12/05/2026
तब जब भारत के रासायनिक खाद बनाने वाले कारख़ाने LNG के लिए तड़प रहे हैं, अमरीकी क्रोध से बचने के लिए भारत ने 60,000 टन LNG से भरे रूसी जहाज़ को ना कह दिया!
भारत ने रूस के प्रतिबंधित LNG कार्गो को लेने से मना कर दिया।
60,000 टन रूसी LNG ले जा रहा एक जहाज अब सिंगापुर के पास बेघर घूम रहा है।
अप्रैल में रूस के बाल्टिक पोर्टोवाया बंदरगाह से ‘कुनपेंग’ नाम का टैंकर भारत के दहेज LNG टर्मिनल की ओर रवाना हुआ।
लेकिन भारतीय खरीदारों और टर्मिनल operators ने इसे लेने से इनकार कर दिया। अमेरिका के सेकेंडरी सैंक्शन्स (दूसरे स्तर के प्रतिबंध) का खतरा था, इसलिए उन्होंने रिस्क नहीं लिया।
अब यह जहाज सिंगापुर के पास अटका हुआ है।
भारत ईरान युद्ध के दौरान भी रूसी तेल खरीदता रहा। ऊर्जा सुरक्षा का हवाला दिया। अमेरिका ने भी मार्च में 30 दिन का अस्थायी छूट दी थी ।
लेकिन LNG अलग है।
जनवरी में ट्रंप प्रशासन ने रूस की शैडो फ्लीट के 180 से ज्यादा जहाजों, व्यापारियों और आर्कटिक LNG 2 से जुड़े लोगों पर प्रतिबंध लगा दिए।
अमेरिका ने साफ चेतावनी दी कि कोई भी विदेशी बैंक या कंपनी अगर इन प्रतिबंधित रूसी LNG से डील करेगी तो उस पर भी सैंक्शन लग सकते हैं।
भारत के बैंक और टर्मिनल operators ने सोचा और फैसला लिया कि सस्ता कार्गो लेने से बेहतर है अमेरिका के सैंक्शन के नियमों का पालन करें।
जब मोदी जी ईंधन बचाओ और विदेशी मुद्रा बचाओ का आह्वान कर रहे हैं, उसी समय यह घटना हुई।
दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था अब सैंक्शन्स की लाइनों में बंट रही है।
जिन देशों को ऊर्जा की जरूरत है, उन्हें चुनना पड़ रहा है कि वे कौन सा खतरा उठा सकते हैं और कौन सा नहीं। मोदी सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि वह अमेरिका के सामने खड़ी नहीं हो सकती भले ही उसकी अर्थव्यवस्था क्यों न बैठ जाए!
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