Dalveer Singh Degree College Nagla Sundar Shikohabad

17/03/2016
24/02/2016
Agra University Exam Date Sheet 2016 Exam Schedule
24/02/2016

Agra University Exam Date Sheet 2016 Exam Schedule

26/04/2014

''चाची!''

''कौन है बेटा?''

''आ जा...आ जा।''

बूढ़ी बफातिन बकरी को हरा पत्ता और गाय को घास देने के बाद चरखा लेकर छाँव में बैठी गयी। और कपड़ा बुनने के लिए जड़ी भरने लगी। बूढ़ा तूफानी सुबह सबेरे बासी भात, प्याज की मोटी-सी एक गाँठ और दो मिर्चे खाने के बाद कपड़ा बुनने के लिए करघे पर बैठ गया था। घर के अन्दर दो प्रकार की आवा$जें गूँज रही थीं, एक तो करघे की खटखट और दूसरा चरखे की चरख चूँ-बफातिन के बुलाने पर चन्दर घर के अन्दर आ गया और आते ही बोला-

''चाची दिनभर इस चर-चों से तेरा मन नहीं घबराता, उस पर चाचा अलग दिन भर ठक-ठक करता रहता है। इसका भी न तो हाथ दुखता है न जी घबराता है।''

''मन घबराये बेटा तो काम कैसे चले। हम दोनों बूढ़े पुरनिया खाएँ क्या? और सब कपड़ा भी कहाँ बुनता है। महीने भर में एक बंडल तो सूत मिलता है। जब तेरा चाचा जवान था और सूत भी मिलता था तो तेरा चाचा दो दिन में एक थान उतार लेता था। अब तो महीना भर ढक-ढक करने पर भी कुछ नहीं बुनता।''

''ठीक हुआ, चाची जो सूत कम हो गया। भगवान भी देखता है कि बूढ़ा-बूढ़ी अधिक काम नहीं कर सकते इसलिए सूत कम कर दिया...हा हा हा हा हा...''

चन्दर अपनी बात खत्म करके ज़ोर-ज़ोर से हँसा। बात ख़त्म करके ज़ोर से कहकहा लगाना उसकी आदत हो गयी थी। जब गाँव में रहता तो दिन भर में एक बार हर एक के घर ज़रूर जाता। थोड़ी देर बैठता, घरवालों से बातें करता और चला जाता। और अगर किसी को कोई काम पड़ जाता तो उसका इन्त$जाम कर देता। मगर अब तो गाँव में रहता बहुत कम था। $ज्यादातर बाहर ही रहता था। एक गाँव से दूसरे गाँव में और दूसरे से तीसरे में। उसकी साइकिल थी और वह...कभी तो हफ्तों वापस ही नहीं आता था। आज एक गाँव में किसानों की सभा है तो कल दूसरे में...आसपास के सारे गाँवों के किसानों पर उसका अधिक असर था और जमींदार उसे नफरत करते थे, खास तौर पर बलराम सिंह को तो उससे दुश्मनी ही थी।

छह वर्ष पहले उसने मैट्रिक की परीक्षा दी थी। उसे यकीन था कि वह जरूर सफल होगा। उसका इरादा था कि वह कॉलेज में दाखिला लेगा। और बी.ए. करके वकालत करेगा और नाम पैदा करेगा। यह उसका आत्म विश्वास था पर उसका पिता एक ग़रीब किसान था। सिर्फ कुछ बीघे खेत ही इसके पास थे। पर हिम्मतवाला आदमी था। खुद दिक्कत सह कर अपने सारे बच्चों को पढ़ा रहा था। चन्दर से छोटे दो भाई थे जो छोटी कक्षाओं में पढ़ रहे थे। चन्दर ने अपना भविष्य सोच लिया था और उसे यकीन था कि जो कुछ वह सोच चुका है उसमें वह ज़रूर सफल होगा। पर अचानक एक ऐसी घटना घटी कि उसकी पूरी ज़िन्दगी ही बदल गयी।

बात यह हुई कि परीक्षा देकर वह शहर ही में रह गया। एक तो अपना परीक्षाफल जानने के लिए और दूसरे वह अपना कुछ इन्त$जाम भी करना चाहता था। उसका बाप एक गरीब किसान था और कॉलेज का खर्च उसके बस की बात नहीं थी। उसके दो भाई सातवीं कक्षा से आगे न बढ़ पाये थे। एक पाठशाला में गुरु का काम करता था और दूसरा बाप के साथ खेती-बाड़ी। उससे छोटा भाई हाईस्कूल में नवीं क्लास में पढ़ रहा था। और सब से छोटा सातवीं क्लास में। चन्दर जानता था कि कितनी दिक्कत में सब भाई पढ़ रहे हैं। दो साल पहले उसकी बहन का विवाह हुआ था। और विवाह में उसके पिता को दो जगह खेत बन्धक रखना पड़ा था। अगर शहर में रह कर कोई इन्त$जाम न करता तो कॉलेज कैसे ज्वायन करता। उसका दोस्त नरसिंह, जो बड़ा जोशीला था और पढ़ाई के दौरान ही दो बार जेल जा चुका था, इसी वजह उसने चन्दर के साथ परीक्षा दी थी। नहीं तो वह कभी का बी.ए. कर गया होता। वह बराबर चन्दर को भी किसानों, मजदूरों और विद्यार्थियों की सरगर्मियों में सम्मिलित करना चाहता था, पर चन्दर चाहता था कि सबसे पहले वह पढ़ाई ख़त्म कर ले फिर कोई काम करे। नरसिह से उसकी बराबर बहस होती पर निचोड़ एक ही रहा, यानी चन्दर टस से मस न हुआ।

बात ऐसी न थी कि चन्दर के दिल में देश-विदेश के किसानों और मजदूरों और गरीबों का दर्द न था। जब काँगे्रसी मन्त्रियों ने इस्तीफा दिया था और दोबारा जेल में भर दिए गये थे, तो उसका खून खौलने लगा था। पर वह हाथ मसल कर रह गया। उसके एक मास्टर ने एक बात कही थी जो उसके दिल में जम गयी थी। मास्टर ने कहा था, ''तुम पढ़-लिख कर जितना अच्छा काम कर सकते हो उतना अज्ञानी रह कर नहीं। तुम जितना पढ़ कर जो काम करोगे उतना ही अच्छा रोगे।'' यह बात चन्दर को बहुत अच्छी लगी थी, तभी उसने सोचा था कि पहले मैं अपनी पढ़ाई समाप्त कर लूँ फिर कोई काम करूँगा...वह अपने इस फ़ैसले पर दृढ़ रहा।

उन्हीं दिनों नरसिंह के घर पर एक आदमी और आया। दुबला पतला-सा, बहुत मोटे शीशे की ऐनक लगाये। उसके बाल हमेशा उलझे रहते थे। वह बहुत सिगरेट पीता था। नरसिंह ने उस बताया कि उसका नाम परेश है। और यह नरसिंह का रिश्तेदार भी था। कुछ दिनों रह कर चला जाएगा। परेश अजीब आदमी था। कहीं आता-जाता नहीं था। दिनभर कमरे में बैठा अख़बार पढ़ता, सिगरेट पीता था, कुछ लिखा करता या फिर वह और नरसिंह अकेले बैठ कर न जाने क्या बातें करते। नरसिंह के पिता बहुत धन छोड़ कर मरे थे। घर में माँ थी और एक छोटा भाई, जिसे चन्दर पढ़ाया करता था।

एक दिन परेश ने चन्दर से पूछा-

''आगे तुम क्या करोगे?''

और चन्दर ने उत्तर दिया था-

''वकालत पढ़ूँगा।''

फिर परेश ने मुँह बनाकर कहा था, ''वकालत पढ़ कर क्यो करोगे, भारत में वकील इतने हैं कि उनकी गिनती मुश्किल है।''

फिर चन्दर ने उससे सवाल किया था-

''तो फिर क्या करूँ?''

और परेश ने उसे जवाब दिया था-

''अभी देश को हजारों नौजवानों की ज़रूरत है। लड़ाई छिड़ चुकी है। अभी तक तो भारत प्रभावित नहीं हुआ है। मगर अँग्रेज़ दबाव में आ गये हैं। यही समय है कि हम अपना देश आज़ाद करा लें।''

और चन्दर ने थोड़ा सोचने के बाद जवाब दिया था-

''पर मेरे घरवालों को भी मेर$जी जरूरत है। मेरे पिता बूढ़े हैं ज़मीन कम है, छोटे भाइयों को पढ़ाना भी है...?''

