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07/11/2022
आज 7 नवंबर महान वैज्ञानिक मेरी क्यूरी का जन्मदिन है।मैरी स्क्लाडोवका क्यूरी (लघु नाम: मैरी क्यूरी)विख्यात भौतिकविद और रस...
07/11/2022

आज 7 नवंबर महान वैज्ञानिक मेरी क्यूरी का जन्मदिन है।
मैरी स्क्लाडोवका क्यूरी (लघु नाम: मैरी क्यूरी)विख्यात भौतिकविद और रसायनशास्त्री थी। मेरी ने रेडियम की खोज की थी।विज्ञान की दो शाखाओं (भौतिकी एवं रसायन विज्ञान) में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने वाली वह पहली वैज्ञानिक हैं।
वैज्ञानिक मां की दोनों बेटियों ने भी नोबल पुरस्कार प्राप्त किया। बडी बेटी आइरीन को 1935में रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ तो छोटी बेटी ईव को 1965 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।
मेरी का जन्म पोलैंड के वारसा नगर में हुआ था। महिला होने के कारण तत्कालीन वारसॉ में उन्हें सीमित शिक्षा की ही अनुमति थी। इसलिए उन्हें छुप-छुपाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करनी पड़ी। बाद में बड़ी बहन की आर्थिक सहायता की बदौलत वह भौतिकी और गणित की पढ़ाई के लिए पेरिस आईं। उन्होंने फ़्रांस में डॉक्टरेट पूरा करने वाली पहली महिला होने का गौरव पाया। उन्हें पेरिसविश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर बनने वाली पहली महिला होने का गौरव भी मिला। यहीं उनकी मुलाक़ात पियरे क्यूरी से हुई जो उनके पति बने। इस वैज्ञानिक दंपत्ति ने 1898 में पोलोनियम की महत्त्वपूर्ण खोज की। कुछ ही महीने बाद उन्होंने रेडियम की खोज भी की। चिकित्सा विज्ञान और रोगों के उपचार में यह एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी खोज साबित हुई। 1903 में मेरी क्यूरी ने पी-एच.डी. पूरी कर ली। इसी वर्ष इस दंपत्ति को रेडियोएक्टिविटी की खोज के लिए भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला। 1911 में उन्हें रसायन विज्ञान के क्षेत्र में रेडियम के शुद्धीकरण (आइसोलेशन ऑफ प्योर रेडियम) के लिए रसायनशास्त्र का नोबेल पुरस्कार भी मिला। विज्ञान की दो शाखाओं में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने वाली वह पहली वैज्ञानिक हैं। वैज्ञानिक मां की दोनों बेटियों ने भी नोबल पुरस्कार प्राप्त किया। बडी बेटी आइरीन को 1935 में रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ तो छोटी बेटी ईव को 1965 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिला।
पुरस्कार :
भौतिकी नोबेल पुरस्कार (1903)
डेवी मेडल (1903)
मैटेक्की मेडल (1904)
एलीयट क्रेसन मेडल (1909)
अलबर्ट मेडल (1910)
रसायन नोबेल पुरस्कार (1911)
विलियर्ड गिब्स पुरस्कार (1921)

कृतज्ञ नमन
28/10/2022

कृतज्ञ नमन

मार्गरेट एलिजाबेथ नोबेल का जन्म 28 अक्टूबर 1867 को आयरलैंड में हुआ था। प्रारंभिक जीवन में उन्होंने कला और संगीत का अच्छा ज्ञान हासिल किया। नोबेल ने पेशे के रूप में शिक्षा क्षेत्र को अपनाया। नोबेल के जीवन में निर्णायक मोड़ 1895 में उस समय आया जब लंदन में उनकी स्वामी विवेकानंद से मुलाकात हुई। स्वामी विवेकानंद के उदात्त दृष्टिकोण, वीरोचित व्यवहार और स्नेहाकर्षण ने निवेदिता के मन में यह बात पूरी तरह बिठा दी कि भारत ही उनकी वास्तविक कर्मभूमि है। इसके तीन साल बाद वह भारत आ गईं और भगिनी निवेदिता के नाम से पहचानी गईं।

