शाश्वत धाम उदयपुर

शाश्वत धाम उदयपुर Shashwatdham Is an non-profit Organisation for Girls to study academics along with Jain ethics and m

25/12/2017

पुराने विचार, घाटे का व्यापार, बिखरता परिवार, हर जगह हार। फिर भी एक वर्ष में नव वर्ष चार, हम भारतीय ही मना सकते हैं।

20/12/2017
20/12/2017

*शान्ति से जीवन जीने की कला ५*

*मोह अधोगामी होता है और अधोगमन ही कराता है।*

आपने एक कहावत सुनी ही होगी *मूल से ब्याज अधिक प्यारा होता है।* अर्थात् मनुष्य को अपने बेटे से भी अधिक पोता प्रिय होता है।
विचार करें दादा को पोता प्रिय है, पोते को दादा नहीं। दादा पोते के लिए मंदिर/स्वाध्याय/सामायिक छोड़कर खिलाने/घुमाने में लग सकता है, पर पोता दादा के लिए अपना सीरियल नही बदल सकता, टी वी की आवाज कम नहीं कर सकता। इसे ही कहते हैं मोह अधोगामी है, नीचे की ओर बहता है।

घर में संतान के जन्म लेते ही उसके खाने-पीने, रहने, कपड़ों की चिंता में माता-पिता लग जाते हैं पर उसी घर में स्वयं के माता-पिता रहते हों तो उनका कमरा खाली करवाकर किराये पर देने का मन होता है।

संतान के लिए ऋण लेकर भी गाड़ी खरीदकर कॉलेज भेजते हैं और दादा जी या माता-पिता के लिए व्हील चेयर लेना हो तो महिनों सोचते रहते हैं।

बच्चों को ५००-७०० रुपये का धूप का चश्मा दिला सकते हैं परन्तु वृद्ध मात-पिता का चश्मा सही कराने को पैसे/समय नहीं होता।

संतान के साथ पिक्चर जाने का समय है, मात-पिता के साथ मंदिर जाने का नहीं, बच्चों के साथ जैसलमेर, गोवा, कन्याकुमारी घूमने हर वर्ष जाना ही चाहिये नहीं तो बच्चे कब घूमेंगे ? पर उसी समय माता-पिता के साथ तीर्थ पर जाना कष्ट कर लगता है। यही है अधोगामी मोह।

यदि दादा-दादी, मात-पिता का सुबह देह वियोग हो जाये तो शाम को ही उठावना करके काम पर लग जाता है मानो वे मरने के लिए ही जी रहे थे, उनका काम पूरा हुआ। परन्तु यदि पुत्र-का वियोग हो जाये तो ६ महिनों तक संतुलित नहीं हो पाता। जबकि किसी की भी मृत्यु आयु पूर्ण होने/समय आने पर ही होती है यह अकाट्य नियम है। दादा या पोता किसी का भी वियोग सच में अनहोना नहीं है। पर मोह अधोगामी है, नीचे की ओर बहता है/बढ़ता है।

*जो मैं नहीं, मेरा नहीं, मेरे सुख-दुख का कारण नहीं उसे मैं/मेरा या सुख-दुख का कारण मानना ही मोह है।* मैं अपने को स्त्री-पुरुष, गोरा-काला, निर्धन-धनवान मानकर, सारे परिजनों को अपना तथा इनको ही अपने सुख-दुख का कारण मानकर निरन्तर तनाव/चिन्ता में रहता हूँ। पर हमने देखा कि जो मोह अधोगामी हो वह भविष्य में मुझे भी अधोगमन ही करायेगा। नरकादि में भ्रमण करवा कर संसार परिभ्रमण ही करायेगा।

हम अब इस बात को समझने के लिए समय/बुद्धि लगायें कि दुनिया में लौकिक दृष्टि से माता-पिता, भाई बहिन, पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री मेरे हैं, घर-दुकान मेरे हैं कहे जाते हों परन्तु सच में यह मेरे नहीं, मैं इनका नहीं हूँ। क्योंकि *मेरा सो जावे नहीं, जावे सो मेरा नहीं।* जो मुझे छोड़कर जा सकते हैं सच में वह मेरे नहीं हैं। लोक में सामाजिक/पारिवारिक व्यवस्थाओं को चलाने के लिए संबंध बताये जाते हैं हमें उनको उतना ही सत्य मानना चाहिये।

