24/06/2020
एक ऐतिहासिक परिचय क्षत्रिय महासभा तदर्थनाम अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा स्थापना दिवस -----
संक्षिप्त उदभव इतिहास एवं शिक्षाविद राजा उदय प्रताप सिंह जूदेव का योगदान
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1857 के स्वतंत्रता के इतिहास का अहम् योगदान था क्षत्रिय सभा के निर्माण में ---
अंग्रेजी शासन काल में ,प्रथम स्वतंत्रता संग्राम अंग्रेजों द्वारा क्षत्रियों के विरुद्ध अपनाई गई कलुषित नीति के विरुद्ध विदेशी दासता से मुक्ति पाने के लिए एक खुली अघोषित क्रांति थी जिसका प्रमुख केंद्र बिंदु उत्तर भारत था ।शुरुआत में इसके सूत्रपात्र के दो मुख्य श्रोत "सैनिक क्रांति "और "जन क्रांति "थे ।इसके सूत्रपात्र का जिम्मा शुरुआती दौर में उत्तरप्रदेश ,बिहार ,मध्यप्रदेश ,दिल्ली ,पंजाब (वर्तमान हरियाणा )तथा आँध्रप्रदेश के उत्पीड़ित क्षत्रिय शासकों एवं मुस्लिम नबाबों ने उठाया था ।यह क्षत्रिय -मुस्लिम एकता का अदभुत संगम था ।सयुक्त प्रान्त , आगरा एवं अवध में , अवध की वेगमों ,बनारस के राजा चेत सिंह की फांसी ,रुहेलखण्ड के क्षत्रिय सरदारों के प्रति ईस्ट इंडिया कंपनी की उपेक्षा पूर्ण नीति और दिल्ली के अंतिम मुगल शासक बहादुरशाह जफ़र के दो बेटों को दिल्ली में बीच मार्ग पर खड़ा करके गोली मारने की घटना ने आग में घी डालने का काम किया ,साथ ही क्षत्रिय राजाओं को गोद लेने की प्रथा को समाप्त करने की लार्ड डलहौजी की घोषणा ने भी भीषण जनक्रांति को जन्म दिया ।
परिणामस्वरूप मुग़ल शासक बहादुरशाह जफ़र के झंडे के नेतृत्व में बेगम हजरत महल ,झांसी की रानी लक्ष्मीबाई , बाजीराव पेशवा ,अवध के राजा बेनी माधव सिंह ,उन्नाव के राव रामबक्श सिंह बैस ,बाबू कुंवर वीरसिंह पंवार जगदीशपुर ,दरियाव सिंह खागा ,राजा नरपति सिंह हरदोई ,शिवरतन सिंह हिस्था सेमरी बिहार ,गालब सिंह अलुरी ,सीताराम राजू आंध्र प्रदेश तथा रानी निड़ाल नागालैंड आदि ने क्रांति कर लाखों क्रांतिकारियों के साथ क्रांति की ज्वाला को प्रज्जवलित कर दिया ।
इसी समय गोंडा के राजा देवी बख्श सिंह बिसेन ,कालाकांकर के राजा हनुमंत सिंह ,प्रताप सिंह ,माधोसिंह ,अवध के राजा बैनी माधव सिंह ,दरियाव सिंह ,बाबूसहलन सिंह ,जोधराज सिंह खीरी आदि राजाओं ने अवध की वेगम हजरत महल के योगदान से कालाकांकर के गंगा पुलिन पर "राम दल "का 16मई 1857ई0 में गठन किया जिसका प्रतीक चिन्ह "श्री राम "के चिन्ह के साथ लाल कमल का फूल था और जिसके प्रचार तंत्र में योगी एवं साधुमहात्मा भी घर- घर जाकर क्रांति का प्रचार -प्रसार कर रहे थे ।अंग्रेजी हुकूमत में अवध के जो सरदार लगान नही देपारहे थे उनकी जमीन जप्त कर लीगयी और उनको उनके अधिकारों से वेदखल कर दिया गया ।इस कठोर नीति ने जनक्रांति को वीभत्स रूप प्रदान किया ।इसी समय अंग्रेजों के द्वारा प्रदत्त बंदूकों की गोलियों से गाय और सूअर की चरबियों के लगाने से हिन्दू और मुस्लिम सैनिकों में धार्मिक उन्माद ने क्रांति के रूप में जन्म ले लिया ।क्रांति के लिए निर्धारित तिथि 31 मई0 1857ई0 थी पर इसके पूर्व ही 26फरवरी 1857 ई0 को सैनिक छावनी बहरामपुर में विद्रोह हुआ लेकिन उसे दवा दिया गया ।31 मार्च 1857ई0 में मंगल पांडे ने विद्रोह कर दिया और विद्रोह की ज्वाला भड़क गयी ।बैसवाडा क्षेत्र उस समय ब्रिटिश फ़ौज की छावनी थी ,जहाँ 40000 हजारसे अधिक क्षत्रिय सरदार सेना में सैनिक थे ।करीव तीस हजार पेंशन पारहे थे इनको युद्ध का अनुभव था ।वे सभी राजाओं की क्रांति सेना में भर्ती होगये ।नवाब रुहेलखण्ड की सेना में पिचहत्तर हजार बैस राजपूत सैनिक ,बैस वाड़ा के राजा बेनी माधव की सेना में 35 हजार सैनिक थे ।बैस वाङा केहर परिवार से हर एक व्यक्ति उनकी सेना का अंग था ।बिहार के कुंवर वीर सिंह की सेना में 65 हजार विद्रोही सैनिक शामिल थे ।