स्वामी विवेकानंद ने नोबेल को 25 मार्च 1898 को दीक्षा देकर मानव मात्र के प्रति भगवान बुद्ध के करुणा के पथ पर चलने की प्रेरणा दी। दीक्षा देते हुए स्वामी विवेकानंद ने अपने प्रेरणाप्रद शब्दों में उनसे कहा- जाओ और उस महान व्यक्ति का अनुसरण करो जिसने 500 बार जन्म लेकर अपना जीवन लोककल्याण के लिए समर्पित किया और फिर बुद्धत्व प्राप्त किया। दीक्षा के समय स्वामी विवेकानंद ने उन्हें नया नाम निवेदिता दिया और बाद में वह पूरे देश में इसी नाम से विख्यात हुईं। भगिनी निवेदिता कुछ समय अपने गुरु स्वामी विवेकानंद के साथ भारत भ्रमण करने के बाद अंतत: कलकत्ता में बस गईं। अपने गुरु की प्रेरणा से उन्होंने कलकत्ता में लड़कियों के लिए स्कूल खोला। निवेदिता स्कूल का उद्घाटन रामकृष्ण परमहंस की जीवनसंगिनी मां शारदा ने किया था। मां शारदा ने सदैव भगिनी निवेदिता को अपनी पुत्री की तरह स्नेह दिया और बालिका शिक्षा के उनके प्रयासों को हमेशा प्रोत्साहित किया। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में बांग्ला विभाग के पूर्व अध्यक्ष अमरनाथ गांगुली ने कहा कि मार्गरेट नोबेल को स्वामी विवेकानंद ने निवेदिता नाम दिया था। इसके दो अर्थ हो सकते हैं एक तो ऐसी महिला जिसने अपने गुरु के चरणों में अपना जीवन अर्पित कर दिया, जबकि दूसरा अर्थ निवेदिता पर ज्यादा सही बैठता है कि एक ऐसी महिला जिन्होंने स्त्री शिक्षा के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया।

गांगुली ने कहा कि सिस्टर निवेदिता में एक आग थी और स्वामी विवेकानंद ने उस आग को पहचाना। निवेदिता अपने गुरु की प्रेरणा से स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में उस समय उतरीं जब समाज के संभ्रांत लोग भी अपनी लड़कियों को स्कूल भेजना पसंद नहीं करते थे। ऐसे समाज में स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देना निवेदिता जैसी जीवट महिला के प्रयासों से ही संभव हो सका। कलकत्ता प्रवास के दौरान भगिनी निवेदिता के संपर्क में उस दौर के सभी प्रमुख लोग आये। उनके साथ संपर्क रखने वाले प्रमुख लोगों में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर, वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु, शिल्पकार हैमेल तथा अवनीन्द्रनाथ ठाकुर और चित्रकार नंदलाल बोस शामिल हैं। उन्होंने रमेशचन्द्र दत्त और यदुनाथ सरकार को भारतीय नजरिए से इतिहास लिखने की प्रेरणा दी। गांगुली ने सिस्टर निवेदिता के देशप्रेम की चर्चा करते हुए कहा कि आयरिश होने के कारण स्वतंत्रता प्रेम उनके रक्त में था। ऐसे में यह बेहद स्वाभाविक था कि उन्होंने भारत में स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों का समर्थन किया और उन्हें सहयोग दिया। भारत प्रेमी भगिनी निवेदिता दुर्गापूजा की छुट्टियों में भ्रमण के लिए दार्जीलिंग गई थीं। लेकिन वहां उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया और अंत में 13 अक्टूबर 1911 को 44 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस एवं विख्यात स्वतंत्रता सेनानी विश्वंभर दयालु त्रिपाठी जी के जन्मदिवस की अनंत शुभकामनाएं यह सं...
05/10/2022

अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस एवं विख्यात स्वतंत्रता सेनानी विश्वंभर दयालु त्रिपाठी जी के जन्मदिवस की अनंत शुभकामनाएं

यह संयोग मात्र ही है कि विश्व शिक्षक दिवस एवं वीडीटी इंटर कॉलेज मियागंज उन्नाव जिनके नाम पर है वह प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी एवं शिक्षाविद स्वर्गीय विशंभर दयालु त्रिपाठी जी का जन्मदिवस एक ही तिथि को होता है आता है वीडीटी इंटर कॉलेज मियागंज उन्नाव विद्यालय परिवार की ओर से समस्त शिक्षकों को अनंत शुभकामनाएं

अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस की इस वजह से हुई थी शुरुआत, जानें कब होता है।

अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस की इस वजह से हुई थी शुरुआत, जानें कब होता है।

International teacher’s day 2021: विश्व भर में शिक्षकों को सम्मान और उन्हें मान्यता देने के लिए दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस मनाया जाता है।

International teacher’s day 2021: हम सब जानते हैं कि हम अपने महान शिक्षक सर्वपल्ली राधाकृष्णन की याद में हर साल 5 सितंबर को शिक्षक दिवस (teacher’s day) मनाते हैं. लेकिन वैश्विक स्तर पर अंतरराष्ट्रीय शिक्षक दिवस (International Teachers Day) 5 अक्टूबर को मनाया जाता है. हालांकि इसे मनाने के लिए यूनेस्को (UNESCO ) और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (International Labour Organization -ILO) ने 1966 में ही मसौदे को मंजूरी दी थी लेकिन इसे 5 अक्टूबर 1994 को स्वीकार किया गया.