और परेश ने अजीब-सा मुँह बनाकर कहा था-

''ठीक ही है।''

फिर परेश ने उससे कभी कोई सवाल नहीं किया, और न चन्दर ने परेश से कोई बात पूछी। वह बराबर इस चिन्ता में लगा रहा कि कॉलेज की किताबों का इन्त$जाम कैसे करे?

एक रात तीनों खाना खाकर सो रहे थे। सुबह होने से पहले घर के चारों तरफ शोर हुआ और किसी ने दरवा$जे की $जंजीर खटखटायी। परेश उठ कर भागा। वह दीवार फाँद कर भाग जाना चाहता था। पर उसके पाँव फिसल गये और वह गिर पड़ा। नरसिंह ने दरवोजा खोल दिया और बहुत से सिपाही और पुलिस के अफ़सर घुस आये और तीनों गिर$फ्तार कर लिये गये। थाना जाकर चन्दर को मालूम हुआ कि परेश मशहूर मजदूर लीडर है। इसका नाम भी परेश नहीं 'नासिर' है। और वह बहुत दिनों से छिपा-छिपा फिर रहा था। चन्दर बहुत गुस्से में था, वह डेढ़ महीने तक हर रोज एक मुसलमान के साथ बैठकर खाना खाता रहा। उसकी जाति पर धब्बा आ गया। फिर तीनों को सजा सुना दी गयी। नासिर को तीन साल, चन्दर और नरसिंह को दो-दो साल।

चन्दर, नासिर के साथ एक साल तक जेल में रहा। इतने दिनों में चन्दर का दिलो दिमाग दोनों बदल गये और उसे अपने जेल जाने पर कोई अफ़सोस न हुआ। फिर जब वह जेल से बाहर निकला तो उसका मन बिलकुल साफ हो चुका था। उसके सामने एक राह थी। पर उसे जेल के दरवा$जे पर ही एक बुरी ख़बर मिली-वह यह कि कुछ दिन पहले ही उसकी बहन के पति को पुलिस ने एक पुल तोड़ते समय गोली मार दी और वह वहीं मर गया। इस बात से वह बड़ा आहत हुआ। उसकी बहन का पति अगर ज़िन्दा होता तो वह इसकी बहुत मदद कर सकता था। पर वह अब मर चुका था। जब चन्दर घर आया तो उसका पिता शोकग्रस्त था। दामाद की मृत्यु और एक होनहार बेटे का इस तरह बिगड़ जाना, फिर तो उन्हें उम्मीद थी कि चन्दर कॉलेज में नाम लिखवाएगा। पर चन्दर ने पढऩे का नाम भी न लिया और गाँव में रहकर किसानों के साथ काम करने लगा। पहले तो चन्दर का पिता खुश नहीं था पर थोड़े ही दिनों में चन्दर ने अपने पिता को भी अपने ही रंग में रंग लिया और अब चन्दर ही नहीं, उसका सारा घर किसान सभा के जोशीले कार्यकत्र्ता थे, $खास तौर पर उसकी विधवा बहन 'डोलनी।'

''चाची बेटों ने पैसे कब से नहीं भेजे?''

चन्दर के हँसने पर बफातिर बोली-

''तीन महीने से बेटा। काम न करें तो पेट कैसे भरे। तोरे भाई सब को अकल थोड़े है। सब अपनी जोरू को पहचानते हैं। हम दोनों बूढ़े पुरनिया की कोई खोज-खबर ना ले है। सारी मेहनत अकारथ बेटा।''

चन्दर फिर हँसा और बोला-

''चाची तो थोड़ी-सी बात पर सबको बुरा कहने लगती है। सुना है कि शोबराती भाई तो खूब कमाता है। कलकत्ता में उसकी बीड़ी की दुकान खूब चलती है, वह कुछ नहीं भेजता?''

''सुअर, हरामी बेटा, एक आधी भी तो ना, सब जोय को देता है। ससुराल में खेत और ज़मीन खरीदता है। पक्का घर बनाइस है। ऐंहाँ खरीदेगा तो हम लोग न खा जाएँगे। वोंहाँ तो उसक जोरू बेटी के काम आएगा। हम लोग तो गैर हैं।''

''और चाची बफाती भाई भी तो बहुत कमाता है। वह भी कुछ नहीं भेजता?''

''कमाता होगा। सुने तो हम भी, मगर न कभी खत भेजता और न अपने आता है। क्या कहें बेटा, तीनों ककड़ी तीनों कानी, कोई पूछे है भला हम लोग को...तो सब जियो बेटा। कोई खेती-बाड़ी की भी फिकर नहीं करता। तेरा बात न रहे तो हम लोगों का जीना भारी हो जाएे। वही सब को देता है बेचारा।''

''चाची बात यह है कि सब जानते ही हैं कि दिन भर तुम दोनों काम करते हो। पैसे की आवश्यकता ही क्या है। फिर खेती-बाड़ी भी है। इसलिए भी कुछ मिल ही जाता है। चाची...सच मान, काम करना छोड़ दे...फिर देख सब पैसा भेजते हैं कि नहीं-हा हा हा हा...।''

''नाही बेटा, ओ सब जोरू का हो के रह गया है। हम सब को काहे को भेजेगा?''

चन्दर बोल ही रहा था कि एक मुर्गी हड़बड़ा कर चन्दर के सिर से होकर गुजर गयी। चन्दर भी चौंक कर खड़ा हो गया और बुढिय़ा बड़बड़ाने लगी, ''मुर्गी निगोड़ी गन्दी...।''

''कोई बात नहीं चाची। मुर्गी का मांस कैसा होता है चाची, बड़ा स्वाद देता है...।''

''कौन है शोबराती की माँ।''

बूढ़े तूफानी मियाँ की आवाज़ आयी। फिर कुछ पलों के लिए दोनों हाथ कमर पर रखे हुए बाहर निकले। चन्दर देखते ही खड़ा होकर बोला-

''सलाम चाचा।''

''जीते रहे बेटा, चन्दर, अरे हम तो तुम्हारे घर जाने को थे। अब छटाई-बटाई का इन्तजाम हो जाना चाहिए। फसल तैयार हो रही है। हमसे क्या होगा। इस साल तेरा बाप खड़ा होकर घर की मरम्मत न करा देता, तो हम दोनों तो पानी में भीग-भीग कर ही मर जाते।''

''नहीं चाचा, ऐसा भी कभी हो सकता है। आख़िर हम लोग किस दिन के लिए हैं।'' तू$फानी मियाँ जानते थे कि चन्दर जब घर में रहता है एक बार ज़रूर आता है। फिर भी सवाल कर ही बैठे-

''कैसे आना हुआ इतनी सवेरे बेटा?''

तूफानी मियाँ गाँव में सबसे बूढ़े आदमी थे और पुराने ढंग के पढ़े-लिखे। बचपन में पाँच वर्ष तक मौलवी साहब से गाँव ही में उर्दू-फारसी पढ़ते रहे थे। गाँव की मस्जिद में अजान देते और नमाज पढ़ाते थे। और शायद पाँचों वक्त कायदे से नमाज पढ़ाने वाले और पढऩे वाले अकेले आदमी थे। इनका एक विचार था कि जब भी कोई इनसे मिलने आता तो केवल राय लेने या इनके ज्ञान का $फायदा उठाने के लिए...जिसके लिए वह हर वक्त तैयार रहते थे। तूफानी मियाँ के सवाल पर चन्दर थोड़ा गड़बड़ाया पर चुप रहने का वक्त भी न था, वह बोला-

''चाचा बाबूजी ने एक बात पूछने को भेजा है।''

''हाँ हाँ, कहो क्या बात है। शोबराती की माँ हुक्का तो देना भर के। हाँ बेटा, बोलो। चन्दर तेरा बाप भी अभी तक लडक़ा है। नाती-पोतों वाला हुआ पर जहाँ कोई बात हुई तो तू$फानी भाई। हा-हा-पर है तो मेरे सामने लडक़ा ही। रघुबर की उम्र की क्या होगी। यही पचास, पचपन...बस...।''

तूफानी मियाँ ने अपनी कमर सीधी की और बोले-

''हाँ तो क्या बात है?''

चन्दर ने तूफानी मियाँ के सन्तुष्ट चेहरे पर नज़र डाली। कितना सन्तुष्ट है यह बूढ़ा। आज भी सत्तर-पछत्तर साल की उम्र में भारत में साँस ले रहा है। फिर चन्दर बोला-

''चाचा थोड़ा धीरे बोलो, कोई आते-आते हमारी बात न सुन ले।''

''कोई सुनकर क्या कर लेगा?''