यह एक महान क्रांति का समय था ।अंग्रेज गरीब भारतीयों को धन के लालच से ईसाई बना रहे थे ।इसी समय कुछ क्षत्रिय राजाओं और नवाबों के अत्याचारों से पीड़ित थे वे परोक्ष रूप से अंग्रेजों से मिले रहे ,जिससे उनको सामाजिक उपेक्षा का शिकार तो होना ही पड़ा ,पर इसे क्षत्रियो को लामबन्द करके इस बलि बेदी पर एक सूत्र में बाँधने की आवश्यकता का अनुभव हुआ ।कालाकांकर प्रतापगढ़ के राजा हनुमंत सिंह के नेतृत्व में गंगा -जमुना क्रांति के प्रवाह में "राम दल "नाम के संघ ने गोपनीय तरीके से क्लब के रूपमें क्षत्रिय महासभा के सूत्रपात्र को जन्म दिया और क्षत्रियों ने "राम दल " को विघटित कर उसके स्थान पर 1860 ई0 में "क्षत्रिय हितकारणी सभा का गठन किया पर यह राजाओं ,राजदरवारियों और उनके सहयोगियों का संगठन आम बन कर रह गया जिसका कार्य क्षेत्र उत्तरप्रदेश (प्रतापगढ़ ,गोरखपुर ,आजमगढ़ ,बलिया ,रायबरेली ,उन्नाव ,आगरा ,मथुरा ,हरदोई ,मैनपुरी ,गोंडा ),मध्यप्रदेश ,राजस्थान ,गुजरात ,बंगाल ,जम्बू कश्मीर ,पंजाब (वर्तमान हरियाणा )तक ही सीमित था जिसके सरपरस्त अंग्रेजों के शुभचिंतक थे इस कारण इससे क्रांति कारियों के परिवारों ने प्रायः दूरी बना कर रखी गई ।कालाकांकर जन्मी क्षत्रिय हितकारणी सभा ने कालान्तर में आगरा और अवध के नाम को परिवर्तित कर संयुक्त प्रान्त आगरा और अवध के नाम से पंजीकृत किया ।
अवागढ़ ,एटा के राजा बलवंत सिंह के नेतृत्व में तत्काल समिति के प्रतिनिधि ठाकुर उमराव सिंह कोटला , राजर्षि राजा उदयप्रताप सिंह जू देव ,राजा खडग बहादुर सिंह ,मझोली ,बिहार ,श्री रामदीन सिंह ,तथा राजा मल्ल एवं अन्य क्षत्रियों ने "क्षत्रिय हितकारणी सभा "को बदल कर इसका पुनः नामकरण "क्षत्रिय महासभा "रखा गया ।
इसी समय में संयुक्त प्रान्त आगरा और अवध के प्रदेश 19 अक्टूबर 1897 ई0 में भारतीय सोसाइटी अधिनियम के तहत राजधानी लखनऊ (लक्ष्मणपुर )अवध में सभा का पंजीकरण हुआ ।राजा बलवंत सिंह ,अवागढ़ ,एटा को संयुक्त प्रान्त आगरा एवं अवध को जनक (Founder )के रूप में अध्यक्ष निर्वाचित कर इसका पंजीकरण पंजीकृत कार्यालय 224 महात्मा गांधी मार्ग ,लखनऊ कैंट ,उत्तरप्रदेश तथा प्रधान कार्यालय मथुरा ,संयुक्त प्रान्त आगरा एवं अवध में रखा गया ।
कालान्तर में 09 -11 -1986ई0 में महाराजा लक्ष्मण सिंह डूंगरपुर के अध्यक्ष एवं श्री कोक सिंह भदौरिया ,राष्ट्रीय महामंत्री के समय में "क्षत्रिय महासभा " यह सभा भारत में "अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा "के रूप में सम्बोधित होगी ,के नाम से पुनरावृत्ति की गयी ।
तुम हमको यूँ ही भुला न पाओगे
