BrahmaKumari's, Navapur-Maharashtra

BrahmaKumari's, Navapur-Maharashtra The Brahma Kumaris Through it’s teachings, the institution has gained global acceptance and unique international recognition.

The Brahma Kumaris - the philosophy, the perspective and the purpose

Prajapita Brahma Kumaris Ishwariya Vishwa Vidyalaya, (Brahma Kumaris in short) is a unique Vishwa Vidyalaya ( university ) and a well known spiritual value based educational institution. The institution believes in the parenthood of God and the brotherhood of man and is open to the people of the entire globe irrespective of thei

r caste, creed, age and social, economic or political status. Prajapita Brahma Kumaris Ishwariya Vishwa Vidyalaya and the two other institutions created by it, namely Raj Yoga Education and Research Foundation and Brahma Kumaris Academy for a Better World are dedicated to the goal of establishing a Value-based society. Their main focus is the development of human potential. They aim at bringing harmony in human relations and changing the attitudes and outlook of man so that there is the spirit of brotherhood, love and co-operation. In order to achieve this goal of establishing a new world order in which there is honesty, sincerity, goodwill and high civic sense, these institutions facilitate people to have a clear vision of their goal and also respective role in the world drama. They give them a clear view of the world and also knowledge of their own identity. They also teach theory and practice of Rajyoga Meditation so that man’s mind becomes free from tension, bias, prejudices, hypocrisy, jealousy, hatred, greed, ego and such other negative tendencies that cause conflict in the society and degrade the person himself. They give special guidance for the effort of inculcating moral values and divine virtues in the self and enables a person to experience deep peace and bliss through Meditation and Spiritual Wisdom. The emphasis of Brahma Kumaris is on promoting the qualities of humanism, tolerance and never-ending enthusiasm for spreading the knowledge of truth in every sphere of life. The institution recognises the intrinsic spirituality and goodness of every human being. Further it helps people rediscover that goodness themselves within, thus encouraging and facilitating the development of spiritual awareness, attitudes, behavior and skills through a process of lifelong learning. The institution's purpose is to share the vision of a world where people live in harmony with others and to strengthen individual awareness of the dignity and inherent worth of every human being. The institution imparts knowledge and experience that enable a person to face the problems of life in a calm, composed and confident manner. Such a person can lead a life of inner satisfaction and kindle in others stable faith in goodness and brings honour to his nation. It firmly believes that education should be for practical life and not merely for a vocation or a profession or job. The education imparted here, though visibly spiritual in content, is a happy blend of ethics, practical psychology, metaphysics or philosophy, the gist of world history and culture, sociology, political science and, in fact, many other subjects. As an international institution, the Brahma Kumaris offers people of all backgrounds an opportunity to learn meditation and deepen their understanding of universal principles and innate values through a variety of educational programmes, courses and learning resources. As a worldwide family of individuals from all walks of life, the institution provides a caring, co-operative and supportive environment, which encourages individuals to bring out the best in themselves. As a global organization, the institution has created opportunities for people across the world to participate in a variety of initiatives aimed at creating a better world where people live in peace and harmony. The institution believes that all the problems plaguing the society and the world today - social, economical, political, religious etc – can be eradicated only by building character in all human beings. There is a well-known saying that “if character is lost, everything is lost”. Hence the institution gives utmost importance to character-formation and to maintaining peace. It believes that if peace is lost, everything is meaningless and purposeless. The inculcation of moral and spiritual values is not a luxury or burden but an absolute necessity. Brahma Kumaris is an institution with a difference. It is run mostly by women with a spirit of dedication, devotion, renunciation and sacrifice for the welfare of the society as a whole, without any distinction on the basis of race, religion, nationality, caste or creed and without charging any fees. It is supported by voluntary contributions of its students.

26/09/2024

Om shanti

☆~☆~☆ होली के रंग - परमात्म प्यार के संग ☆~☆~☆भारत त्यहारो का देश है, और होली सभी त्योहारो में से एक मुख्य त्यौहार के रू...
12/03/2017

☆~☆~☆ होली के रंग - परमात्म प्यार के संग ☆~☆~☆
भारत त्यहारो का देश है, और होली सभी त्योहारो में से एक मुख्य त्यौहार के रूप में पूरे भारतवर्ष में बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है।
फाल्गुन मास की पुर्णिमा को यह त्योहार मनाया जाता है। होली के साथ अनेक कथाएं जुड़ीं हैं। होली मनाने के एक रात पहले होली को जलाया जाता है। इसके पीछे एक लोकप्रिय पौराणिक कथा है।
भक्त प्रह्लाद के पिता हरिण्यकश्यप स्वयं को भगवान मानते थे। वह विष्णु के विरोधी थे जबकि प्रह्लाद विष्णु भक्त थे। उन्होंने प्रह्लाद को विष्णु भक्ति करने से रोका जब वह नहीं माने तो उन्होंने प्रह्लाद को मारने का प्रयास किया। प्रह्लाद के पिता ने आखिर अपनी बहन होलिका से मदद मांगी। होलिका को आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। होलिका अपने भाई की सहायता करने के लिए तैयार हो गई। होलिका प्रह्लाद को लेकर चिता में जा बैठी परन्तु विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जल कर भस्म हो गई।
यह कथा इस बात का संकेत करती है कि बुराई पर अच्छाई की जीत अवश्य होती है। आज भी पूर्णिमा को होली जलाते हैं, परन्तु इसका आध्यात्मिक रहस्य यह कहता है के अपने अंदर के अभिमान को जल कर प्रभु प्रेम और शक्तियों के रंगो में खुद को और अपने आस पास सभी मनुष्यात्माओं को उसी रंग में रंग दो इसलिए ही अगले दिन सब लोग एक दूसरे पर गुलाल, अबीर और तरह-तरह के रंग डालते हैं। यह त्योहार रंगों का त्योहार है। इस दिन लोग प्रात:काल उठकर रंगों को लेकर अपने नाते-रिश्तेदारों व मित्रों के घर जाते हैं और उनके साथ जमकर होली खेलते हैं। बच्चों के लिए तो यह त्योहार विशेष महत्व रखता है। वह एक दिन पहले से ही बाजार से अपने लिए तरह-तरह की पिचकारियां व गुब्बारे लाते हैं। बच्चे गुब्बारों व पिचकारी से अपने मित्रों के साथ होली का आनंद उठते हैं। सभी लोग बैर-भाव भूलकर एक-दूसरे से परस्पर गले मिलते हैं। घरों में औरतें एक दिन पहले से ही मिठाई, गुझिया आदि बनाती हैं व अपने पास-पड़ोस में आपस में बांटती हैं।
ब्रज की होली, मथुरा की होली, वृंदावन की होली, बरसाने की होली, काशी की होली पूरे भारत में मशहूर है क्यूंकि यंहा होली भारत के प्रथम राजकुमार कृष्णा जिसने पुरुसोत्तम संगम युग में ५००० वर्ष पूर्व साधारण तन में रहकर सबसे पहले खुद पर और औरो पर आध्यात्मिक रंगो की बौछार करके परमात्म याद की होली मनाई थी उसी कृष्णा की याद में इन स्थानो पे विशेष होली मनाई जाती है। होली इंग्लिश शब्द होली अर्थात पवित्रता से भी सम्बंधित है। सच्ची होली उसे कहेंगे जब सभी पवित्रता की शपथ ले के परमात्मा की याद में रहकर सभी शक्तियों, प्रभु प्रेम का रंग चढ़ाया जाये और मधुर बोल की मिठाई आपस में बाँटी जाये।