''नहीं चाचा बात ही ऐसी है। एक ज़रूरी बात पूछने को भेजा है बाबूजी ने।''

''अरे ऐसी क्या बात है?''

तूफानी मियाँ के चेहरे पर लकीरें खिंचने लगीं। उन फैली हुई लकीरों को चन्दर ने देख लिया और वह दिलासा देने के अन्दाज में बोला-

''घबराने की कोई बात नहीं चाचा, बाबूजी ने पूछने को कहा है, न जाने क्यूँ?''

''हाँ क्या बात है?''

चन्दर ने बात उस अन्दाज़ में कही जैसे इसका कोई महत्व ही न हो-

''चाचा शोबराती भाई के घर में कितने मुसलमान हैं?''

''क्यों क्या बात है! होंगे कोई तीस घर...।''

''और बफाती भाई के ससुराल में?''

''यही कोई चालीस-पचास घर।''

''और रमजानी भाई के ससुराल में?''

''कोई तीन सौ घर!''

''चाचा हैं तो सब मजबूत ना?''

''हाँ...हाँ...पठान हैं, जमींदार हैं।''

''तो बस ठीक है।''

''बात क्या है।'' तूफानी मियाँ ने घबरा कर पूछा।

''हम कुछ नहीं जानते चाचा, बाबूजी ने कहा था कि पूछ आ...और जहाँ अधिक मुसलमान रहते हैं वहीं अपने चाचा और चाची को पहुँचा आ...।'' ''काहे? आखिर कोई बात तो होगी?''

चन्दर ने गर्दन झुका ली। जैसे उसने चोरी की हो और पकड़ा गया हो। उसकी गर्दन फिर नहीं उठी। बफातिन हुक्का भर के लायी और तूफानी मियाँ गुडग़ड़ाने लगे। फिर बफातिन ने पूछा-

''क्या सोच रहा है बेटा?''

चन्दर ने सिर उठाया और हँसता चेहरा बना कर बोला-

''चाची तेरा धान कटवाना है। फिर ये देख खम्भा भी ख़राब हो गया है। इसे बदलवाना है। तुझे और चाचा को इदन दीदी के घर पहुँचाना है। इदन दीदी ने सबको पर्व पर बुलाया है।''

तूफानी मियाँ गहरी सोच में पड़ गये। बात उनकी समझ में आयी कि अब केवल कुछ दिन ही पर्व को रह गये हैं। तो वो बेटी के यहाँ जाएँ।

''आखिर क्यूँ...।'' बफातिन बोली, ''सालभर के पर्व में अपना घर छोड़ कर कोई बेटी के यहाँ जाता है?''

मगर तूफानी मियाँ के दिमाग में बात आ गयी। चार दिन बकरईद को बाकी थे। शायद इस वर्ष कुछ हंगामे का डर हो। मगर उस गाँव में तो कभी कुछ न हुआ था, फिर भी बात कुछ जरूर थी। वे बोले-

''काहे बेटा-इस साल पर्व में कुछ डर है क्या?''

''हाँ चाचा।'' चन्दर की गर्दन फिर झुक गयी। तूफानी मियाँ भी सोच में पड़ गये। अगर कोई बात न होती तो कभी भी रघुबर गाँव से जाने को न कहता। फिर उन्हें याद आया कि दो दिन पहले ही अली बख्श आकर उनसे कह गया था कि वो अपने बच्चों को लेकर कलकत्ता जा रहा है। फिर उन्हें गाँव में एक नई बात भी नज़र आयी। मगर उस पर इन लोगों ने इतना ध्यान नहीं दिया था। पहले लोग बहुत रात गये तक रामायण पढ़ते रहते या कीर्तन करते रहते थे। मगर इधर कुछ दिनों से 'बजरंग बली की जय', 'महावीर की जय' पुकार रहे थे। 'बजरंग बली' जीवन में पहली बार इन लोगों ने इसी वर्ष सुना था। और वह बोले-

''चन्दर ये रात को लोग, 'बजरंग बली की जय' क्यों पुकारते हैं।''

''चाचा इन्हीं लोगों से तो डर है। यही सब हैं गाँव के कुछ लोग। बदमाशी करने पर तुले हुए हैं।''

तूफानी मियाँ फिर बोले-''कुछ नहीं होगा। कुछ नहीं होगा। हमारे गाँव में आज तक कोई बात नहीं हुई। डरने की कोई बात नहीं है।''

''चाचा जमाना बदल चुका है। पुरानी बातें भूल जाओ, अब चलने को तैयार हो जाओ।''

''अपने गाँव के लोग न बिगड़े। फिर कुछ डर नहीं।''

''चाचा मुश्किल तो यही है।''

अभी चन्दर की बात खत्म भी न हुई थी कि रमजानी बीवी-बच्चों के साथ आँगन में आ खड़ा हुआ। तीनों बच्चे दो और आठ साल के बीच के। दोनों बड़ी लड़कियाँ आते ही दादी के पास चली गयीं। छोटा बच्चा माँ की गोद में ही रहा। रमजानी की पत्नी आते ही सास के पास बैठ कर रोने लगी।

''भइया सब लुट गया।''

चन्दर उठ कर खड़ा हो गया और बोला-''कैसे आ गये रमजानी भाई। कोई खबर तो आने की न थी।''

''क्या बताएँ चन्दर, मुसीबत के मारे आये हैं। यहाँ का क्या हाल है?''

चन्दर बोला-

''हम भी तो सुनें बात क्या है?

''क्या बताएँ चन्दर, वहाँ के सारे हिन्दू बिगड़ गये हैं। मुसलमानों को मार डालते हैं। घर लूट कर, फिर आग लगा देते हैं। कोई राई-दुहाई नहीं, न थाना, न पुलिस-बस हर तरफ यही हो रहा है। सब मुसलमानों को मार रहे हैं और कहते हैं गाँधी जी का हुक्म है। सरकार का हुक्म है। मुसलमान को मार डालो। बहुत से लोग मारे गये चन्दर। हिन्दू भी मरे-मगर मुसलमान बहुत अधिक-औरत भी बच्चे भी...ओह...।''

चन्दर ने घबराकर पूछा-''तुम सब तो अच्छे रहे ना।''

''हाँ बस किसी तरह से बच गये। कुल छ: घर तो मुसलमान थे ही। इसमें भी बहुत से आदमी कलकत्ते में रहते हैं। गाँव में औरत और बच्चे...और सब तो हिन्दू ही हैं। वहाँ कभी कोई बात नहीं थी चन्दर। पर राजू तेली ने सब बदमाशी की। उसी ने सबको बहकाया। कहता था, नोआखाली का बदला लो। मुसलमानों को मार डालो। पहले तो कोई भी उसके साथ न हुआ, फिर एक-दो उसके साथ हो गये। पर गाँव के और दूसरे लोग हमें दिलासा देते रहे। कल शाम को जाकर वह बहुत से आदमी बुला लाया, सभा हुई और गाँव के सारे लोग बिगड़ गये। हम लोगों को तो नत्थू बेचारा रातों रात भगा लाया। अब यहाँ पहुँच रहे हैं। रास्ते में दरगाही मिला था, वह किसी तरह जान बचा कर भागा, कह रहा था सब मारे गये, कोई भी नहीं बचा, बूढ़े, बच्चे, जवान, औरतें कोई भी...सारे घरों में आग लगा दी गयी। यही हाल हर जगह का है। हम लोग दस दिन तक गाँव से बाहर नहीं निकले थे।''

