11/10/2022
उज्जैन के महान इतिहास के बारे में कुछ तथ्य है जो सबको सबको ज्ञात होना चाहिए राजा विक्रमादित्य की महानता के बारे में जो हमे पढ़ाया ही नही गया
भारत में चक्रवर्ती सम्राट उन्हें कहा जाता है जिसका शासन संपूर्ण भारत में रहा हों।
ऋषभदेव के पुत्र राजा भरत प्रथम चक्रवर्ती सम्राट थे, जिसके नाम पर इस अजनाभाखंड का नाम भारत पड़ा
परिवर्तित काल में शकुंतला एवम् दुष्यंत के भरत नाम के पुत्र हुए
उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य भी चक्रवर्ती सम्राट थे विक्रमादित्य का नाम विक्रम सेन था , विक्रम वेताल और सिंहासन बत्तीसी की कहानियां महान सम्राट विक्रमादित्य से जुड़ी हुईं है सम्राट विक्रमादित्य गर्दभिल्ल वंश के शासक थे , उनके पिता का नाम गर्द भिल्ल था सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को पराजित किया था ,उनका पराक्रम देखकर उनको महान सम्राट कहा गया उनके नाम की उपाधि कुल 14 भारतीय राजाओं को दी गई
भारतीय इतिहास में "विक्रमादित्य" की उपाधि बाद में कई अन्य राजाओं ने प्राप्त किया था, जिनके बीच गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय और सम्राट
हेमचंद्र विक्रमादित्य (जो कि हेमू के नाम से प्रसिद्ध) वे उल्लेखनीय हैं।
राजा विक्रमादित्य का नाम, 'विक्रम' और 'आदित्य' समास से बना है जिसका अर्थ है 'महानता' 'सूर्य' या 'सूर्य के समान शक्तिशाली'। उन्हें विक्रम या विक्रमार्क (विक्रम + अर्क .) भी ऐसा कहा जाता है (संस्कृत में विक्रम का अर्थ है रवि)।
विक्रमादित्य का परिचय : विक्रम संवत अनुसार आज से 2288 साल पहले विक्रमादित्य थे। नबोवाहन के पुत्र राजा गंधर्वसेन चक्रवर्ती सम्राट भी थे। राजा गंधर्व सेन का एक मंदिर मध्य प्रदेश में सोनकच्छ के आगे गंधर्वपुरी में बना है यह गांव बेहद रहस्यमयी गांव है। उनके पिता को महेंद्रादित्य भी कहा जाता था। उनके और भी नाम थे जैसे गर्द भिल्ल , गादर्व वेश , गंधर्वसेन के पुत्र विक्रमादित्य थे और भर्तृहरि।
विक्रम की मां का नाम था सौम्यदर्शन, जिन्हें वीरमती और मदनरेखा के नाम से भी जाना जाता है ,उनकी एक बहन थी जिसका नाम मैनावती था। उनके भाई भर्तृहरि के अलावा, शंख और अन्य माताओं के पुत्र भी थे।
उनकी पांच पत्नियां थीं, मलयावती, मदनलेखा, पद्मिनी, चेला और चिल्लामहादेवी।
उनके दो पुत्र विक्रमचरित और विनयपाल और दो बेटियां प्रियंगुमंजरी (विद्योत्तमा) और
वसुंधरा थे। उनका गोपीचंद नाम का एक भानजा था। मुख्य मित्रों में भट्टनमात्र का नाम आता है। राज पुरोहित त्रिविक्रम और वसुमित्र थे। मंत्री भट्टी और बहसिंधु थे।
सेनापति थे विक्रमशक्ति और चंद्र ।
कली काल के 3000 वर्ष बीत जाने पर 101 ई.पू. में सम्राट विक्रमादित्य जन्म हुआ।
उन्होंने 100 वर्षों तक शासन किया। -(गीता प्रेस, गोरखपुर प्रेडिक्शन, पेज-245)।
विक्रमादित्य भारत की प्राचीन नगरी उज्जयिनी राजसिंहासन पर विराजमान हुए। विक्रमादित्य अपने ज्ञान, वीरता स और उदारता के प्रसिद्ध थे। अपने लोगों के सम्राट विक्रमादित्य को इतिहास में सबसे लोकप्रिय और न्यायिक राजाओं में से एक माना गया है। कहा जाता है कि मालवा में विक्रमादित्य के भाई भर्तहरी का शासन था। भर्त हरी के शासन के दौरान शको का हमला हुआ भर्तहरी हार गया जब भर्तृहरि ने राज्य छोड़ दिया तब विक्रम सेना ने शासन संभाला और उन्होंने ईशा पूर्व 57 58 में सबसे पहले शकों को शासन क्षेत्र से बाहर खदेड़ दिया इसकी याद में उन्होंने विक्रम संवत की शुरुआत कर अपने राज्य के विस्तार का प्रारंभ किया विक्रमादित्य ने भारत की भूमि को विदेश शासकों से छुटकारा पाने के लिए है अभियान चलाया। कहते हैं उन्होंने अपनी सेना का फिर से गठन किया । उनकी सेना विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना बनी , जो भारत की सभी दिशाओं में अभियान चलाकर विदेशी एवम् अत्याचारी राजाओं से मुक्त कर एक छत्र शासन को स्थापित किया