विशेष ध्यान :-
आजकल अच्छी क्वॉलिटी के रंगों का प्रयोग नहीं होता और त्वचा को नुकसान पहुंचाने वाले रंग खेले जाते हैं। यह सरासर गलत है। इस मनभावन त्योहार पर रासायनिक लेप व नशे आदि से दूर रहना चाहिए। बच्चों को भी सावधानी रखनी चाहिए। बच्चों को बड़ों की निगरानी में ही होली खेलना चाहिए। दूर से गुब्बारे फेंकने से आंखों में घाव भी हो सकता है। रंगों को भी आंखों और अन्य अंदरूनी अंगों में जाने से रोकना चाहिए। यह मस्ती भरा पर्व मिलजुल कर मनाना चाहिए।

ıllııllı ☆ सच्चा गुरु गोबिंद सिंह ıllı ☆ ıllııllı ☆ एक वेला सी जद भारत सी सुखी, पावन ते संपन्नशेर ते बकरी एक घाट विच पिन...
05/01/2017

ıllııllı ☆ सच्चा गुरु गोबिंद सिंह ıllı ☆ ıllııllı ☆

एक वेला सी जद भारत सी सुखी, पावन ते संपन्न
शेर ते बकरी एक घाट विच पिन्दे सी पानी, ठंडी सी पवन
पूरे भारत विच सी एक भाषा ते एक धरम
सोने दी चिड़िया कहलान्दा सी, श्रेष्ठ सी सब्दे करम

2500 सालां बाद ओ स्वर्ग दा वेला वी गया मुक
रूहाण नू विकारां दी चिड़िया करन लगियाँ हप
सतयुग-त्रेता दे देवता बन गये धरम भ्रष्ट-करम भ्रष्ट
झूठ ते अन्याय ही हो गया सर्वव्यापी, ज़रा नहीं रह्या सच

दिनोदिन वधदा गया पापाचार ते भ्रष्टाचार
हर पासे सुनाई देन लगया दुख दा समाचार
दुख दा जद कोई नहीं विख्दा सी अंत
तद् रब ने भेजे किन्ने ही श्रेष्ठ संत

इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट आए दें धरम दा होया प्रवेश
ते गुरु नानक जी ने कित्ता सीख पंत दी स्थापना
लोकी नेया (नाम) लेन रब दा, एहियो सी उन्हा दी चाहना

दिनोदिन हिंसा वध्दी गयी दुनिया विच
तद् आए हिंदुआ नू बचान गुरु गोबिंद सिंह
कित्ती इन्हाने खालसा पंथ दी स्थापना
चाहना सी जाति, धरम ते लिंग दी दीवारा नू मिटाना

एक रब नू ही याद करो – सी उन्हा दा फरमान
धी (बेटी) दी हत्या क रन वाल्या दा कित्ता बहिष्कार
पंज कक्के (केश, कंघा, करा – तलवार, कृपाण, काकचेरा) बने पंज हुकम
धूम्रपान नू मन्या अपवित्र ते घातक

हथियारा नाल प्यार करन वाला कहलाएगा चंगा घुड़सवार
सारे भेद मिटाकर करेगा ओ सब्दे नाल प्यार
भेदभाव तौं उपर उठके करनी है सेवा गरीबा दी
हिन्दू ते मुसलमाना विच बरसाना है प्यार दा मीह (बारिश)

खुशियाँ नाल भर जाँदा है मन- दिंन, रातिं, शाम ते सवेर
कहके - वाहे गुरु जी दा खालसा ते वाहे गुरु जी दी फ़तेह
संगमयुग विच आके शिव बाबा दसदे ने आत्मा, परमात्मा दा ग्यान
पावन करदे ने सान्न्, देकर अपनी ते साडडी सच्ची पहचान

राजयोग सिखा के बनान्दे ने ओ सतयुग का सिरमोर
पा के उन्हानू रेहन्दी नहीं कोई वी दुनियावी लोड
शिव, निराकार, ज्योतिबिन्दु ही हैं गोविंद; बाकी सब हैं गुरु
ओ ही सच्चा साहिब, बंधु, सखा, प्यो, शिक्षक ते है सतगुरु

वाह-वाह बनान वाला ओहियो है सच्चा वाहे गुरु
सान्नु राज-भाग देके करान्दा है स्वर्ग दी दुनिया शुरू
परमधाम विच जाके ओ लेन्दा है वानप्रस्थ
ते अस्सी बच्च्यां नू दिला देन्दा है इंद्रप्रस्थ

आओ आज दे दिंन अस्सी वी उन्हानु दे दईये एक वचन
बनकर के सच्चा -2 गुरु गोविंद करांगे चंगे करम
मीठे बोल बोलकर सबनू खुआवान्गे दिलखुश मिठाई
गुरु गोविंद सिंग जी दे जनमदिन दी लाख-लाख वधाई

☆~☆~☆ सर्वात्माओं और सर्व गुरुओं का सच्चा गोबिंद ☆~☆~☆गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म भारत में बिहार राज्य के पटना शहर, हुआ ...
05/01/2017