चन्दर ने लम्बी साँस ली और बोला-''अच्छा हुआ रमजानी भाई! तुम आ गये। हम चाचा से यही बात कर रहे थे, यहाँ भी गाँव का रंग-ढंग अच्छा नज़र नहीं आता। चमारी, बुधन, लोटन और रामदीन बदमाशी पर आतुर हैं। सच पूछो तो सबका माथा फिर गया है। किसी का दिल साफ नहीं रहा। चमारी कह रहा था, मुसलमान पाकिस्तान माँगते हैं। इनको कब्रिस्तान पहुँचा दो। हमने कहा कि भाई हमारे गाँव के मुसलमानों ने तो काँगे्रस को वोट दिया है। ये सब तो पाकिस्तान के विरुद्ध हैं। तो वह बदमाश बोला-बला से, हैं तो मुसलमान और मुसलमान को जीवित नहीं छोड़ सकते। बाबूजी ने उसे बुलाकर डाँटा-फटकारा, हम सबने भी समझाया-बुझाया और हमारी साथी भी आये और बात खत्म हो गयी थी। मगर कल शाम को मालूम हुआ कि चमारी को बलराम सिंह ललकार रहा है। उसका तो यह कहना है कि जो हिन्दू, मुसलमानों को बचाने का प्रयत्न करे, उसे भी खत्म कर दो। यानी हम लोगों को भी मार जाएे। इसमें उसकी बड़ी चाल है। हमें मालूम है कि बिहार भर में जमींदार बदमाशी पर आतुर हैं जिससे सरकार इसी झगड़े में उलझी रहे और जमींदारी न उठ सके। इसमें बड़ी चाल है जमीदारों की। पर हम लोग अनपढ़ हैं समझते ही नहीं। पर घबराने की कोई बात नहीं है। बाबूजी ने सबको कह दिया है-मुसलमानों पर हाथ उठाने से पहले हमसे लडऩा होगा। गाँव के आधे लोग तो खुल्लमखुल्ला हम लोगों के साथ हैं। और कुछ लोग चुप हैं। उन लोगों पर भरोसा नहीं। आज सुबह ही मालूम हुआ है कि चमारी, बुधन और रामदीन दूसरे गाँवों के हिन्दुओं को बुलाने गये हैं। अब जमाना बदला हुआ है। लूट की लालसा में बहुत से लोग इक_े हो जाएँगे। इसलिए हम लोगों ने सोचा है कि आज रात को सब लोगों को इदन दीदी के घर पहुँचा दें।...क्या राय है तुम्हारी?''

रमजानी सोच में पड़ गया। फिर वह यहाँ क्यों आया। किसी ऐसे गाँव में चला जाता जहाँ मुसलमान अधिक थे। यहाँ तो कुल दस-बारह घर ही हैं। और वह भी गरीब, सब मेहनत-मजदूरी करने के लिए शहर में रहते हैं। कुल पाँच-सात आदमी, फिर बच्चे और औरतें। अगर कोई बात हो गयी तो कितनी देर सामना किया जा सकता है। और चन्दर आदि का भी क्या भरोसा, है तो यह भी हिन्दू ही। हालात को समझ कर वो उदास हो गया। इसे पूरा विश्वास हो गया कि हमला होगा ही। रास्ते में आते वक्त दुखो चमार से मुलाकात हुई थी, इसने खुशी-खुशी सलाम किया था। ''सलाम दुखो चाचा।'' पर दुखो ने उसे कोई उत्तर नहीं दिया, बल्कि विषभरी निगाहों से उसे देखा था।

रमजानी को परेशान देखकर चन्दर ने उसे दिलासा दिया-

''रमजानी भाई, घबराने की कोई बात नहीं, हम लोग घर में बारह जन हैं। पहले हम लोग मर जाएँगे तब ही कोई तुमको छू सकता है। डरने की कोई बात नहीं, चेतन को बाबूजी ने थाने भेजा है कि जाकर सूचना कर दे। वह साइकिल पर गया है फिर हीरामन चाचा और उनके सब लडक़े, दुखो दुसाध के घर के सारे लोग, और भी बहुत से लोग तैयार हैं। कुछ भी हो जाएे मगर अपने जीते जी गाँव में कुछ भी होने न देंगे।''

रमजानी ने चन्दर को देखा। उसके चेहरे पर भी परेशानी की लकीरें थीं। उसका मन चाहा कि चन्दर को छाती से लगा कर खूब रोये। इतनी जोर-जोर से रोये कि आँगन में इक_े होकर रोने और शोर मचाने वाली औरतों की आवाज़, उसकी आवाज़ में डूब जाएे। एक ये भी हिन्दू हैं। इसके बाप, भाई भी हिन्दू हैं। इसके साथी भी हिन्दू हैं।...और हिन्दू रामदीन महतो भी है। सीताराम भी हैं जो खुलेआम कहते हैं मुसलमानों को मार डालो। घर लूट लो। आग लगा दो। औरतों की इज्जत लूट लो। सबको हिन्दू बना डालो। और हिन्दू भैरव भी हैं, लक्ष्मण भी हैं और दीना भी जो अन्त तक ढाढ़स बँधाते रहे, पर बाद में बदल गये। ये लोग भी हिन्दू हैं जो मुसलमानों को बचाने के लिए अपनी जान तक देने को तैयार हैं। और हिन्दू वो लोग भी हैं जो औरतों और बच्चों को भी मारने से नहीं शरमाते। पर फिर भी उसके उदास दिल में उम्मीद की कोई किरण न फूटी। कौन जाने हैं तो यह लोग भी हिन्दू ही। भैरव, लक्ष्मण, दीना भी तो ऐसी ही बातें बनाते हैं। वह नत्थू ने अपना धर्म निभा दिया।

चन्दर ने कहा, ''अच्छा मैं चलता हूँ, सब लोग चलने को तैयार हो जाओ, जल्दी, जल्दी। समय बहुत कम है। मैं जाकर और इन्तजाम करता हूँ।''

तूफानी मियाँ अब तक गहरे सोच में थे। अब तक कुछ न बोले थे। सारे आँगन में गाँव की मुसलमान औरतें और बच्चे भरे हुए थे। और मेले जैसा समा हो बच्चा था। वह कमर पर हाथ रखकर उठे और बोले-

''जाओ सब अपने-अपने घर। घबराने की कोई बात नहीं। अल्लाह सबसे बड़ी ताकत है। वही सबका मालिक है। वही जिलाता है, वही मारता है। आदमी कुछ नहीं कर सकता और हमारे गाँव में कभी कुछ नहीं हुआ और कभी कुछ नहीं होगा।''

चन्दर ने एक कदम आगे बढ़ाया चलने की तैयारी में फिर रुककर बोला, ''रमजानी भाई! सब तैयारी कर लो। दिल हारने की कोई बात नहीं है।''

फिर वह दूसरों से बोला-''जाओ सब अपने-अपने घर और जरूरी वस्तुएँ एक जगह इक_ी कर लो।''

तूफानी मियाँ के कहने को तो कह दिया कि कोई बात नहीं पर वह खुद घबराये हुए थे। अब इन्हें अपने अलावा रमजानी और उसके बच्चों की भी चिन्ता थी। इनके कान में पहले ही भनक पहुँच चुकी थी। मगर वो बूढ़े थे, कर भी क्या सकते थे।

अभी चन्दर दो ही कदम आगे बढ़ा था कि उसकी बहन डोलनी चीखती हुई आयी।

''चन्दर जल्दी कर, बाबूजी कह रहे हैं, सब मुसलमानों को अपने घर ले चल, हीरामन, सहाय और सबको पुकार ले, जल्दी कर।''

डोलनी पागलों जैसी हो रही थी। चन्दर उसका मुँह तकने लगा।

''मुँह क्या देखता है। ले चल सबको घर। समय नहीं रहा अब। जयकारे की आवा$जें नहीं सुनता। चलो सब जल्दी करो। बाबूजी, भइया और सब लोग लाठी, भाला लिए खड़े हैं। जल्दी-करो-और देखो हीरामन चाचा, बुधन चाचा, सहाय भइया और दुखो के घर के लोगों के सिवा किसी को मत घर की ओट आने देना। सब हम लोगों के दुश्मन हो रहे हैंं। हे भगवान!''

और वह पागलों की तरह धक्का देकर मुसलमान औरतों को घर से निकलाने लगी-''जाओ, सब जल्दी करो, मेरे घर में, बाबूजी वहीं खड़े हैं। जल्दी करो...।''

वह जल्दी से निकल कर दूसरे घर में घुस गयी। वह बिलकुल दीवानी हो रही थी। रमजानी और चन्दर ने जल्दी-जल्दी सबको घसीटा और चन्दर के घर भेजा। बफातिन और उसकी बहू सामान इक_ा करने लगीं। पर चन्दर ने सबको डाँटा। वह एक घंटा पहले वाला चन्दर नहीं रहा था। धक्का देकर बाहर निकाल कर बोला-

''जाओ जल्दी घर पर।''

जब वह दरवाजे से बाहर निकला तो देखा कि उसका छोटा भाई, महावीर और हीरामन का बेटा शामू भाला लिये खड़े हैं। वह औरतों के दो तरफ हो गये। चन्दर ने इन लोगों को भेजा और दूसरी तरफ बढ़ा कि उसके कान में आवाज़ आयी ''जय बजरंग बली'', और जैसे उसे बिजली घेर गयी। और उसने देखा कि सारे मुसलमान औरतें, बच्चे, मर्द उसके धर की तरफ भागे जा रहे हैं।

