19/09/2022
पैग़ाम बानी ए दर्सगाह :-
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मेरा पैग़ाम -ए - मोहब्बत उनके वास्ते जो मेरी रग रग में
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पैवस्त हैं !
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मोहतरम अज़ीज़ों ,
मेरे लिए इससे ज़्यादा ख़ुशी की बात और क्या हो सकती है कि आज के दिन ही इस इदारे का संग - ए - बुनियाद रक्खा गया था मगर दूसरी जानिब मेरे लिए ये भी बहुत अफसोस की बात है कि आज आपकी महफिल से ग़ैर हाजिर हूँ तक़रीबन चार बरसों से हम एक तूफान के मुकाबिल शम-ए - इल्म को रौशन किये हुए हैं आने वाला इतिहास इस बात के लिए गवाह रहेगा कि आज़ाद मुल्क कहलाने वाले हिन्दुस्तान में ऐसा भी हुआ था जो कभी जनरल डायर ने किया था कांटों और अंगारों भरे रास्तों पर चले और आज भी हम और हमारे हम सफ़र इस रास्ते पर गामज़न हैं कल गुज़र गया और जैसा भी था आज आ गया ये भी गुज़र जाएगा और फिर एक कल आएगा जो ऐसे आफताब और माहताब को जन्म देगा जो आने वाली नस्लों के लिए नई राहें तय करेगा जिनमें उनकी मंजिल के निशान होगें जब मै AMU में तालीब -ए - इल्म था तब भी बहुत हस्सास और मुतहर्रिक था अक़्लियती किरदार की बहाली का मैं एक छोटा सिपाही था लड़ाई सख्त थी मगर हौसले बुलंद थे बात बहुत दिलचस्प है मगर वो कहानी फिर कभी ।
तब लगता था रास्ता मिल गया है तो मंजिल कहाँ है????????
मन्ज़िल नज़र आ रही है तो रास्ता क्यों दिखाई नहीं देता तब का मेरा एहसास आज भी मेरा तआक़्क़ुब कर रहा है ----------------
तुफ़ान- ए - बला है कहीं गिरदाब मसायब
हस्ती है कि यास का दरिया मेरे आगे
एक धुन है कि चलता ही चला जाता हूँ आज़म
मन्ज़िल की ख़बर मुझको ना रस्ता मेरे आगे
वही धुन जो अब से तक़रीबन 42 साल पहले मेरी हमसफर हुआ करती थी आज भी है मगर उस वख्त कुछ श़राफ़त थी ,कुछ इन्सानियत थी ,कुछ रवादारी थी , कुछ ग़ैरत थी ,और कुछ इन्साफ भी था , मगर अब ??????? ------‐------- फ़ैसला आप पर छोड़ता हूँ ।
अज़ीज़ों जब आप इस तालीम - ओ - तरबीयत गाह की रंगारंग तक़रीबात से लुत्फ अन्दोज़ हो रहे होगें उस वक़्त मेरी पुरनम आंखें और कमज़ोर हाथ आप और आपकी आने वाली नस्लों के रौशन मुस्तक़बिल के लिए इन्शाह अल्लाह दुआ गो होगें हरगिज़ की दिल आज़ार ग़ैर हाज़री के लिए माज़रत ख़्वाह हूँ और आपके बीच ना होकर भी मौजूद हूँ हर सिम्त मेरी आहट और मेरे गुज़र जाने का नर्म - ओ - गर्म एहसास आपको मेरी याद दिलाता रहेगा ------- शुक्रिया
आपसे बहुत क़रीब आपका अपना मोहम्मद आज़म ख़ान.