☆~☆~☆ सर्वात्माओं और सर्व गुरुओं का सच्चा गोबिंद ☆~☆~☆
गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म भारत में बिहार राज्य के पटना शहर, हुआ था और वे सिक्ख धर्म के दसवें और अन्तिम गुरु थे. गुरु गोबिंद सिंह जी अपने पिता गुरु तेग बहादुर जी के पद चिन्हों पर चलते हुए, 1675 में नौ वर्ष की आयु में गुरु बने। वह सिक्ख धर्म के एक महान नेता, एक योद्धा, एक कवि और दर्शनशास्त्री थे। सिक्ख समाज में, गुरु गोबिंद सिंह जी, मनुष्यता के एक संपूर्ण उदाहरण थे; उच्च रूप से शिक्षित थे, एक बहुत अच्छे घुड़सवार, शौर्यवान और एक उदार चरित्र के महापुरुष थे।
गुरु गोबिंद सिंह का जन्म पटना में गुरु तेग बहादुर के घर में हुआ था। उनका बचपन का नाम गोबिंद राय था। उनकी माँ का नाम गुजरी देवी था। गुरु गोबिंद सिंह का जन्म एक महान लक्ष्य के लिए हुआ था। उन्होने धर्म के संरक्षण क लिए मुगलों के साथ युद्ध करते हुए, अपने संपूर्ण परिवार का बलिदान दे दिया।
गुरु गोविंद सिंह जी अपने समय के महान योद्धा, सुकवि एवं श्रेष्ठतम आध्यात्मिक नेता थे। उन्होने छोटे और हीन समझे जाने वाले लोगों के मन में आत्मविश्वास का संचार किया। उनमें अधिकारों के प्रति जागरूकता उत्पन्न की और बराबरी पर आधारित समाज की संकल्पना की।
दशम गुरु गोविंद सिंह जी ने अपना एक ऐसा दर्शन विकसित किया, जिससे पीड़ित-दलित, निरीह- निरुपाय समाज अपनी कायरता त्याग, भयमुक्त होकर रणभूमि में जूझने की आकांक्षा लेकर उठ खड़ा हुआ।
वैदिक युग से लेकर महाभारत के काल तक, पंजाब राज्य एक अद्वितीय इतिहास वाला राज्य रहा. मुगल सुल्तानों ने पंजाब राजे को युद्ध के द्वारा जो की लगभात 400 वर्ष चला था, पूर्णतः तहस-नहस कर दिया था।
पंजाब को इस युद्ध से बचाने के लिए, गुरु नानक देव जी की दूरदर्शिता के कारण सिक्ख धर्म अस्तित्व में आया। इस अन्यायपूर्ण आक्रमण का प्रतिक्रमण करने के लिए, सिक्ख धर्म के दस गुरुओं ने हमलावरों के विरुद्ध भीषणता के साथ लड़ाई लड़ी। गुरु गोबिंद सिंह जी सिक्खों के दसवें और अन्तिम गुरु थे और उनका जन्मदिवस कल अर्थात 5 जनवरी को मनाया गया।
इस अवसर पर, मुगलों के विरुद्ध उनकी गौरव गाथा महान भारत को गौरवान्वित करती है, जो संपूर्ण विश्व को मूल्यों, आज़ादी और लोगों के प्राणों की रक्षा करने की प्रेरणा देती है।
इस दुनिया में, बहुत से संत और सूफी एक दिव्य संदेश देने आए, और इस प्रकार से अपने अपने धर्म की स्थापने के निमित्त बने. तथापि, उनका अपने अनुयायियों के जीवन को परिवर्तित करने में योगदान नगण्य रहा। उनमें से बहुतों को तो अपने जीवन की आहुति भी देनी पड़ी, जिनमें प्रमुख हैं – यीशु मसीह, गुरु तेग बहादुर, गुरु गोबिंद सिंह जी इत्यादि। जब भी हम उनकी जीवन कहानी पढ़ते हैं तो हम उन्हे प्रेरणादायी और हृदय स्पर्शी महसूस करते हैं, परंतु हम वैसे दिव्य नहीं बन पाते जैसे कि वे स्वयं थे. यही कारण है सिर्फ परमात्मा ही हैं जो हम मनुष्यात्माओं को विकारी से निर्विकारी बना सकते हैं। चूंकि परमात्मा जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हैं और ज्ञान, पवित्रता, शांति, प्रेम, सुख, आनंद आदि गुणों के सागर हैं जो हुंए भी ज्ञानी, पवित्र, शांत, प्रेम स्वरूप, सुख स्वरूप, आनंद स्वरूप आदि बनाते हैं, जैसे की वह स्वयं हैं।
यही क़यामत का समय है। जैसे कि कहावत है, जब सभी द्वार बंद हो जाते हैं, तब परमात्मा को अंततः परमात्मा ही हमारी सहायता करते हैं। इसके अलावा, ऐसा भी कहा जाता है कि ‘भगवान के घर देर हैं लेकिन अंधेर नहीं है। यह बड़ी खुशी की बात है कि इस पतित-पुरानी-छी-छी दुनिया में परमात्मा के अवतरण लेकर हमें माया रावण रूपी 5 विकारों के चंगुल से बचाकर हमें पतित से पावन बनाना का समय अभी ही है।
यह बड़े हर्ष की बात है कि वे इस धरा पर अवतरित हो चुके हैं और पिछले 78 वर्षों से अपने साकार माध्यम – प्रजापिता ब्रह्मा के द्वारा हमे सहज राजयोग सिखा रहे हैं। वह इस समय परमपिता, क रूप में प्यार से पालना कर रहे हैं, परम शिक्षक के रूप में राजयोग की शिक्षा देकर हमें नर से श्री नारायण, नारी से श्री लक्ष्मी बनाने का दिव्य कर्तव्य कर रहे हैं और परम सतगुरु के रूप में हमारी सदगति कर रहे हैं।
उनकी सर्वश्रेष्ठ श्रीमत् हमें इस दुखधाम बन चुकी दुनिया में कमल पुष्प समान न्यारा और प्यारा बनाती हैं। परमपिता परमात्मा शिव, जिनसे हम 5000 वर्ष तक बिछड़ गये थे, राजयोग के ज्ञान द्वारा हम पर अपनी सर्वशक्तियों की वर्षा करके हमें अपने समान मास्टर सर्वशक्तिमान बना रहे हैं, जिसके बल पर हम आने वाले स्वर्ग अर्थात सतयुग और त्रेतायुग में 21 जन्मों के लिए देवी देवता बनकर सर्व सुखों को प्राप्त करेंगे।
द्वापरयुग से लेकर, अब तक बहुत से गुरु और संत लोगों ने इस धरती पर जन्म लिया है, परंतु सच्चा गुरु गोबिंद तो स्वयं परमपिता परमात्मा शिव ही हैं जो हम बच्चो को गुलाब के पुष्प की भाँति दिव्यता से संपन्न बनाते हैं। आइए इन सच्चे गुरु गोबिंद को पहचानें जो 5000 वर्ष के इस सृष्टि चक्र रूपी नाटक में केवल एक बार वर्तमान पुरुषोत्तम संगंयुग में ही अवतरित होते हैं, और अपना जीवन गुणवान बनाएँ।
आप सब ईश्वरीय संतानों को गुरु गोबिंद सिंह जयंती की कोटि-2 बधाई हो।

☆~☆~☆खुशियों की शुरुआत, धनतेरस के साथ ☆~☆~☆ दीपावली अकेले नहीं आती, अपने साथ पर्वों का समूह लेकर आती है। दीपावली के दो द...
28/10/2016

☆~☆~☆खुशियों की शुरुआत, धनतेरस के साथ ☆~☆~☆
दीपावली अकेले नहीं आती, अपने साथ पर्वों का समूह लेकर आती है। दीपावली के दो दिन पूर्व धनतेरस मनाया जाता है। इसका संबंध अन्न, धन और स्वास्थ्य से है। वैद्य धन्वन्तरी का जन्म दिन भी इस दिन मनाया जाता है। इस संबंध में कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दिन अमृतकलश हाथ में लेकर देवताओं के वैद्य भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए। इसलिए यह दिन भगवान धन्वंतरि के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन आरोग्य के विद्वान और वैद्य मंडली भगवान धन्वंतरि का पूजन करते हैं और लोगों के दीर्घ जीवन व आरोग्य लाभ के लिए मंगलकामना करते हैं। इस दिन नीम के पत्तों से बना प्रसाद ग्रहण करने का महत्व है। माना जाता है कि नीम की उत्पति अमृत से हुई है और धन्वंतरि अमृत के दाता हैं। अतः प्रतीक स्वरूप धन्वंतरि जयंती के दिन नीम के पत्तों से बना प्रसाद बाँटते हैं। इस दिन की एक अन्य विशेषता भी है कहा जाता है कि इसी दिन यमराज से राजा हिम के पुत्र की रक्षा उसकी पत्नी ने की थी, जिस कारण दीपावली के दो दिन पहले मनाए जाने वाले ऐश्वर्य के त्योहार धनतेरस पर सायं काल को यमदेव के निमित्त दीप दान किया जाता है, जिसे यमदीप दान भी कहा जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से यमराज के कोप से सुरक्षा मिलती है। इस दिन घरों को साफ-सफाई कर स्वच्छ और पवित्र बनाया जाता है। साथ ही, इस दिन नयी खरीफ फसल की खील बनाई जाती है। नए बर्तन में भगवान को भोग लगाने के पश्चात स्वयं भी उसका उपभोग किया जाता है। स्वास्थ्य धन बहुत बड़ा धन है। कहा जाता है “पहला सुख निरोगी काया।“ आत्मा का दीप जलाने के लिए काया निरोगी चाहिए। भगवान जब प्रकाश की दुनिया (सतयुग) के निर्माण के लिए आते हैं तो शुद्ध सात्विक प्रसाद रूप भोजन खिला-खिला कर बुझे दीपक को ज्ञान घृत से प्रज्ज्वलित कर देते हैं। उसी की यादगार में धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

