16/06/2022
*मख़लूत तालीम एक फ़ित्ना...??*
जब से दुनिया मे मर्द-ओ-ज़न की बराबरी की तहरीकें परवान चढ़ी हैं तब से को-एजुकेशन भी ज़िंदगी का एक हिस्सा बन चुकी है, बिना ये जाने के कुदरत ने सब को बराबर बनाया ज़रूर है, सब के हुक़ूक़ भी यकसाँ हैं, मगर काम करने के दायरा-ए-अमल अलग अलग है, जिस्मानी साख़्त अलग है, क़ुव्वत अलग है और हुनर अलग है,
आज को-एजुकेशन ने एक फ़ितने का रूप इसलिए ले लिया है के मज़हब की पकड़ कमज़ोर हो गई है, अख़लाक़ ओ तहज़ीब के मयार बदल गए है और पूरी दुनिया पर अमरीका और योरप की तहज़ीब गालिब आ गई है, वो तहज़ीब जिसके तौर तरीके तमाम मज़हबों की तालीमात से टकराते हैं, यहां तक के खुद ईसाइयत भी इस बे-राह रवि के खिलाफ है,
आज इंटरनेट के ज़रिए हमारे मोबाइलों में फहाशी और बेशर्मी का सैलाब आया हुआ है, फिल्मों टीवी सीरियलों में ऐसी ऐसी बातें और मनाज़िर दिखाए जा रहे हैं जो कमसिन ज़हनों को उम्र से पहले न सिर्फ ज़हनी बालिग़ बना रहे है बल्कि गुनाहों और जुर्म को पैदा कर रहे है,
मख़लूत तालीम में यही सब से बड़ा नुकसान है, लड़के और लड़कियों का एक साथ बैठना, आज़ाद तौर से घुलना मिलना खराबी पैदा कर रहा है,
क्योंकि चारों तरफ फैली फहाशी पर बिगड़े ज़हन ऐसी जगह अपनी आसूदगी ढूंढते है और गलत रास्तों पर चल निकलते हैं।
हमारी मजबूरी ये है के जिन शहरों में हमको ऑप्शन नही है वहां इस सिस्टम को स्वीकार करना पड़ता है, लेकिन जहां हमारी मजबूरी नही है, जहां हमें लड़को और लड़कियों के लिए अलग अलग तालीमी इदारे मयस्सर हैं वहां इसका फायदा न उठाना हमारी नादानी है।
अंजुमन मुस्लिम गर्ल्स स्कूल एक ऐसा ही शानदार इदारा है, जो हर लिहाज से साधन युक्त भी है और सक्षम भी, बहतरीन इंफ्रा स्ट्रक्चर, प्रोफेशनल टीचर्स, आला तालीमी मयार, सब से बढ़ कर आपकी बच्चियां यहां को-एजुकेशन के फ़ितने से दूर है, मुकम्मल मज़हबी माहौल है, बच्चियों को पूरा पूरा तहफ़्फ़ुज़ हासिल है।
लिहाज़ा आप से दरख्वास्त है के अपनी बच्चियों का दाखिला अंजुमन मुस्लिम गर्ल्स स्कूल में करवाएं और उनका मुस्तक़बिल बहतर बनाएं।