सच में पारलौकिक दृष्टि से तो सभी से मोह त्यागने योग्य ही है परन्तु जब तक निर्मोह दशा न हो तब तक हम अत्यन्त स्वार्थी/अनैतिक मोह में रहकर मात्र भविष्य की पीढ़ी के प्रति ही जिम्मेदारी निभाने का कर्तव्य न समझें अपितु अपनी आदरणीय पहली पीढ़ी को भी प्राथमिकता दें, संतान को भी यही कर्तव्य सिखायें यह भावना हमें वर्तमान में सम्मान व सुख देगी, वृद्धावस्था में हमें भी सेवा करने वाले मिलेंगे या सच में तो सेवा कराने की आवश्यकता ही नहीं होगी तथा पुण्य का कारण होने से धर्म मार्ग की प्राप्ति में सहायक बनेंगे। यही है शान्ति से जीवन जीने की कला।

प्रस्तुति *समर्पण*
२०/१२/17

आवश्यक नहीं है कि आप मेरे विचारों से सहमत हों, पर हैं तो सहमत होने का ज्ञान करायें

11/11/2017

कहाँ है पंचमकाल?

प्राय: हम सुना करते हैं, पंचमकाल चल रहा है, कलयुग है, हीन काल चल रहा है, दुखमा काल है आदि। हम सुनते भी हैं और अवसर आने पर कहते भी हैं, पर क्या हमारा मन मानता है कि पंचमकाल है? बार-बार मन सोचता है कि कहाँ है पंचमकाल? क्या हीनता है इस काल में?

इन्द्रपुरी जैसे नगरों व राजप्रासादों को लज्जित करने वाले रंगमहलों की रचना, पुष्पक विमान को पीछे छोड़कर पंच महाद्वीपों की यात्रा कराने वाले विशाल वायुयान, बैल गाड़ी को संग्रहालय की वस्तु बनाकर द्रुतगति से दूसरे महानगर पहुंचाने वाली बुलेट रेल, कम्प्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट (यदि चतुर्थ काल में होता तो सीता को खोजने में इतनी मशक्कत नहीं करना पड़ती।) आदि कितनी उन्नति हो रही है इस काल में फिर कहाँ है पंचमकाल?

इतना ही नहीं कि लौकिक क्षेत्र में ही नहीं धार्मिक क्षेत्र में भी दर्शनीय उन्नति हो रही है।

चतुर्थ काल में लाखों वर्षों में पंचकल्याणक देखने को मिलते थे आज साल में ५० से अधिक हो रहे हैं। गांव- गांव, नगर- नगर में मंदिर, स्वाध्याय भवन, शिविर, साहित्य प्रकाशन, चातुर्मास, तीर्थ यात्रा, विशाल शोभायात्रायें निकल रही हैं, कहाँ तो हजारों वर्षों में कुछेक तीर्थ थे आज तो हर हाइवे पर नया गिरि/धाम शोभायमान हो रहा है, पंच सितारा धर्मशालायें बन रही हैं, दानदाताओं/व्रतियों/प्रवचनकारों की फेहरिश्त लम्बी होती जा रही है जिस तरफ देखें उन्नति ही उन्नति फिर कैसा अवसर्पिणी/हीन/ दुखमा /पंचमकाल? कहाँ है पंचमकाल? किसी को कहीं दिखा हो तो बताना।
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मित्रो! चतुर्थ/पंचमकाल यह भवनों या सुविधा- असुविधा, मंदिरों की संख्या से नहीं अपितु मन के भावों और तन्निमित्तक तन से है। आज भोग सामग्री की प्रगति हो रही है यहाँ तक कि तीर्थ, मंदिर और स्वाध्याय भवन भी साधना की नहीं साधनों की मुख्यता से बन रहे हैं, आश्रम भी रिसोर्ट की तरह मनोहारी बन रहे हैं।
विगत २००० वर्षों में ९ भारतीय दर्शन थे जो पिछले १०० वर्ष ९० हो गये होंगे। मंदिर कम थे पर मन सब के एक थे।