27-10-16 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबनमीठे बच्चे– इस पुरानी दुनिया से बेहद के वैरागी बनो क्योंकि बाप तुम्हारे ल...
26/10/2016

27-10-16 प्रात:मुरली ओम् शान्ति “बापदादा” मधुबन
मीठे बच्चे– इस पुरानी दुनिया से बेहद के वैरागी बनो क्योंकि बाप तुम्हारे लिए नया स्वर्ग रूपी घर बना रहे हैं।

प्रश्न:

इस अविनाशी रूद्र यज्ञ में किन-किन बातों के कारण ही विघ्न पड़ते हैं?

उत्तर:

यह शिवबाबा का रचा हुआ अविनाशी रूद्र यज्ञ है, इसमें तुम मनुष्य से देवता बनने के लिए पवित्र बनते हो, भक्ति आदि छोड़ते हो इस कारण विघ्न पड़ते हैं। लोग कहते हैं– शान्ति हो, विनाश न हो और बाप ने यह रूद्र ज्ञान यज्ञ रचा ही है पुरानी दुनिया के विनाश के लिए। इसके बाद ही शान्ति की दुनिया आयेगी।

ओम् शान्ति।

ओम् शान्ति का अर्थ बाप ने बच्चों को समझाया है। अहम् आत्मा का स्वधर्म है शान्त। शान्तिधाम में जाने के लिए कोई पुरूषार्थ नहीं करना पड़ता है। आत्मा स्वयं शान्त स्वरूप, शान्तिधाम में रहने वाली है। यहाँ थोड़े समय के लिए शान्त रह सकते हैं। आत्मा कहती है मेरी कर्मेन्द्रियों का बाजा थक गया है। मैं अपने स्वधर्म में टिक जाता हूँ, शरीर से अलग हो जाता हूँ। परन्तु कर्म तो करना ही है। शान्ति में कहाँ तक बैठे रहेंगे। आत्मा कहती है– मैं शान्ति देश की रहवासी हूँ। सिर्फ यहाँ शरीर में आने से मैं टॉकी बना हूँ। अहम् आत्मा मम् शरीर है। आत्मा ही पतित और पावन बनती है। आत्मा पतित बनती है तो शरीर भी पतित बनता है क्योंकि सतयुग में 5 तत्व भी सतोप्रधान होते हैं। यहाँ 5 तत्व तमोप्रधान हैं। सोने में खाद पड़ने से सोना पतित बन जाता है। फिर उनको साफ करने के लिए आग में डाला जाता है। उनको योग अग्नि नहीं कहा जाता। योग अग्नि भी है, जिससे पाप जलते हैं। आत्मा को पतित से पावन बनाने वाला परमात्मा है। नाम ही एक का है। बुलाते हैं हे पतित-पावन आओ। ड्रामा प्लैन अनुसार सबको पतित तमोप्रधान बनना ही है। यह झाड़ है ना। उस झाड़ का बीज नीचे रहता है, इनका बीज ऊपर में है। बाप को जब बुलाते हैं तो बुद्धि ऊपर चली जाती है। जिससे तुम वर्सा ले रहे हो वह अब नीचे आया हुआ है। कहते हैं मुझे आना पड़ता है। मेरा जो यह मनुष्य सृष्टि का झाड़ है, यह अनेक वैराइटी धर्मों का है। अब वह तमोप्रधान पतित जड़जडीभूत अवस्था को पाया हुआ है। बाप बैठ बच्चों को समझाते हैं– सतयुग में पहले-पहले होते हैं देवी-देवतायें। अब कलियुग में हैं असुर। बाकी असुर और देवताओं की लड़ाई लगी नहीं। तुम इन आसुरी 5 विकारों पर योगबल से जीत पाते हो। बाकी कोई हिंसक लड़ाई की बात नहीं है। तुम कोई भी प्रकार की हिंसा नहीं करते हो। तुम किसको हाथ भी नहीं लगायेंगे। तुम डबल अहिंसक हो। काम कटारी चलाना, यह तो सबसे बड़ा पाप है। बाप कहते हैं– यह काम कटारी आदि-मध्य-अन्त दु:ख देती है। विकार में नहीं जाना है। देवताओं के आगे महिमा गाते हैं– आप सर्वगुण सम्पन्न, सम्पूर्ण निर्विकारी। आत्मा इन आरगन्स द्वारा जानती है। कहते हैं कि हम पतित बन गये हैं तो जरूर कब पावन थे, जो कहते हैं हम पतित बने हैं। बुलाते भी हैं हे पतित-पावन आओ। जब पावन हैं तब कोई बुलाते ही नहीं। उनको स्वर्ग कहा जाता है। यहाँ तो साधू-सन्त आदि कितनी धुन लगाते हैं पतित-पावन सीताराम... जहाँ भी जाओ गाते रहते हैं। बाप समझाते हैं कि सारी दुनिया पतित है। रावण राज्य है ना, रावण को जलाते हैं। परन्तु उनका राज्य कब से हुआ, किसको पता नहीं है। ढेर की ढेर भक्ति मार्ग की सामग्री है। कोई क्या करते, कोई क्या करते। सन्यासी भी कितने योग सिखाते हैं। वास्तव में योग किसको कहा जाता है– यह कोई को पता नहीं है। यह भी किसका दोष नहीं है। यह ड्रामा बना बनाया है। जब तक मैं न आऊं, इन्हों को अपना पार्ट बजाना है। ज्ञान और भक्ति, ज्ञान है दिन सतयुग त्रेता, भक्ति है रात द्वापर कलियुग फिर है वैराग्य। पुरानी दुनिया से वैराग्य। यह है बेहद का वैराग्य। उन्हों का है हद का वैराग्य। तुम जानते हो यह पुरानी दुनिया अब खत्म होने वाली है। नया घर बनाते हैं तो पुराने से वैराग्य हो जाता है। देखो, बेहद का बाप कैसा है! तुमको स्वर्ग रूपी घर बनाकर देता है। स्वर्ग है नई दुनिया। नर्क है पुरानी दुनिया। नई सो पुरानी सो फिर नई बनती है। नई दुनिया की आयु कितनी है, यह किसको पता नहीं है। अभी पुरानी दुनिया में रह हम नई बनाते हैं। पुराने कब्रिस्तान पर हम परिस्तान बनायेंगे। यही जमुना का कण्ठा होगा, इस पर महल बनेंगे। यही देहली जमुना नदी पर होगी। बाकी यह जो दिखाते हैं– पाण्डवों के किले थे। यह सब ड्रामा प्लैन अनुसार जरूर फिर भी बनेंगे। जैसे तुम यज्ञ तप दान आदि करते होंगे, यह फिर भी करना होगा। पहले शिव की भक्ति करते हो। फर्स्टक्लास मन्दिर बनाते हो, उनको अव्यभिचारी भक्ति कहा जाता है। अब तुम ज्ञान मार्ग में हो। यह है अव्यभिचारी ज्ञान। एक ही शिवबाबा से तुम सुनते हो जिसकी पहले तुमने भक्ति की, उस समय कोई और धर्म होते नहीं। उस समय तुम बहुत सुखी रहते हो। देवता धर्म