इसलिए विश्व भर में शिक्षकों को सम्मान और उन्हें मान्यता देने के लिए दुनिया भर में आयोजन किए जाते हैं. साथ ही यूनेस्को और अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा समाज द्वारा स्टूडेंट्स के विकास में शिक्षकों के योगदान को बेहतर तरीके से समझने के लिए अभियान चलाया जाता है. इसके लिए यूनेस्को कई गैर सरकारी संस्था और मीडिया संस्थानों से भी साझेदारी करता है.

विश्व शिक्षक दिवस का महत्व
अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस का उद्येश्य विश्व के शिक्षकों की सराहना, मूल्यांकन और सुधार पर लोगों का ध्यान केंद्रित करना है. इस दिन शिक्षण और शिक्षकों के मुलभूत मुद्दे पर चर्चा करने का अवसर मिलता है. इसके अलावा इस दिन विश्व के शिक्षकों की जिम्मेदारी, उनके अधिकार और आगे की शिक्षा के लिए उनकी तैयारी और मानक को महत्व दिया जाता है.

विश्व शिक्षक दिवस का इतिहास
1966 में यूनेस्को और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की एक बैठक में शिक्षकों के अधिकारों, जिम्मेदारियों, रोजगार और आगे की शिक्षा के साथ गाइडलाइन बनाने की बात कही गई थी. संयुक्त राष्ट्र में विश्व शिक्षक दिवस को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाने के लिए साल 1994 में 100 देशों के समर्थन से यूनेस्को की सिफारिश को पारित कर दिया गया. इसके बाद 5 अक्टूबर 1994 से अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस मनाया जाने लगा.

विश्व शिक्षक दिवस 2021 की थीम
इस साल विश्व शिक्षक दिवस 2021 की थीम है – शिक्षकः बढ़ते संकट के बीच भविष्य की नई कल्पना (Teachers: leading in crisis, re imagining the future). अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक दिवस यूनिसेफ, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन और अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा (Education International) के साथ साझेदारी में मनाया जाता है. सतत विकास लक्ष्य-4 के तहत एजुकेशन 2030 एजेंडा ( Education 2030 agenda) के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए शिक्षकों के योगदान को सर्वोच्च मान्यता देने की बात कही गई है

19/08/2022
12/12/2021
एक मुकम्मल ईमान मुसलमान अमर शहीद अशफाकउल्लाह खान को जन्मदिन पर सलाम ! पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के इस छोटे भाई जैसे जाबांज...
22/10/2021

एक मुकम्मल ईमान मुसलमान अमर शहीद अशफाकउल्लाह खान को जन्मदिन पर सलाम ! पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के इस छोटे भाई जैसे जाबांज साथी को अपनी ज़िंदगी की आखरी रात तक बस इस बात का गिला रहा कि मादर ए वतन पर कुर्बान होने के लिए मैं एक ही बार पैदा हो सका ! अल्लाह से ज़न्नत के बदले हिन्द पर फ़िदा होने के लिए दूसरा जन्म मांगने की ख्वाहिश रखने वाले इस सितारे को सौ-सौ सलाम ! स्वर्गीय अग्निवेश शुक्ल की अप्रतिम कविता का एक अंश हिंदुस्तान के इस प्यारे बेटे को सादर समर्पित...❤️🇮🇳🙏
"जाऊँगा खाली हाथ मगर ये दर्द साथ ही जायेगा,
जाने किस दिन हिन्दोस्तान आज़ाद वतन कहलायेगा?
बिस्मिल हिन्दू हैं कहते हैं "फिर आऊँगा,फिर आऊँगा,
फिर आकर के ऐ भारतमाँ तुझको आज़ाद कराऊँगा".
जी करता है मैं भी कह दूँ पर मजहब से बंध जाता हूँ,
मैं मुसलमान हूँ पुनर्जन्म की बात नहीं कर पाता हूँ;
हाँ ख़ुदा अगर मिल गया कहीं अपनी झोली फैला दूँगा,
और जन्नत के बदले उससे एक पुनर्जन्म ही माँगूंगा...!”

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