24/04/2024
"अग्नि गुलाब"
धूप के विशाल तवे पर तप कर
जब मेरा शरीर
तुम्हारी ममता की शीतलता में
कुछ देर ठहर पाता है
इस दुनिया के सारे सुकून
हवाओं में घुल कर
मेरे दिल के पोर-पोर में
तुम्हारा चेहरा बनकर
खिल उठता है|
बिल्कुल आग की तरह खिलता है
तुम्हारा चेहरा अग्नि गुलाब
लेकिन तपिश नहीं होता उसमें
सूरज की तरह
पल्लवित करता है वह
मेरे सच्चे अरमानों को
इसलिए लौट आता हूँ मैं
तुम्हारी आग की शीतलता में|
हो सकता है मैं
अब तक भस्म हो चुका हूँ
और विलीन हो गया हूँ
तुम्हारी मुस्कान के तूफ़ान में
पर मुझे फिर भी
उसी शीतलता का एहसास है
जिसने मेरा अस्तित्व मिटाया है|
मेरे बाद भी तुम्हारे पास
कई पक्षी उड़ कर आएंगे
उदित होगा फिर एक
तपिश विहीन नया सूरज
तुम फिर खिलना इसी तरह
मेरे अग्नि गुलाब
और देना सबको
शीतलता का एहसास|
(जाहिदुल दीवान)