बहुत सुख देने वाला है। नाम लेने से मुख मीठा हो जाता है। तुम एक बाप से ही ज्ञान सुनते हो। बाप कहते हैं और कोई से तुम मत सुनो। यह है तुम्हारा अव्यभिचारी ज्ञान। बेहद बाप के तुम बने हो। बाप से ही वर्सा मिलेगा। नम्बरवार पुरूषार्थ अनुसार। बाप थोड़े समय के लिए साकार में आया हुआ है। कहते हैं मुझे तुम बच्चों को ही ज्ञान देना है। मेरा यह स्थाई शरीर नहीं है, मैं इसमें प्रवेश करता हूँ। शिव जयन्ती से फिर झट गीता जयन्ती हो जाती है। उनसे ज्ञान शुरू कर देते हैं। यह रूहानी विद्या सुप्रीम रूह दे रहे हैं। पानी की बात नहीं। पानी को थोड़ेही ज्ञान कहेंगे। पतित से पावन, ज्ञान से बनेंगे। पानी से थोड़ेही पावन बनेंगे। नदियां तो सारी दुनिया में हैं ही। यह तो ज्ञान सागर बाप आते हैं, इसमें प्रवेश कर नॉलेज सुनाते हैं। यहाँ गऊ मुख पर जाते हैं। वास्तव में गऊ मुख तुम चैतन्य में हो। तुम्हारे मुख से ज्ञान अमृत निकलता है। गऊ से तो दूध मिलता है। पानी की तो बात ही नहीं, यह सब कुछ बाप बैठ समझाते हैं। जो सबका सद्गति दाता है। अब सभी दुर्गति में पड़े हैं। आगे तुम नहीं जानते थे तो रावण को क्यों जलाते हैं। अब तुम जानते हो बेहद का दशहरा होने वाला है। यह सारी दुनिया बेट (टापू) है। रावण का राज्य सारी सृष्टि पर है। जो शास्त्रों में है बन्दर सेना थी, बन्दरों ने पुल बनाई... यह सब हैं दन्त कथायें। भक्ति आदि चलती है, पहले होती है अव्यभिचारी भक्ति, फिर व्यभिचारी भक्ति। दशहरा, राखी बन्धन सब अभी के ही त्योहार हैं। शिव जयन्ती के बाद होती है कृष्ण जयन्ती। अभी कृष्णपुरी स्थापन हो रही है। आज है कंसपुरी, कल होगी कृष्णपुरी। कंस आसुरी सम्प्रदाय को कहा जाता है। पाण्डव और कौरवों की लड़ाई है नहीं। कृष्ण का जन्म है सतयुग में, वह है फर्स्ट प्रिन्स। स्कूल में पढ़ने जाता है। जब बड़ा होता है तो राजगद्दी पर बैठता है। महिमा सारी शिवबाबा की है, जो पतितों को पावन बनाने वाला है। बाकी यह रास लीला आदि यह तो आपस में खुशी मनाते होंगे। बाकी कृष्ण किसको ज्ञान सुनाये, यह कैसे हो सकता है। बाबा कहते हैं– किसको मना नहीं करनी है कि भक्ति नहीं करो। आपेही छूट जाती है। भक्ति छोड़ते हैं, विकार छोड़ते हैं, इस पर ही हंगामा होता है। बाबा ने कहा है मैं रूद्र यज्ञ रचता हूँ, इसमें आसुरी सम्प्रदाय के विघ्न पड़ते हैं। यह है शिवबाबा का बेहद का यज्ञ, जिससे मनुष्य से देवता बनते हैं। गाया हुआ है ज्ञान यज्ञ से विनाश ज्वाला प्रगट हुई। जब पुरानी दुनिया का विनाश हो– तब तुम नई दुनिया में राज्य करेंगे। लोग कहते हैं हम कहते शान्ति हो, यह बी.के. कहते विनाश हो। ज्ञान न समझने के कारण ऐसा बोलते हैं। बाप समझाते हैं– यह सारी पुरानी दुनिया इस ज्ञान यज्ञ में स्वाहा हो जायेगी। पुरानी दुनिया को आग लगने वाली है। नेचुरल कैलेमिटीज आयेगी, सरसों मुआिफक सब पीस कर खत्म हो जायेंगे। बाकी कुछ आत्मायें बच जायेंगी। आत्मा तो अविनाशी है। अब बेहद की होलिका होनी है, जिसमें शरीर सब खत्म हो जायेंगे। बाकी आत्मा पवित्र बनकर चली जायेगी। आग में चीज शुद्ध होती है। हवन करते हैं, शुद्धता के लिए। वह सब हैं जिस्मानी बातें। अब सारी दुनिया स्वाहा होने वाली है। विनाश के पहले जरूर स्थापना होनी चाहिए। किसको समझाओ– पहले स्थापना फिर विनाश। ब्रह्मा द्वारा स्थापना। प्रजापिता मशहूर है आदि देव, आदि देवी... जगत अम्बा के लाखों मन्दिर हैं। कितने मेले लगते हैं। तुम हो जगत अम्बा के बच्चे ज्ञान-ज्ञानेश्वरी, फिर बनेंगी राज-राजेश्वरी। तुम बहुत धनवान बनते हो। फिर भक्ति मार्ग में लक्ष्मी से दीपमाला पर विनाशी धन मांगते हैं। यहाँ तुमको सब कुछ मिल जाता है आयुश्वान भव, पुत्रवान भव। वहाँ 150 वर्ष आयु रहती है। यहाँ तुम जितना योग लगायेंगे उतनी आयु बढ़ती जायेगी। तुम ईश्वर से योग लगाकर योगेश्वर बनते हो। बाप कहते हैं मैं धोबी हूँ। सब मूत पलीती आत्माओं को साफ करता हूँ। फिर शरीर भी शुद्ध मिलेगा। मैं सेकेण्ड में दुनिया के कपड़े साफ कर लेता हूँ। सिर्फ मनमनाभव होने से आत्मा और शरीर पवित्र बन जायेंगे। छू मन्त्र हुआ ना। सेकेण्ड में जीवनमुक्ति, कितना सहज उपाय है। चलते-फिरते सिर्फ बाप को याद करो और कोई जरा भी तकलीफ नहीं देता हूँ। अब तुम्हारी एक सेकेण्ड में चढ़ती कला होती है। बाप कहते हैं– मैं तुम बच्चों का सर्वेन्ट बनकर आया हूँ। तुमने बुलाया है– हे पतित-पावन आकर हमको पावन बनाओ तो सर्वेन्ट हुआ ना। जब तुम बहुत पतित बनते हो तो जोर से चिल्लाते हो। अब मैं आया हूँ। मैं कल्प-कल्प आकर बच्चों को मन्त्र देता हूँ कि मुझे याद करो। मनमनाभव का अर्थ भी यह है। फिर विष्णुपुरी का मालिक बनेंगे। तुम आये हो विष्णुपुरी का राज्य लेने, रावण पुरी के बाद है विष्णुपुरी। कंसपुरी के बाद कृष्णपुरी। कितना सहज समझाया जाता है। बाप कहते हैं इस पुरानी दुनिया से सिर्फ ममत्व मिटा दो। अब हमने 84 जन्म पूरे किये हैं। यह पुराना चोला छोड़ हम जायेंगे नई दुनिया में। याद से ही तुम्हारे पाप कट जायेंगे, इतनी हिम्मत करनी चाहिए। अच्छा।