साधन नहीं थे, पर साधना के भाव थे।

मोबाइल पर दूर की बातें नहीं जानते/सुनते थे, पर अंतरंग मित्रों व अपने अंतरंग की बातें जानते/सुनते थे।

एक ग्रन्थ में दस लोग स्वाध्याय कर लेते थे, आज १० ग्रन्थ मंदिर में रखने वाले हैं पर पढ़ने वाले १-२ भी हों तो सौभाग्य है।

पहले विशाल मंदिर किसने बनाये खोजना मुश्किल पर आज एक वेदी पर भी दानदाताओं की लंबी सूची कहीं भी मिल सकती है।

पहले आचार्यों ने महान ग्रन्थों की रचना की पर लेखक/आचार्य का नाम आज भी शोध का विषय है और आज के लेखक का वंशवृक्ष, आकर्षक मुखमुद्राओं में एक ग्रन्थ में अनेक स्थानों पर देख सकते हैं।

लाखों वर्षों एक ही जिनधर्म प्रवर्तित रहा पर दो हजार वर्षों में हम दिगम्बर/श्वेताम्बर दो भागों से लेकर तेरह/बीस पंथ, स्थानकवासी/मूर्तिपूजक से लेकर अब तो हर गुरु के अलग अलग सम्प्रदाय/पंथ/परम्परा होती जा रही हैं और सभी अपने को उत्कृष्ट दिखाने के फेर में निकृष्ट प्रवृत्ति कर रहे हैं।

पहले पारिवारिक संपत्ति भी पारमार्थिक कार्य को बिना नाम सोंप देते थे आज पारमार्थिक संपत्ति को भी पारिवारिक की तरह इस्तेमाल करने के भाव हो रहे हैं।

पहले संयमित जीवन जीने वाले और विद्वज्जनों का आदर श्रेष्ठी करते थे आज श्रेष्ठियों के पीछे ही सारा जगत होता जा रहा है।

चतुर्थ काल में बादल विघटते/बाल सफेद होते देखकर ही वैराग्य हो जाता था पर आज तो सैकड़ों की मृत्यु, दुर्घटनायें भी हमें प्रभावित नहीं करती, पहले घर में भी वैरागी के गीत गाये जाते थे आज वैरागियों के राग की वीडियो वायरल हो रहे हैं।

मित्रो! इन गिरते हुए परिणामों में ही पंचमकाल छुपा हुआ है। यह विकृतियां बढ़ने ही वाली हैं, आप चतुर्थ काल नहीं ला सकते परन्तु यदि आप स्वयं इसके प्रभाव से बचना चाहते हैं तो अपने गिरते परिणामों की सम्हाल कर जगत से निष्पक्ष/निरपेक्ष/सरल रहकर आत्महित की भावना से पूजन/स्वाध्याय/दान आदि कार्य करें तो चतुर्थ काल ही है।

प्रस्तुति
*समर्पण*
समर्पण व्यक्ति नहीं भावना है।
११/११/17. ८.३० रात

आगम विरुद्ध कुछ हो तो 🙏🙏🙏

13/10/2017

*मैं*
कुछ ऐसा लिखूंगा
जो किसी ने अब तक लिखा न हो

*मैं*
अब कुछ ऐसा कहूंगा
जैसा जमाने में किसी ने कहा न हो

*मैं*
कुछ ऐसा करूंगा
जो किसी ने भी अब तक किया न हो

*मैं*
दान करूंगा इतना/ऐसा
जितना/जैसा अब तक किसी ने दिया न हो

ऐसा

कुछ मूर्ख
रात- दिन सोचते हैं।

प्रस्तुति *समर्पण*
१३/१०/17
रात १०.४५

22/05/2017

*शाश्वत धाम समाचार*

*कक्षा १२ (वरिष्ठ उपाध्याय) के*
*उज्वल परिणाम*

संस्कार तीर्थ शाश्वत धाम द्वारा संचालित जैन दर्शन कन्या महाविद्यालय की प्रथम बैच के परिणाम आ गए हैं। संस्था का परिणाम अत्यंत उत्साहवर्धक रहा।

प्रथम बैच में कुल १३ बालिकाएँ थी और शत प्रतिशत बालिकाएँ अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण हुयी। विस्तृत परिणाम निम्नलिखित है।