देश जब अंग्रेजों की गुलामी की जंजीर में जकड़ा हुआ था उस समय आम राजपूत की आर्थिक एवं शैक्षनिक स्थित बहुत ही दयनीय थी । एक तरफ सामाजिक संगठन का आभाव व् दूसरी तरफ अशिक्षा ने समाज की उन्नति को खोखला कर रखा था । अधिकांश बड़े बड़े राजा व् महाराजा अंग्रेजों के कठपुतली बन चुके थे ।सामाजिक चेतना की जागृति करने का तो किसी ने सोचा भी नही था ।जादातर राजवाड़े अपनी सुख -सुविधाओं को बनाये रखने के लिए ही अंग्रेजों के आधीन थे ।उन्हें समाज के उत्थान से कोई लेना -देना भी नही था । देशके कुछ गिने -चुने छोटे राजाओं और जागीरदारों के मन में यह विचार आया कि क्षत्रिय समाज का कैसे उत्थान सम्भव है क्यों कि परिस्थितियां उस समय बहुत प्रतिकूल थी । कुछ जागीरदार एवं शिक्षित राजपूतो ने विचार कर समाज के शैक्षणिक विकास व् सामाजिक उत्थान के लिए संगठन बनाने का मंथन और चिंतन किया जिसमें राजा बलवंत सिंह अवागढ़ ,राजर्षि राजा उदयप्रताप सिंह जू देव ,ठाकुर उमराव सिंह ,राजा प्रताप सिंह जी जम्बू कश्मीर ने प्रचार प्रसार करके क्षत्रियों में शिक्षा व् सामाजिक उत्थान के लिए जागृति के लिए अभियान चलाया ।
ये हमारे लिए बड़े हर्ष एवँ स्वाभिमान का विषय है क़ि ये उन तीनों महापुरुषो के द्वारा बनाया गया क्षत्रियों का संगठन " क्षत्रिय महासभा" तदर्थ नाम "अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा " आज इतना बड़ा बट वृक्ष का रूप ले चुका है कि देश के सभी प्रान्तों के जिलों में विद्यमान है और राजपूत हितों के लिए कार्य कर रहा है ।कितनी उच्च कोटि की सोच थी ये राजपूत समाज के विकास के लिए उन महान व्यकित्व की ।केवल सोच ही नही थी इन तीनो राजपूत राजाओं ने समाज के सामाजिक विकास के अलावा शैक्षणिक विकास के लियेअपना महान योगदान भी दिया जिस आज हमारा समाज राजा बलवंत सिंह महाविद्यालय आगराऔर उदयप्रताप कॉलेज वनारस के रूप में देखते भी है और उसका हमने लाभ भी लिया जिसके लिए हम उनके हमेशा ऋणी भी रहेंगे। अधिकांश देश के पुराने शिक्षित राजपूत इन्हीं दोनों कॉलेज के पढे हुये है ।इन महाविद्यालयों का राजपूतों के शैक्षणिक विकास में आज भी बहुत बड़ा योगदान है और हर राजपूत विद्यार्थी बड़े गर्व से फक्र महसूस करते हुए कहता है कि मैं बलवंत राजपूत कॉलेज आगरा या राजा बलवंत सिंह कॉलेज आगरा और उदय प्रताप कॉलेज वनारस का शिक्षित व् संस्कारी क्षात्र हूँ ।
आज हमारे समाज में केवल ये ही सोच है कि "मैं और मेरा परिवार "।
अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा की प्रथम सभा आगरा में ठाकुर उमराव सिंह जी और उनके छोटे भाई नौ निहाल सिंह जी की कोठी "बाघ फरजाना "जिसको बाद में राजपूत बोर्डिंग हाउस का नाम दिया गया उसमें संपन्न हुई थी ।
20जनवरी 1898को राजा बलवंत सिंह जी और उनके दोनों सहयोगी राजा उदय प्रताप सिंह जी भिनगा और कोटिला के राजा उमराव सिंह ने बनारस के बाबू सांवल सिंह जी की अध्यक्षता में प्रस्ताव पारित करके क्षत्रिय समाज में एकता और जागृती लाने के उदेश्य से एक समाचार पत्र जिसका नाम "राजपूत मासिक "दिया गया प्रकाशित कर वाया गया जिसके माध्यम से देश के विभिन्न भागों में फैले हुए समस्त क्षत्रिय समाज में उनकी सामाजिक ,शैक्षणिक विकास एवं समस्याओं के निराकरण के जनसम्पर्क और नुक्कड़ सभाएं शुरू हुई थी । राजर्षि उदय प्रताप सिंह का योगदान इन कार्यक्रमों में बहुत था क्योंकि वे उच्च शिक्षित जहीन व्यक्ति थे। राजर्षि को भविष्य के बारे में पता था उनकी दृष्टि दिव्य थी।
Contribution of Raja Udai Pratap Singh Ji of Bhinga in Educational Development of Rajput Community.