मीठे-मीठे सिकीलधे बच्चों प्रति मात-पिता बापदादा का याद-प्यार और गुडमार्निंग। रूहानी बाप की रूहानी बच्चों को नमस्ते।

धारणा के लिए मुख्य सार:

1) मुख से सदैव ज्ञान अमृत निकालना है। ज्ञान से ही सबकी सद्गति करनी है। एक बाप से ही ज्ञान सुनना है, दूसरों से नहीं।

2) चढ़ती कला में जाने के लिए चलते-फिरते बाप को याद करने का अभ्यास करना है। इस पुरानी दुनिया, पुराने चोले से ममत्व मिटा देना है।

वरदान:

फालो फादर और सी फादर के महामन्त्र द्वारा एकरस स्थिति बनाने वाले श्रेष्ठ पुरूषार्थी भव!

'सी फादर-फालो फादर' इस मंत्र को सदा सामने रखते हुए चढ़ती कला में चलते चलो, उड़ते चलो। कभी भी आत्माओं को नहीं देखना क्योंकि आत्मायें सब पुरूषार्थी हैं, पुरूषार्थी में अच्छाई भी होती और कुछ कमी भी होती है, सम्पन्न नहीं, इसलिए फालो फादर न कि ब्रदर सिस्टर। तो जैसे फादर एकरस है ऐसे फालो करने वाले एकरस स्वत: हो जायेंगे।

स्लोगन:

परचिंतन के प्रभाव में न आकर शुभचिंतन करने वाली शुभाचिंतक मणी बनो।

23-10-16 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ’अव्यक्त-बापदादा“ रिवाइज:26-11-81 मधुबन सहयोगी ही सहजयोगीआज बापदादा अपने स्वराज्य अधिकार...
23/10/2016

23-10-16 प्रात:मुरली ओम् शान्ति ’अव्यक्त-बापदादा“ रिवाइज:26-11-81 मधुबन
सहयोगी ही सहजयोगी

