28/09/2024
भगत सिंह का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में लिखा गया है। उनका जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले (अब पाकिस्तान में) के बंगा गाँव में हुआ था। भगत सिंह ने बहुत ही कम उम्र में भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी, और उन्हें हमेशा भारत के सबसे प्रमुख क्रांतिकारियों में से एक के रूप में याद किया जाएगा।
भगत सिंह का परिवार स्वतंत्रता संग्राम से गहराई से जुड़ा हुआ था। उनके चाचा अजीत सिंह और स्वर्ण सिंह भी स्वतंत्रता सेनानी थे। बचपन से ही भगत सिंह ने अंग्रेजी शासन के अन्याय और अत्याचार को देखा था, और इसका उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। जलियाँवाला बाग हत्याकांड और लाला लाजपत राय पर हुए बर्बर लाठीचार्ज ने उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष की ओर प्रेरित किया।
भगत सिंह को महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन से प्रेरणा मिली, लेकिन जब गांधी जी ने चौरी चौरा कांड के बाद आंदोलन को वापस ले लिया, तो भगत सिंह का विश्वास अहिंसा के रास्ते से हटकर सशस्त्र क्रांति की ओर मुड़ गया। उन्होंने 1924 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) से जुड़कर क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेना शुरू किया। बाद में, इस संगठन का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) कर दिया गया।
भगत सिंह ने समाजवादी विचारधारा को अपनाते हुए अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का मार्ग चुना। उन्होंने यह मानना शुरू किया कि केवल अहिंसा से आजादी नहीं मिल सकती, बल्कि इसके लिए क्रांतिकारी कदम उठाने होंगे। भगत सिंह और उनके साथियों ने अंग्रेजी हुकूमत के प्रतीकात्मक रूप से विरोध करने के लिए 1928 में साइमन कमीशन के विरोध में प्रदर्शन किया, जिसमें लाला लाजपत राय की मृत्यु हो गई।
लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव और चंद्रशेखर आजाद ने ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या कर दी। इसके बाद, भगत सिंह ने 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंका, जिसका उद्देश्य किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं था, बल्कि अंग्रेजी सरकार तक अपने संदेश को पहुँचाना था। बम फेंकने के बाद उन्होंने स्वयं को गिरफ्तार करा दिया और कोर्ट में अपने विचारों को रखा।
भगत सिंह को जेल में रहते हुए अमानवीय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। जेल में रहते हुए भी उन्होंने अन्य कैदियों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार के खिलाफ भूख हड़ताल की। उनका उद्देश्य सिर्फ़ आज़ादी पाना नहीं था, बल्कि एक ऐसे समाज की स्थापना करना था जो शोषणमुक्त हो और जिसमें हर व्यक्ति को समान अधिकार मिले।
23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को अंग्रेजी सरकार ने फांसी दे दी। उनकी शहादत ने पूरे भारत में आक्रोश और राष्ट्रीयता की भावना को और भी प्रबल कर दिया। भगत सिंह की उम्र सिर्फ 23 साल थी जब उन्होंने अपने जीवन का सर्वोच्च बलिदान दिया।
भगत सिंह सिर्फ एक क्रांतिकारी ही नहीं थे, बल्कि एक विचारक भी थे। उन्होंने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से भारतीय युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने और सामाजिक बदलाव की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया। वे नास्तिक थे और उनका मानना था कि धार्मिक विश्वासों को तर्क और विज्ञान के प्रकाश में परखा जाना चाहिए। उनका यह विश्वास था कि स्वतंत्रता सिर्फ अंग्रेजों से छुटकारा पाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से एक नये भारत का निर्माण होना चाहिए।
भगत सिंह की जयंती हमें उनकी महान सोच, साहस और बलिदान की याद दिलाती है। उन्होंने अपने जीवन का सर्वोत्तम समय देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया। उनके विचार और उनके बलिदान आज भी हमें प्रेरणा देते हैं। उनके सपनों का भारत, एक समतामूलक और स्वतंत्र राष्ट्र, आज भी हमारे सामने एक आदर्श के रूप में खड़ा है।
भगत सिंह की विरासत हमें यह सिखाती है कि स्वतंत्रता और समानता के लिए संघर्ष कभी समाप्त नहीं होता। हमें निरंतर उनके आदर्शों को याद रखना चाहिए और उनके बलिदान को व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए।
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