राजा उदय प्रताप सिंह जी भिंगा राजपरिवार का भी राजपूतों के सामाजिक विकास के अतरिक्त शैक्षणिक विकास मेंभी महत्वपूर्ण व् सराहनीय योगदान रहा था ।वे स्वयं भी बहुत शिक्षित थे ।राजपूतों के शैक्षणिक विकास में उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा ।उन्होंने वाराणसी में सन् 1909 में हेवेत्त क्षत्रिय हाई स्कूल की स्थापना की जिसके लिए 100000 0रूपये दान दिए जो 1921 में इंटरमीडिएट कॉलेज में अपग्रेड हुआ जो बाद मेंउदय प्रताप इंटरमीडिएट कॉलेज के नाम से जाना गया ।बाद में 1949में डिग्री कॉलेज में अपग्रेड हुआ और जिसका नाम उदय प्रताप कॉलेज हुआ । बाद मे यह कालेज चन्द्रशेखर जी के प्रधानमंत्री काल मे स्वायत्तशासी हो गया । उदय प्रताप कॉलेज को स्वायत्तशासी करने की घोषणा प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी ने किया था ।उदय प्रताप कॉलेज को स्वायत्तशासी करने की घोषणा स्वयं तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी ने कालेज परिसर से किया था। राजा उदय प्रताप सिंह जी ने क्षत्रिय उपकर्णी महासभा की स्थापना की जिसके लिए भिनगा राज क्षत्रियों के लिए 35000रूपये दान दिए ।इसके अलावा वे हर साल क्षत्रिय ग्रेजुएट को ऑक्सफ़ोर्ड और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में शिक्षा पाने के लिए11000रूपये क्षात्रवृति के रूप में देते थे ।
राजर्षि स्वर्गीय पंडित मदन मोहन मालवीय जी की विचाधारा के अनुयायी थे ।उन्होंने उदय प्रताप कॉलेज के आलावा कई दूसरी संस्थाओं को आर्थिक सहायता प्रदान की ।राजा साहिब ने वाराणसी के कमच्छा में उर्फन्स होम ,भिनगा राज अनाथालय एस्टेब्लिशद किये जिसके लिए 123000रूपये खर्चे के लिए दान दिए ।उन्होंने लाखों रूपये दूसरे सामाजिक संगठनो को दान दिए जिनमें के0 जी0 मेडिकल कॉलेज लखनऊ ,कैल्विन तालुकुदार कॉलेज लखनऊ ,मूलघंध कुतिविहार ,सारनाथ ,हिंदी प्रचारिणी सभा सम्लित है ।उन्होंने राजपूत छात्रों के लिए कई छात्रवृति के रूप में फण्ड दिए जिसके लिए वे हमेशा याद किये जाएंगे ।
सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है क्षत्रिय महासभा के गठन ,कालेजों की स्थापना , रुप रचना इत्यदि का कार्य राजर्षि उदय प्रताप सिंह जू देव ने ही किमा था । इन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले राजा बलवंत सिह , जिन्होने RBS College आगरा की स्थापना किया था ,स्वयं बहुत पड़े लिखे नही थे । राजा बतवंत र्सिह को इस बात की टीस आजीवन रही । राजा उमराव सिंह भी सामान्य शिक्षित थे , परन्तु राजषि उदय प्रताप सिंह जू देव उच्च शिक्षित घे। इन तीनों महापुरुषों का योगदान शिक्षा के क्षेत्र में समाज सेवा के क्षेत्र में सदैव अग्रणी रहेगा। दुर्भाग्य है इतिहासकारों ने इन महान शिक्षाविदों के प्रति न्याय नहीं किया। मेरी दृष्टि में इतिहासकारों ने उन तमाम राजाओं के प्रति न्याय नहीं किया जिन्होंने अपना खजाना खोल के समाज के उत्थान के लिए शिक्षा के प्रसार और प्रचार के लिए सैकड़ों कालेजों की स्थापना किया था। भारतवर्ष में राजाओं और महाराजाओं द्वारा खोले गए कालेजों के पीछे राजर्षि उदय प्रताप सिंह जूदेव की प्रेरणा थी। धार्मिक नगरी काशी में भारतवर्ष के सभी राजाओं महाराजाओं का आना जाना था। राजर्षि उदय प्रताप सिंह जूदेव ऐसे प्रेरणा पुंज के रूप में उभरे जिनकी प्रेरणा को प्राप्त करके शिक्षा दान का महा अभियान चल पड़ा ।
ऐसे पुंज कभी अस्त नही होते सदैव प्रकाश देते रहते है । अमरत्व प्राप्त राजर्षि वह आकाश दीप है जो सदैव आपके हमारे रुप मे रोशनी विखेरते रहेगें।
त्रिभुवन प्रताप सिंह