फिर भी वह सीधा अपने घर की ओर भागा और सबको पुकारता गया-''जल्दी करो-जल्दी।''

और जब वह अपने दरवाजे पर पहुँचा तो उसे मालूम हुआ कि दंगाई बहुत बड़ी संख्या म

26/04/2014

सफर में
मनोज कुमार पांडेय

सफर में हूँ। दिन किस तरह गुजर गया पता ही नहीं चला। दिन भर ताश का खेल जमा। बीच बीच में चाय और सिगरेट चलती रही। मेरे पास सिगरेट था और सुजॉय दा की थर्मस में चाय। दोपहर के समय जब कई लोग सो रहे थे, मैने 'जूलियस फूचिक' की मशहूर किताब 'फाँसी के तख्ते से' पढ़ी। एक स्तब्ध कर देने वाली किताब। उस हर युवा को जो व्यवस्था से लड़ते हुये दुनिया को बदलने का सपना लेकर जी रहा है यह किताब जरूर पढ़नी चाहिये।

शाम चार बजे एक आदमी मेरा जूता और नकवी की चप्पल लेकर चलती ट्रेन से नीचे कूद गया, हम लोगों के सामने ही। ओह, कितने खतरनाक तरीके से कूदा था वो। उसे कितनी चोट लग सकती थी। उसकी जान जा सकती थी। बाकी लोग उसे कोस रहे हैं मगर मैं कुछ भी सोच-समझ नहीं पा रहा हूँ। मेरा सीना धड़-धड़ कर रहा है। लग रहा है जैसे मैं भी उस आदमी के साथ नीचे कूद गया हूँ। आखिर वो कौन सी स्थितियाँ हैं जिनके चलते एक 40-42 साल का आदमी चलती ट्रेन से एक मामूली जूते के लिए कूद जाता है, उसकी या उसके जैसे बहुत सारे लोगों की स्थितियों का जिम्मेदार कौन है? जो भी हो अपना जूता मैं उस आदमी से वसूल के रहूँगा। कैसे? अभी क्यों बताऊँ, पहले जूता तो वापस मिल जाने दो भाई। हाँ मेरे साथ एक नई बात हुई आज। मुझे उस आदमी पर बिलकुल भी गुस्सा नहीं आया। पता नहीं क्यों, पर ऐसा मेरे साथ पहले कभी नहीं हुआ था
(28.11.2000 - ट्रेन में - रात 11.30 बजे)

अभी-अभी सोकर उठा हूँ। शायद और सोता मगर एक बेहद अजीब सपने ने जगा दिया। सपने में मैने देखा कि 'स्वदेश दीपक के नाटक 'कोर्टमार्शल' के 'रामचंदर' ने फैसला सुनाये जाने के बाद बचाव वकील कै. विकाश राय को गोली मार दी। गोली मारने के पहले रामचंदर ने चीख-चीख कर विकाश राय के ऊपर अपना सबसे बड़ा दुश्मन होने का आरोप लगाया और कहा कि कपूर या वर्मा जैसे लोग कम खतरनाक हैं, क्योंकि वे हमेशा पहचान में बने हैं। इसके सिवा ये मूर्ख और जाहिल लोग हैं पर तुम विकाश राय, तुमने बेहद योजनाबद्ध और शातिर तरीके से हमें बरगलाया है। तुम जैसे लोग हमारे पक्ष में होने का नाटक कर हमारी लड़ाई को कमजोर बना कर रख देते हो और हमें च्च-च्च की झूठी मक्कार आवाजों के सिवा कुछ भी नहीं मिलता। तुम अपने आप को सच और न्याय की लड़ाई का योद्धा कहते हो और बेहद बचकाने ढंग से झूठे भावावेग में चीखते हुए कहते हो कि मुझे फाँसी मिलनी ही चाहिये। तुम्हें यकीन है कि हमें फाँसी ही मिलेगी। पर विकाश राय अब हम तुम्हें पहचान गये हैं। अब हम तुम्हें कुचल कर रख देंगे।

ऐसा ही कुछ था मेरा अभी का सपना। देखा न तुमने कि अपने सपने को अजीब कहकर मैने कोई गलती नहीं की। सच जो भी हो मगर मैं अशांत हो गया हूँ। कहीं रामचंदर सच तो नहीं कह रहा था, या आपने त्रासद अंत ने उसे विक्षिप्त बना दिया था? इनमें से जो भी बात हो, पर अब मुझे तब तक चैन नहीं मिलने वाला, जब तक मैं खुद अपने तरीके से कोर्टमार्शल का कोर्टमार्शल न कर लूँ। क्यों! तुम बताओ - मैं गलत तो नहीं सोच रहा हूँ न?

मैं सोच रहा हूँ कि मुझे उन परिस्थितियों के बारे में स्पष्ट हो जाना चाहिये जिनके तहत मैं दादा के साथ आया। उस समय जबकि मेरा हैदराबाद के लिए 28 की रात का रिजर्वेशन कन्फर्म हो चुका था और मैने मृत्युन्जय के साथ 'लटिया की छोकरी' देखने जाने की बात पक्की की थी। फिर 27 को दिन के 11 बजे अचानक तैयारी क्यों? जबकि मेरा मृत्युन्जय के साथ किया गया वादा टूटा। योगेश विक्रांत को दिया गया आश्वासन टूटा। बेचारा योगेश... जब नाटक के बाद उसने मुझे नहीं पाया होगा तो उसे इस बात का एहसास कितने गहरे तरीके से हुआ होगा कि उसने मेरे साथ कितनी भारी गलती की थी। मैं जानता हूँ कि उसे अपने किये पर कहीं न कहीं पछतावा जरूर है पर इस बात का घमंड भी है कि देखो तुम्हारे बिना भी हमने सब कुछ कर लिया। खैर यह दूसरी बात है, सही बात तो यह है कि 11 बजे मैंने अपना रिजर्वेशन कैंसिल करवाया। अफरातफरी में तेलियरगंज पहुँचा। विनोद को कमरे पर पहुँचने के लिए कहा। रास्ते में सुप्रिया को बताया कि मैं भी चल रहा हूँ मगर प्रतिक्रियास्वरूप उसके चेहरे पर प्रकट हुये भावों को मैं नहीं समझ पाया। जितना कुछ भी किया मैंने पर हुआ यह कि डेलीगेसी पहुँचने वाला मैं पहला व्यक्ति था, प्रणव दा डेढ़ बजे आये। उनके चेहरे और बातों से मुझे लगा कि उन्हें खुशी हुई मेरे आने से, (खुशी तो विक्रांत को भी हुई होती) और मैं सभी लोगों के साथ शाम चार बजे महानगरी एक्सप्रेस पर सवार था।