आज बापदादा अपने स्वराज्य अधिकारी राजऋषि भविष्य में राज्य वंशी बच्चों को देख रहे हैं। सभी सहजयोगी अर्थात् राजऋषि हो। बापदादा सभी बच्चों को वर्तमान वरदानी समय पर विशेष वरदान कौन-सा देते हैं? सहजयोगी भव! यह वरदान अनुभव करते हो? योगी तो बहुत बनते हैं लेकिन सहजयोगी सिर्फ संगमयुगी आप श्रेष्ठ आत्मायें बनती हो क्योंकि वरदाता बाप का वरदान है। ब्राह्मण बने अर्थात् इस वरदान के वरदानी बने। सबसे पहला जन्म का वरदान यही सहजयोगी भव का वरदान है। तो अपने आप से पूछो– वरदानी बाप, वरदानी समय और आप भी वरदान लेने वाली श्रेष्ठ आत्मायें हो। इस वरदान को सदा बुद्धि में याद रखना– यह है वरदान को जीवन में लाना। तो ऐसे वरदान को सदा प्राप्त की हुई आत्मा, प्राप्ति स्वरूप आत्मा समझते हो? वा मेहनत भी करनी पड़ती है? सदा वरदानी आत्मा हो? इस वरदान को सदा कायम रखने की विधि जानते हो? सबसे सहज विधि कौन-सी है? जानते हो ना? सदा सर्व के और सेवा में सहयोगी बनो। तो सहयोगी ही सहज योगी हैं। कई ब्राह्मण आत्मायें सहज योग का अनुभव सदा नहीं कर पाती। योग कैसे लगायें? कहाँ लगायें? इसी क्वेश्चन में अब तक भी हैं। सहज योग में क्वेश्चन नहीं होता है। साथ-साथ वरदान है, वरदान में मेहनत नहीं होती है। और सहज, सदा स्वत: ही रहता है अर्थात् सहज योगी वरदानी आत्मा स्वत: निरन्तर योगी होती है। नहीं रहते इनका कारण? प्राप्त हुए वरदान को वा ब्राह्मण जन्म की इस अलौकिक गिफ्ट को सम्भालना नहीं आता। स्मृति द्वारा समर्था रखने में अलबेले बन जाते हो। नहीं तो ब्राह्मण और सहज योगी न हों तो ब्राह्मण जीवन की विशेषता ही क्या रही। वरदानी होते भी सहज योगी नहीं तो और कब बनेंगे? यह नशा और निश्चय सदा याद रखो– यह हमारा जन्म का वरदान है। इसी वरदान को सर्व आत्माओं के प्रति सेवा में लगाओ। सेवा में सहयोगी बनना– यही विधि है सहजयोगी की। अमृतवेले से लेकर सहयोगी बनो। सारे दिन की दिनचर्या का मूल लक्ष्य एक शब्द रखो कि सहयोग देना है। सहयोगी बनना है। अमृतवेले बाप से मिलन मनाकर बाप समान मास्टर बीजरूप बन, मास्टर विश्व कल्याणकारी बन सर्व आत्माओं को अपनी प्राप्त हुई शक्तियों के द्वारा आत्माओं की वृत्ति और वायुमण्डल परिवर्तन करने के लिए सहयोगी बनो। बीज द्वारा सारे वृक्ष को रूहानी जल देने के सहयोगी बनो। जिससे सर्व आत्माओं रूपी पत्तों को प्राप्ति के पानी मिलने का अनुभव हो। ऐसे अमृतवेले से लेकर जो भी सारे दिन में कार्य करते हो हर कार्य का लक्ष्य “सहयोग देना” हो। चाहे व्यवहार के कार्य में जाते हो, प्रवृत्ति को चलाने के कार्य में रहते हो। लेकिन सदा यह चेक करो लौकिक व्यवहार में भी स्व प्रति वा साथियों के प्रति शुभ भावना और कामना से वायुमण्डल रूहानी बनाने का सहयोग दिया? वा ऐसे ही रिवाजी (साधारण) रीति से अपनी ड्युटी बजाकर आ गये। जैसा जिसका आक्युपेशन होता है, वह जहाँ भी जायेंगे, अपने आक्युपेशन प्रमाण कार्य जरूर करेंगे। आप सबका विशेष आक्युपेशन ही है– “सहयोगी बनना”। वह कैसे भूल सकते! तो हर कार्य में सहयोगी बनना है तो सहजयोगी स्वत: बन जायेंगे। कोई भी सेकण्ड सहयोगी बनने के सिवाए न हो। चाहे मंसा में सहयोगी बनो, चाहे वाचा से सहयोगी बनो। चाहे सम्बन्ध सम्पर्क के द्वारा सहयोगी बनो। चाहे स्थूल कर्म द्वारा सहयोगी बनो। लेकिन सहयोगी जरूर बनना है क्योंकि आप सभी दाता के बच्चे हो। दाता के बच्चे सदा देते रहते हैं। तो क्या देना है? “सहयोग”। स्व परिवर्तन के लिए भी स्वयं के सहयोगी बनो। कैसे? साक्षी बन स्व के प्रति भी सदा शुभचिन्तन की वृत्ति और रूहानी वायुमण्डल बनाने के स्व प्रति भी सहयोगी बनो। जब प्रकृति अपने वायुमण्डल के प्रभाव में सभी को अनुभव करा सकती है जैसे सर्दा, गर्मा प्रकृति अपना वायुमण्डल पर प्रभाव डाल देती है, ऐसे प्रकृतिजीत सदा सहयोगी, सहज योगी आत्मायें अपने रूहानी वायुमण्डल का प्रभाव अनुभव नहीं करा सकती? सदा स्व प्रति और सर्व के प्रति सहयोग की शुभ भावना रखते हुए सहयोगी आत्मा बनो। वह ऐसा है वा ऐसा कोई करता है, यह नहीं सोचो। कैसा भी वायुमण्डल है, व्यक्ति है, “मुझे सहयोग देना है”। ऐसे सभी ब्राह्मण आत्मायें सदा सहयोगी बन जाएं तो क्या हो जायेगा? सभी सहज योगी स्वत: हो जायेंगे क्योंकि सर्व आत्माओं को सहयोग मिलने से कमजोर भी शक्तिशाली हो जाते हैं। कमजोरी समाप्त होने से सहयोगी तो हो ही जायेंगे ना! कोई भी प्रकार की कमजोरी, मुश्किल वा मेहनत का अनुभव कराती है। शक्तिशाली हैं तो सब सहज है। तो क्या मधुबन करना पड़े? सदा चाहे तन से, मन से, धन से, मंसा से, वाणी से वा कर्म से सहयोगी बनना है। अगर कोई मन से नहीं कर सकते तो तन और धन से सहयोगी बनो। मंसा, वाणी से नहीं तो कर्म से सहयोगी बनो। सम्बन्ध जुड़वाने वा सम्पर्क रखाने के सहयोगी बनो। सिर्फ सन्देश देने के सहयोगी नहीं बनो, अपने परिवर्तन से सहयोगी बनो। अपने सर्व प्राप्तियों के अनुभव सुनाने के सहयोगी बनो। अपने सदा हर्षित रहने वाली सूरत से सहयोगी बनो। किसी को गुणों के दान द्वारा सहयोगी बनो। किसी को उमंग-उत्साह बढ़ाने के सहयोगी बनो। जिसमें भी सहयोगी बन सको उसमें सहयोगी सदा बनो। यही सहज योग है। समझा क्या करना है? यह तो सहज है ना। जो है वह देना है। जो कर सकते हो वह करो। सब नहीं कर सकते हो तो एक तो कर सकते हो? जो भी एक विशेषता हो उसी विशेषता को कार्य में लगाओ अर्थात् सहयोगी बनो। यह तो कर सकते हो ना, यह तो नहीं सोचते हो कि मेरे में कोई विशेषता नहीं। कोई गुण नहीं। यह हो नहीं सकता। ब्राह्मण बनने की ही बड़ी विशेषता है। बाप को जानने की बड़ी विशेषता है इसलिए अपनी विशेषता द्वारा सदा सहयोगी बनो। अच्छा। ऐसे सदा सहयोगी अर्थात् सहजयोगी, सदा अपने श्रेष्ठ वृत्ति द्वारा वायुमण्डल बनाने के सहयोगी आत्मा, कमजोर आत्माओं को उत्साह दिलाने की सहयोगी आत्मा, ऐसे अमृतवेले से हर समय सहयोगी बनने वाली आत्माओं को बापदादा का यादप्यार और नमस्ते। पार्टियों के साथ साइलेन्स की शक्ति से दैवी स्वराज्य की स्थापना साइलेन्स की शक्ति से सारे विश्व पर दैवी राजस्थान का फाउन्डेशन डाल रहे हो ना। वह आपस में लड़ते हैं और आप दैवी राजस्थान बना रहे हो, क्या बनना है? यह उन्हों को क्या पता, वह तो अपना-अपना प्रयत्न करते रहते हैं लेकिन भावी क्या है– उसको तो आप जानते हो? तो सभी बच्चे साइलेन्स की शक्ति से दैवी स्वराज्य बना रहे हो ना? उनकी है जबान की शक्ति या बाहुबल, शस्त्र की शक्ति और आपकी है साइलेन्स की शक्ति। इसी शक्ति के द्वारा दैवी राज्य स्थापन हो ही जायेगा– यह तो अटल निश्चय है ना। वे भी समझते हैं कि वर्तमान समय कोई ईश्वरीय शक्ति चाहिए जो कार्य करे। लेकिन गुप्त होने के कारण जान नहीं सकते हैं। आप जानते हो और कर भी रहे हो। पंजाब में वृद्धि तो हो रही है ना! पंजाब भी सेवा का आदि स्थान है। तो आदि स्थान से कोई विशेष कार्य होना चाहिए। रूहानी बाप के बच्चे होने के नाते रूहानी सेवा करना हर बच्चे का कार्य है। जो बाप का कार्य वही बच्चों का कार्य। जैसे रूहानी बाप का कर्तव्य है रूहानी सेवा करना, ऐसे बच्चों को भी इसी कार्य में तत्पर रहना है। यह रूहानी सेवा हर कदम में प्रत्यक्ष फल प्राप्त कराती है। प्रत्यक्ष फल है खुशी। जितनी सेवा करते, उतना खुशी का खजाना बढ़ता जाता है, एक का पदमगुणा मिलता है। ऐसे समझते हो? आपका आक्युपेशन ही है– रूहानी सेवाधारी। लौकिक में भल कोई भी पोजीशन हो लेकिन अलौकिक में रूहानी सेवाधारी हो। अगर कोई डाक्टर है, तो रूहानी और जिस्मानी डबल डाक्टर बनो। वह सेवा करते भी मूल कर्तव्य है रूहानी डाक्टर बनना। बार-बार रोगी आये, इससे तो रोग ही खत्म हो जाए, सदा के लिए। तो ऐसी दवाई देनी चाहिए ना। रोगी आता ही है सदा शफा पाने के लिए। सदा शफा होगी रूहानी सेवा से। अच्छा। लण्डन ग्रुप से बापदादा की

