11/11/2017
कहाँ है पंचमकाल?
प्राय: हम सुना करते हैं, पंचमकाल चल रहा है, कलयुग है, हीन काल चल रहा है, दुखमा काल है आदि। हम सुनते भी हैं और अवसर आने पर कहते भी हैं, पर क्या हमारा मन मानता है कि पंचमकाल है? बार-बार मन सोचता है कि कहाँ है पंचमकाल? क्या हीनता है इस काल में?
इन्द्रपुरी जैसे नगरों व राजप्रासादों को लज्जित करने वाले रंगमहलों की रचना, पुष्पक विमान को पीछे छोड़कर पंच महाद्वीपों की यात्रा कराने वाले विशाल वायुयान, बैल गाड़ी को संग्रहालय की वस्तु बनाकर द्रुतगति से दूसरे महानगर पहुंचाने वाली बुलेट रेल, कम्प्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट (यदि चतुर्थ काल में होता तो सीता को खोजने में इतनी मशक्कत नहीं करना पड़ती।) आदि कितनी उन्नति हो रही है इस काल में फिर कहाँ है पंचमकाल?
इतना ही नहीं कि लौकिक क्षेत्र में ही नहीं धार्मिक क्षेत्र में भी दर्शनीय उन्नति हो रही है।
चतुर्थ काल में लाखों वर्षों में पंचकल्याणक देखने को मिलते थे आज साल में ५० से अधिक हो रहे हैं। गांव- गांव, नगर- नगर में मंदिर, स्वाध्याय भवन, शिविर, साहित्य प्रकाशन, चातुर्मास, तीर्थ यात्रा, विशाल शोभायात्रायें निकल रही हैं, कहाँ तो हजारों वर्षों में कुछेक तीर्थ थे आज तो हर हाइवे पर नया गिरि/धाम शोभायमान हो रहा है, पंच सितारा धर्मशालायें बन रही हैं, दानदाताओं/व्रतियों/प्रवचनकारों की फेहरिश्त लम्बी होती जा रही है जिस तरफ देखें उन्नति ही उन्नति फिर कैसा अवसर्पिणी/हीन/ दुखमा /पंचमकाल? कहाँ है पंचमकाल? किसी को कहीं दिखा हो तो बताना।
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मित्रो! चतुर्थ/पंचमकाल यह भवनों या सुविधा- असुविधा, मंदिरों की संख्या से नहीं अपितु मन के भावों और तन्निमित्तक तन से है। आज भोग सामग्री की प्रगति हो रही है यहाँ तक कि तीर्थ, मंदिर और स्वाध्याय भवन भी साधना की नहीं साधनों की मुख्यता से बन रहे हैं, आश्रम भी रिसोर्ट की तरह मनोहारी बन रहे हैं।
विगत २००० वर्षों में ९ भारतीय दर्शन थे जो पिछले १०० वर्ष ९० हो गये होंगे। मंदिर कम थे पर मन सब के एक थे।
साधन नहीं थे, पर साधना के भाव थे।
मोबाइल पर दूर की बातें नहीं जानते/सुनते थे, पर अंतरंग मित्रों व अपने अंतरंग की बातें जानते/सुनते थे।
एक ग्रन्थ में दस लोग स्वाध्याय कर लेते थे, आज १० ग्रन्थ मंदिर में रखने वाले हैं पर पढ़ने वाले १-२ भी हों तो सौभाग्य है।
पहले विशाल मंदिर किसने बनाये खोजना मुश्किल पर आज एक वेदी पर भी दानदाताओं की लंबी सूची कहीं भी मिल सकती है।
पहले आचार्यों ने महान ग्रन्थों की रचना की पर लेखक/आचार्य का नाम आज भी शोध का विषय है और आज के लेखक का वंशवृक्ष, आकर्षक मुखमुद्राओं में एक ग्रन्थ में अनेक स्थानों पर देख सकते हैं।
लाखों वर्षों एक ही जिनधर्म प्रवर्तित रहा पर दो हजार वर्षों में हम दिगम्बर/श्वेताम्बर दो भागों से लेकर तेरह/बीस पंथ, स्थानकवासी/मूर्तिपूजक से लेकर अब तो हर गुरु के अलग अलग सम्प्रदाय/पंथ/परम्परा होती जा रही हैं और सभी अपने को उत्कृष्ट दिखाने के फेर में निकृष्ट प्रवृत्ति कर रहे हैं।
पहले पारिवारिक संपत्ति भी पारमार्थिक कार्य को बिना नाम सोंप देते थे आज पारमार्थिक संपत्ति को भी पारिवारिक की तरह इस्तेमाल करने के भाव हो रहे हैं।
पहले संयमित जीवन जीने वाले और विद्वज्जनों का आदर श्रेष्ठी करते थे आज श्रेष्ठियों के पीछे ही सारा जगत होता जा रहा है।
चतुर्थ काल में बादल विघटते/बाल सफेद होते देखकर ही वैराग्य हो जाता था पर आज तो सैकड़ों की मृत्यु, दुर्घटनायें भी हमें प्रभावित नहीं करती, पहले घर में भी वैरागी के गीत गाये जाते थे आज वैरागियों के राग की वीडियो वायरल हो रहे हैं।
मित्रो! इन गिरते हुए परिणामों में ही पंचमकाल छुपा हुआ है। यह विकृतियां बढ़ने ही वाली हैं, आप चतुर्थ काल नहीं ला सकते परन्तु यदि आप स्वयं इसके प्रभाव से बचना चाहते हैं तो अपने गिरते परिणामों की सम्हाल कर जगत से निष्पक्ष/निरपेक्ष/सरल रहकर आत्महित की भावना से पूजन/स्वाध्याय/दान आदि कार्य करें तो चतुर्थ काल ही है।
प्रस्तुति
*समर्पण*
समर्पण व्यक्ति नहीं भावना है।
११/११/17. ८.३० रात
आगम विरुद्ध कुछ हो तो 🙏🙏🙏