यह सब क्यों और कैसे हुआ जबकि ऐसा होने की संभावना बिल्कुल नहीं बची थी। मेरे सफर की तैयारियाँ अधूरी पड़ी थीं, फिर भी अचानक! मुझे लगता है कि मुझे दादा के साथ अपने संबंधों की पड़ताल कर लेनी चाहिये। 1 नवंबर 98 को मैं पहली बार दादा से मिला। क्यों? मुझे थियेटर करना था। क्यों करना था? अरे फिल्मों में जाना था भाई, और मैने अखबारों में पढ़ रखा था कि थियेटर एक अच्छा माध्यम है फिल्मों में जाने के लिए। मैने 1 नवंबर से 15 नवंबर तक दादा द्वारा संचालित नाट्य कार्यशाला में हिस्सा लिया। इन पंद्रह दिनों में मैं दादा से बेहद प्रभावित हुआ और गहरे भावनात्मक तरीके से जुड़ गया। अब सोचता हूँ तो लगता है वह समय ही ऐसा था। 94-95 के बेहद भयानक पागल कर देने वाले दौर से मैं किसी तरीके से उबरने की कोशिश में था। 96 में बी.ए. फाइनल की परीक्षाओं से फुर्सत होकर मैं साल भर के लिए गाँव गया और जुलाई 97 में मैं फिर इलाहाबाद लौट आया। जुलाई 97 से नवंबर 98 तक मैं किसी से दोस्ती नहीं कर पाया। क्यों? जबकि मैं लगातार इसकी जरूरत महसूस कर रहा था? मैं कितना अकेला था, उस समय, यह मैं ही जानता था। शायद इसलिये कि कुछ कुंठाओं, हीन भावनाओं और अकेलेपन से पैदा हुई जड़ता का शिकार हो गया था मैं (शायद अब भी कहीं न कहीं मैं वैसा ही हूँ।) तो ऐसे में किसी से जुड़ना कितनी बड़ी बात थी मेरे लिए, चाहे मैं किसी भी तरीके से क्यों न जुड़ता। इसके बाद दादा के साथ लगातार चार राष्ट्रीय नाट्य समारोहों में गया। मतलब यह कि हर टूर पर किसी न किसी छोटी-बड़ी भूमिका में मैं दादा के साथ था, तो ये टूर कैसे छोड़ देता, मैं इसका लोभ संवरण नहीं कर पाया। लेकिन क्या दादा के साथ आने के पीछे यही एक कारण है? नहीं। इसी के समानांतर एक दूसरा भी कारण है, वो यह कि दादा ने मुझसे लगभग 1 महीने पहले कहा था कि मैं भी उनके साथ चलूँगा, तो धीरे-धीरे मानसिक रूप से एक भरी-पूरी यात्रा की तैयारी कर चुका था मैं। ऐन वक्त पर जब दादा ने कहा कि लोग बढ़ गये हैं। और मेरा चलना... तो मैं बेचैन हो उठा। मेरे लिए इलाहाबाद से निकलना उस वक्त बेहद जरूरी था क्योंकि ऐसी हालत में मैं वहाँ कुछ भी नहीं कर सकता था। और कहीं निकलने की इसी बेचैनी में मैंने हैदराबाद का रिजर्वेशन करवा लिया। जब दादा ने दुबारा चलने के लिए कहा तो मुझे लगा कि सफर पर निकलना तो है ही, तो क्यों न साथ ही निकला जाय और शायद यह भी कि इस तरीके से मेरे कुछ रुपये बच जाते, जोकि मेरी इस समय की स्थितियों में कम नहीं होते। हालाँकि यह अलग बात है कि मेरा जूता खो गया और फायदे की बजाय नुकसान ही हुआ मुझे। शायद यह मेरे स्वार्थी व्यवहार की सजा थी। पर यह तो सिर्फ आर्थिक नुकसान की बात है। वैसे मैं फायदे में ही रहा। एक शानदार और अच्छे लोगों की टीम में सफर करने का मौका मुझे मिला और मैं बहुत दिनों के बाद अपने आपको फिर से रचनात्मक ऊर्जा से भरा हुआ पा रहा हूँ।
(29.11.2000 - पूनम लॉज, शोलापुर - 3.45 शाम)

रात के बारह बजे हैं। अभी कुछ घंटे पहले बलवंत गार्गी लिखित नाटक लोहार देखा। प्रस्तुति ठीक ही थी। पर कहीं-कहीं पात्रानुरूप संवाद नहीं थे, इनसे बचा जा सकता था। लोहार की प्रस्तुति देखते हुए मेरे मन में पूरे समय 'यर्मा' और 'मित्रो मरजानी' घूमतीं रहीं। स्त्रियों की लौंगिकता पर इतनी सहज, सशक्त इतनी उद्दाम कोई कृतियाँ फिलहाल मैंने तो नहीं देखी। एक बात और बहुत सुना था मराठी दर्शकों के बारे में। पर क्या ये लोग हुल्लड़बाजी और सीटियाँ बजाने में मिथुन चक्रवर्ती की फिल्मों के कस्बाई दर्शकों से किसी मायने में कम थे, दर्शकों में महिलाओं का प्रतिशत 2 या 3 से अधिक नहीं था। क्या सचमुच यहाँ रंगमंच की कोई स्वस्थ परपंरा या संस्कृति है? और अगर जो है उसे ही संस्कृति मानें तो सवाल यह है कि यह क्यों और किसके हित में है? क्या दर्शकों के हित में? क्या रंगमंच के हित में? क्या एक स्वस्थ सुंदर संस्कृति के पक्ष में? नहीं न दोस्त तो फिर ऐसी संस्कृति या परंपरा के क्या मायने। बाजार और व्यावसायिकता की अंधी घुड़दौड़ में फँसकर यहाँ के निर्देशकों ने फूहड़ और सस्ते नाटक दिखाकर अपने ही पाँवों पर कुल्हाड़ी मारी है।

दिन औसत गुजरा। मैं काफी खुश रहा पर काफी बेचैन और मायूस भी। पता नहीं क्यों? मैं खुद भी नहीं जान पा रहा हूँ, पर मेरे भीतर या बाहर कुछ न कुछ घटने वाला जरूर है। यह अच्छा भी होगा, क्योंकि अच्छा या बुरा कुछ भी हो पर नयापन मेरे लिए समय की माँग है। समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूँ। ऐसा मेरे साथ पहली बार हो रहा है कि अपनी बेचैनी को न तो मैं कोई शब्द दे पा रहा हूँ, न ही कोई हरकत। देखना है कब तक ऐसे चलता है। दोपहर का सपना अभी भी आँखों में है, पर अभी तो बस आँखों में नींद है सो विदा लेता हूँ। इंतजार करना, वैसे ही जैसे सुबह के सूरज का इंतजार करती हो।
(29.11.2000 - पूनम लॉज शोलापुर - रात 12.30)

दोपहर के तीन बजे हैं। सुबह से हुतात्मा स्मृति भवन में था। अभी थोड़ी देर पहले ब्रोशर कंपोज करवा कर लाया हूँ। मेरा नाम 'प्रापर्टी इन्चार्ज' के रूप में गया है। वैसे मैंने किया क्या है? शायद कुछ नहीं, साथ आने के सिवा, साथ खाने के सिवा। एक बात बताऊँ मैं तुम्हें, बड़े-बड़े शहरों में बड़े-बड़े लोगों के साथ ऐसी छोटी मोटी घटनायें होती ही रहती हैं। क्यों है न!

सुबह से ही अनजानी खुशी और अनजाने गम के बीच सफर कर रहा हूँ मैं। देखता हूँ इनमें से आखिर में मेरे हाथ क्या लगता है। दोपहर को खाना खाते समय सुजॉय दा ने पूछा, मनोज तुम हमेशा सोचते क्या रहते हो? अब तुम्हीं बताओ क्या बताता मैं। वैसे मैं जो तुम्हें बार-बार संबोधित कर रहा हूँ, तुम्हीं कहो न कि तुम कौन हो, मैं जानता हूँ, तुम हो जरूर यहीं, कहीं मेरे आस-पास मेरी बेचैनी में। तो तुम्हीं साफ-साफ कहो न, नहीं तो निडर होकर सबके सामने तुम्हारे बारे में कुछ कहने में पता नहीं मैं कितनी देर लगाऊँ। गधा हूँ न। मुँह चियारने के सिवा मुझे कुछ आता-वाता नहीं है, लेकिन एक बात बताऊँ मैं तुम्हें, जाने कैसे मेरे बारे में लोगों में तमाम तरह के भ्रम पैदा हो गये हैं।

मैं चुप रहता हूँ। वजह यह कि मैं उतना खुला नहीं हूँ जितना कि होना चाहिये पर तुम्हें बताऊँ लोग क्या समझते हैं, लोग समझते हैं कि मैं बेहद गंभीर किस्म का व्यक्ति हूँ। अभी कुछ दिन पहले कृष्णमोहन को अपनी एक कहानी सुनाई तो कृष्णमोहन ने कहा कि मेरा गद्य शानदार और प्रवाहपूर्ण है? क्या? तुम्हें यकीन नहीं हुआ न, मुझे भी नहीं हुआ पर मैंने ऐसे सिर हिलाया और मुस्कुराया, जैसे उनकी बात दो सौ फीसदी सही हो। कुछ फूल, पत्तियाँ, नदी, पहाड़, भूख, लड़कियाँ प्रेम, घृणा, अस्मिता और बराबरी जैसे शब्दों को कुछ पंक्तियों में लिखता हूँ और लोग उन्हें कविता कहते हैं। हरिश्चंद्र अग्रवाल ने वर्तमान साहित्य के लिए कवितायें माँगी हैं और मैं जानता हूँ कि मैं उन्हें एक दिन दे ही आऊँगा। और तो और अब जो बात मैं तुम्हें बताने जा रहा हूँ उससे तुम्हारा पेट दर्द करने लगेगा हँसते-हँसते। इधर 'नागानंदम्' और 'लटिया की छोकरी' के बाद बहुत से लोगों को भ्रम हो गया है कि मैं एक अच्छा अभिनेता भी हूँ। क्या हुआ जो आज तक श और ज़ आदि का गलत उच्चारण करता हूँ, क्या हुआ जो बकौल दादा मेरी जुबान लटपटाती है। (थैंक्यू सुषमा जी, थैंक्यू योगेश विक्रांत) घर पर लोग सपने देख रहे हैं कि मैं कब दिखाई पड़ता हूँ सीरियलों और फिल्मों में, और यह जानकर तुम्हें जाने कैसा लगेगा कि यह भ्रम मैने खुद ही बनाकर रखा है।