*शाश्वत प्रियंका : 83.4%*
शाश्वत श्रद्धा : 82.8%
शाश्वत भाविका : 82.6%
शाश्वत दैवी : 80.2%
शाश्वत आशिक़ा : 76.4%
शाश्वत मानसी : 76.2%
शाश्वत शिवानी : 72.8%
शाश्वत अनुभूति : 70.8%
शाश्वत प्रज्ञा : 68.8%
शाश्वत चारुल : 68.8%
शाश्वत किंजल : 68.0%
शाश्वत पूजा : 54.8%

आपके अपने शाश्वत धाम की बालिकाएँ संस्कारों में भी आगे और पढ़ाई में भी !!!

23/03/2017

*शाश्वतधाम पंच कल्याणक, उदयपुर*

सादर जय जिनेंद्र।

*संस्कार तीर्थ शाश्वतधाम, उदयपुर* में निर्माणाधीन श्री सीमंधर जिनालय में प्रतिष्ठित होनेवाले जिनबिंबों का *पंच कल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव* २ से ७ दिसम्बर २०१७ तक आयोजित हो रहा है।

इस महा महोत्सव में अविरत ज्ञान गंगा बहाने का संकल्प है। कई वरिष्ठ व प्रतिभाशाली विद्वानों के प्रवचन - गोष्ठी आदि के साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से सम्पूर्ण कार्यक्रम के दौरान अलग अलग विडीओ का प्रसारण होगा।

इसलिए जो जो युवा साधर्मी इस प्रकार के गीत, शॉर्ट फ़िल्म, ऐनिमेशन फ़िल्म, सदाचार की प्रेरणा देनेवाली कथायें, हमारे सिद्धक्षेत्रों की जानकारी,ग्रंथों पर ( द्रव्यानुयोग की प्राथमिकता ) आधारित कार्यक्रम, पू गुरुदेव श्री के जीवन व वचनामृत के विडीओ बनाते हैं, उनसे निवेदन हैं की कृपया अपनी कृतियाँ हमें भेजें जिन्हें पंच कल्याणक के दौरान प्रसारित किया जाएगा।

इसके अतिरिक्त देशभर में संचालित सभी मुमुक्षु संस्थाएँ, छात्रावास, मंदिर संकुल भी अपने विडीओ हमें भेज सकते हैं। इन विडीओज की ऑडीओ तथा विडीओ क्वालिटी प्रसारण योग्य हो इस बात का ख़याल रखें।

कृपया सम्पर्क करें:

कौशल लाखानी +91 97125 15151
[email protected]
मिलन शाह +91 99980 50477
[email protected]

अजित जैन,
संयोजक, संस्कार तीर्थ शाश्वतधाम
अध्यक्ष, पंच कल्याणक प्रतिष्ठा समिति

*ज्ञानधारा कैलेंडर का विमोचन*आज संस्कार तीर्थ शाश्वत धाम उदयपुर में पधारे डॉ श्री विनोद चिन्मय तथा डॉ मुकेश तन्मय ने वर्...
29/12/2016

*ज्ञानधारा कैलेंडर का विमोचन*

आज संस्कार तीर्थ शाश्वत धाम उदयपुर में पधारे डॉ श्री विनोद चिन्मय तथा डॉ मुकेश तन्मय ने वर्ष २०१७ के ज्ञानधारा कैलेंडर का विमोचन किया। इस प्रसंगपर शाश्वत धाम के ट्रस्टी श्री राजकुमारजी तथा श्री आई एस जैन भी उपस्थित थे।

ज्ञानधारा पत्रिका के पाठकों को २०१७ का कैलेंडर भेजा गया है लेकिन यदि किसी संस्था या व्यक्ति को अधिक संख्या में आवश्यकता हो तो कृपया डॉ मुकेश तन्मयजी का सम्पर्क कर सकते हैं। उनका नम्बर 094251 48507 है।

28/12/2016

*पुत्र का पत्र पिता के नाम*

पूज्य पिताजी!
आपके आशीर्वाद से
आपकी भावनाओं/इच्छाओं के अनुरूप
मैं अमेरिका में व्यस्त हूं
यहाँ
पैसा, बंगला, साधन सब हैं
नहीं है तो केवल
समय।

