लेते रहते हैं

अहिंसा के पुजारी..
दिन में बुद्ध और रात में महावीर जैन की तरह दिगम्बर हो जाते हैं

महावीर जैन नंगे थे
पर पतित नहीं

ये नंगा फकीर अपने साथ अपनी बेटी भतीजी के अलावा अनेक औरतों के साथ
नंगा सोता है
और अपने स्टेमिना को चेक करने को ब्रह्मचर्य का प्रयोग कहता है

अंग्रेजों के इस एजेंट ..इस जासूस का नाम दिन में करमचंद और रात को गरमचंद हो जाता है
और आज भी यह परंपरा चल रही है

हर फिल्म में विलेन का नाम रोबर्ट और जासूस का करमचंद ही क्यों होता है..??

यह अहिंसा का पुजारी..
प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में
अंग्रेजों का खुला साथ देता है
भारतीयों को कहता है
सेना में भर्ती हो जाओ और युद्ध करो ताकि ब्रिटिश राज बचा रहे

असहयोग आंदोलन फुस्स
सविनय अवज्ञा फुस्स
भारत छोड़ो भी फुस्स

देश को बांट देने वाला राष्ट्रपिता बन जाता है
लाखों को मरवा देने वाला अहिंसा का पुजारी
और महात्मा बन जाता है

पर गांधी शब्द एक ब्रांड है
एक ढाल है
बालाकोट करना है
गांधी के नाम पर करना होता है

कल संसार भर में हमको भी आतंकियों को मारना है
जेहादियों को कूटना है
इसे हमें गांधी के नाम पर
अहिंसा और शांति की स्थापना के नाम पर करना होगा

गांधी बहुत मजेदार थीम है
इसलिए मोदी जी..
गांधी गांधी करते हैं..

समझा करो..मित्रों
गोडसे तलवार हैं
गांधी ढाल हैं

और इंटरनेशनल कम्युनिटी गांधी नाम की ढाल के पीछे ही अपनी तलवार वर्षों से छिपा रही है।

मेरा अभियान कॉंग्रेस इस्लाम मुक्त भारत जहान.....

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