सुबह 'कोटमार्शल' की रिहर्सल देख रहा था। मुझे लग रहा है कि रामचंदर मेरे सपने में सच ही कह रहा था। कोर्टमार्शल व्यवस्था के पक्ष में लिखा गया एक बेहद क्रूर और शातिर नाटक है। भले ही यह स्वदेश दीपक से गलती से ही क्यों न हुआ हो, पर एक लेखक को सावधान होना चाहिये। और एक नाटक लेखक को तो बेहद सावधान। क्या यह हिन्दी रंगमंच की बिडंबना नहीं है कि कोर्टमार्शल जैसा नाटक जनपक्षधर और व्यवस्था से विद्रोह करने वाला माना जाता रहा है और मजे की बात तो यह है कि रंजीत कपूर हों या उषा गांगुली, अनिल भौमिक हों या अरविंद गौड़ किसी भी रंग-निर्देशक को यह बातें सूझी ही नहीं।
(30.11.2000 - पूनम लॉज शोलापुर - दोपहर 3.00 बजे)

अभी दोपहर को बहुत जोश में था और एक झटके में 'कोर्टमार्शल' के सभी निर्देशकों के ऊपर दृष्टिहीन होने का आरोप जड़ दिया। इतनी जल्दबाजी अच्छी नहीं होती। फिर भी कुछ चीजें बुरी तरह खटक गई हैं। कपूर की आत्महत्या क्यों? पूरे नाटक के दौरान जो तनाव बनता है उसका एक झटके में स्खलन क्यों? सूरत सिंह का ब्रिगेडियर बनना क्या सिर्फ पार्टी सीन के लिए है? और फिर पार्टी सीन ही क्यों? क्या दर्शकों को रिलैक्स करने के लिए? सूरत सिंह और विकाश राय के चरित्र तमाम तरह के अंतर्विरोधों से भरे हैं। दोनों अपने आपको किसी राबिनहुड से कम नहीं समझते। दोनों के अपने-अपने सामंती घमंड हैं। जिस समय सूरत सिंह अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में दर्शकों को बता रहा होता है। विकाश राय अपने दादा और पिता के जज होने का हवाला देता है और यहाँ तक कि जो लड़ाई उसका भाई एक नक्सलाइट के रूप में लड़ रहा था, वही वह यहाँ लड़ रहा है कि गर्वभरी घोषणा करता है और कपूर जब अपने पारिवारिक संबंधियों के ऊँचे-ऊँचे पदों पर होने की बात सगर्व करता है तब इस बिंदु पर क्या इन तीनों के बीच कोई अंतर दिखाई देता है? कपूर जो जाति व्यवस्था का पक्षधर और खल पात्र है उसका चरित्र इतना विकृत और फिल्मी क्यों? तो दीपक साहब जाति व्यवस्था के उन पक्षधरों को क्या कहेंगे जो ब्राह्मणवादी नैतिकता के मानदंडो पर खरे हैं। जो न शराब पीते हैं न रोज-ब-रोज पत्नी को पीटते हैं, जबकि जाति व्यवस्था के सबसे बड़े पैरोकर हैं। दलित या पिछड़ी जातियों के प्रति जितना क्रूर और अमानवीय व्यावहार प्रचलित नैतिकतावादियों का रहा है उसका दसांश भी कपूर जैसे विकृत और अनैतिक लोगों का नहीं रहा है। विकाश राय जो बचाव वकील है क्या प्रकारांतर से रामचंदर के प्रति कपूर से भी अधिक निर्मम नहीं है? रामचंदर कांड से जो सवर्ण अफसरों के विरुद्ध या कहें कि सवर्ण मानसिकता के विरुद्ध (जो कि अंततः व्यवस्था की ही मानसिकता है - बदले अर्थों और संदर्भों के साथ) सैनिकों में जो गुस्से की लहर है या यों कहें कि दर्शकों में जो गुस्से की एक लहर है, कपूर की आत्महत्या द्वारा क्या वह फुस्स नहीं कर दी जाती है? कि लो भई व्यवस्था में अगर कपूर और वर्मा हैं तो सूरत सिंह और विकाश राय भी। कुल मिलाकर व्यवस्था अच्छी और न्यायपूर्ण है, बस कुछ लोग बुरे हैं जिनके बारे में व्यवस्था अगर कानूनी रूप से कोई फैसला लेने में सक्षम नहीं साबित होती है तो कलात्मक न्याय होता है और कपूर जैसे लोग सजा पा ही जाते हैं। कलात्मक न्याय/ईश्वरीय न्याय! हा-हा-हा, स्वदेश जी क्या ख्याल है? मरने के बाद कपूर और वर्मा की आत्मायें जरूर घनघोर कुंभीपाक नरक में गयी होंगी। है न!

शो सफल रहा पर मैं इस बात को लेकर बेहद मायूस था कि मैं शो का हिस्सा क्यों नहीं था। काश कि मैं एक अच्छा अभिनेता होता। अभी एक घंटे पहले तक मैं भारी तनाव में था। अब बहुत खुश हूँ। क्यों? अरे भाई अब तुमसे कैसा परदा। अभी खाना खाते समय तुमने मुझसे पूछा कि मैं बंद बोतल की तरह उदास क्यों बैठा हूँ, और बोतल खुली फक्क-सारी उदासी उड़ गयी और उसकी जगह महकी हुई हवाओं ने ले ली। तुमने मेरी उदासी छीन ली और खुद उदास हो...। लेकिन यह तो गलत बात है न। मेरे लिए ऐसी खुशी किस काम की जो तुम्हें उदास करके हासिल हो। क्या तुम्हारी दी हुई खुशी तुम्हें वापस कर दूँ मगर कैसे? कैसे वापस करूँ मैं तुम्हें तुम्हारी खुशी? मुझ गधे को लेने के सिवा देना कब आया।

कल से सफर में तन्हा हो जाऊँगा पर इस समय तो तुम्हें अपने भीतर महसूस कर रहा हूँ और चहक रहा हूँ। यकीन नहीं हो रहा है कि इतना सारा तनाव, इतनी सारी जलन इतनी जल्दी कपूर हो गई। ऐसा पहले तो कभी नहीं हुआ। इतना खुश हूँ कि कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या करूँ (डर अलग से लग रहा है कि ये खुशी मेरा साथ तो नहीं छोड़ देगी) हँसूँ या रोऊँ, सोऊँ या जागूँ? मगर क्या यह सब कुछ सचमुच मेरे वश में है? नहीं। अब तो मुझे लग रहा है कि जो भी है सब तुम्हारे वश में है।
(30.11.2000 - पूनम लॉज शोलापुर - रात 1.00 बजे)

अभी थोड़ी देर पहले सो कर उठा हूँ। आज रात कोई सपना नहीं आया, जबकि मैं जब सोने जा रहा था तो उस वक्त मुझे लगा था कि आज की रात तो रंग-बिरंगे सपनों की रात होगी। कहीं ऐसा तो नहीं कि तुमने मेरे सपनों का खून कर दिया और खुद उनकी जगह ले ली, मगर तुम मेरे सपनों से अलग कहाँ हो। तो ऐसा तो नहीं कि तुमने सोचा कि तुम मेरे पास तभी आओगी जब मैं जाग रहा होऊँगा? इसका क्या मतलब है? मैं तो हर क्षण तुम्हें अपने पास देखना चाहता हूँ। यहीं-कहीं अपने साथ। अपने में शामिल। तुम मुझे बेहद स्वार्थी समझ रही हो न? क्या करूँ! लेकिन मुझे लगता है कि यह मेरा स्वार्थ नहीं है। हाँ, कमजोरी जरूर है। पर यही कमजोरी मुझे कहीं भी कभी भी न टूटने वाली मजबूती देगी। और मैं मजबूत बनना चाहता हूँ। मेरा ये चाहना गलत है क्या? हो तो बता देना।

पूनम लॉज की पाँचवी मंजिल पर अकेला कमरा है यह जिसमें कि मैं हूँ। खिड़कियाँ खोलो तो सामने कबूतरों का रंग-बिरंगा झुंड दिखता है। कितने स्वस्थ और खूबसूरत हैं ये। अगर मैं इनकी गुटरगूँ-गुटरगूँ समझ पाता तो इन कबूतरों के बीच मैं भी एक कबूतर बन जाता। लेकिन क्या यह मुमकिन है। यहाँ तो आदमी होने का वरदान और अभिशाप दोनों साथ-साथ मिला है। आदमी होने का मतलब ही दोनों को साथ-साथ ढोना है।