कल्हण की 'राजतरंगिणी' 14 ई. कु. के अनुसार निकट में आंध्र युधिष्ठिर वंश के राजा
हिरण्य की निःसंतान मृत्यु से वहा अराजकता फेल गई । जिसे देखकर वहां के मंत्रीयो की सलाह से उज्जैन के राजा विक्रमादित्य से मातृगुप्त: को कश्मीर राज्य को संभालने के लिए भेजा गया। नेपाली राजवंश के अनुसार नेपाल के राजा अंशुवर्मन के दौरान (ईसा पूर्व पहली शताब्दी) उज्जैन के राजा विक्रमादित्य का नेपाल आने का ज़िक्र मिलता है।
भारत के राजा विक्रम का संस्कृत, प्राकृत, आधा मगधी, हिंदी, गुजराती, मराठी, बंगला भाषाओं में विवरण में मिलता है ।
उनकी वीरता, उदारता, दया, क्षमा आदि का विवरण भारतीय साहित्य की अनेक कहानियाँ भरी पड़ी हैं । नवरत्न रखने की परंपरा को महान सम्राट विक्रमादित्य द्वारा हुई थी जिसे तुर्की राजा अकबर ने भी अपनाया।
सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों के नाम धन्वंतरी, छपनक, अमरसिंह, शंकु, बेताल भट्ट,घाटखरपार, कालिदास, वाराहमिहिर और वरुचि कहे जाते हैं। इन नवरत्नों में उच्च कोटि के विद्वान, सर्वश्रेष्ठ कवि गणित के विद्वान और विज्ञान विशेषज्ञ आदि शामिल थे।
देश में ऐसे अनेक विद्वान हुए, जो विक्रम संवत को उज्जैन के राजा विक्रमादित्य द्वारा ही प्रवर्तित मानते हैं। इस संवत के प्रवर्तन की पुष्टि ज्योतिर्विदाभरण ग्रंथ
से होती है, जो 3068 कलि अर्थात 34 ईसा पूर्व में लिखा गया था। इसके अनुसार विक्रमादित्य ने 3044 कलि अर्थात 57 ईसा पूर्व विक्रम संवत चलाया। महाराजा विक्रमादित्य का विस्तृत वर्णन भविष्य पुराण और स्कंद पुराण में मिलता है। विक्रमादित्य के बारे में प्राचीन अरब साहित्य विवरण मिलता है। उनका शासन उन दिनों अरब तक फैला हुआ था। वस्तुतः विक्रमादित्य का शासन अरब और मिस्र तक फैला हुआ था और संपूर्ण पृथ्वी के लोग उनके नाम से परिचित थे।
इतिहासकारों के अनुसार उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य का राज्य भारतीय उपमहाद्वीप के अलावा ईरान, इराक और अरब तक फैला हुआ था वहां विक्रमादित्य की अरब विजय का विवरण कवि जरहम किन्तोयी ने अपनी पुस्तक 'सिरे-उल-ओकुल' में किया हैं!. पौराणिक कथाओं और अन्य इतिहास के अनुसार अरब और मिस्र विक्रमादित्य के अधीन थे। तुर्की के इस्तांबुल शहर का प्रसिद्ध पुस्तकालय का सुल्तानिया में एक ऐतिहासिक ग्रंथ है 'सिरे-उल-ओकुल'
उनमें से एक राजा विक्रमादित्य से संबंधिt शिलालेख का उल्लेख है जिसमें यह लिखा है वो लोग बड़े भाग्यशाली हैं,जिनका जन्म राजा विक्रम के शांशन में हुआ उनके राज में जीवन बिताया। वह बहुत दयालु, उदार और कर्तव्यपरायण शासक था, जो सबके कल्याण के बारे में सोचता था।.. उन्होंने अपने पवित्र धर्म को हमारे बीच में फैलाया , अपने देश के सूर्य से भी तेज विद्वानों को इस देश को भेजा ताकि हम शिक्षा प्राप्त कर उज्ज्वल भविष्य प्राप्त कर सके , इन सभी विद्वानों और ज्ञाताओ ने हमें भगवान की उपस्थिति और सत्य के सही मार्ग के बारे में बताकर परोपकार किया। ये सभी विद्वान राजा विक्रमादित्य के निर्देश पर यहां धर्म शिक्षा देने आये थे
अन्य सम्राट जिनका नाम के आगे विक्रमादित्य लगा है :- श्री हर्ष, शूद्रक, हुल, चंद्रगुप्त द्वितीय, शिलादित्य, यशोवर्धन आदि।