मैं आपसे मिलना चाहता हूं
आपके पास बैठकर बातें करना चाहता हूँ
आपके दुख दर्द को बांटना चाहता हूँ
परन्तु
क्षेत्र की दूरी
बच्चों के अध्ययन की मजबूरी
कार्यालय का काम करना जरूरी
क्या करूँ? कैसे कहूँ?
चाह कर भी
स्वर्ग जैसी जन्म भूमि और माँ के पास
आ नहीं सकता।

पिताजी।!
मेरे पास अनेक सन्देश आते हैं -
"माता-पिता सब बेंचकर भी बच्चों को पढ़ाते हैं
और बच्चे
सबको छोड़ परदेस चले जाते हैं
नालायक पुत्र
माता-पिता के किसी काम नहीं आते हैं। "

पर पिताजी
मैं कहाँ जानता था
इंजीनियरिंग क्या होती है?
मैं कहाँ जानता था कि पैसे की कीमत क्या होती है?
मुझे कहाँ पता था कि अमेरिका कहाँ है ?
मेरा कॉलेज, पैसा और अमेरिका तो बस
आपकी गोद ही थी न?

आपने ही मंदिर न भेजकर स्कूल भेजा
पाठशाला नहीं कोचिंग भेजा
आपने अपने मन में दबी इच्छाओं को पूरा करने
इंजीनियरिंग /पैसा /पद की कीमत
गोद में बिठा बिठाकर सिखाई
माँ ने भी दूध पिलाते हुये
मेरा राजा बेटा बड़ा आदमी बनेगा
गाड़ी बंगला होगा हवा में उड़ेगा
कहा था
मेरी लौकिक उन्नति के लिए
घी के दीपक जलाये थे।।

मेरे पूज्य पिताजी!
मैं बस आपसे इतना पूछना चाहता हूं
मैं आपकी सेवा नहीं कर पा रहा
मैं बीमारी में दवा देने नहीं आ पा रहा
मैं चाहकर भी पुत्र धर्म नहीं निभा पा रहा
मैं हजारों किलोमीटर दूर
बंगले में और आप
गाँव के उसी पुराने मकान में
क्या इसका दोष सिर्फ़ मेरा है?
**
आपका नालायक पुत्र
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प्रस्तुति *समर्पण*
१४/१२/16 5.50

13/12/2016
🙏🙏🙏हार्दिक आमंत्रण🙏🙏🙏◆श्री कुन्दकुन्द कहान शाश्वत पारमार्थिक ट्रस्ट उदयपुर◆    वर्तमान शासन नायक परम आराध्य भगवान श्री म...
02/12/2016

🙏🙏🙏हार्दिक आमंत्रण🙏🙏🙏
◆श्री कुन्दकुन्द कहान शाश्वत पारमार्थिक ट्रस्ट उदयपुर◆
वर्तमान शासन नायक परम आराध्य भगवान श्री महावीर, परमपूज्य कुन्दकुन्द आदि आचार्य, एवं ज्ञानी पुरुषों द्वारा उद्घाटित तत्वज्ञान की प्रभावना हेतु,
आध्यात्मिक सत्पुरुष पूज्य गुरुदेवश्री कानजी स्वामी के पुण्य प्रभावना योगमें-
◆श्री आदिनाथ दिगंबर जिनबिम्ब
पंच कल्याणक प्रतिष्ठा मोहत्सव
2 दिसंबर 2017 से 7 दिसंबर 2017 तक आयोजित होने जा रहा है।
इस महा महोत्सव की सूचना एक वर्ष पूर्व देने का एकमात्र उद्देश्य यही है कि आप सभी अपने परिजन और मित्र परिवार सहित इस मंगल अवसर पर अवश्य पधारें, अपना मानस अभी से बना लें तथा इस समयावधि में अपने पारिवारिक आयोजन ना रखें।
इस महा महोत्सव को अभूतपूर्व सफलता प्रदान करने के लिए आप सभी के संपूर्ण सहयोग एवं सहभाग की अपेक्षा है।
संपर्क- +919414103492
■संस्कारतीर्थ शाश्वत धाम, उदयपुर■

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@[468659506561157:]

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