मुलाकात:- लण्डन के अच्छे-अच्छे रत्न जगह-जगह पर गये हैं। वैसे सभी विदेश के सेवाकेन्द्र एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे, ऐसे खुलते हैं। अभी टोटल कितने सेवाकेन्द्र हैं? (1982में) (50) तो 50 जगह का फाउण्डेशन लण्डन है। तो वृक्ष सुन्दर हो गया ना। जिस तना से 50 टाल-टालियां निकलें, वह वृक्ष कितना सुन्दर हुआ। तो विदेश का वृक्ष भी विस्तार वाला अच्छा फलीभूत हो गया है। बापदादा भी बच्चों के, सिर्फ लण्डन नहीं सभी बच्चों के सेवा का उंमग-उत्साह देख खुश होते हैं। विदेश में लगन अच्छी है। याद की भी और सेवा की भी, दोनों की लगन अच्छी है। सिर्फ एक बात है कि माया के छोटे रूप से भी घबराते जल्दी हैं। जैसे यहाँ इंडिया में कई ब्राह्मण जो हैं, वे चूहे से भी घबराते हैं, काकरोच से भी घबराते हैं। तो सिर्फ विदेशी बच्चे इससे घबरा जाते हैं। छोटे को बड़ा समझ लेते हैं लेकिन है कुछ नहीं। कागज के शेर को सच्चा शेर समझ लेते हैं। जितनी लगन है ना उतना घबराने के संस्कार थोड़ा-सा मैदान पर आ जाते हैं। तो विदेशी बच्चों को माया से घबराना नहीं चाहिए, खेलना चाहिए। कागज के शेर से खेलना होता है या घबराना होता है? खिलौना हो गया ना? खिलौने से घबराने वाले को क्या कहेंगे? जितनी मेहनत करते हो उस हिसाब से, डबल विदेशी सभी नम्बरवन सीट ले सकते हो क्योंकि दूसरे धर्म के पर्दे के अन्दर, डबल पर्दे के अन्दर बाप को पहचान लिया है। एक तो साधारण स्वरूप का पर्दा और दूसरा धर्म का भी पर्दा है। भारतवासियों को तो एक ही पर्दे को जानना होता है लेकिन विदेशी बच्चे दोनों पर्दे के अन्दर जानने वाले हैं। हिम्मत वाले भी बहुत हैं, असम्भव को सम्भव भी किया है। जो क्रिश्चियन या अन्य धर्म वाले समझते हैं कि हमारे धर्म वाले ब्राह्मण कैसे बन सकते, असम्भव है। तो असम्भव को सम्भव किया है, जानने में भी होशियार, मानने में भी होशियार हैं। दोनों में नम्बरवन हो। बाकी बीच में चूहा आ जाता है तो घबरा जाते हो। है सहज मार्ग लेकिन अपने व्यर्थ सकंल्पों को मिक्स करने से सहज मुश्किल हो जाता है। तो इसमें भी जम्प लगाओ। माया को परखने की आंख तेज करो। मिसअन्डस्टैन्ड कर लेते हो। कागज को रीयल समझ लेना मिसअन्डरस्टैडिंग हो गई ना। नहीं तो डबल विदेशियों की विशेषता भी बहुत है। सिर्फ एक यह कमजोरी है-बस। फिर अपने ऊपर हंसते भी बहुत हैं, जब जान लेते हैं कि यह कागज का शेर है, रीयल नहीं है तो हंसते हैं। चेक भी कर लेते, चेन्ज भी कर लेते लेकिन उस समय घबराने के कारण नीचे आ जाते हैं या बीच में आ जाते हैं। फिर ऊपर जाने के लिए मेहनत करते, तो सहज के बजाए मेहनत का अनुभव होता है। वैसे जरा भी मेहनत नहीं है। बाप के बने, अधिकारी आत्मा बने, खजाने के, घर के, राज्य के मालिक बने और क्या चाहिए। तो अभी क्या करेंगे? घबराने के संस्कारों को यहाँ ही छोड़कर जाना। समझा! बापदादा भी खेल देखते रहते हैं, हंसते रहते हैं। बच्चे ग्हराई में भी जाते हैं लेकिन गहराई के साथ-साथ कहाँ-कहाँ घबराते भी हैं। लास्ट सो फास्ट के भी संस्कार हैं। पहले विदेशियों में विशेष फंसने के संस्कार थे, अभी हैं फास्ट जाने के संस्कार। एक में नहीं फंसते हैं लेकिन अनेकों में फंस जाते हैं। एक ही लाइफ में कितने पिंजरे होते हैं। एक पिंजरे से निकलते दूसरे में फंसते, दूसरे से निकलते तीसरे में फंसते। तो जितना ही फंसने के संस्कार थे उतना ही फास्ट जाने के संस्कार हैं। सिर्फ एक बात है, छोटी चीज को बड़ा नहीं बनाओ। बड़े को छोटा बनाओ। यह भी होता है क्या? यह क्वेश्चन नहीं। यह क्या हुआ? ऐसे भी होता है? इसके बजाए जो होता है कल्याणकारी है। क्वेश्चन खत्म होने चाहिए। फुलस्टाप। बुद्धि को इसमें ज्यादा नहीं चलाओ, नहीं तो एनर्जा वेस्ट चली जाती है और अपने को शक्तिशाली नहीं अनुभव करते। क्वेश्चन मार्क ज्यादा होते हैं। तो अब मधुबन की वरदान भूमि में क्वेश्चन मार्क खत्म करके, फुलस्टाप लगा के जाओ। क्वेश्चनमार्क मुश्किल है, फुलस्टाप सहज है। तो सहज को छोड़कर मुश्किल को क्यों अपनाते हो! उसमें एनर्जा वेस्ट है और फुलस्टाप में लाइफ ही बेस्ट हो जायेगी। वहाँ वेस्ट वहाँ बेस्ट। तो क्या करना चाहिए? अभी वेस्ट नहीं करना। हर संकल्प बेस्ट, हर सेकण्ड बेस्ट। अच्छा– लण्डन निवासियों के साथ रूहरिहान हो गई। लण्डन के सभी सिकीलधे बच्चों को बापदादा का पद्मापद्मगुणा यादप्यार स्वीकार हो। साकार में मधुबन में नहीं पहुंचे हैं लेकिन बापदादा सदा बच्चों को सम्मुख देखते हैं। जो भी सर्विसएबुल बच्चे हैं, एक-एक का नाम क्या लें, जो भी सभी हैं, सभी सहयोगी आत्मायें हैं, सभी बेफिकर बन फखुर में रहना क्योंकि सबका साथी स्वयं बाप है। अच्छा। ओम् शान्ति।

वरदान:

निंदा-स्तुति, जय-पराजय में समान स्थिति रखने वाले बाप समान सम्पन्न व सम्पूर्ण भव

जब आत्मा की सम्पूर्ण व सम्पन्न स्थिति बन जाती है तो निंदा-स्तुति, जय-पराजय, सुख-दु:ख सभी में समानता रहती है। दु:ख में भी सूरत व मस्तक पर दु:ख की लहर के बजाए सुख वा हर्ष की लहर दिखाई दे, निंदा सुनते भी अनुभव हो कि यह निंदा नहीं, सम्पूर्ण स्थिति को परिपक्व करने के लिए यह महिमा योग्य शब्द हैं-ऐसी समानता रहे तब कहेंगे बाप समान। जरा भी वृत्ति में यह न आये कि यह दुश्मन है, गाली देने वाला है और यह महिमा करने वाला है।

स्लोगन:

निरन्तर योग अभ्यास पर अटेन्शन दो तो फर्स्ट डिवीजन में नम्बर मिल जायेगा।

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