शोलापुर, एक साफ-सुथरा शहर। अच्छे लोग हैं। ऑटो नहीं है, टैक्सियाँ हैं। औरतें अच्छी-खासी संख्या में छोटे-छोटे स्टाल चलाती दिखती हैं। इलाहाबाद से करीब डेढ़ गुना महँगा शहर। पूनम लॉज की पाँचवी मंजिल का वह कमरा जहाँ मैं रुका था, हमेशा याद आयेगा। लिफ्ट थी पर आम तौर पर मैं सीढ़ियों का ही प्रयोग करता था। मैं तीन दिन यहाँ रुका, अपने क्रियाकलापों को जाना-समझा। फिर कभी शोलापुर आना हुआ तो इसी कमरे में रूकना पसंद करूँगा। कमरे के उत्तर-दक्षिण दोनों तरफ छत है। छत पर खड़े हो जाओ तो पूरा शहर दिखता है पर शहर के दक्षिणी तरफ जो ऊँचे-नीचे खाली मैदानों में पेड़ों के झुरमुट दिखते हैं वे तो बस एक जादुई पेंटिग का आभास देते हैं।

आज से मैं अपने सफर में अकेला हो जाऊँगा। क्या तुम मेरा साथ नहीं दोगी? स्मृतियों में भी नहीं? ऐसा कैसे हो सकता है? मुझे अकेला मत छोड़ना। मुझे अकेलेपन से बेहद डर लगता है। एक खराब बेचैनी मेरे खून में भर जाती है और मुझे लगता है मैं पागल हो जाऊँगा। तो क्या मैं यह यकीन कर लूँ कि तुम मुझे पागल नहीं होने दोगी?
(1.12.2000 - पूनम लॉज - सुबह 7 बजे)

सब गये और तुम भी। तुमने पूछा कि मैं तुम्हे वैसे क्यों देख रहा था, जैसे कि मैं देख रहा था। मैं हँसा और जवाब दिया, कुछ नहीं। अजीब सा जवाब है न। हमने हाथ मिलाये, हाथ हिलाये और अलग हो गये। मैंने अपने हाथों को चूम लिया है। तुम्हें बुरा लगा न! क्या करूँ, तुम जा रही हो तो मुझे भी बहुत बुरा लग रहा है। ट्रेन ने एक लंबी सीटी दी और मेरी बेचैनी चरम पर पहुँच गई। जब ट्रेन चली तो मन हुआ कि दौड़ूँ और दौड़ कर ट्रेन पर चढ़ जाऊँ। किसी तरह से मैने अपने आपको ऐसा करने से रोका। अब थोड़ा सहज हूँ। अभी थोड़ी देर पहले पता किया तो पता चला कि हैदराबाद कि लिए दो ट्रेन हैं - पुणे हैदराबाद पैसेन्जर और मुंबई हैदराबाद एक्सप्रेस। पैसेन्जर शाम चार बजे है तो एक्सप्रेस 11 बजे। अभी तय नहीं किया है कि किससे जाऊँगा। कहीं जाने का मन नहीं है सो तय किया है कि यहीं स्टेशन पर रहूँगा और किताबें पढ़ूँगा। सिद्धेश्वर पीठ खूबसूरत जगह है, फिर जाता मगर वहाँ मंदिर की क्या जरूरत थी। लोग पता नहीं कब इन पीठों और लिंगों के जाल से बाहर निकलेंगे। हालाँकि यह मेरी असहिष्णुता ही कही जायेगी पर मैं क्या करूँ जो किसी मंदिर में घुसते ही मुझे उबकाई सी आने लगती है।

हाँ तो सुबह नहाने और भोजन करने के बाद हम लोग सिद्धेश्वर पीठ गये। दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिरों में से एक। समूचा मंदिर एक झील के केंद्र में स्थित है। मंदिर तक पहुँचने के लिए एक सँकरा सा पुल है। मंदिर प्रांगण में प्रवेश के पहले सबने चप्पल और जूते उतारे, पैर धोये और फिर अंदर। मैं एक भी मंदिर में नहीं घुसा, बस बाहर ही बाहर घूमता रहा। तुमने पूछा कि क्या मैं सचमुच इन सब चीजों मसलन ईश्वर में विश्वास नहीं करता हूँ, मैंने जवाब दिया हाँ। और तब तुमने कहा कि तुम भी नहीं करती हो। खैर कुछ देर तक हम झील के किनारे धीरे-धीरे चलते हुये एक दूसरे के हमसफर रहे। फिर फोटोग्राफी का दौर शुरू हुआ। एक के बाद एक कई सारी तस्वीरें खिंची। कैमरा दादा का है सो तस्वीरें भी दादा की निजी संपत्ति होंगी। पता नहीं दादा को तस्वीरें देने में क्या दिक्कत होती है। कलकत्ता के टूर की बेहद शानदार तस्वीरें। सिर्फ मैं और तुम समानांतर की चित्र प्रदर्शनी के लिए तस्वीरें छाँट रहे थे, तभी मैंने हँसते हुये तुमसे कहा कि मेरा मन तस्वीरें चुराने का हो रहा है। और तुमने तुरंत दादा से कह दिया कि दादा मनोज क्या कह रहा है और दादा वहीं कुर्सी लगाकर बैठ गये, नहीं तो जरूर मैं उस दिन कई तस्वीरें साफ कर देता। और दादा ही क्यों तुमने भी तो जबलपुर में खींची गयी तस्वीरों की कापी आज तक नहीं दी। मैं अकेला आगे निकल आया हूँ और झील के शांत ठंडे जल में पाँव डालकर बैठा हूँ, मछलियाँ पैरों में गुदगुदी कर रही हैं।

सिद्धेश्वर पीठ पर निकलने के पहले बाल सँवारते समय जब अपने आपको आईने में देखा तो मुझे अपना चेहरा बहुत प्यारा लगा। मुझे याद आया लटिया की छोकरी, के बाद तुमने कहा था कि नाटक में मैं बहुत क्यूट लग रहा था। मुझे लगा कि आज भी तुम शायद वैसा ही कुछ कहोगी, और तब मैं कहूँगा कि तो क्या हुआ तुम तो हमेशा बहुत क्यूट लगती हो। और तब तुम थोड़ा लजा जाओगी तो मैं कहूँगा कि लजाओ मत, आजकल अक्सर मैं झूठ बोल जाता हूँ। पर रास्ते में तुमने सिर्फ इतना कहा कि मनोज तुम्हारी शर्ट बहुत खूबसूरत लग रही है। तब मैंने कहा तुम्हारी भी, बदलोगी क्या, पर सारी की सारी बातें सोची की सोची रह गईं।
(1.12.2000 - शोलापुर जं. - 1 बजे दोपहर)

गुड बाई शोलापुर। शाम के पाँच बजे हैं। मैं पुणे हैदराबाद पैसेन्जर में बैठ चुका हूँ। स्टेशन पर 'इवान इल्यूविच की मृत्यु' पढ़ी। क्या सच में दुनिया इतनी खोखली है विश्वास नहीं होता। इसी किताब में 'नाच के बाद' प्रेम पर एक शानदार कहानी है। युवा मन की गहरी संवेदनात्मक कोमल अनुभूति से लबालब। 'दो हुस्सार' भी ठीक था पर दो हुस्सार पढ़ते समय 'कज्जाक' क्यों याद आया था?
(1.12.2000 - शोलापुर जं. - शाम 5 बजे)

सुबह के 10 बजे हैं। मैं अभी-अभी हैदराबाद जंक्शन पर उतरा हूँ। रात भर नींद नहीं आई। बगल से आती-जाती हर ट्रेन में तुम्हारा चेहरा देखता रहा हूँ मैं। कुछ अर्धनिद्रा के झोंके भी आये तो मैंने पाया कि मेरी नींद में भी तुम्हीं हो। समझ नहीं पा रहा हूँ कि यह मुझे क्या हो गया है। मेरा खुद पर कोई जोर ही नहीं बचा है। मैं वैसे ही नाच रहा हूँ जैसे तुम नचा रही हो। स्टेशन पर उतरते ही मैं एक लड़की को तुम समझ कर आवाज दे बैठा। मैं बस उसके कंधे पर हाथ रखने वाला ही था कि वह पलट गई और मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई है। मैं जानता हूँ मैं अभी-अभी पिटने से बचा हूँ। मै

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