वस्तुतः आदित्य शब्द देवताओ से प्रयुक्त है । आदित्य का मतलब सूर्य जो धरती को आलोकित करते रहते है
(परिवर्तित काल में विक्रमादित्य की प्रसिद्धि
के बाद राजाओ को विक्रामदित्य की उपाधि 'देना जाने लगी ) विक्रमादित्य से पहले और बाद में और भी विक्रमादित्य हुए , जिसके चलते भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है।
उज्जैन सम्राट विक्रमादित्य के बाद 300 ई. में समुद्रगुप्त का पुत्र चन्द्रगुप्त द्वितीय अथवा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य हुए
एक विक्रमादित्य द्वितीय 7 वी सदी में हुआ ,विजयादित्य (विक्रमादित्य प्रथम )के पुत्र थे । अपने समय में विक्रमादित्य द्वितीय ने चालुक्य साम्राज्य की शक्ति को अक्षुण्ण बनाये रखा । विक्रमादित्य द्वितीय . के काल में लाट देश (दक्षिण गुजरात) पर अरबों ने आक्रमण किया । विक्रमादित्य की वीरता के कारण अरबों को अपने प्रयासों में सफलता नहीं मिली और यह प्रतापी चालुक्य राजा अपने साम्राज्य की रक्षा करने में सक्षम रहा ।
पल्लव राजा ने पुलकेसन को हराया और मार दिया। उनके पुत्र विक्रमादित्य, जो उनके पिता के समान क्षेत्र के शासक के रूप में सिंहासन पर विराजमान हुए उन्होंने वह फिर से दक्षिण के अपने दुश्मनों के खिलाफ संघर्ष शुरू किया, उसने चालुक्यो के पुराने वैभव को पुन प्राप्त किया । . यहां तक कि उनके परपोते विक्रमादित्य द्वितीय भी एक महान योद्धा था।
753 ई. में विक्रमादित्य और उनके पुत्र का दंती दुर्गा नाम के एक सरदार ने तख्ता पलट कर दिया।
उसने महाराष्ट्र व कर्नाटक में एक और महान साम्राज्य की स्थापना की, जिसे कहा राष्ट्र कूट कहा गया ।विक्रमादित्य द्वितीय के बाद 15वीं शताब्दी में
सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य 'हेमू' बन गया।
सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य के बाद "विक्रमादित्य पंचम" सत्याश्रय कल्याणी के राजसिंहासन पर आरुड हुए । उन्होंने लगभग १००८ ई. में चालुक्य राज्य की गद्दी को संभाला , भोपाल के राजा भोज के काल में यही विक्रामदित्य थेविक्रमदित्य पंचम ने अपने पूर्वजो की नीतियों का अनुसरण करते हुए कई युद्ध लडे उसके समय में मालवा के परमारों के साथ चालुक्यो का पुन संघर्ष हुआ और वकपतिराज मुंज की पराजय व हत्या का प्रतिशोध करने के लिए परमार राजा भोज ने चालुक्य राज्य पर आक्रमण कर उन्हें पराजित किया , लेकिन एक युद्ध में विक्रमादित्य पंचम ने राजा भोज को भी हरा दिया था
शाक्यद्विप से आये आक्रंताओ को ‘’शक’’ कहा गया , उन्होंने समुद्री मार्ग से आकर आक्रमण किया और सम्पूर्ण दक्षिणी भारत पर अधिपत्य कर लिया शक भी सनातन धर्मावलम्बी थे किन्तु क्रमश उत्तर भारत की और बढते गए इसी क्रम में उन्होंने भारतीयों पर अनेक अत्याचार किये , उनकी वंश वृधि भी होती गयी जिसके कारण उनके साम्राज्य का विस्तार होता गया
उनमे शालिवाहन नाम का प्रमुख उल्लेखनीय शाशक था उसने शकसंवत नाम का संवत परवर्तित किया (चलाया)
शको के विस्तारवादी निति में विक्रमादित्य बाधक हुए , उन्हें परस्त कर सम्पूर्ण भारत भारत में एक क्षत्र राज्य स्थापित किया , शक यहाँ की संस्कृति एवं संस्कार में एकाकार हो गए
काल गणना के समय भी विक्रम संवत के साथ साथ शक संवत का उल्लेख होता है , क्योकि दोनों विधि से काल गणना का आधार एक ही है
परिवर्तित काल में मुग़ल एवं अंग्रेज आक्रंताओ के कारण हमारा इतिहास लुप्त सा हो गया , इतिहास पर शोध सर्वथा बंद हो गए
जय महाकाल