14/10/2025
'नाम भेद अमोलक है'
संसार के सभी धर्म, पंथ, सम्प्रदाय 'नाम' की बड़ी महिमा करते हैं और कहते नहीं थकते की, 'कलयुग नाम आधारा'। कोई एक नाम, कोई दो, तो कोइ तीन या चार तक पहुंच कर चुक गए। पांचवां नाम जो इस जगत का है ही नहीं, तो इस जगत की रीत से तो किसी को कभी मिला नहीं, ना ही मिल सकता है। 'यही कारण है कि, संसार के किसी भी सैद्धांतिक धर्म, मत या सम्प्रदाय में इसका भेद नहीं मिलता और ना ही मिल सकता है। यह महापवित्र पांचवां नाम इस ब्रह्माण्ड से परे का है। जिसका भेद 'राधास्वामी' मत की शिक्षाओं में और दीक्षा सतगुरु वक़्त द्वारा उपदेश के वक़्त दी जाती है। जो कि ना तो इस जगत के हैं और ना ही इस जगत में हैं। उनका सिलसिला हर वक़्त सत्य देश से कायम रहता है। जिसे साधारण जीव उनके वचनों पर अमल किये बिना कभी जान और समझ ही नहीं सकता। सिर्फ अपने वक़्त के सतगुरु पूरे की खोज ही कर सकता है। उसके लिए भी सच्ची लगन, द्रढ़ विश्वास, निश्छल प्रेम, निर्मल मन और पूर्ण समर्पण का होना आवश्यक है।
इस रीत से 'राधास्वामी मत' किसी भी रीत से एक सांसारिक और सैद्धांतिक मत नहीं है। जो लोग राधास्वामी नाम के सच्चे भाव और वास्तविक अर्थों से परिचित हैं, वे अच्छी तरह से जानते हैं कि, 'राधास्वामी' तो इस जगत में हो ही नही सकती। फिर जो पांचवें नाम के भेद से अनजान हैं, वे ही अपनी ओछी और सांसारिक बुद्धि के अनुसार राधा और स्वामी को अलग-अलग लिखते और समझते हैं। जो कि इस मत और मार्ग की अवधारणा से बिल्कुल विलग और विपरीत है। इस मत और मार्ग की शुरुआत ही पिण्ड के नाके से शुरू होती है और यात्रा धुर पर पहुंच कर पूरी होती है।
यही सच्ची और पूरी मुक्ति का भेद भी है।
'राधास्वामी' मत के आदि प्रणेता समद गुरु राधास्वामी दयाल हुज़ूर स्वामीजी महाराज, जो कि ना तो इस जगत के थे और ना ही इस जगत में थे। जिन्हें कुल जीवों ने समद हुज़ूर स्वामीजी महाराज के दैहिक स्वरूप में जाना, (कोई प्रश्न ?) सो आपने सच्चे नाम के वर्णात्मक और ध्वनात्मक दोनों ही रूपों का भेद बतलाया है। की ,
'आदि शब्द से श्रवण शब्द फिर शब्द से धुन और धुन से वर्ण बनता है। इस रीत से जीव वर्णात्मक नाम से एकाग्रता द्वारा ध्वनात्मक नाम या धुन, फिर धुन में लीनता द्वारा श्रवण शब्द और श्रवण में रिक्तता द्वारा आदि शब्द को प्राप्त हो सकता है।'
पांच नाम के 'सुमिरन' के माध्यम से 'राधास्वामी मत' की शिक्षा, निर्देशों और सिद्धांतों के अनुसार अंतर अभ्यास द्वारा नाम के इस भेद और 'धुर पद' को पाया जा सकता है। जो कुल का आदि और मूल है।
* पर प्रश्न अब भी वही है कि, पांचवां नाम क्या है ?
तो यदि आप 'राधास्वामी दयाल' को परमात्मा समझते हैं और 'सुरत' को आत्मा के रूप में देखते हैं। तो आपको यह लेक्चर अभी यहीं पर छोड़ देना चाहिए। ...फिर भी यदि 'पांचवें नाम' का भेद पाने की चाह सच्ची हैं, तो पहले कुछ दिन किसी प्रेमी सतसंगी या साध का संग करना चाहिए। तब ही अंतर में सच्ची जिज्ञासा और 'परम सत्य की खोज' पैदा हो सकती है। जो कि महा पवित्र पांचवां नाम है।
कुछ लोग जो खुद को 'राधास्वामी मत' का सच्चा गुरु मानते हैं। उनका कहना है कि, सभी जीव पांच नाम का भेद जानना चाहते हैं। तो वे उनसे कुछ दिन या वर्ष बेगारी करवा कर * 'ज्योत-निरंजन , ओंकार , रारँ , सोहंग , सतनाम.' का पहाड़ा पढ़ा देते हैं। इसमें 'राधास्वामी' नाम का कहीं ज़िक्र भी नहीं आता और I.D. card बना कर अपने डेरे या आश्रम , बाग बगीचों के एनुअल शेड्यूल से बांध देते हैं। उनका सारा जोर बस इसी बात पर रहता है कि ...
सिमरन करो - या जाप करते रहो ?
और...
भक्ति करो - या सेवा करते रहो ?
या फिर पिछले हो चुके संत वी महात्माओं की टेक बंधवा कर जड़ कर देते हैं।
अब करते रहो जीवन भर 'सेवा'...
जब कि सच तो यह है कि,
'नाम वर्णात्मक गाऊं, दुधा विधि भेद बतलाऊँ।
राधास्वामी नाम जो गावे सोई तरे,
कल क्लेश सब नाश,
सुख पावे सब दुख हरे।
ऐसा नाम अपार कोई भेद ना जानहिं,
जो जाने सो पार बहुरि ना जग में जन्महिं।
लखायक है यही धुन का।
बिना गुरु फल नहीं किनका।।
जबकि अपने मूल रूप में ना तो यह प्रेम का पथ है, ना भक्ति मार्ग है, ना ही ज्ञान मार्ग है। 'राधास्वामी मत' सच्ची लगन, द्रढ़ विश्वास, निश्छल प्रेम, निर्मल मन और पूर्ण समर्पण पर आधारित 'गुरु मत' है।
यह लीनता का 'ज्ञात मार्ग' है। जिसमें जो कुछ भी है, इस जगत में और इस जगत से परे भी। वह सब कुछ अपने मूल स्वरूप सहित समाया हुआ है।
'सतगुरु स्वामी सदा सहाय'
सप्रेम राधास्वामी
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राधास्वामी हेरिटेज
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(परमपुरुष पूरणधनी समद हुज़ूर स्वमीजी महाराज के महापवित्र निज अंशों व संतमत विश्वविद्यालय की स्थापना के प्रति कार्यरत व समर्पित).